गाँधी का सत्याग्रह - (सुशोभित)

 


“सच्चे अधिकार तो फ़र्ज़ के फल हैं।” [ ‘हिन्द स्वराज’ ]

वंश-परंपरा का भी कोई-न-कोई महत्त्व तो होता ही है। उसी से आपके गुणसूत्र तय होते हैं। दोस्तोयेव्स्की को क्रांति का शत्रु कहा जाता था। काफ़्का के बारे में लूकाच का मत था कि वे क्रांति को असंभव बना देते हैं। देखता हूँ, आजकल काफ़्का को उद्धृत करके उग्र विप्लव की भाषा बोली जाती है। यह बहुत ही आश्चर्यजनक है। गाँधीजी को भी एंटी रिवॉल्यूशन कहा गया है। यथास्थितिवादी कहकर फटकारा गया है। किसी और ने नहीं, स्वयं नायपॉल ने यह कहा है कि गाँधीजी की वजह से भारत को आज़ादी कोई पंद्रह-बीस साल देरी से मिली, यह 1930 के दशक में ही मिल जाना चाहिए थी। गाँधीजी से पूछें तो वे कहेंगे कि शायद 1947 में भी जल्दी ही मिल गई, शायद हम तब भी इसके लिए तैयार नहीं थे। अपने कार्य-व्यवहार से, लड़ाई, दंगा-फ़साद, हिंसा, वैमनस्य से हमने यही सिद्ध किया कि हम इस आज़ादी के लिए अभी पके नहीं हैं।

गाँधीजी ने मनुष्यता के इतिहास के महानतम प्रयोगों में से एक किया था। वह अत्यंत दुष्कर था। आप जीवनभर प्रयास करके एक व्यक्ति का उन्नयन नहीं कर सकते, गाँधीजी ने लाखों लोगों को संयमित किया, दृढ़ बनाया और उनके आचरण को नैतिक आभा से पुष्ट किया। वैसा उन्होंने स्वयं का उदाहरण सामने रखकर किया। “मेरा जीवन ही मेरा संदेश है”- वो यों ही नहीं कहते थे। एक नायक के बिना वैसे आंदोलन संभव नहीं हो सकते, और गाँधी जैसे नायक तो सहस्राब्दियों में एक उत्पन्न होते हैं। लाखों-करोड़ों की जिस भीड़ का गाँधीजी ने नेतृत्व किया, ये वे लोग थे, जो वंचित-पीड़ित थे, दासता की बेड़ियों में जकड़े थे, इन्हें सत्ता का प्रतिकार करना था, आंदोलन करना था, सड़कों पर उतरना था, किंतु एक क्षण को अपनी नैतिक निष्ठा नहीं गँवाना थी, और एक क्षण को हिंसक नहीं होना था। यह भला कैसे संभव हो सकता था?

किंतु यह हुआ। गाँधीजी ने सत्याग्रह की कुंजी दी। सविनय अवज्ञा का पाठ पढ़ाया। असहयोग का उपकरण दिया। अन्याय का प्रतिकार तो करना ही है, किंतु स्वयं अन्यायी हुए बिना कैसे करें? अगर स्वयं ही अन्यायी हो गए, तो हम फिर किस मुँह से न्याय माँगें? जब हम सड़क पर आंदोलन करने उतरें तो राज्यसत्ता हमें कैसे देखे? हम उसके साथ कैसा वास्ता रखें? हम उसे उकसाने का प्रयास करें तो इससे क्या लाभ? इससे तो वो उल्टे हठी ही बनेगी। अगर आंदोलन का मक़सद अन्याय का अंत करना है तो आंदोलनकारी तो यही चाहेगा कि तमाम रास्ते उस दिशा में जाएँ, जहाँ से कोई सूरत निकलती हो। जहाँ से बातचीत संभव होती हो। संवाद होता हो। समाधान निकलता हो। किंतु जिससे आपने दुश्मनी ही ठान ली हो, उससे आप संवाद कैसे करेंगे? तब सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना ही मक़सद रह गया, या सूरत बदले इसमें भी किसी को दिलचस्पी रह गई?

गाँधीजी का सत्याग्रह गेंद को प्रतिपक्षी के पाले में धकेल देता है। वह अपनी चाल चल देता है और प्रतिपक्षी के प्रत्युत्तर का इंतज़ार करता है। सामने वाले पक्ष को यहाँ एक नैतिक निर्णय लेना ही होता है, अन्यथा विश्व-भावना उसके विपरीत हो जाती है। सत्याग्रही अपने आचरण से अपने पक्ष में जनमत का निर्माण करता है, वह अपने प्रति घृणा उत्पन्न नहीं करता। लोगों में अपने प्रति घृणा उत्पन्न करवाना तो आंदोलन की जड़ में मट्ठा डालना होगा। उससे कुछ प्रतिफल नहीं मिल सकता।

जनसमूह जब एकत्र होता है तो उस पर कलुष बहुत जल्द हावी हो जाता है। विशेष रूप से वैसा जनसमूह जो आंदोलित हो। देखते-ही-देखते वह हिंसक हो जाता है। उसे संयमित करना कठिन है। चौरी-चौरा में गाँधीजी के मूल्य भी नहीं कर सके थे। इसका पछतावा भी उन्होंने तुरंत ही असहयोग आंदोलन वापस लेकर किया। कोई भी साधारण नेता इस तरह के निर्णय नहीं ले सकता। जिस आंदोलन ने भारत-देश की चेतना को वैसे ग्रस लिया था और एक सूत्र में बाँध दिया था, जैसे विगत पाँच हज़ार वर्षों के इतिहास में कभी नहीं हुआ था, उसे पश्चाताप-स्वरूप निरस्त कर देना बहुत ही दुष्कर था। किंतु गाँधी जैसा व्यक्ति ही वैसा निर्णय ले सकता था। प्रश्न तो यही था ना कि अगर हम स्वयं ही अन्यायी हो गए तो सामने वाले से न्याय की मांग किस मुँह से करेंगे? 1921 में गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस लेते समय वही सोचा था, जो शायद उन्होंने 1947 में सोचा होगा- “अभी हम इसके लिए तैयार नहीं हैं।” आज भला कौन है, जो ऐसे सोचता है कि हम किसी मूल्य के लिए तैयार हैं या नहीं? हम तो आज यही सोचते हैं कि हमें सारे अधिकार हैं, और जन्मजात अधिकार हैं। एनटाइटलमेंट की उद्धत भाषा।

वर्ष 1930 के वसंतांत में जब साबरमती आश्रम से डांडी तक गाँधीजी के सत्याग्रहियों का टोला चला, तो वह मनुष्यता के सबसे गौरवशाली क्षणों में से है। यह जनसमूह सागर संगम तक पहुँचा। गाँधीजी ने यात्रा आरंभ करते ही कहा, “किसी भी स्थिति के लिए मन बना लो। सत्याग्रही को जेल और मसान जाने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए। हमने अपने पुल जला दिए हैं। अब मैं लौटकर कभी साबरमती आश्रम नहीं जाऊँगा। यहाँ से अब कोई वापसी संभव नहीं है।” और हज़ारों-लाखों की भीड़ गाँधीजी के पीछे चल दी। साबरमती से उन्होंने कूच किया, नडियाड, आणंद, बोरसाड में दम लेने रुके, डांडी में उन्होंने नमक बनाया, धरासाणा में सत्याग्रियों को नेतृत्व दिया, यरवडा जेल में सरकार की रोटी तोड़ी, लेकिन एक पल को भी प्रतिज्ञा से नहीं डिगे। दुनिया ने चमत्कृत होकर यह दृश्य देखा और गाँधीजी के दल को नमन किया।

सत्यनिष्ठा की देवी ऐसे ही सत्याग्रहियों को खादी की माला पहनाकर उनका अभिनंदन करती है।

जहाँ हम संपूर्ण और असंदिग्ध होते हैं, जहाँ बदलाव केवल दूसरों में करने की आवश्यकता होती है और इसे बल, दबाव, हठ और अराजकता से किया जाता है, तो वह रास्ता गाँधी का नहीं होता। इसलिए सत्याग्रही कभी वैसा उद्दंड क्रांतिकारी नहीं हो सकता, जैसा कि कम्युनिस्ट विचारधाराएँ रचती हैं। तोड़ के लेंगे, छीन के लेंगे, लड़ेंगे भिड़ेंगे, मखौल करेंगे- ये लहजा, ये इरादे ही शत्रुता रचते हैं। जो स्वयं ही वैरभाव से ही संचालित हो, स्टेट-पॉवर को एन्टेगनाइज़ करता हो, वो सब्र के मीठे फल पाए भी तो कैसे? जो स्वयं ही धतूरा बोए वो मोगरे की सुगंध की कामना रखे भी कैसे?

गाँधीजी की सुन लीजिए :

“आप मानते हैं कि साधन और साध्य- ज़रिया और मुराद- के बीच कोई संबंध नहीं है, यह बहुत बड़ी भूल है। अंग्रेज़ों को मारकाट से जैसी चीज़ मिली, वैसी ही हम भी ले सकते हैं। आप क़बूल करेंगे वैसी चीज़ हमें नहीं चाहिए।”

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“सबने अधिकार पाने का प्रयत्न किया, लेकिन फ़र्ज़ सो गया। जहाँ सभी अधिकार की बात करें, वहाँ कौन किसको दे? सच्चे अधिकार तो फ़र्ज़ के फल हैं।”

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“अर्ज़ी के पीछे दो तरह के बल होते हैं। एक है- अगर आप नहीं देंगे तो हम आपसे लड़ेंगे। इसका बुरा नतीजा हम देख चुके हैं। दूसरा बल यह है कि अगर आप नहीं देंगे तो हम आपके अर्ज़दार नहीं रहेंगे। हम अर्ज़दार होंगे तो आप राजा बने रहेंगे। पर हम आपके साथ कोई व्यवहार नहीं रखेंगे। इस बल को चाहे दयाबल कहें, चाहे आत्मबल कहें या सत्याग्रह कहें- यह बल अविनाशी है।” [ ‘हिन्द स्वराज’ ]