गाँधी होना कठिन है - (सुशोभित)

 

गाँधी होना कठिन है, गाँधीवादी होना सरल। अलबत्ता जिस दिशा में सामूहिक अवचेतन इन दिनों प्रवृत्त हो रहा है, उसमें तो गाँधीवादी होना भी इतना सहज नहीं।

गाँधीवाद यानी क्या? बड़ी सरल-सी बातें हैं, उसमें कुछ दुरूह नहीं है।

सत्यनिष्ठा- इसलिए नहीं कि नैतिक शिक्षा की पुस्तक में उसका उपदेश दिया गया है, बल्कि इसलिए कि झूठा-से-झूठा आदमी भी अपने अंत:करण से झूठ नहीं बोल सकता। तब मन में दुराव रखने से क्या लाभ? अहिंसा- इसलिए नहीं कि हिंसा पाप है, बल्कि इसलिए कि जो व्यक्ति हिंसक होता है, उसकी चेतना में ग्रंथियाँ बन जाती है, वह विरूप हो जाता है। मितव्ययिता- इसलिए नहीं कि साधनों का अभाव है, बल्कि इसलिए कि परिग्रह के एक छोर पर लोभ है, दूसरे छोर पर तृष्णा, और तीसरे कोण पर अन्याय, और ये सभी मन को भरमाते हैं, उसे असंभव मरीचिकाओं के लिए व्यग्र करते हैं। सरलता- इसलिए नहीं कि वैसा करने से पुण्य मिलेगा, बल्कि इसलिए कि जीवन अपने स्वरूप में सरल ही है, प्रकृति के नियम अकुंठ ही हैं, आप उसके विपरीत जाकर स्वयं को अवरुद्ध ही करेंगे। दैन्य- इसलिए कि संसार में मनुष्य दीन ही है, लघु ही है, वैसा ही वह स्वयं को जान ले तो निर्मल हो जाए। जीसस ने इसीलिए कहा था- “धन्य हैं वे, जो अपनी आत्मा में निर्धन हैं।” फिर, इसी में जोड़ लीजिए- सादगी, विनम्रता, निसर्ग से अनुकूलता, परिश्रम, निष्ठा, ईमानदारी, पारदर्शिता, परदु:खकातरता, समाज के अंतिम व्यक्ति का चिंतन यानी सर्वोदय, सत्याग्रह, आत्म-परिष्कार- ये सब गाँधीवादी मूल्य हैं।

ज़रूरी नहीं कि आप इंद्रिय निग्रह करें ही तभी गाँधीवादी कहलाएँगे। नेहरू भी गाँधी के शिष्य थे, विनोबा भी थे। ये दोनों ही दो विपरीत ध्रुव। ज़रूरी नहीं कि आप व्रत, उपवास, तप करें ही। आपदधर्म में भी शस्त्र न उठाएँ। भगत सिंह भी गाँधीजी की जय बोलते थे और नेताजी सुभाष भी राष्ट्रपिता की चरणधूलि लेते थे। आहार-संयम और इंद्रिय-निग्रह गाँधीजी की निजी यात्रा के प्रयोग थे, वो आप पर भी लागू हों, ज़रूरी नहीं। ‘सत्य के प्रयोग’ की भूमिका में गाँधीजी ने कहा ही था- “मेरे लेखों को प्रमाणभूत ना मानें, उनमें बताए प्रयोगों को दृष्टांतरूप मानकर अपने-अपने प्रयोग यथाशक्ति और यथामति करें!”

आप इन मूल्यों में निष्ठा रखें तो गाँधीवादी कहलाएँगे। जो लोग गाँधीजी को गाली बकते हैं, वो इन मूल्यों को गाली बके बिना वैसा नहीं कर सकते! क्योंकि गाँधीजी ने ये बातें केवल कही नहीं थीं, वे इनकी सजीव प्रतिमा बन गए थे- मनसा-वाचा-कर्मणा। “मेरा जीवन ही मेरा संदेश है!” जो गाँधीजी को अपशब्द कहता है, वह सत्यनिष्ठा को अपशब्द कहता है। जो गाँधीजी से द्वेष रखता है, वह निर्मलता की लक्ष्मणरेखा लाँघने के बाद ही वैसा करता है। वो इस संभावना को झुठला देता है कि मनुष्य की चेतना का कभी उन्नयन भी हो सकता है। अपने भीतर की मनुष्यता की हत्या किए बिना महात्मा गाँधी की हत्या नहीं की जा सकती।

गाँधी निकष हैं। गाँधी मानदंड हैं। गाँधी न्याय की तुला हैं।

इसलिए मैं कहता हूँ गाँधीवादी होना सरल है, गाँधी होना कठिन है।

कठिन क्यों है? क्योंकि प्रेरणा के किसी क्षण में हम सभी सत्यनिष्ठ, अहिंसक, सरल, पारदर्शी हो जाते हैं, किंतु आधी सदी के सार्वजनिक जीवन में वैसा बने रहना एक असंभव तपस्या है। उसे गाँधीजी ने साकार किया था। आश्चर्य होता है कि कैसी निष्कलुष चेतना रही होगी, जो इतने झंझावातों के बावजूद डिगी नहीं। ना कभी झूठ बोला, ना कभी हिंसा का मार्ग सुझाया, छले जाकर भी मन में द्वेष नहीं आने दिया, धोखा खाकर भी भरोसा नहीं गँवाया, गाली सुनकर भी मन में क्रोध नहीं जगा, अपमानित होने की भावना नहीं आई, आत्मा में कुछ अवरुद्ध नहीं हुआ। उलटे उन्होंने यही सोचा कि मुझमें ही कोई दोष रहा होगा, जो मेरा नेतृत्व भारतवासियों का उन्नयन नहीं कर सका है। मुझमें ही अभाव होगा।

हत्या से सत्रह दिन पूर्व गाँधीजी ने उपवास किया तो प्रार्थना सभा में संदेश भिजवाया- “कोई भी इंसान अपनी जान से ज़्यादा पवित्र चीज़ क़ुर्बान नहीं कर सकता। मैं आशा करता हूँ मुझमें इस उपवास के योग्य पवित्रता होगी।” गाँधीजी ने वस्तुत: स्वयं को मृत्यु को प्रस्तुत कर दिया था। उनकी हत्या ने समूचे राष्ट्र को ग्लानि और लज्जा और आत्मबोध से भर दिया। सामूहिक अवचेतन प्रशांत हो गया और मनन में डूब गया। स्वाधीनता आंदोलन गाँधीजी के लिए एक यज्ञ की तरह था, दधीचि को उसके लिए अपनी अस्थियाँ देना ही थीं।

वो गाना है ना- “आँधी में भी जलती रही गाँधी तेरी मशाल / साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल!” यह सच है। इतने अंधड़ों के बीच स्थितप्रज्ञ बने रहना सरल नहीं। गाँधी होना कठिन है।

मैं तो स्वयं को गाँधीवादी नहीं कहता, मैं अभी उस उपाधि के योग्य नहीं। मुझमें तो राग-द्वेष, अभिमान, गौरव भरा है। कोई आकर कुछ कह दे तो बुरा मान जाता हूँ। कोई अच्छा कह दे तो मन में फूल खिल जाते हैं। इसने मुझे भला कहा, यह मेरा मित्र। इसने मुझे बुरा कहा, यह मेरा शत्रु- इससे मुझे प्रतिशोध लेना है। राग-द्वेष की भावना आ जाती है। इनका परीक्षण करता हूँ, किंतु शमन नहीं कर पाता। मैं अभी गाँधीवादी कहाँ।

हिन्दू राष्ट्रवादी अक्सर यह आरोप लगाते हैं कि स्वामी श्रद्धानंद के हत्यारे अब्दुल रशीद को गाँधीजी ने अपना भाई कहा था। वो लोग यह नहीं बताते कि प्रार्थना सभा में बम फेंकने वाले मदनलाल पाहवा को भी गाँधीजी ने अपना भाई कहा था। अब्दुल रशीद के लिए उन्होंने कहा था कि हमें उसे अपराधी नहीं मानना चाहिए, उसके दिल में जिसने नफ़रत भरी, दोष उनका है। मदनलाल पाहवा के बारे में भी उन्होंने यही कहा था कि उस भाई से आपको घृणा नहीं करना चाहिए। ईश्वर उसका भला करे। पुलिस से मैंने आग्रह किया है कि उसको सताया न जाए।

यह मदनलाल पाहवा उस षड्यंत्र का हिस्सा था, जिसने आख़िरकार गाँधीजी की हत्या को अंजाम दिया। 20 जनवरी को मदनलाल ने विफल प्रयास किया था, दस दिन बाद 30 जनवरी को नाथूराम उस प्रयास में सफल रहा। किंतु मुझे विश्वास है, अगर गाँधीजी अपनी मृत्यु से लौटकर बयान कर पाते तो नाथूराम को भी अपना भाई ही कहते। हत्यारे ने भी गोली दागने से पूर्व महात्मा के पैर यों ही नहीं छुए थे।

अपनी हत्या का प्रयास करने वाले के प्रति भी द्वेष नहीं रखना- क्या यह आसान बात है? इसीलिए मैं कहता हूँ- गाँधी होना कठिन है। गाँधी-विद्वेषियों को स्वयं पर लज्जा आनी चाहिए कि वे जिस व्यक्ति को कलंकित करने के यत्न में जुटे हैं, उसका जीवन खुली किताब है, उसके सभी पत्र, लेख, भाषण सार्वजनिक आलोक में प्रकाशित हैं। झूठ बोलने वाले के मन में संशय होता है। आत्मविश्वास से झूठ बोलने वाले कैसे कुटिल होंगे, कल्पना ही की जा सकती है।

सबसे अंत में, गाँधी-वाणी :

“सभी लोग क़रारों के ख़ुद को अच्छे लगने वाले अर्थ करके ख़ुद को धोखा देते हैं। किसी शब्द का अपने अनुकूल पड़ने वाला अर्थ करने को न्यायशास्त्र में द्वि-अर्थी मध्यपद कहा गया है। सुवर्ण न्याय तो यह है कि विपक्ष ने हमारी बात का जो अर्थ माना हो, वही सच माना जाए; हमारे मन में जो हो वह खोटा अथवा अधूरा है। दूसरा सुवर्ण न्याय यह है कि जहाँ दो अर्थ हो सकते हैं, वहाँ दुर्बल पक्ष जो अर्थ करे, वही सच मानना चाहिए। इन दो सुवर्ण मार्गों का त्याग होने से ही अधर्म चलता है।”

[ ‘सत्य के प्रयोग’, पृष्ठ 54-55, नवजीवन प्रकाशन मंदिर ]