गाँधी-टोपी - (सुशोभित)

 

2 जनवरी 1948 को दिल्ली में पानी बरसा था और बिड़ला हाउस में भी रिमझिम थी। उस दिन, यानी मृत्यु से 28 दिन पहले, गाँधीजी प्रार्थना सभा में आए तो सभी उन्हें देखकर हँसने लगे। वो सरकंडे का एक अजीबोग़रीब और बड़ा-सा टोप पहनकर चले आए थे, ताकि बरखा से सिर ढाँक सकें। जब सभी हँसने लगे तो गाँधीजी ने प्रार्थना सभा की शुरुआत इसी टोप से की। वे बोले- नोआखाली में किसान लोग धूप से बचने के लिए यह टोप ओढ़ते हैं। दो बातों की वजह से मैं इसकी बड़ी कदर करता हूँ। एक तो मुझे यह एक किसान ने भेंट किया है। दूसरे यह छतरी का काम देता है पर उससे सस्ता है, क्योंकि गाँव की ही चीज़ों से बना है।

यों तो गाँधीजी सिर पर ‘आकाश-मंडप’ ही पहनते थे और मुण्डित शीश लिए ही देश-दुनिया में फिरते रहते थे। बहुत हुआ तो कभी-कभी सिर पर गमछा रख लिया। लेकिन टोपियों से उनका जाने-अनजाने ही संबंध जुड़ गया है। एक टोपी का तो नामकरण ही ‘गाँधी-टोपी’ हो गया। नेहरू जी ने ताउम्र वह टोपी पहनी। राजेंद्र बाबू और शास्त्री जी ने भी हमेशा पहनी। बाद के सालों में मोरारजी देसाई उसको धारण किए रहते। लेखकों में विष्णु प्रभाकर। रफ़ी अहमद क़िदवई के बारे में कहा जाता है कि वे टोपी के बाहर निकलते नहीं थे। जगजीवन राम, वाई.बी. चव्हाण, चंद्रभानु गुप्त, चौधरी चरण सिंह आदि भी गाँधी-टोपी पहनते थे। किंतु स्वयं गाँधीजी उसे नहीं पहनते थे। दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के दिनों में भले उन्होंने वह पहनी हो और भारत लौटने के बाद भी कुछेक अवसरों पर उसे शिरोधार्य किया था। लेकिन गाँधीजी के साथ जो असंख्य जन आंदोलनरत हुए थे, वे अवश्य गाँधी-टोपी पहनते। वह सत्याग्रहियों का अलंकार बन गई थी। वह उनके सिर की शोभा बनकर इठलाती। कांग्रेस सेवादल की तो यह यूनिफ़ॉर्म ही बन गई थी।

काका कालेलकर ने गाँधीजी पर विपुल लेखन किया है। उन्हें गाँधीजी का साहचर्य-सुख भी बहुत मिला था। अनेक दिनों तक कारावास के कक्ष में वो गाँधीजी के सहचर रहे। नमक सत्याग्रह के बाद जब गाँधीजी यरवडा जेल में थे तो काकाजी उनके साथ थे। इस अनुभव पर उनकी एक पुस्तक है- ‘नमक के प्रभाव से।’ एक अन्य पुस्तक है- ‘बापू की झाँकियाँ’। काकाजी की ‘मेरी जीवन यात्रा’ शीर्षक से स्वयं की जो आत्मकथा है, वह भी लगभग पूरी की पूरी ही गाँधीजी के आसपास ही घूमती है। ‘बापू की झाँकियाँ’ में उन्होंने लिखा है कि गाँधीजी ने कैसे उन्हें चरखे, खादी और गाँधी-टोपी के महत्त्व के बारे में बतलाया था। काका साहब नक्षत्र-विज्ञानी थे तो बदले में वे गाँधीजी को आकाश के तारों के बारे में बतलाते। कहाँ कौन-सा तारामंडल है, कहाँ कौन-सा नक्षत्र है, ये सब दिखलाते। किंतु नंगे सिर पर ‘आकाश-मंडप’ पहनने वाले गाँधीजी के लिए तो आकाश का तारकदल भी रत्नजड़ित टोप ही रहा होगा!

गाँधीजी ने बहुत उद्यमपूर्वक सत्याग्रहियों के लिए गाँधी टोपी को चुना था। पगड़ी के बारे में वो कहते कि ये बहुत बड़ी होती है। जितने कपड़े में कुर्ता बन जावै, उतने की टोपी बनाकर क्या पहनना। मराठी पगड़ी के बारे में वो कहते कि वो भली तो होती है, पर खादी की नहीं नमडा धागे की बनती है। बिहारी टोपी पर कहते कि ये तो बड़ी पतली होती है। जब गाँधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तो वे काठियावाड़ी पगड़ी पहनकर आए थे और इसी वेशभूषा में उनकी तस्वीरें भी बम्बई बंदरगाह पर उतारी गई थीं। पर सत्याग्रही के लिए उनको यह भी अनुचित मालूम हुई। बहुत सोच-विचार करके उस टोपी को चुना गया, जो कालांतर में गाँधी-टोपी कहलाई। यह खादी की होती थी, सफ़ेद रंग की थी, इससे पूरा सिर ढंक जाता था किंतु अवसर पड़ने पर इसे उतारकर तह करके जेब में भी रखा जा सकता था। इसमें अधिक कपड़ा नहीं बरबाद होता और इसे सरलता से धोया जा सकता है। तब तो गाँधी-टोपी चल निकली।

असहयोग आंदोलन के दौरान यह टोपी तेज़ी से लोकप्रिय हुई। एक ऐसा भी समय आया, जब भारत-देश में जहाँ नज़र दौड़ाओ, गाँधी-टोपी पहने नरमुंड ही दिखलाई देते थे। यह टोपी एक लोकभावना बन गई थी। निष्ठा, संकल्प और शुद्धि का एक रूपक उसमें निहित हो गया था। सत्याग्रही कभी नंगे सिर नहीं चलते, हमेशा गाँधी-टोपी धारण करके ही निकलते थे। खद्दर का कुर्ता पहनते। खादी का ही झोला टाँगते। समय मिलने पर चरखा चलाते। स्वाधीनता आंदोलन गाँधीजी के करस्पर्श से एक यज्ञ की सी तन्मयता और आवेग से आप्लावित हो गया था।

बाद के सालों में राजीव गाँधी कभी-कभी गाँधी-टोपी पहने देखे गए। साल 2011 में रामलीला मैदान में जब इक्कीसवीं सदी का ‘खिचड़ी विप्लव’ हुआ तो गाँधी-टोपी कुछ दिनों के लिए एक बार फिर फ़ैशन में चली आई। वो एक राजनीतिक दल का भी सिंगार बनी। आंदोलन के नेता अण्णा हज़ारे गाँधी टोपी पहनते थे। लोगों को उनमें गाँधीजी की झलक दिखलाई दी थी। वो आंदोलन जितनी तेज़ी से उभरा, उतनी ही तेज़ी से बिसरा भी गया, क्योंकि उसके नायकों में वैसी बौद्धिक, आत्मिक और नैतिक निष्ठा नहीं थी। इसने यह भी सिद्ध किया कि 1915 से लेकर 1947 तक गाँधीजी ने 32 वर्षों तक जिस आंदोलन का निरंतर नेतृत्व किया, उसकी वैधता को बनाए रखने के लिए दलनायक ने पग-पग पर कितना संघर्ष किया होगा और कितनी अग्निपरीक्षाओं से वो कुंदन की तरह तपकर निकले होंगे।

अण्णा में गाँधी-छवि देखकर देश की तरुणाई तब जैसे आंदोलित हो गई थी, उससे इसका भी प्रमाण मिला कि भारत-भावना मन-ही-मन एक और गाँधी की कैसे आज भी मन बाँधकर बाट जोहती है, भले ऊपर से वो उसको व्यक्त न करे। भारत आज भी गाँधी-व्याकुल है। उसे कोई और ठौर अपना दिखता नहीं। गाँधी जैसा कोई आज भी पुकारे तो पूरा देश आँख मूंदकर उसके पीछे चल देने को तैयार है। गाँधी भारत के सामूहिक-अवचेतन में इतने गहरे पैठे हैं कि थाह लगाना कठिन है।

भारत की आज़ादी के पचासवें साल में गायक लकी अली ने एक गीत जारी किया था- ‘अनजानी राहों में तू क्या ढूँढ़ता फिरे।’ उसमें दृश्य आता है कि एक फ़िल्म की शूटिंग चल रही है। भारत छोड़ो आंदोलन का दृश्य फ़िल्माया जा रहा है। नायक ने गाँधी-टोपी पहन रखी है। सीन कट होते ही वह टोपी उतारकर रख देता है। टोपी धरती पर जा गिरती है। यह देख भीड़ में शामिल खद्दरधारी लकी अली आगे बढ़ता है, गाँधी-टोपी को उठाता है और उसको झाड़-पोंछकर फिर से नायक को पहना देता है, मानो उससे कह रहा हो, “यह टोपी भारत-देश की लाज है, इसको यों कभी मैली नहीं होने देना!”