गाँवों के गाँधी - (सुशोभित)

 

ग्राम-स्वराज गाँधीजी का केंद्रीय विचार था। इसमें उनकी मूलभूत तर्कणा की कुंजी भी थी। उनके चिंतन में ‘स्वराज’ बीजशब्द की तरह है और फिर, इसी के फलपूर्वक- ‘सर्वोदय’। और हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गाँधीजी स्वराज की इस परिकल्पना को व्यक्ति से लेकर राज्य तक, सभी पर लागू करते थे। स्वराज व्यक्ति से शुरू होता था और आत्मसंयम उसकी कुंजी थी।

जैसा कि ‘हिन्द स्वराज’ में गाँधीजी ने स्पष्ट कर दिया था, स्वराज यानी यह नहीं कि अंग्रेज़ भारत छोड़कर चले जाएँ, लेकिन अंग्रेज़ी शैली का राज-काज बना रहे। गोरे साहब चले जाएँ तो भूरे साहब उनकी जगह पर आ जाएँ। स्वराज तो तभी होगा, जब भारत की आत्मा के अनुरूप राज-व्यवस्था यहाँ क़ायम होगी। इसके लिए वे ग्राम-स्वराज की बात करते थे। ये सच है कि जिन दिनों में गाँधी सक्रिय थे, तब भारत गाँवों में बसता था। आज भारत शहरीकरण की गिरफ़्त में है और गाँवों का भी शहरीकरण हो रहा है। इसके दुष्परिणाम भी सामने हैं। इसलिए भी गाँधीजी के ग्राम-स्वराज के विचार को एक बार देखना ज़रूरी लगता है।

भारत में सात लाख गाँव हैं। गाँधीजी का विचार यह था कि जब तक ये गाँव स्वावलंबी और स्वनिर्भर नहीं होंगे, सुराज नहीं हो सकता। इस स्वनिर्भरता की उनकी परिभाषा यह थी कि गाँव अपनी ज़रूरत का अनाज और कपड़ा अपने यहाँ ही उत्पन्न करें। इसके बाद जो वो उपजाएँ, उसे वे दूसरे गाँवों-जनपदों को बेचें, वो अलग बात है। इधर एक शब्द का निरंतर इस्तेमाल किया जाता है और वो है- कैश-क्रॉप। गाँधीजी को यह बतलाया जाता तो वे इसको निश्चय ही एक पाप कहते। धरती पर अन्न उपजता है, ताकि मनुज का उदरपोषण हो सके। धरती पर अन्न इसलिए नहीं उपजता कि मंडी में उसका मोलभाव हो सके। यानी अन्न-उत्पादन का प्राथमिक प्रयोजन उदरपोषण है। कृषि को व्यवसाय के रूप में देखना एक भूल है। चंपारण में फ़िरंगियों के द्वारा नील की खेती कैश क्रॉप के विचार का ही परिणाम थी!

दूसरे शब्दों में, लोकल मर्केंडाइल को गाँधीजी भारत जैसे गाँवों में बसने वाले देश के लिए ज़रूरी समझते थे। अगर गाँव में मनुज भूखा सो रहा है और उसी गाँव में उपजा अन्न दूर देश की मंडी में बिक रहा है तो यह बाज़ार के द्वारा उत्पन्न एक अपराध है। कोंकण में उत्पन्न होने वाला हापुस दूर-विलायत के लोग रस लेकर खाते हैं, आप कह सकते हैं यह एक क़िस्म का डेलीकेसी का ब्योपार है, और स्वीकार्य है। किंतु कोंकण का किसान अन्न के अभाव में आत्महत्या कर ले, तो किसी-ना-किसी स्तर पर भीषण रूप से ग्राम-स्वराज व्यवस्था की क्षति हो रही है। बंगाल का अकाल इसी की एक चरम परिणति थी। याद रहे कि बंगाल में अकाल इसलिए नहीं पड़ा था कि उस साल पानी नहीं बरसा था और सूखा पड़ गया था। बंगाल का अकाल मैन-मेड फ़ैमिन था, क्योंकि उपज को दूसरे क्षेत्रों में ट्रांसपोर्ट कर दिया गया था और स्थानीयजन भूखों मर गए थे। गाँधीजी ने अकाल के कोई तीस साल पहले ही ‘हिन्द स्वराज’ में इस बुराई की ओर संकेत कर दिया था।

गाँव का आदमी कुछ बनने के लिए शहर में जाए, ठीक है। लेकिन गाँव का आदमी रोटी कमाने के लिए शहर में जाए, और वहाँ एक मज़दूर बनकर रह जाए और झुग्गियों में पड़ा रहे और वहाँ उसका ‘डी-ह्यूमनाइज़ेशन’ हो, जैसा कि सई परांजपे की फ़िल्म ‘दिशा’ में दिखलाया गया है, तो यह आपराधिक राज-प्रणाली है। गाँवों में इतना काम, इतना अन्न सदैव होना चाहिए कि वहाँ रहने वाला भूखों ना मरे, यह सुनिश्चित करने के बाद फिर कैश क्रॉप के बारे में आप सोचना चाहें तो सोच सकते हैं। एक आदमी का ज़रूरत से ज़्यादा पैसा कमा लेना और सैकड़ों दूसरों का उसी गाँव में तंगहाली में फ़ाक़ा करना एक बुराई है। विनोबा का भूदान आंदोलन ग्राम स्वराज के विचार का महत्तम विस्तार था!

राजनैतिक क्षेत्र में ग्राम स्वराज का यही विचार पंचायत प्रणाली में परिणत हो जाता था। सत्ता का विकेंद्रीकरण इसके मूल में था। गाँधीजी का स्पष्ट मत था कि केंद्र से कोई भी राजव्यवस्था भारत को नहीं चला सकती। शक्तिशाली केंद्र का विचार भारत के लिए आत्मघाती है। स्वराज ऊपर से नीचे नहीं आएगा, नीचे से शुरू होकर ऊपर तक पहुँचेगा। अंतिम इकाई से ही बात शुरू होगी। गाँधीजी इसको कहते थे- समाज वैसी मीनार की तरह नहीं होना चाहिए, जिसमें एक ईंट के ऊपर दूसरी ईंट रखी गई है, नींव में बहुत सारे लोग हैं और जो शिखर पर है, वह अकेला है। समाज को वैसे समुद्र की तरह होना चाहिए, जिसमें एक लहर के पीछे दूसरी लहर है, और वो सभी एक लयपूर्ण संरचना का हिस्सा हैं। दूसरे शब्दों में, राज-समाज की संरचनाएँ वर्टिकल नहीं, हॉरिज़ॉन्टल हों, तो ही शुभ है। वही सच्चा स्वराज होगा, और जब वह होगा, तभी सर्वोदय की परिकल्पना साकार हो सकेगी।

जब आप विकेंद्रीकरण की बात करते हैं, तो नेशन के विचार से सहज नहीं हो सकते। ब्रिटिश सत्ता जैसा नेशन भारत को बनाना चाहती थी, और उसके बाद एक तरफ़ सावरकर और दूसरी तरफ़ जिन्ना के मन में भारत की जैसी नेशनलिस्ट परिकल्पनाएँ थीं, उससे गाँधीजी (और रबींद्र नाथ ठाकुर की भी) बुनियादी असहमति थी, किंतु वो एक दूसरे लेख का विषय है।

ग्राम-स्वराज तभी संभव हो सकता है, जब मनुष्य अपने अतिशय लोभ को तिलांजलि देकर सर्वोदय के बारे में सोचे। मौजूदा राजनैतिक संस्कृति में तो यह होने से रहा, जहाँ इससे ठीक उलट प्रेरणा दी जाती है। वैश्विक मंचों पर राष्ट्राध्यक्ष यह जाकर बोलते हैं कि जलवायु परिवर्तन की क़ीमत पर भी अगर हमको औद्योगिक विकास करना है तो हम करेंगे। दूसरी तरफ़ विश्व बैंक और आईएमएफ़ सकल घरेलू उत्पाद के आँकड़ों का हव्वा बना देते हैं और दुनिया के सभी मुल्क जीडीपी ग्रोथ की होड़ में लग जाते हैं।

किंतु अगर सस्टेनेबल डेवपलमेंट ही नहीं है, गाँव और किसान तक विकास के फल नहीं पहुँच रहे हैं तो इसका क्या लाभ है? सस्टेनेबल डेवलपमेंट इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि सर्विस सेक्टर एक फुगावे की तरह है और वैश्विक मंदी की एक ही लहर करोड़ों लोगों को बेरोज़गार कर सकती है। वास्तव में सेवा क्षेत्र उपभोक्तावादी संस्कृति का उप-उत्पाद है, वो आदमी के लोभ की उत्पत्ति है, और आप मानें या ना मानें, किंतु यह चिरस्थायी नहीं है।

गाँधीजी के चरखे को याद कीजिए। वो एक प्रतीक था, और गाँधीजी अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच जब चरखा चलाते थे तो कुछ प्रमाणित करने की कोशिश किया करते थे। गाँधीजी का आश्रम और उनका चरखा ग्राम-स्वराज का मिनिएचर चित्र था- अपनी ज़रूरत का अनाज और कपास हम अपने गाँव में ही उत्पन्न कर लें। क्योंकि इस संसार में सबसे ज़रूरी चीज़ है- मनुष्य का आत्मिक संतोष, भले ही सकल घरेलू उत्पाद के आँकड़े इसे कहीं दर्ज ना करें। जो सुखी और संतोषी होगा, वो अहिंसक होगा। और जो अहिंसक होगा, वो ईश्वर से संबद्ध होगा- यह गाँधीजी का स्वराज का पूरा कार्यक्रम है।

और सबसे अंत में, स्वयं गाँधीजी-

“आज़ादी नीचे से शुरू होनी चाहिए। हर गाँव एक जम्हूरी सल्तनत हो, जिसमें पंचायत का राज हो। वह अपने पाँव पर खड़ा हो, अपनी ज़रूरतें पूरी कर सके। मुझे ताना दिया जाता है कि ये सब तो ख़याली तस्वीरें हैं, इन पर सोचकर क्यों वक़्त बर्बाद करें। मैं कहता हूँ, यूक्लिड की परिभाषा वाला बिंदु कोई खींच नहीं सकता, फिर भी उसकी क़ीमत हमेशा रही है और रहेगी। उसी तरह मेरी इस तस्वीर की भी क़ीमत है।”

 

[‘हरिजन सेवक’, 28 जुलाई, 1946]