एक और गाँधी - (सुशोभित)

 

गाँधी, विवेकानंद, श्रीअरविंद : 20वीं सदी में तीन भिन्न क्षेत्रों में, तीन भिन्न कालखंडों के दौरान, इन्होंने भारतीय जनमानस का पथ-प्रदर्शन किया। तीनों ही गहरी आध्यात्मिकता से आप्लावित थे। भारतीय चेतना की ख़ूब समझ उन्हें थी।

रबींद्रनाथ कवि थे किंतु उनके कवि को अनंत पुकारता था। एक अकूत आत्मिक तृषा उनके काव्य से फूट पड़ती थी। महामना हों या लोकमान्य : वे आध्यात्मिक आभा से दीप्त व्यक्तित्व थे। राजेंद्र बाबू, राधाकृष्णन, आचार्य कृपलानी, नरेंद्र देव, विनोबा : इन सभी में आभ्यंतर के प्रकाश का वह तत्व था।

भारत की नियति ही कुछ वैसी है कि आध्यात्मिक निष्ठा के बिना उसको रीति, नीति, राजनीति सब खंख मालूम होते हैं। शासक से लेकर सत्याग्रही तक, सभी में वह तत्व होना वांछित है। उसके बिना भारतीय लोकमानस का हृदय तृप्त नहीं होता।

आज भारत देश में जो सर्वव्यापी विक्षोभ, दिशाहीनता, उपहास, उपेक्षा और संभ्रम दिखलाई देता है, उसका क्या कारण है? यही ना कि पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों ही से आध्यात्मिक नैतिकता का लोप हो गया है। बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में हम पराधीन और संघर्षरत भले रहे हों, इतने क्लांत और आत्महीन नहीं थे, जैसे कि आज हैं।

आपको क्या लगता है, आज भारत में अच्छाई और बुराई की लड़ाई चल रही है? इससे बड़ा झूठ कोई नहीं हो सकता। जो आपसे यह झूठ बोले, उससे सावधान रहना, वह आपको छल रहा है!

अगर भारत में अच्छाई और बुराई की लड़ाई चल रही होती तो पूरा देश अच्छाई के पक्ष में यों निर्द्वंद्व खड़ा होता, जैसे असहयोग आंदोलन और नमक सत्याग्रह में खड़ा हो गया था। दुविधा का प्रश्न ही नहीं था।

किंतु यही तो दु:ख है कि बुराई और बुराई के बीच की लड़ाई है! कलुष ही कलुष से लड़ रहा है! विष ही विष को धो रहा है! एक अंधकार दूसरे से संघर्षरत है- और विकल्पहीन, किंकर्तव्यविमूढ़ भारत-चेतना चुपचाप यह सब देख रही है।

निर्णय का संकट है, विश्वास का संताप है, निष्ठा का घटाटोप है। मूल्य किसी में दिखता नहीं!

और सारी लड़ाई ही मूल्यों की है। उसी से भारतीय आत्मा तुष्ट होती है। आज सम्मुख स्वधर्म और स्वराज्य का प्रश्न है, नायक के शोध की चिंता है! यह कोई चुनावी शक्ति-परीक्षण का शोक भारत को नहीं छल रहा है।

आज भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक और गाँधी को जन्म देने की है!

सत्यनिष्ठा की एक जलती हुई मशाल- और पूरा देश निमिष भर में उसके पीछे पंक्तिबद्ध हो जाएगा, जैसे पिता की उँगली पकड़कर निश्चिंत हो जाता है बालक!