एक बिरला भवन - (सुशोभित)

 

भारतभूमि का सर्वप्रमुख गाँधीधाम तो साबरमती आश्रम ही है। फिर सेवाग्राम की बारी आती है। पोरबंदर, राजकोट, आग़ा ख़ाँ पैलेस, यरवडा जेल, बम्बई, चंपारण मेमोरियल, वर्धा आदि का भी अत्यंत महत्त्व है। दिल्ली में राजघाट स्थित गाँधीजी की समाधि समेत अनेक गाँधी-स्मारक हैं। इनमें डांडी मेमोरियल (ग्यारह मूर्ति), राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय, गाँधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा, चरखा संग्रहालय, गाँधी शांति प्रतिष्ठान आदि सम्मिलित हैं।

किंतु दिल्ली ही नहीं, भारत का भी सबसे बिरला गाँधी-तीर्थ मैं तो बिड़ला हाउस को ही कहूँगा। यहीं गाँधीजी की हत्या की गई थी। मुझे नहीं मालूम दिल्ली में ही कितने लोग इस बात को जानते हैं। दिल्ली नगरिया गाँधीजी को लेकर बड़ी उदासीन मालूम होती है, जबकि दूर देश से सात समुद्र लाँघकर आने वालों का ताँता मैंने बिड़ला हाउस में देखा। ऑटो वाले से जब यहाँ चलने को कहा तो उसने कहा आपको बिड़ला मंदिर जाना होगा, भूल से बिड़ला हाउस बोल रहे हैं। मैंने उन्हें बतलाया कि बिड़ला हाउस ही जाना है और बाहर-गाँव से आया होने के बावजूद रास्ता सुझाया- जनपथ पर जो तीस जनवरी लेन गई है, वहाँ पर। ये तीस जनवरी लेन का नामकरण वर्ष 1948 के उस कलंकित दिन के आधार पर किया गया है- परदेसियों को जिसकी तफ़सीलें सुनाते अन्यथा गौरव से भरे टूर गाइड सहसा लज्जित हो जाते हैं- यही दिल्ली में कितने जानते होंगे?

कम ही लोग विश्वास करेंगे कि 46 वर्ष की अवस्था तक गाँधीजी कभी दिल्ली नहीं आए थे। वे पहली बार 12 अप्रैल 1915 को दिल्ली आए और कश्मीरी गेट पर श्री एस. के. रुद्र के यहाँ ठहरे। बिड़ला हाउस में वो वर्ष 1939 में पहली बार आए। राष्ट्रसेवी घनश्याम दास बिड़ला ने साल 1928 में अल्बुकर्क मार्ग पर बारह शयनकक्षों की यह कोठी बनवाई थी। गाँधीजी जब भी वायसराय से मिलने दिल्ली आते, यहीं ठहरते। अंतिम प्रयाण से पूर्व चौदह बार गाँधीजी यहाँ आए थे। सरदार पटेल भी अनेक मर्तबा यहाँ रुके। स्वाधीनता आंदोलन में बिड़ला-बजाज का योगदान अनाथपिंडक और भामाशाह जैसे भारतीय इतिहास के गौरवशाली नगरसेठों से कम नहीं था!

9 सितंबर 1947 को जब गाँधीजी दिल्ली पहुँचे तो किसी ने नहीं सोचा होगा कि अब वो कभी यहाँ से नहीं जा सकेंगे। 1946-47 के दिन गाँधीजी ने अत्यंत विचलित मनोदशा में बिताए। जहाँ से सांप्रदायिक तनाव की ख़बर मिलती, वे वहीं दौड़ पड़ते और लोगों को समझाते कि लड़ाई-फ़साद बंद कर दीजिए। ऐसे ही वो मृत्यु को अपना उघड़ा सीना दिखलाते नोआखाली, कलकत्ता, बिहार गए थे। फिर दिल्ली की ख़राब फ़िज़ा के बारे में सुना तो यहाँ चले आए। उन्हें बिड़ला हाउस ठहराया गया तो नाराज़ हुए। वो दिल्ली में हरिजन बस्ती में रहना चाहते थे। किंतु यही नियत था कि 9/9/47 से 30/1/48 तक गाँधीजी के जीवन के अंतिम 144 दिन यहीं बीतें।

बिड़ला हाउस- जिसे वर्ष 1971 में भारत सरकार ने ख़रीदकर गाँधी स्मृति भवन के रूप में विकसित किया। गाँधीजी की सजीव उपस्थिति इस भवन के हर कोने में अनुभव की जाती है। गाँधीजी का चश्मा, चरखा, लाठी, लुटिया, तहमद, तखत आज भी यहाँ जस के तस हैं, जैसे गाँधीजी प्रार्थना सभा के लिए छोड़कर गए थे। यहाँ खादी भण्डार और पुस्तक विक्रय केंद्र भी है। बलिदान स्थल तो है ही, जहाँ 79 वर्ष की तपोनिष्ठ देह पर गोलियाँ दाग़ने का राक्षसी-कर्म किया गया था।

दिल्ली की दौड़धूप के बीच सफ़ेद रंग की यह इमारत निर्धूम मेघ के जैसी उज्ज्वल और निकलंक है। पुण्यभूमि है, तीर्थ है, शांति-निकुंज है। जैसे सघन छतनार पर धवल पुष्प खिले हों, वैसा उसकी व्याप्ति का आस्वाद है। दिल्ली रहकर इसके दर्शन करने का अवसर ना चूकें। राजघाट पर वैष्णवजन की धुन अहर्निश बजती है, डांडी मेमोरियल में आरोहण का स्थापत्य है, गाँधी संग्रहालय में गाँधीजी की पाँच हज़ार तस्वीरों समेत साबरमती आश्रम की अनुकृति भी है। इन स्थानों पर नवजीवन प्रकाशन मंदिर अहमदाबाद से किफ़ायती दरों पर प्रकाशित गाँधी-साहित्य सुगम है। छुट्टी के दिन अपने बच्चों को यहाँ ले जाएँ और ये सब दिखलाएँ।

मैं दिल्ली में अब्दुल्ला दीवाना ही सही, बेगाना हरगिज़ ना था। दो दिन बिताकर निहाल हुआ। भावना से पूरे समय इतना भरा रहा कि भूल ही गया इस नगर की वायु में अब विष घुल गया है, गाँधीजी होते तो यह हरगिज़ बर्दाश्त न करते!