द्रोण बने द्रोणाचार्य (महाभारत की अनसुनी कहानियाँ -19)

 



अब द्रोण कृपी के साथ गृहस्थाश्रम में रह रहे थे, तो एक व्रतस्थ ब्राह्मण होने के कारण उन्होंने निष्कांचन जीवन जीने की ठान ली थी। कुटुंब के निर्वाह के लिए जितना चाहिए, बस उतना ही धन पाने की इच्छा वह रखते थे। धन को किसी भी तरह से धन इकट्ठा करना या फिर भविष्य के लिए संजोग के रखना, इन चीजों को वह वर्जित मानते थे।

इस प्रकार, द्रोण की आर्थिक स्थिति इतनी सुधरी हुई नहीं थी। कभी-कभी अश्वत्थामा दूसरे बालकों को दूध पिता हुआ देखता था और फिर वह उसकी मां से गाय के दूध के लिए हठ करता था। लेकिन धन के अभाव के कारण द्रोण के घर में गाय नहीं थी और ना ही वह दूध बाहर से खरीदने की आर्थिक क्षमता रखते थे।

एक दिन ऐसा हुआ की अश्वत्थामा ने उसके मित्रों को दूध पीते हुए देख लिया। फिर वह बालक घर पर आकर अपनी मां से गाय के दूध के लिए हठ करने लगा। अश्वत्थामा के हठ से तंग आकर,  कृपी ने  चावल के आटे को पानी में मिलाया और उस को दूध कहकर अश्वत्थामा को दे दिया।

दूध तो नकली था। किंतु वह दूध मिलने के बाद, अश्वत्थामा के खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह अबोध बालक चावल के आटे के पानी को दूध समझकर बड़े आनंद से पीने लगा, नाचने लगा और चिल्लाने लगा - देखो, मुझे दूध मिल गया! देखो, मुझे दूध मिल गया!! यह करुण दृश्य देखकर द्रोण को अतिशय पीड़ा हुई।

जब पड़ोस वाले लोगों ने अश्वत्थामा को चावल के आटे का पानी पीते हुए देखा, तो वह लोग द्रोण को कोसने लगे।  वह कहने लगे, ‘हे ब्राह्मण, तू कैसा पिता है? तू शास्त्रविद्या में  इतना ज्ञानी होने के बावजूद ऐसी दरिद्रता में जी रहा है कि तुम्हारे बेटे के जीवन में दूध तक नसीब नहीं है।’

उन लोगों ने किए हुए अपमान के कारण द्रोण को गहरी चोट पहुँची। उसके बाद, द्रोण ने ठान लिया की वह अपनी दरिद्रता को मिटाकर, अपने पुत्र को सम्मान का जीवन प्रदान करेंगे।

उसके कुछ दिन बाद, एक दिन द्रोण ने सुना कि जमदग्नि के पुत्र परशुराम - जिन्होंने पृथ्वी से अन्यायी क्षत्रियों का बार-बार संहार किया था – उनकी सारी संपत्ति ब्राह्मणों में दान करके सन्यास लेने जा रहे हैं। यह सुनने के बाद द्रोण ने सोचा कि वह परशुराम से कुछ संपत्ति मांग कर अपनी दरिद्रता मिटाने का प्रयास कर सकते हैं। ऐसा सोचकर, द्रोण परशुराम से मिलने महेंद्र पर्वत जा पहुंचे।

जब द्रोण परशुराम से मिलने  महेंद्र पर्वत पर पहुँच गए, तो उन्होंने परशुराम को प्रणाम किया। उसके बाद, परशुराम ने उनसे परिचय पूछा। तब द्रोण ने कहा, ‘हे  ऋषिवर, मैं भारद्वाज पुत्र द्रोण हूं। जिसका जन्म ब्रह्माजी की तरह स्त्री-योनि के बिना हुआ है।’

यह उत्तर सुनने के बाद, परशुराम ने द्रोण से उनका महेंद्र पर्वत पर आने का कारण पूछा। तब द्रोण ने कहा, ‘हे  ऋषिवर, मैंने सुना है कि आप आपकी सारी  संपत्ति ब्राह्मणों को दान कर रहे हो। मैं भी उस संपदा में भागीदार बनने के लिए आपके शरण में आया हूं।’

तब परशुराम बोले, ‘हे ब्राम्हण, मेरे पास जो भी सोना, चांदी और संपत्ति थी, वह तो मैं पहले ही ब्राह्मणों को दे चुका हूं। इसके अलावा क्षत्रियों को पराजित करके जो पृथ्वी मैंने जीती थी, वह पृथ्वी मैंने कश्यप ऋषि को दान की है। अब मेरे पास सिर्फ मेरी शस्त्रविद्या ही बची हुई है।’

यह सुनने के बाद द्रोण ने कहा, ‘तो मुझे आपकी शस्त्रों की विद्या ही प्रदान कीजिए।’

द्रोण की बात का स्वीकार करते हुए, परशुराम ने द्रोण को अपनी सारी शस्त्रविद्या दान के रुप में भेंट कर दी। इस प्रकार, द्रोण को परशुराम की अमोघ शस्त्रविद्या का ज्ञान मिल गया, जिसमें ब्रहमास्त्र भी शामिल था।

इस प्रकार, परशुराम से मिलने के बावजूद द्रोण उनसे संपत्ति हासिल ना कर पाए और दरिद्रता नहीं मिटा पाए। इसके बाद द्रोण सोचने लगे कि अब वह क्या करें? उनके पास तो बस परशुराम ने  दी हुई शस्त्रविद्या थी। फिर उन्होंने सोचा कि ऐसी शस्त्रविद्या का काम तो किसी सम्राट को ही आ सकता है। ऐसा सोचने के बाद उन्हें उनके बचपन के दोस्त द्रुपद की याद आई, जो पांचाल सम्राट बन गया था। ऐसा विचार करने के बाद, द्रोण ने उनके साथ पत्नी और पुत्र को लिया और वह द्रुपद से मिलने पांचाल राज्य की ओर चल पड़े।

द्रोण सोच रहे थे कि अब वह  द्रुपद की सहायता से पांचाल में ही रहेंगे ताकि उन्होंने अर्जित किए हुए शस्त्रविद्या का द्रुपद को फायदा हो जाए और द्रोण उनके कुटुंब के लिए उचित धन कमा पाएँ।

पांचाल राज्य का राजा द्रुपद द्रोण के बचपन का मित्र था। द्रुपद के पिता का नाम प्रिषत था और राजा प्रिषत द्रोण के पिता - भारद्वाज ऋषि - के करीबी मित्र था। प्रिषत नियमित रूप से भारद्वाज ऋषि के आश्रम में आते-जाते रहता था। इस प्रकार, जब प्रिषत भारद्वाज ऋषि के आश्रम में आता था, तो वह उसके साथ पुत्र द्रुपद को भी लाता था। इससे, द्रुपद और द्रोण की अच्छी मित्रता हो गई थी। दोनों एक दूसरे के साथ खेलते-कूदते थे। उसके बाद, भारद्वाज ऋषि ने अग्निवेश ऋषि के आश्रम में द्रुपद और द्रोण को विद्यार्जन के लिए भेज दिया। अग्निवेश ऋषि के आश्रम में रहते हुए, द्रोण और द्रुपद ही मित्रता और गहरी हो गई। उस समय, द्रुपद द्रोण को हमेशा बोलता था, ‘हे द्रोण, तुम मेरे प्रिय मित्र हो। मेरे जीवन में मुझे जो कुछ संपदा प्राप्त होगी, उसपे तुम्हारा भी अधिकार होगा। अगर जीवन में कभी तुम्हारे ऊपर कोई संकट आ जाए, तो हमेशा याद रखना की तुम्हारा एक प्रिय मित्र भी है। में हमेशा तुम्हारी सहायता करने के लिए तैयार रहूँगा।’

जब राजा प्रिषत की मृत्यु हो गई, तो रीति के अनुसार ‘द्रुपद’ को पांचाल का सम्राट बना दिया गया।

इस प्रकार द्रोण को बड़ा विश्वास था कि उनके बचपन का मित्र, द्रुपद, दरिद्रता के इस कठिन समय में उनकी मदद जरूर करेगा। ऐसा सोचकर, द्रोण उसकी पत्नी और बेटे के साथ द्रुपद के राजदरबार में चले गए और सारे दरबारियों के समक्ष जाकर वह खड़े हो गए।

द्रुपद ने उनसे पूछा, ‘हे ब्राह्मण, तुम तुम कौन हो?’

द्रोण ने कहा, ‘महाराज, मैं आपका प्रिय मित्र हूं। मैं वही द्रोण हूं, जिनके साथ आप बचपन में भारद्वाज ऋषि के आश्रम में खेला करते थे।’

लेकिन एक ग़रीब ब्राह्मण द्वारा मित्र बुलाए जाने पर द्रुपद को गंभीर आपत्ति थी। उसे एक ब्राह्मण का यह बर्ताव बिल्कुल अच्छा नहीं लगा था। राज्य के मद में चूर द्रुपद अपनी बचपन की मित्रता को भूल गया था। फिर द्रुपद क्रोध से लाल हो गया और क्रोधित होकर द्रोण पर बरस पड़ा।

‘हे ब्राह्मण, शायद तुम पहचान नहीं पा रहे हो कि तुम किससे बात कर रहे हो। मैं पांचाल देश का राजा ‘द्रुपद’ हूं और तुम एक दरिद्र ब्राह्मण हो! हम दोनों में मित्रता अब नहीं सकती। हां, मुझे यह बात याद है कि जब हम बचपन में एक दूसरे के साथ खेला करते थे, तब हमारे बीच में मित्रता थी। लेकिन समय के अनुसार चीजें बदल जाती है और मित्रता भी भुलाई जाती है। बचपन में हम मित्र थे क्योंकि उस समय मैं केवल बालक था, लेकिन अब मैं पांचाल राज्य का सम्राट बन चुका हूं। एक सम्राट में और एक दरिद्र ब्राह्मण में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है। इस प्रकार, मेरी मित्रता किसी दूसरे सम्राट के साथ ही हो सकती है। तो तुम अपने बचपन की मित्रता को भूल जाओ। यही अच्छा रहेगा।’

इतना कहकर द्रुपद द्रोण को उसके राजदरबार से निकल जाने का इशारा कर दिया। फिर द्रुपद को कुछ उत्तर दिए बिना ही, द्रोण ने द्रुपद का राजदरबर छोड़ दिया।

कुटुंब और दरबारियों के समक्ष ऐसा घोर अपमान सहकर, द्रोण के मन में बदले की आग भड़क उठी। द्रोण ने यह निश्चय कर लिया कि वह इस अपमान का बदला द्रुपद से जरूर लेंगे। फिर द्रोणाचार्य ने सोचा की शायद कृपी के भाई - कृप - के पास जाकर उन्हें द्रुपद से बदला लेने के लिए कुछ मदद मिल जाए। ऐसा सोचकर, द्रोण अपने परिवार सहित कृप के घर हस्तिनापुर चले आए और कृप के परिवार के साथ रहने लगे। तब बाक़ी लोग कृप को कृपाचार्य बुलाते थे, क्योंकि कौरव और पांडव उन्ही के आश्रम आकर विद्यार्जन करते थे।

जब द्रोण ने परिवार के साथ कृपाचार्य के घर में रहना शुरू किया, तो कभी-कभी अश्वत्थामा कृपाचार्य की कक्षा में बैठकर कौरवों और पांडवों के साथ शस्त्रविद्या सीखता था। कृपाचार्य की कक्षा खत्म होने के बाद, वह खुद कौरवों और पांडवों को शस्त्रविद्या के रहस्य बताता था।

एक दिन ऐसा हुआ कि कौरव और पांडव कृपाचार्य के आश्रम के नजदीक खेल रहे थे। तब उनकी गेंद, एक कुएं में गिर गई। कुआं गहरा था और उसमें गिरी हुई गेंद निकालने में, कौरव और पांडव विफल हो रहे थे।

कुएं के पास बालकों का घेराव देखकर, द्रोण वहां पर चले गए। कौरवों और पांडवों को तब द्रोण का परिचय पता नहीं था। उन्हें तो केवल ऐसा लगा कि कृश  शरीर का एक काला-सांवला ब्राह्मण, वहां पर आया हुआ था। फिर द्रोण ने राजकुमारों से पूछा कि वह कुएं में क्या देख रहे हैं? तब किसी ने बताया कि उनकी गेद उस कुएं में गिर पड़ी है।

यह सुनने के बाद, द्रोण स्मित हास्य करते हुए राजकुमारों का  झूठ-मूठ में उपहास करते हुए बोले, ‘अरे राजकुमारों, इतनी विद्याएं सीखने के बाद भी तुम सब लोग मिलकर इस गेंद को कुएं से बाहर नहीं निकाल पा रहे रहे हो।’

इस पर राजकुमारों ने उन्हें वह गेंद उस कुएं से निकालने की विनती की। फिर द्रोण ने कहा, ‘मैं यह गेंद अवश्य निकाल कर दूंगा, लेकिन इसके बदले में मुझे तुम्हें उचित भोजन देना पड़ेगा।’

उनकी बात सुनकर, युधिष्ठिर बोल पड़ा, ‘हे ब्राह्मण, आप इस काम के बदले में हमसे एक मामूली सा इनाम मांग रहे हैं। हम आपको इतना धन दिलवा सकते हैं कि आपको जीवन भर भिक्षा मांगने की जरूरत नहीं पड़ेगी।’

युधिष्ठिर की बात सुनने के बाद, द्रोण ने कहा, ‘यह देखो, मैंने अपने हाथ में यह घास का पत्ता लिया हुआ है। अब मैं केवल इस घास के पत्ते की मदद से तुम्हारी गेंद को कुएं से निकाल दूंगा। मैं इस घास के पत्ते को मंत्र से अभिमंत्रित कर दूंगा, तो यह मेरे लिए एक अस्त्र का काम करेगा। मंत्र से अभिमंत्रित करने के बाद मैं इसे कुएं में गिरी हुई गेंद पर मारूंगा। तो यह घास की पत्ता उस गेंद में जाकर फंस जाएगा। फिर ऐसी और कई पत्तियां इस्तेमाल करके, मैं उन सब को मंत्र से अभिमंत्रित करके उनसे एक रस्सी बनाऊंगा और फिर जैसे ही मैं उस रस्सी को खींच लूंगा, तुम्हारी गेंद इस कुएं में से बाहर आ जाएगी।’

फिर द्रोण ने एक घास का पत्ता उठा लिया और उसे मंत्र से अभिमंत्रित करके गेंद की तरफ फेंक दिया। वह घास का पत्ता उस गेंद में अटक के बैठ गया। फिर द्रोण ने ऐसे कई सारे पत्ते उठाएं और हर एक पत्ते को अभिमंत्रित करके, उन्होंने कुएं में डालना शुरू किया। इससे घास के पत्तों की एक लंबी रस्सी बन गई। फिर अंत में द्रोण ने उसके रस्सी को खींचकर, राजकुमारों की गेंद निकाल दी। यह चमत्कार देखने के लिए, सभी राजकुमार उस कुएं के अंदर बड़े कुतूहल से देख रहे थे।

द्रोण का चमत्कार देखकर, कौरव और पांडव दंग रह गए। हाथ जोड़कर, वह द्रोण के सामने खड़े हुए और फिर युधिष्ठिर ने उनसे कहा, ‘हे वीर, आप कौन हैं? आपका परिचय क्या हैं? आपने हमें जो चमत्कार दिखाया है, ऐसा करना बड़े-बड़ों को संभव नहीं है।’

युधिष्ठिर की बात सुनने के बाद, द्रोण ने कहा, ‘तुमने अभी जो देखा है, वह जाकर अपने दादाजी बता दो। भीष्म को अपने आप पता चल जाएगा कि मैं कौन हूं।’

द्रोण का कहना मानकर सारे राजकुमार फिर भीष्म के पास चले गए और भीष्म को सारी घटित घटना सुना दी। राजकुमारों से सारी घटना सुनने के बाद, भीष्म को यह पहचानने में देर नहीं लगी कि ऐसा वीर ब्राह्मण तो केवल द्रोण ही हो सकते हैं।’

इसके बाद, भीष्म ने द्रोण को मिलने के लिए बुलाया।

भीष्म की विनती सुनकर, द्रोण दरबार में चले आए. द्रोण का यथोचित सत्कार करने के बाद, भीष्म ने द्रोण से पूछा कि उनका हस्तिनापुर आने का क्या कारण है?

भीष्म का प्रश्न सुनकर द्रोण ने भीष्म को अपनी कथा सुनानी शुरू कर दी।

‘बहुत साल पहले, जब मैं पिता के आश्रम में विद्यार्जन कर रहा था, उस समय पांचाल नरेश प्रिषद भी मेरे पिता के मित्र थे। इसलिए वह मेरे पिता के आश्रम में आते-जाते रहते थे। उनके साथ उनका पुत्र द्रुपद भी मेरे पिता के आश्रम में बार-बार आता था। तो हम एक-दूसरे के साथ खेला करते थे। इससे हमारी मित्रता हो गई थी। बाद में, मेरे पिता ने मुझे और द्रुपद को विद्यार्जन के लिए अग्निवेश नामक ऋषि के आश्रम में भेज दिया।  अग्निवेश ऋषि के आश्रम में हम दोनों में गहरी मित्रता हो गई। उस समय द्रुपद हमेशा कहता था कि वह मेरा परममित्र है और इसलिए जीवन में कोई कठिनाई मेरे ऊपर आती है, तो वह मुझे अवश्य मदद करेगा।

इसके कुछ समय बाद, मैंने गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया और कृपी से विवाह कर लिया। इसके बाद, हमें अश्वत्थामा नामक एक पुत्र की प्राप्ति हो गई।  विद्या में निपुण होने के बावजूद मैंने निष्कांचन रहने का व्रत ले लिया था। इसलिए हमारे घर में इतना धन नहीं था।  कभी-कभी अश्वत्थामा को पिलाने के लिए गाय का दूध भी नहीं होता और उसका हट पूरा करने के लिए मेरी पत्नी उसे चावल के आटे में पानी मिलाकर देती थी। 

एक दिन, यह देखकर मैं दुखी हो गया और संपत्ति पाने के लिए परशुराम के पास चला गया। लेकिन उन्होंने अपनी संपत्ति पहले ही ब्राह्मणों को दान कर दी थी। किंतु उन्होंने मुझे सम्पत्ति की जगह उनकी शस्त्रविद्या ज़रूर प्रदान की। यह जानने के बाद, मुझे लगा कि अब अपने मित्र द्रुपद की मदद लेनी चाहिए। द्रुपद के पिता की मृत्यु के बाद, वह पांचाल का राजा बन गया था। फिर में अपने परिवार को लेकर द्रुपद के पास पहुंच गया। मेरी कामना उससे भिक्षा मांगने की नही थी। मैं उसके देश में रहकर विद्या की मदद से धन कमाना चाहता था। उसके दरबार में जाने के बाद, मैंने उसे अपना मित्र कहकर बुलाया। लेकिन यह बात उसे अच्छी नहीं लगी। उसने भरे दरबार में मेरे परिवार के सामने मेरा घोर अपमान कर दिया। उस अपमान का बदला लेने के लिए ही, मैं बड़ी आशा से कुरु वंश के पास आया हूं।’

द्रोण की व्यथा सुनकर, भीष्म ने उनसे पूछा कि वह कुरु वंश से किस प्रकार की मदद चाहते हैं? तो द्रोण ने कहा, ‘अगर आप मुझे कोई बुद्धिमान और ईमानदार शिष्य प्रदान करेंगे, तो मैं उसको अपनी अमोघ शस्त्रविद्या सिखाकर, इस संसार का सबसे बलवान वीर बना दूंगा। उसके बाद, उनकी मदद से, द्रुपद को परास्त करके मैं अपनी मनीषा पूर्ण कर लूँगा।’

द्रोण की इच्छा सुनकर, भीष्म ने आनंदित हो गया और फिर भीष्म ने द्रोण से कहा, ‘हे ब्राह्मण श्रेष्ठ, मैं एक नहीं किंतु सारे कुरु राजकुमारों को आपके चरणों में अर्पण करना चाहता हूं। राजकुमारों के लिए, आपके जैसा ज्ञानी गुरु पाकर मैं धन्य हो जाऊंगा। कृपा करके, आप उनको अपनी छत्रछाया में ले लीजिए और आज से ही उनकी विद्या का प्रारंभ कर दीजिए। इसके आगे, आपको कभी किसी चीज की कमी नहीं पड़ेगी। मैं आपके रहने की उचित व्यवस्था कर दूँगा  और इसके साथ ही आपको संपत्ति भी दे दूंगा।’

फिर द्रोण ने कुरु राजकुमारों को अपने शिष्यों के रूप में स्वीकार कर लिया. इस प्रकार से, द्रोण कौरवों और पांडवों के गुरु बन गए और लोग उन्हें द्रोणाचार्य के नाम से पुकारने लगे।