दिशा बताइए (व्यंग्य) : हरिशंकर परसाई

 

समारोह के मुख्य अतिथि नहीं आए थे। वादा करके जो मुख्य अतिथि ऐन मौके पर न आए वह आम आ जाने वाले मुख्य अतिथि से बड़ा होता है, जैसे वह कवि बड़ा होता है जो पेशगी खा जाए और कवि सम्मेलन में न जाए। मैं एक कवि को जानता हूं जो हर शहर की पेशगी खा गए और अब उन्हें कोई नहीं बुलाता। वे कवि-कर्म से ही छुट्टी पा गए हैं।

संयोजक घबड़ाए हुए हॉल में चारों तरफ नज़रें डाल रहे थे। उनकी तलाश दुहरी थी–अपने मुख्य अतिथि को वे खोज रहे थे और साथ ही, उसकी एवज में मुख्य अतिथि बन सकने वाले को भी ढूंढ रहे थे। मुख्य अतिथि की एक बनावट होती है। गांधीजी ने खादी का धोती-कुरता पहनाकर और नेहरू ने जाकिट पहनाकर कई पीढ़ियों के लिए मुख्य अतिथि की बनावट तय कर दी थी। आज़ादी के पहले ये सब दुबले थे, इसलिए मुख्य अतिथि नहीं होते थे। आज़ादी के बाद ये मोटे हो गए, कुछ की तोंद निकल आई और आदर्श मुख्य अतिथि बन गए। मैं इधर कुछ सालों से देख रहा हूं, मैं फुर्ती से मुख्य अतिथि के रूप में ढल रहा हूं। कुरता-पायजामा, जाकिट मैं पहले से ही पहनता हूं। इधर कपड़ा ज़्यादा लगने लगा है। ज्यों-ज्यों कपड़ा ज़्यादा लगने लगा है, त्यों-त्यों मैं मुख्य अतिथि की गद्दी की तरफ सरक रहा हूं।

कोने में रखी फूल-मालाओं की आंखें निकल आई हैं। वे अपने मुख्य अतिथि की तलाश कर रही हैं। मैं फूल-मालाओं से आंखें मिला रहा हूँ। बड़ा ‘फस्ट्रेशन’ है उनकी आंखों में, बड़ी निराशा। वादा करके भी प्रेमी कॉफी हाउस में न मिले तो उस मन:स्थिति में सुंदरी को पटा लेना सहज होता है। मैं देख रहा हूं, मालाएं मुझसे आंखें मिला रही हैं। इधर संयोजकों की नज़र मुझपर बार-बार पड़ती है और वे आपस में कानाफूसी करते हैं। वे एवज़ के मुख्य अतिथि के रूप में मुझे तौल रहे हैं। एवज़ में छोटों का भाग्य चमक जाता है। राम की एवज़ में खड़ाऊं राजसिंहासन पर बैठ गई थीं।

तीन संयोजक दरवाज़े के पास खड़े सलाह कर रहे हैं। वे मेरी तरफ बार-बार देखते हैं। मुख्य अतिथि उनके लिए ज़रूरी है। उन्हें मालाएं पहनानी हैं। माला पहनाना कुछ लोगों की तन्दुरुस्ती के लिए ज़रूरी है। वे अगर महीने में एक बार किसी को माला न पहनाएं तो स्वास्थ्य खराब होने लगता है। हर समाज में माला पहनानेवाले ज़रूरी हैं। अगर ये न हों तो माला पहनने वालों की गर्दनें पिचक जाएं। मंत्रिमंडल से निकलने के बाद एक साहब को माला पहनाने वाले नहीं मिलते थे। उनका स्वास्थ्य गिरने लगा। डॉक्टरों ने उन्हें सलाह दी कि आप फूलमाला का सेवन करें। उन्होंने दस रुपये महीने पर एक माली को रोज़ माला पहनाने के लिए लगा लिया। शाम को वे सजकर कुर्सी पर बैठ जाते। माली आता और माला पहनाता। वे कहते–भाइयो और बहनो! उनकी सेहत अच्छी हो गई। मगर माली का स्वास्थ्य गिरने लगा। हर एक को माला पहनाना अनुकूल नहीं पड़ता। अपनी-अपनी प्रकृति है। भगवान भूतल पर कोई बड़ा काम करते थे, तो निठल्ले देवता आकाश से फूल बरसाते थे। दोनों का स्वास्थ्य ठीक रहता था। कर्मी के लिए फूल तोड़ने में निठल्ले का वक्त अच्छा कट जाता है।

संयोजक अब निर्णय पर पहुंच रहे हैं। दूर हैं, पर हाव-भाव से पूरा वार्तालाप मैं सुन रहा हूं। एक कहता है–परसाईजी ठीक रहेंगे। दूसरे का चेहरा खिन्न होता है। कहता है–नहीं यार, वह नहीं जमेंगे। तब तीसरा मेरे समर्थन में कहता है–कोई और यहां है ही नहीं और टाइम बहुत हो गया। बहुमत मेरे पक्ष में हो गया है। मैं जाकिट के बटन लगा लेता हूं। बालों पर हाथ फेरता हूं। दुरुस्त हैं। रूमाल चेहरे पर फेरता हूं, जिससे उचक्कापन साफ हो जाए और नीचे दबी गम्भीरता ऊपर आ जाए। अब वे आते ही हैं। मालाएं एकटक नजर मेरी तरफ देख रही हैं। उन्हें गर्दन मिल गई।

मैं मंच पर पहुंच गया। एवज़ में मुख्य अतिथि मैं पहले भी एक बार बन चुका था। तब संस्था के मंत्री ने श्रोताओं से कहा था–हमें बड़ा दुख है कि अमुकजी नहीं आए, इसलिए परसाईजी को मुख्य अतिथि बनाना पड़ रहा है। आशा है, आप लोग हमें क्षमा करेंगे। यह सुनकर भी मैं बेशर्मी लादकर बैठा रहा।

मालाएं मुझे पहनाई जाने लगीं। मुझे इसका अभ्यास कम है। गर्दन भी अभी मालाओं के अनुकूल नहीं है। कई गर्दनें मैंने ऐसी देखी हैं जैसे वे माला पहनने के लिए ही बनी हों। गर्दन और माला बिल्कुल ‘मेड फॉर ईच अदर’ रहती हैं। माला लपककर गले में फिट हो जाती है। फूल की मार विकट होती है। कई गर्दनें जो संघर्ष में कटने के लिए पुष्ट कर दी गई थीं, माला पहनकर लचीली हो गई हैं। एक क्रांतिकारी इधर रहते हैं जिनकी कभी तनी हुई गर्दन थी। मगर उन्हें माला पहनने की लत लग गई। अब उनकी गर्दन छूने से लगता है, भीतर पानी भरा है। पहले जन-आन्दोलन में मुख्य अतिथि होते थे, अब मीना बाजार में मुख्य अतिथि होते हैं।

मैंने 10-12 मालाएं पहनीं और मेरी सारी उद्धतता चली गई। फूल की मार बुरी होती है। शेर को अगर किसी तरह एक फूलमाला पहना दो तो गोली चलाने की ज़रूरत नहीं है। वह फौरन हाथ जोड़कर कहेगा–मेरे योग्य कोई और सेवा!

मंत्री माइक पर कहता है–अब परसाईजी हमें दिशा-निर्देश करेंगे। यह तरुणों की संस्था है। मैं इन्हें क्या दिशा बताऊं? हर दिशा में यहां दिशा-शूल हैं। कभी सोचा था कि तकनीकी शिक्षा की दिशा में जाना चाहिए मगर हज़ारों बेकार इंजीनियर हैं। उस दिशा में भी दिशा-शूल निकला।

क्या दिशा बताऊं? ये तरुण मुझ जैसे के गले में यहां माला पहना रहे हैं और इन्हीं की उम्र के बंगाल के तरुण मुझ जैसे की गर्दन काट रहे हैं। कौन-सी सही दिशा है? माला पहनाने की, या गला काटने की?

किसी को दिशा नहीं मालूम। दिशा पाने के लिए यहां की राजनैतिक पार्टियां एक अधिवेशन उत्तर में श्रीनगर में करती हैं, दूसरा दक्षिण में त्रिवेन्द्रम में, तीसरा पूर्व में पटना में और चौथा पश्चिम में जोधपुर में–मगर चारों तरफ घूमकर भी जहां की तहां रहती हैं। बाएं जाते-जाते लौटकर दाएं चलने लगती हैं।

दिशा मुझे मालूम ही नहीं है। कई साल पहले मैं नए लेखक के रूप में दिशा खोज रहा था। तभी दूसरों ने कहा–बेवकूफ, जो दिशा पा लेता है वह घटिया लेखक होता है। सही लेखक दिशाहीन होता है। ऊंचा लेखक वह जो नहीं जानता कि कहां जाना है, पर चला जा रहा है।

दिशा मैंने छोड़ दी। देख रहा हूं, लेखक चौराहे से चारों सड़कों पर जाते हैं। मगर दूर नहीं जाते। लौट-लौटकर चौराहे पर आ जाते हैं और इंतज़ार करते हैं कि उन्हें उठा ले जाने वाली कार कब आती है और वे बैठकर बाकी लेखकों को ‘टा-टा’ बोलकर चले जाते हैं। सुना है, बम्बई, कलकत्ता, दिल्ली में तो हवाई जहाज़ से उड़ा ले जाते हैं। मैं दिशा की खोज में जूते घिसता रहा और चौराहे का ध्यान नहीं रखा। देर से चौराहे पर लौटता हूं, देखता हूं, साथ के लोगों को उठा लिया गया है।

नहीं, दिशा मैं नहीं बता सकता। फूल-मालाओं से लाद दो तब भी नहीं। दिशा आज सिर्फ अंधा बता सकता है। अंधे दिशा बता भी रहे हैं। सवेरे युवकों को दिशा बताएंगे, शाम को वृद्धों को। कल डॉक्टरों को दिशा बताएंगे, तो परसों पाकिटमारों को। अंधा दिशा भेद नहीं कर सकता, इसलिए सही दिशा दिखा सकता है।

मैंने श्रोताओं से कहा–मैं दिशा नहीं जानता। फिर मैं बहुत दयालु और शरीफ मुख्य अतिथि हूं। आपको बिल्कुल तकलीफ नहीं दूंगा। मैं भाषण नहीं दूंगा।

श्रोताओं ने लम्बा भाषण सुनने के लिए सारी शक्ति बटोर ली थी। सांप दिखे तो आदमी उससे बचने के लिए स्नायुओं को तीव्र कर लेता है, मांसपेशियां मज़बूत हो जाती हैं। मगर फिर यह समझ में आया कि रस्सी है, तो राहत तो मिलती है, पर साथ ही एक तरह की शिथिलता और गिरावट भी आती है। मेरे श्रोताओं का यही हाल था। जिसे सांप समझे थे वह रस्सी निकला।

बाद में संयोजकों ने कहा–आपने भाषण क्यों नहीं दिया? मैंने कहा–वे श्रोता मेरे नहीं थे। तुम्हारे उन मुख्य अतिथि के थे। मैं दूसरे का मारा हुआ शिकार नहीं खाता।