चरखा और गुलाब - (सुशोभित)

 

गाँधी और नेहरू के युगपत् पर एकाग्र किसी भी पुस्तक का इससे सुंदर शीर्षक भला और क्या हो सकता है- ‘चरखा और गुलाब।’ जैसे दो रूपकों का सम्यक निरूपण!

वह पुस्तक मैंने दिल्ली के राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय से ली थी। गाँधीजी और नेहरू जी ने अपने जीवनकाल में पत्रों, भाषणों, लेखों, पुस्तकों में जहाँ-जहाँ एक-दूसरे के बारे में कुछ कहा, उसमें से यह एक संचयन है। इन दोनों के परस्पर, उसके अपरिहार्य संयोग, उसके विरोधाभासों का उन्हीं के शब्दों में एक चित्रण।

इसी में ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ के पेज नंबर 359 पर अवतरित होने वाला वह वाक्य भी है- ‘एंड देन गाँधी केम!’ (और तब गाँधी आए!)

भारत का संपूर्ण इतिहास सुना देने के बाद नेहरू जी ने यह वाक्य लिखा था। ‘विश्ववंद्य’ पुस्तक में पहली बार गाँधी का नामोल्लेख। जो भी गाँधीजी से मोहाविष्ट है, वह पूछ सकता है- गाँधी के पदार्पण की सूचना देने के लिए 359 पृष्ठों की भूमिका!

और तब, मुझको याद हो आया रिचर्ड एटेनबरो की फ़िल्म ‘गाँधी’ का वह सरल-सा दृश्य, जिसमें असहयोग आंदोलन के बाद बंदी बनाए गए गाँधीजी से जेल में मिलने नेहरू जी आते हैं और उन्हें देश में हो रही गतिविधियों का संवाद सुनाते हैं। वे दोनों एक मेज़ पर पास-पास बैठे होते हैं और गंभीर मुद्रा में फुसफुसाते हुए बतियाते हैं।

मैंने वह दृश्य वहीं रोक दिया और टकटकी लगाकर इन दोनों को देर तक देखता रहा। फ़िल्म में ‘गाँधी’ की भूमिका में बेन किंग्स्ले थे और नेहरू की भूमिका में रोशन सेठ।

सहसा, आनंद कुमारस्वामी का एक वाक्य मेरे मन में कौंधा- “ग्राम और नगर- जैसे किसी शिल्पकृति में वस्तु और रूप।”

मुझे लगा मैं परिवार के किसी पुराने एलबम में अपने पुरखों की तस्वीर देख रहा हूँ, जो बरसों पहले चल बसे। हठात् मेरा गला रूँध गया।

उनका गौरव भारत का गौरव बन गया। उनकी अपकीर्ति भारत की अपकीर्ति बन गई। उनकी नियति से भारत की नियति जुड़ गई। आधुनिक भारत-नियति के ये दो अनिवार्य नक्षत्र हैं-

गाँधी और नेहरू! वस्तु और रूप!! चरखा और गुलाब!!!

यानी, भारत का अद्वैत!