बापू की बोली - (सुशोभित)

 

आशीष नंदी ने गाँधी और नेहरू की अंग्रेज़ी पर टिप्पणी करते हुए बड़ी सुंदर बात कही थी। उन्होंने कहा था कि “जहाँ नेहरू की सजी-सँवरी एडवर्डियन अंग्रेज़ी अब पुरानी लगती है (इंग्लैंड में एडवर्डियन काल विक्टोरियन काल के ठीक बाद माना जाता है), वहीं गाँधीजी की अंग्रेज़ी में बाइबिल जैसी सरलता है।” इसके आगे उन्होंने जोड़ा- “बहुत सारे लोग इस बात को समझ नहीं पाते कि गाँधीजी अंग्रेज़ी के विलक्षण लेखक थे और पश्चिम के असहमत चिंतकों का उनका ज्ञान असाधारण था।”

जब गाँधीजी दक्षिण अफ्रीका में थे तो उन्होंने गुजराती और अंग्रेज़ी में ‘इंडियन ओपिनियन’ नामक पत्र निकाला। भारत में उन्होंने अंग्रेज़ी में ‘यंग इंडिया’ निकाला। गुजराती में ‘नवजीवन’ निकाला (आम्बेडकर ने आरोप लगाया था कि गाँधीजी अपने अंग्रेज़ी लेखन में उदारवादी विचार व्यक्त करते थे और गुजराती लेखन में परंपरावादी)! ‘हरिजन’ नामक पत्र उन्होंने तीन भाषाओं में निकाला- ‘हरिजन’ अंग्रेज़ी में, ‘हरिजन बंधु’ गुजराती में और ‘हरिजन सेवक’ हिन्दी में। ‘हिन्द स्वराज’ और ‘सत्य के प्रयोग’ उन्होंने मूल गुजराती में लिखी थीं। जीवन का लंबा समय उन्होंने वर्धा और सेवाग्राम में भी बिताया तो कालांतर में उनकी भाषा पर महाराष्ट्रीयन प्रभाव भी आ गया। ‘हिन्द स्वराज’ को उन्होंने स्वयं अंग्रेज़ी में अनूदित किया, ‘सत्य के प्रयोग’ महादेव भाई देसाई ने अनूदित की। चंपारण आंदोलन के बाद से उन्होंने हिन्दी पर ध्यान एकाग्र करना शुरू किया। इसको वे हिन्दुस्तानी ज़बान कहते थे और भारतीय राष्ट्रीय पहचान के लिए केंद्रीय महत्त्व की बतलाते थे। आज़ादी के बाद बीबीसी को उन्होंने जो कहा था, वो तो अब चिर स्मरणीय है- “दुनिया से कह दो कि गाँधी अंग्रेज़ी भूल गया।”

‘हिन्द स्वराज’ का गुजराती से हिन्दी अनुवाद अमृतलाल ठाकोरदास ने किया था और ‘सत्य के प्रयोग’ का गुजराती से हिन्दी अनुवाद काशीनाथ त्रिवेदी ने किया था। इन पुस्तकों को हिन्दी में पढ़ने का अपना ही सुख है। बाद के सालों में जब गाँधी हिन्दी में बोलने और लिखने लगे तो उसमें भी उनका वह गुजराती लहजा बरक़रार रहा। इस कारण गाँधीजी की भाषा अलग से ही पहचानी जाती है। वह अनगढ़ है, मुहावरेदार है, देशी है। और उसमें विचारों का तारतम्य लयपूर्ण रहता है, विश्रृंखल नहीं होता। यह वही चीज़ है, जिसे आशीष नंदी ने बाइबिल जैसी सरलता कहा है। इसमें बखान की एक कहन है, जो पाठक को जोड़ती है। एक वाक्य से जुड़कर दूसरा वाक्य बनता है और उसमें आप सिनर्जीकल प्रवाह देख सकते हैं।

विष्णु खरे ने गाँधीजी में एक धोखादेह सरलता पाई थी। और वैसा सोचने वाले वे अकेले नहीं थे। गाँधी की बहुत सारी बातें ऊपर से जितनी सरल दिखती हों, उनके भीतर एक गहरा आत्ममंथन रहता है। किंतु चूँकि गाँधी एक अकादमिक पृष्ठभूमि से नहीं आते थे, इसलिए उनके पास अपनी विचार श्रृंखला को बाँधने वाला वैसा भाषारूप नहीं था, जैसा कि नेहरू के पास था। इसी ने उनको सर्वव्यापी भी बना दिया। वे हमेशा जनसमुदाय को सीधे संबोधित कर सकते थे और उन तक अपनी बात पहुँचा सकते थे।

गाँधीजी की भाषा के बारे में एक नुस्ख़ा मैं आपको बतलाऊँ। जब गाँधीजी के बारे में सर्वत्र व्याप्त प्रलाप और आरोप-प्रत्यारोप और दोषारोपण से आप विचलित हो जावें तो एक काम करें। गाँधीजी की कोई भी पुस्तक उठाएँ और उसे किसी भी जगह से खोलकर एक-दो पन्ने पढ़ जाएँ। गाँधी हेरिटेज पोर्टल ने पचास हज़ार पृष्ठों का ‘संपूर्ण गाँधी वांग्मय’ सौ खंडों में प्रकाशित किया है, वो तो किसी सौभाग्यशाली के ही पास होगा, किंतु आपके पास गाँधीजी की जो भी पुस्तक हो, उसी को पढ़ने का यत्न कीजिए। भाषा में भावना होती है और आप इसे अनुभव कर सकते हैं। चतुराई से उसे कुछ देर तक ही छुपाया जा सकता है, दूर तक नहीं। गाँधीजी की भाषा में चाहे आग्रह हो, चाहे आत्मचिंतन, चाहे दैन्य, चाहे संकल्प, वह वैसी खरी भावना को व्यंजित करती है कि उसके पीछे कान लगाकर आप बापू की आवाज़ को सुन सकते हैं।

यह एक ऐसे मानुष की आवाज़ है, जो यह हमेशा जानता है कि सही क्या है, फिर भले उस सही के परिणाम चाहे जो हों। यह उस व्यक्ति का लहजा है, जिसने ज़माना देखा है, दीन-दुनिया के रंग-ढंग निरखे-परखे हैं, आदमी की ज़ात पहचानी है और अच्छाई और बुराई को लेकर उसके मन में कोई दुविधा नहीं है। सबसे बढ़कर उसको आदमी की अच्छाई पर अथाह भरोसा है। आप बाहर खड़े होकर प्रश्न पूछ सकते हैं कि इसको आप अच्छा क्यों कहते हैं और इसको बुरा क्यों कहते हैं, किंतु उस मानुष के भीतर वैसा कोई प्रश्न नहीं है। और यह उद्भावना उसकी भाषा में उतर आती है।

जब भी गाँधीजी पर संशय हो, समाधान के लिए किसी और के पास न जाएँ, स्वयं गाँधीजी के पास जाएँ-

“जो अच्छा होता है, वह बीरबहूटी की तरह धीरे चलता है। वह जल्दी नहीं करता। वह जानता है कि आदमी पर अच्छी बात का असर डालने में बहुत समय लगता है, बुरी बात ही तेज़ी से बढ़ जाती है। घर बनाना मुश्किल है, तोड़ना सहल है।” [‘हिन्द स्वराज’ से]