अंधेरे में (कहानी) : गजानन माधव मुक्तिबोध | Andhere me

 

एक रात को बारह बजे, ट्रेन से एक युवक उतरा। स्टेशन पर लोग एक कतार में खड़े थे और ज़्यादा नहीं थे। इसलिए ट्रेन से नीचे आने में उसको ज़्यादा कठिनाई नहीं हुई। स्टेशन पर बिजली की रोशनी थी, परन्तु वह रात के अँधियाले को चीर न सकती थी, और इसलिए मानो रात अपने सघन रेशमी अँधियाले से तम्बूनुमा घर हो गई थी जिसमें बिजली के दीए जलते हों। उतरते ही प्लेटफ़ार्म की परिचित गन्ध, जिसमें गरम धुआँ और ठंडी हवा के झोंके, गरम चाय की बास और पोर्टरों के काले लोहे में बन्द मोटे काँचों से सुरक्षित पीली ज्वालाओं के कंदील पर से आती हुई अजीब उग्र बास, इत्यादि–सारी परिचित ध्वनियों और गन्धों ने उनकी संज्ञा से भेंट की। युवक के हृदय में जैसे एक दरवाज़ा खुल गया था, एक ध्वनि के साथ, और मानो वह ध्वनि कह रही थी–आ गया, अपना आ गया...।

युवक झटपट उतरा। उसके पास कुछ भी सामान नहीं था, कोयले के कणों से भरे हुए लम्बे बालों में हाथों से कंघी करता हुआ वह चला। पाँच साल पहले वह यहीं रहता था। इन पाँच सालों की अवधि में दुनिया में काफ़ी परिवर्तन हो गया, परन्तु उस स्टेशन पर परिवर्तन आना पसन्द नहीं करता था, युवक ने अपने पूर्वप्रिय नगर की खुशी में एक कप चाय पीना स्वीकार किया और वहीं स्टॉल पर खड़ा होकर कपबशी की आवाज़ करता हुआ इधर-उधर देखने लगा। सब पुराना वातावरण था। परन्तु इस नगर के मुहल्ले में बीस साल बिता चुकनेवाला यह पचीस साल का युवक पुराना नहीं रह गया था। उसकी आत्मा एक नए महीन चश्मे से स्टेशन को देख रही थी।

टिकट देकर स्टेशन पर आगे बढ़ा तो देखता है कि ताँगे निर्जल अलसाए बादलों की भाँति निष्प्रभ और स्फूर्तिहीन ऊँघते हुए चले जा रहे हैं। युवक ने इसी से पहचान लिया कि यह विशेषता इस नगर की अपनी चीज़ है।

दुकानें सब बन्द हो चुकी थीं, जिनके पास नीचे सड़क पर आदमी सिलसिलेवार सो रहे थे। उनके साथी और उन्हीं के समान सभ्य पशुओं में से निर्वासित श्वान-जाति दुबकी इधर-उधर पड़ी हुई थी। युवक ने पैर बढ़ाने शुरू कर दिए। उखड़ी हुई डामर की काली सड़क पर बिजली की धुँधली रोशनी बिखर रही थी। एक ओर दुकानें, फिर सराय, फिर अफ़ीम-गोदाम, फिर एक टुटपुंजिया यूनिसिपल पार्क, फिर एक छोटा चौराहा जहाँ डनलप टायर के विज्ञापनवाली दुकान और उसके सामने लाल पम्प, फिर उसके बाद कॉलेज। और इस तरह इस छोटे शहर की बौनी इमारतें और नक़ली आधुनिकता इसी सड़क के किनारे-किनारे एक ओर चली गई थीं। दूसरी ओर रेल का हिस्सा था जहाँ शंटिंग का सिलसिला इस समय कुछेक घंटों के लिए चुप था।

युवक को रात का यह वातावरण अत्यन्त प्रिय मालूम हुआ। गरमी के दिन थे। फिर भी हवा बहुत ठंडी चल रही थी। सड़क के खुले हिस्से में जहाँ रेल के तार जा रहे थे, नीम और पीपल के वृक्ष के पत्ते झिरमिर-झिरमिर कर रहे थे। रेल की पटरियों के उधर मालवे का पठार शुरू हो जाता था, जहाँ के सघन आम के बड़े-बड़े दरख्त दूर से ही दीख रहे थे। उसी मैदान पर, एक ओर, एक नवीन मुहल्ला, शहर के अमीरों, व्यापारियों, अफ़सरों का उपनिवेश, सिकुड़ा हुआ था।

सब दूर शान्ति थी। रात का गाढ़ा मौन था। युवक के रोज़मर्रा के कर्मप्रधान जीवन में रोज़ रात का एक, सोने का समय था, और सुबह के साढ़े आठ के अनन्तर जागने का समय था। वैदिक ऋषि-मनीषियों के उष:सूक्त से लगाकर तो अत्याधुनिक छायावादियों के ‘बीती विभावरी जाग री, अम्बर पनघट में डुबो रही ताराघट ऊषा नागरी’ का दर्शन इस युवक ने इन गए पाँच सालों में बहुत कम किया है।

अपने उस कर्म-जटिल क्षेत्र को पीछे छोड़कर जैसे मनुष्य अपनी अरुचिकर यादों से बचना चाहता हो–यह युवक इस रात में पा रहा था कि वातावरण में पठार-मैदान से उठकर आनेवाली हवा की उत्फुल्ल और मीठी ताज़गी के साथ-ही-साथ मानो मनुष्यों की सोई हुई चुपचाप आत्माएँ अपनी गाढ़ी नीरवता में अधिक मधुर होकर वन की सुगन्ध और वृक्ष के मर्मर में मिल गई है।

रेल की पटरियों के पार–रेलवे यार्ड में ही–वहाँ के मध्यवर्गीय नौकरों के क्वार्टर्स बने हुए थे। बाहर ही, जो उसका आँगन कहा जा सकता है, दो खाटें समानान्तर बिछी हुई थीं जिनके बीच में एक छोटा-सा टेबल रखा हुआ था। उस पर एक आधुनिक लैम्प अपनी अध्ययन–समर्पित रोशनी डाल रहा था। एक खाट पर एक पुरुष कोई पुस्तक पढ़ रहा था और दूसरी पर घोर निद्रा थी। लैम्प की धुँधली रोशनी में घर के सामनेवाले बाजू पर एक काला-सा अधखुला दरवाज़ा और बाँस की चिमटियों से बनाए गए बन्द बरांडे के लेटे-से चतुष्कोण साफ़ दीख रहे थे। उस घर की पंक्ति में ही कई क्वार्टर्स और दीख रहे थे, उसी तरह पंक्तिबद्ध खाटें बराबर यथास्थान लगी हुई चली गई थीं।

युवक के मन में एक प्यार उमड़ आया। ये घर उसे अत्यन्त आत्मीय-जैसे लगे, मानो वे उसके अभिन्न अंग हों।

यही बात उसकी समझ में नहीं आई। इस अजीब आनन्दमय भावना ने उसके मन के सन्तुलित तराजू को झटके देने शुरू किए। वह भावनाओं से अब इतना अ यस्त नहीं रह गया था कि उनका आदर्शीकरण कर सके। रोज़ का कठिन, शुष्क, दृढ़ जीवन उसे एक विशेष तरह का आत्मविश्वास-सा देता था। परन्तु...आज...।

वह बैठनेवाला जीव न था। रास्ते पर पैर चल रहे थे। मन कहीं घूम रहा था। दूसरे उसे अत्यन्त एकान्त–जहाँ उसकी सहज प्रवृत्तियों का खुला बालिश खिलवाड़ हो–बहुत दिनों से नहीं मिला था।

उसने सोचना शुरू किया कि आख़िर क्यों यह अजीब जल के निर्मलिन सहस्र स्रोतों-सी भावना उसके मन में आ गई।

उसको जहाँ जाना था, वहाँ का रास्ता उसे मिल नहीं सकता था। एक तो यह कि पाँच साल के बाद शहर की गलियों को वह भूल चुका था। दूसरे, जिस स्थान पर उसे जाना था वह किसी ख़ास ढंग से उसे अरुचिकर मालूम हो रहा था। इसलिए लक्ष्यस्थान की बात ही उसके दिमाग़ से ग़ायब हो गई थी।

पैर चल रहे थे या उसके पैर के नीचे से रास्ता खिसक रहा था, यह कहना असम्भव है, परन्तु यह ज़रूर है कि कुछ कुत्ते–चिर-जाग्रत् रक्षक की भाँति खड़े हुए–भूँक रहे थे।

उसके मन में किसी अजान स्रोत से एक घर का नक्शा आया। उसका भी बरांडा इसी तरह की चिमटियों से बना हुआ था। वहाँ भी वासन्ती रातों में नीम के झिरिर-मिरिर के नीचे खाटें पड़ी रहती थीं। युवक को एक धुँधली सूरत याद आती है, उसकी बहन की, और आते ही फ़ौरन चली जाती है। बस चित्र इतना ही। यह मत समझिए कि उसके माता-पिता मर गए। उसके भाई हैं, माता-पिता हैं। वे सब वहीं रहते हैं जिस शहर में यह रहता है।

युवक हँस पड़ा। उसे समझ में आ गया कि क्यों उन क्वार्टरों को देखकर आत्मीयता उमड़ आई। मज़दूर चालों में, जहाँ वह नित्य जाता है, या उसके अमीर दोस्तों के स्वच्छ सुन्दर मकानों में, जहाँ से वह चन्दा इकट्ठा करता, चाय पीता, वाद-विवाद करता और मन-ही-मन अपने महत्त्व को अनुभव करता है–वहाँ से तो कोई आत्मीयता की फुसफुसाहट नहीं हुई। हमारा युवक अपने पर ही हँसने लगा। एक सूक्ष्म, मीठा और कटु हास्य।

दूर एक दुकान पर साठ नम्बर का ख़ास बेलजियम का बिजली का लट्टू जल रहा था। सड़क पर ही कुरसियाँ पड़ी थीं, बीच में टेबल था। एक आरामकुर्सी पर लाल भैरोगढ़ी तहमद बाँधे हुए ताँगेवाले साहब बैठे हुए बिस्कुट खा रहे थे। दूसरी कुरसी पर एक निहायत गन्दा, पीछे से फटी हुई चड्डी पहने, उघाड़े बदन, लड़का कभी बिस्कुटों के चूरे खाने की तरफ़ या भाफ उठाते हुए टेबल पर रखे चाय के कप की तरफ़ देखता हुआ बैठा था। दूसरी कुरसी पर दूसरे मुसलमान सज्जन रोटी और मांस की कोई पतली वस्तु खा रहे थे और बहुत प्रसन्न मालूम हो रहे थे। जो होटल का मालिक था वह एक पैर पर अधिक दबाब डाले–उसको खूँटा किए खड़ा था, सिगरेट पी रहा था और कुछ ख़ास बुद्धिमानी की बातें करता था जिसको सुनकर रोटी और मांस की पतली वस्तु को दोनों हाथों का उपयोग कर खानेवाले मुसलमान सज्जन ‘अल्लाहो अकबर’, ‘अल्ला रहम करे’ इत्यादि भावनाप्लुत उद्गारों से उसका समर्थन करते जाते थे। सिगरेट का कश वह इतनी ज़ोर से खींचता था कि उसका ज्वलन्त भाग बिजली की भयानक रोशनी में भी चमक रहा था। उसका हाथ आराम से जंघा-क्षेत्र में भ्रमण कर रहा था।

दुकान के अन्दर से पानी को झाड़ू से फेंकने की क्रिया में झाड़ू की कर्कश दाँत पीसती-सी आवाज़ और पानी के ढकेले जाने की बालिश रोतली ध्वनि आ रही थी, साथ ही उसके छींटे छोटे-छोटे कंकड़ों की भाँति लगातार बाहर उन्नतवक्र रेखामार्ग से चले आ रहे थे। बिजली का लट्टू दरवाज़े के ऊपर लगे हुए कवर के बहुत नीचे लटक रहा था, जिस पर लगातार गिरनेवाले छींटे सूखकर धब्बे बन रहे थे।

इतने में पुलिस के एक गश्तवान सिपाही लाल पगड़ी पहने और ख़ाकी पोशाक में आकर बैठ गए। वे भी मुसलमान ही थे। उनकी दाढ़ी पर छह बाल थे, और ओठों पर तो थे ही नहीं। चालीस साल की उम्र हो चुकी थी पर बालों ने उन पर कृपा नहीं की थी। नाक उनकी बुद्धि से व्यापक थी, काले डोरे की घुंडी की भाँति चमक रही थी। आँख में एक चुपचाप दयनीयता झाँक उठती। वह कोई मुसीबतजदा प्राणी था–शायद उसे सूज़ाक था–या उसकी घरवाली दूसरे के साथ फ़रार हो गई थी। या वह किसी अभागी बदसूरत वेश्या का शरीरजात था। उसे न जाने कौन-सी पीड़ा थी जो चार आदमियों में प्रकट नहीं की जा सकती थी। वह पीड़ा तो दूसरों के आनन्द और निर्बाध हास्य को देखकर चुपचाप निबिड़ आँखों में चमक उठती थी। वह इस समय भी चमक रही थी, किसी ने उसकी तरफ़ ध्यान नहीं दिया। उसके सामने क्रमानुसार चाय आ गई और फुर-फुर करते हुए पीने लगा।

ताँगेवाले महाशय का ताँगा वहीं दुकान के सामने सड़क के दूसरे किनारे खड़ा था। घोड़ा अपने मालिक की भाँति बड़ा चढै़ल और ग़ुस्सैल था। एक ओर तो वह बिजली की रोशनी में चमकनेवाली हरी घास को बादशाह की भाँति खा रहा था, तो दूसरी ओर आध घंटे में एक बार अपनी टाँग ताँगे में मार देता था। उसके घास खाने की आवाज़ लगातार आ रही थी और उसका भव्य सफ़ेद गम्भीर चेहरा होटल को उपेक्षा की दृष्टि से देख रहा था।

ताँगेवाले महाशय ने चाय पीनी शुरू की। तगड़ा मुँह था। बेलौस सीधी नाक थी और उजला रंग था। ठाठदार मोतिया साफ़ा अब भी बँधा हुआ था। बोल-चाल निहायत शुस्ता और सलीक़े से भरी थी। चेहरे पर मार्दव था जो कि किसी अक्खड़ बहादुर सिपाही में हो सकता है। आज दिन में उन्होंने काफ़ी कमाई की थी, इसीलिए रात में जगने का उत्साह बहुत अधिक मालूम हो रहा था।

दुकान के अन्दर झाड़ू की कर्कश आवाज़ और पानी की खल-खल ध्वनि बन्द हो गई। छोटी-छोटी बूँदें टपकानेवाली मैली झाड़ू लिये एक पन्द्रह का लड़का, एक आँख से काना, दरवाज़े में खड़ा हो गया। वह एक गन्दी बनियान पहने हुए और घुटने पर से फटे पाजामे को कमर पर इकट्ठा किए खड़ा था कि मालिक का अब आगे क्या हुक्म होता है। परन्तु बाहर मजलिस जमी थी। लाल साफ़ेवाला सिपाही बड़ी रुचि के साथ उसे सुन रहा था। चाहता था कि वह भी कुछ कहे...।

इतने में इन लोगों को दूर से एक छाया आती हुई दिखाई दी। सब लोगों ने सोचा कि इस बात पर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं! पर धीरे-धीरे आनेवाली उस छाया का सिर्फ़ पैंट ही दिखाई दिया और कुछ थकी-सी चाल! युवक चुपचाप उन्हीं की ओर आया और हलकी-सी आवाज़ में बोला, ‘चाय है?’ उत्तर में ‘हाँ’ पाकर और बैठने के लिए एक अच्छी आरामदेह कुरसी पाकर वह खुश मालूम हुआ। लोगों ने जब देखा कि चेहरे से कोई ख़ास आकर्षक या असाधारण आदमी मालूम नहीं होता, तब आश्वास की साँस लेकर बातें करने लगे!

लाल पगड़ीवाला दयनीय प्राणी कुछ बोलना चाहता था। इतने में उसके दो साथी दूर से दिखाई दिए। उन्हें देखकर वह अत्यन्त अनिच्छा से वहाँ से उठने लगा। उसने सोचा था कि शायद, कोई बैठने को कहे। परन्तु लोगों को मालूम भी नहीं हुआ कि कोई आया था और जा रहा है।

‘माधव महाराज के ज़माने में ताँगवालों को ये आफ़त नहीं थी, मौलवी सा’ब! मैंने बहुत ज़माना देखा है। कई सुपुरडंट आए, चले गए, कोतवाल आए, निकल गए। पर अब पुलिसवाला ताँगे में मुफ़्त बैठेगा भी, और नम्बर भी नोट करेगा...’ ताँगेवाले ने कहा।

होटलवाला जो अब तक मौलवी साहब से कुछ ख़ास बुद्धिमानी की बात कर रहा था, उसने अब ज़ोर से बोलना शुरू किया। धोती की तहमद बाँधे, बहुत दुबला, नाटे क़द का एक अधेड़ हँसमुख आदमी था। वह बहुत बातूनी, और बहुत खुशमिज़ाज आदमी और अश्लील बातों से घृणा करनेवाला, एक ख़ास ढंग से संस्कारशील और मेहनती मालूम होता था। उसने कहा, ‘मौलवी सा’ब, दुनिया यों ही चलती रहेगी। मैंने कई कारोबार किए। देखा, सबमें मक्कारी है। और कारोबारी की निगाह में मक्कारी का नाम दुनियादारी है। पुलिसवाले भी मक्कार हैं–ताँगवाले कम मक्कार नहीं हैं। वह जैनुल आबेदीन–मिर्जावाड़ी में रहनेवाला...सुना है आपने क़िस्सा।’

मौलवी साहब ठहाका मारकर हँस पड़े। ‘या अल्लाह’ कहते हुए दाढ़ी पर दो बार हाथ फेरा और अपनी उकताहट को छिपाते हुए–मौलवी साहब को एक कप चाय और बिस्कुट मुफ़्त या उधार लेना था–आँखों में मनोरंजक विस्मय कूड़कर होटलवाले की बात सुनने लगे।

होटलवाले ने अपने जीवन का रहस्योद्घाटन करने से डरकर बात को बदलते हुए कहा, ‘मैं आपको क़िस्सा सुनाता हूँ। दुनिया में बदमाशी है, बदतमीज़ी है। है, पर करना क्या? गालियों से तो काम नहीं चलता, क्यों रहीमबख़्श (ताँगेवाले की ओर संकेत कर), ताँगेवाले बहुत गालियाँ देते हैं! दूसरे, सड़क पर से गुज़रती हुई औरतों को देख–चाहे वे मारवाड़िनियाँ ही हों, ढिल्लमढाल पेटवाली–बस इन्हें फ़ौरन लैला याद आ जाती है। यह देखकर मेरी तो रूह काँपती है। मौलवी सा’ब, मेरा दिल एक सच्चे सैयद का दिल है। एक दफ़ा क्या हुआ कि हज़रत अली अपने महल में बैठे हुए थे। और राज-काज देख रहे थे कि इतने में दरबान ने कहा कि कुछ मिस्री सौदागर आए हैं, आपसे मिलना चाहते हैं। अब उनमें का एक सौदागर आलिम था।’

मौलवी सिर्फ़ उसके चेहरे को देख रहे थे जिस पर अनेक भावनाएँ उभड़ रही थीं जिससे उसका चिपका-काला चेहरा और भी विकृत मालूम होता था। दूसरे, वह यह अनुभव कर रहे थे कि यह अपना ज्ञान बघार रहा है और ज्ञान का अधिकार तो उन्हें है। तीसरे, उन्होंने यह योग्य समय जानकर कहा, ‘भाई, एक कप चाय और बुलवा दो।’

चाय का नाम सुनकर कुरसी पर बैठे हुए युवक ने कहा, ‘एक कप यहाँ भी।’

पीछे से फटी चड्डी पहने हुए गन्दा लड़का ऊँघ रहा था। वह ऊँघता हुआ ही चाय लाने गया। ताँगेवाला रहीमबख़्श बातों को ग़ौर से सुन रहा था। वह जानना चाहता था कि इस कहानी का ताँगवालों से क्या सम्बन्ध है।

होटलवाले ने कहना शुरू किया, ‘उनमें का एक सौदागर आलिम था। उसने हज़रत अली का नाम सुन रखा था कि ग़रीबों के ये सबसे बड़े हिमायती हैं। शानोशौक़त बिलकुल पसन्द नहीं करते। और अब देखता क्या है कि महल की दीवारें संगमरमर से बनी हुई हैं, जिसमें ख़्वाबकोह के हीरे दरवाज़ों के मेहराबों पर जड़े हुए हैं और चबूतरा काले चिकने संगमूसे का बना हुआ है। हरे-हरे बाग़ हैं और फ़व्वारे छूट रहे हैं। वह मन-ही-मन मुसकराया। गरमी पड़ रही थी, और रूमाल से बँधे हुए सिर से पसीना छूट रहा था।

‘हज़रत अली के सामने जब माल की क़ीमत नक्की हो चुकी, तो सौदागर उनकी मेहरबानी सूरत से खिंचकर बोला कि ‘बादशाह सलामत! सुना था कि हज़रत अली ग़रीबों के ग़ुलाम हैं। पर मैंने कुछ और ही देखा है। हो सकता है, ग़लत देखा हो।’

‘सौदागर अपना गट्ठा बाँधते-बाँधते कह रहे थे। हज़रत अली की आँख से एक बिजलीसी निकली। सौदागर ने देखा नहीं, उसकी पीठ उधर थी, वह अपने माल का गट्ठा बाँध रहा था।

‘हज़रत अली ने कहा, ‘ज़्यादा बातें मैं आपसे नहीं कहना चाहता। आप मुझे इस वक़्त महल में देखते हैं, पर मैं हमेशा यहाँ नहीं रहता। बाज़ार में अनाज के बोरे उठाते हुए मुझे किसी ने नहीं देखा है।’ हज़रत अली की आँखें किसी ख़ास बेचैनी से चमक रही थीं।

‘वे रेशम का लम्बा शाही लबादा पहने हुए थे। उन्होंने उसके बन्द खोले।

‘सौदागर ने आश्चर्य से देखा कि हज़रत अली मोटे बोरे के कपड़े अन्दर से पहने हुए हैं।

‘सौदागर ने सिर नीचा कर लिया।’

सैयद होटलवाले की आँखों में आँसू आ गए। मौलवी साहब ने सिर नीचा कर लिया, मानो उन्हें सौ जूते पड़ गए हों। चाय की गरमी सब ख़तम हो गई। ताँगवाले को इसमें ख़ास मज़ा नहीं आया। युवक अपनी कुरसी पर बैठा हुआ ध्यान से सुन रहा था।

होटलवाले ने कहा, ‘असली मज़हब इसे कहते हैं। मेरे पास मुस्लिम लीगी आते हैं। चन्दा माँगते हैं। मुस्लिम क़ौम निहायत ग़रीब है! मुझसे पाकिस्तान नहीं माँगते। मुझसे पाकिस्तान की बातें भी नहीं करते। हिन्दू-मुस्लिम इत्तेहाद पर मेरा विश्वास है। लेकिन मैं ज़रूर दे देता हूँ। ‘कौमी जंग’ अख़बार देखा है आपने? उसकी पॉलसी मुझे पसन्द है। लाल बावटेवालों का है। मैं उन्हें भी चन्दा देता हूँ। मेरा ममेरा भाई बिरला मिल में है। खाता कमेटी का सेक्रेटरी है। वह मुझसे चन्दा ले जाता है।’

युवक अब वहाँ बैठना नहीं चाहता था। फिर भी, सैयद साहब की बातों को पूरा सुन लेने की इच्छा थी। मालूम होता था, आज वे मज़े में आ रहे हैं। रात काफ़ी आगे बढ़ चुकी थी। होटल के सामने युनिसिपल बग़ीचे के बड़े-बड़े दरख्त रात की गहराई में ऊँघ-से रहे थे जिनके पीछे आधा चाँद मुस्लिम नववधू के भाल पर लटकते हुए अलंकार के समान लग रहा था।

नवयुवक जब उठा और चलने लगा तो मालूम हुआ कि उसके पीछे भी कोई चल रहा है। उन दोनों के पैरों की आवाज़ गूँज रही थी। परन्तु चाँद की तरफ़ (जिसकी काली पृष्ठभूमि भी कुछ आरुण्य लिए थी, मानो किसी मुग्ध रुचिर चेहरे पर खिली हुई लाल मिठास हो) जो घने दरख्तों के पीछे से उठ रहा था, वह युवक मुँह उठाए देखता जा रहा था। विशाल, गहरा काला, शुक्रतारकालोकित आकाश और नीचे निस्तब्ध शान्ति, जो दरख्तों की पत्तियों में भटकनेवाले पवन की क्रीड़ा में गा उठती थी।

युवक ऐसी लम्बी एकान्त रात में अर्ध-अपरिचित नगर की राह में अनुभव कर रहा था कि मानो नग्न आसमान, मुक्त दिशा और (एकाकी स्वपथचारी सौन्दर्य के उत्साह-सा, व्यक्ति-निरपेक्ष मस्त आत्माधारा के खुमार-सा) नित्य नवीन चाँद से लाखों शक्तिधाराएँ फूटकर नवयुवक के हृदय से मिल रही हों। नग्न, ठंडे-पाषाण, आसमान और चाँद की भाँति ही–उसी प्रकार, उसका हृदय नग्न और शुभ्र शीतल हो गया है। द्रव्य की गतिमयी धारा ही उसके हृदय में बह रही है। पाषाण जिस प्रकार प्रकृति का अविभाज्य अंग है, मनुष्य प्रकृति पर अधिकार करके भी अपने रूप से उसका अविभाज्य अंग है।

चाँद धीरे-धीरे आसमान में ऊपर सरक रहा था। वृक्षों का मर्मर रात के सुनसान अँधेरे में स्वप्न की भाँति चल रहा था, परस्पर-विरोधी विचित्र गतिताल के संयोग-सा।

जो छाया दो क़दम पीछे चल रही थी, वह नवयुवक के साथ हो गई। नवयुवक ने देखा कि सफ़ेद, नाज़ुक, लाठी के हिलते त्रिकोण पर चाँद की चाँदनी खेल रही है; लम्बी और सुरेख नाक की नाज़ुक कगार पर चाँद का टुकड़ा चमक रहा है, जिससे मुँह का क़रीब-क़रीब आधा भाग छायाच्छन्न है। और दो गहरी छोटी आँखें चाँदनी और हर्ष से प्रतिबिम्बित हैं। उस वृद्ध मौलवी के चेहरे को देखकर नवयुवक को डी.एच. लॉरेंस का चित्र याद आ गया!

उस अर्द्ध-वृद्ध ने आते ही अपनी ठेठ प्रकृति से उत्सुक होकर पूछा, ‘आप कहाँ रहते हैं?’

वृद्ध के चेहरे पर स्वाभाविक अच्छाई हँस रही थी। इस नए शहर के (यद्यपि नवयुवक पाँच साल पहले यहीं रहता था) अजनबीपन में उसे इस मौलवी का स्वाभाविक अच्छाई से हँसता चेहरा प्रिय मालूम हुआ। उसने कहा, ‘मैं इस शहर से भली-भाँति वाक़िफ़ नहीं हूँ। सराय में उतरा हूँ। नींद नहीं आ रही थी, इसलिए बाहर निकल पड़ा हूँ।’ होटल में बैठा हुआ यह वृद्ध मौलवी सैयद से हार गया था, मानो उसकी विद्वत्ता भी हार गई थी। इस हार से मन में उत्पन्न हुए अभाव और आत्मलीन जलन को वह शान्त करना चाहता था। ‘सैयद साहब बहुत अच्छे आदमी हैं। हम लोगों पर उनकी बड़ी मिहरबानी है।’

नवयुवक ने बात काटकर पूछा, ‘आप कहाँ काम करते हैं?’

‘मैं मस्जिद के मदरसे में पढ़ाता हूँं। जी हाँ, गुज़र करने के लिए काफ़ी हो जाता है।’ उसकी आँखें सहसा लान हो गईं और वह चुप होकर, गरदन झुकाकर नीचे देखने लगा। फिर कहा, ‘जी हाँ, दस साल पहले शादी हो चुकी थी। मालूम नहीं था कि वह गहने समेट करके चंपत हो जाएगी।...तब से इस मस्जिद में हूँ।’

युवक ने देखा कि आधा-बूढ़ा एक ऐसी बात कह गया है जो एक अपरिचित से कहना नहीं चाहिए। बूढ़े ने कुछ ज़्यादा नहीं कहा। परन्तु इतने नैकट्य की बात सुनकर युवक की सहानुभूति के द्वार खुल गए। उसने बढ़े की सूरत से ही कई बातें जान लीं–वही दु:ख जो किसी-न-किसी रूप में प्रत्येक कुचले मध्यवर्गीय के जीवन में मुँह फाड़े खड़ा हुआ है।

‘जी हाँ, मस्जिद में पाँच साल हो गए, पंधरा रुपया मिलते हैं, गुज़र कर लेता हूँ। लेकिन अब मन नहीं लगता। दुनिया सूनी-सूनी-सी लगती है। पर इस लड़ाई ने एक बात और पैदा कर दी है–दिलचस्पी! रेडियो सुनने में कभी नागा नहीं करता। रोज़ कई अख़बार टटोल लेता हूँ। जी हाँ, एक नई दिलचस्पी। किताब पढ़ने का शौक़ ज़रूर है। पर मैं तालीमयाफ़्ता हूँ नहीं। तो, गर्जे–कि समझ में नहीं आती।’

बूढ़ा अपनी नर्म, रेशमी, सितार के हलके तारों की गूँज-सी आवाज़ में कहता जा रहा था। बातें मामूली तथ्यात्मक थीं, परन्तु उनके आसपास भावना का आलोकवलय था। उसकी ज़िन्दगी में आहत भावनाओं की जो तर्कहीन शक्ति थी, वह उसकी बातों की साधारणता में अपूर्व वैयक्तिक रंग भर देती थी।

युवक को यह अच्छा लगा। प्रिय मालूम हुआ। एक क्षण में उसने अपनी सहानुभूति की जादुई आँख से जान लिया कि कोई असंगत (अजीब) मस्जिद होगी, जहाँ रोज़ चुपचाप लोग यंत्रचालित-सी एक क़तार में प्रार्थना पढ़ते होंगे। और उसकी सूनी, खाली, दूसरी मंज़िल पर यह असन्तुष्ट और जीवनपूर्ण अर्द्ध-वृद्ध छोटे-छोटे मैले-कुचैले लड़के-लड़कियों को दुपहर में पढ़ाता होगा। अपने लड़कों के ऊधम से परेशान माँ- बाप उन्हें काम में जुटाए रखने के लिए मदरसे में भेज देते होंगे, और यह अनमने भाव से पढ़ाता होगा, और अपनी ज़िन्दगी, दुनिया और दुपहर का सारा क्रुद्ध सूनापन इसके दिल में बेचैनी से तड़पता होगा...।

उसने मौलवी से पूछा, ‘आपकी उम्र क्या होगी?’

युवक ने देखा कि मौलवी को यह सवाल अच्छा लगा। उसका चेहरा और भी कोमल होता–सा दिखाई दिया। उसने कहा, ‘सिर्फ़ चालीस। यद्यपि मैं पचास साल के ऊपर मालूम होता हूँ। अजी, इन पाँच सालों ने मुझको खा डाला। फिर भी मैं कमज़ोर नहीं हूँ। काफ़ी हट्टा-कट्टा हूँ।’

मौलवी यह सिद्ध करना चाहता था कि वह अभी युवक है। जीवन की स्वाभाविक, स्वातंत्र्यपूर्ण, उच्छृंखल आकांक्षा-शक्तियाँ उसके सारे शरीर में तारल्य भर देती थीं। उसके चलने में, बातचीत में, वह अन्तिमता नहीं थी जो शैथिल्य और उदासी में पक्वता का आभास पैदा कर देती है। उसने चालीस ठीक कहा था और नवयुवक को भी उसकी बात पर अविश्वास करने की इच्छा न हुई।

‘ओफ़्फो:, तो आप जवान हैं!’ युवक ने थमकर आगे कहा, ‘तो आपका दिमाग़ लड़ाई पर ज़रूर चलता होगा...’

‘अरे साहब, कुछ न पूछिए, सैयद साहब मुझसे परेशान हैं।’

‘आप ‘कौमी जंग’ पढ़ते हैं? आपके होटल में तो मैंने अभी ही देखा है।’

‘ कौमी जंग’ तो हमारी मस्जिद में भी आता है! हमारे सबसे बड़े मौलवी परजामंडल के कार्यकर्ता हैं। जमीयत-उल-उलेमा हिन्द के मुअज्ज़िज हैं। वहीं के उलेमा हैं। सब तरह के अख़बार ख़रीदते हैं। यहाँ उन्होंने मुस्लिम फ़ारवर्ड ब्लाक खोल रखा है।’

युवक को यहाँ की राजनीति में उलझने की कोई ज़रूरत नहीं थी। फिर भी उससे अलग रहने की भी कोई इच्छा नहीं थी। इतने में एक गली आ गई जिसमें मुड़ने के लिए मौलवी तैयार दिखाई दिया। युवक ने सिर्फ़ इतना ही कहा, ‘किताबों के लिए हम आपकी मदद करेंगे। अब तो मैं यहाँ हूँ कुछ दिनों के लिए। कहाँ मुलाक़ात होगी आपसे?’

‘सैयद साहब के होटल में। जी हाँ, सुबह और शाम।’

मौलवी साहब के साथ युवक का कुछ समय अच्छा कटा। वह कृतज्ञ था। उसने धन्यवाद दिया नहीं। उसकी ज़िन्दगी में न मालूम कितने ही ऐसे आदमी आए हैं जिन्होंने उस पर सहज विश्वास कर लिया, उसकी ज़िन्दगी में एक निर्वैयक्तिक गीलापन प्रदान किया। जब कभी युवक उन पर सोचता है तो अपने लिए, अपने विकास के लिए उनका ऋणी अनुभव करता है। उनके झरनों ने उसकी ज़िन्दगी को एक नदी बना दिया। उनमें से सब एक सरीखे नहीं थे। और न उन सबको उसने अपना व्यक्तित्व दे दिया था। परन्तु उनके व्यक्तित्व की काली छायाओं, कंटकों और जलते हुए फ़ास्फ़ोरिक द्रव्यों, उनके दोषों से उसने नाक-भौंह नहीं सिकोड़ी थी। अगर वह स्वयं कभी आहत हो जाता, तो एक बार अपना धुआँ उगल चुकने के बाद उनके व्रणों को चूमने और उनका विष निकाल फेंकने के लिए तैयार होता। उनके व्यक्तित्व की बारीक से बारीक बातों को सहानुभूति के मायक्रोस्कोप (वृहद् दर्शक ताल) से बड़ा करके देखने में उसे वही आनन्द मिलता था जो कि एक डॉक्टर को। और उसका उद्देश्य भी एक डॉक्टर का ही था। उसमें का चिकित्सक एक ऐसा सीधा-साधा हकीम था, जो दुनिया की पेटेंट दवाइयों के चक्कर में न पड़कर अपने मरीज़ों से रोज़ सुबह उठने, व्यायाम करने, दिमाग़ को ठंडा रखने और उसकी दो पैसे की दो पुड़िया शहद के साथ चाट लेने की सलाह देता था। सहानुभूति की एक किरण, एक सहज स्वास्थ्यपूर्ण निर्विकार मुसकान का चिकित्सा-सम्बन्धी महत्त्व, सहानुभूति के लिए प्यासी, लँगड़ी दुनिया के लिए कितना हो सकता है–यह वह जानता था! इसलिए वह मतभेद और परस्पर पैदा होनेवाली विशिष्ट विसंवादी कटुताओं को बचाकर निकल जाता था। वह उन्हें जानता था और उसकी उसे ज़रूरत नहीं थी। दुनिया की कोई ऐसी कलुषता नहीं थी जिस पर उलटी हो जाए–सिवाय विस्तृत सामाजिक शोषणों और उनसे उत्पन्न दम्भों और आदर्शवाद के नाम पर किए गए अन्ध अत्याचारों, यांत्रिक नैतिकताओं और आध्यात्मिक अहंताओं की तानाशाहियों को छोड़कर। दुनिया के मध्यवर्गीय जनों के अनेक विषों को चुपचाप वह पी गया था, और राह देख रहा था सिर्फ़ क्रान्ति-शक्ति की। परन्तु इससे उसको एक नुक़सान भी हुआ था। व्यक्ति उसके लिए महत्त्वपूर्ण नहीं था; व्यक्तित्व अधिक,चाहे वह व्यक्तित्व मामूली ही हो और वह भी तभी तक जब तक उसकी जिज्ञासा और उष्णता का तालाब सूख न जाए। उसकी उष्णता का दृष्टिकोण भी काफ़ी अमूर्त था, क्योंकि उसके व्यक्तित्व का उद्देश्य अमूर्त था। इसलिए अपने आपमें व्यक्ति उससे यदाकदा छूट जाता था, सिवाय उनके जो उसकी धड़कनों और रक्त के साथ मिल गए हैं। हकीम मरीज़ों को फ़ौरन भूल जाते हैं; और मर्ज़ के लिए और मर्ज़ के साथ-साथ वे याद आते हैं। परिणामत: उसकी सहज उष्णता पाकर व्यक्ति उसके साथ एक हो जाते, अपने को नग्न कर देते; और फिर उससे नाना प्रकार की अपेक्षाएँ करने लगते जो सम्भव होना असम्भव था।

मौलवी जब गली में मुड़कर गया तो युवक की आँखें उस पर थीं। मौलवी का लम्बा, दुबला और श्वेतवस्त्रावृत सारा शरीर उसे एक चलता फिरता इतिहास मालूम हुआ। उसकी दाढ़ी का त्रिकोण, आँखों की चपल चमक और भावना शक्तियों से हिलते कपोलों का इतिहास जान लेने की इच्छा उसमें दुगुनी हो गई।

तब सड़क के आधे भाग पर चाँदनी बिछी थी और आधा भाग चन्द्र के तिरछे होने के कारण छायाच्छन्न होकर काला हो गया था। उसका कालापन चाँदनी से अधिक उठा हुआ मालूम हो रहा था।

युवक के सामने समस्याएँ दो थीं। एक आराम की, दूसरी आराम के स्थान की। और दो रास्ते थे। एक तो, कि रात-भर घूमा जाए–रात के समाप्त होने में सिर्फ़ साढ़े-तीन घंटे थे। और दूसरे, स्टेशन पर कहीं भी सो लिया जाए।

कुछ सोच-विचारकर उसने स्टेशन का रास्ता लिया।

उसके शरीर में तीन दिन के लगातार श्रम की थकान थी। और उसके पैर शरीर का बोझ ढोने से इनकार कर रहे थे। परन्तु जिस प्रकार ज़िन्दगी में अकेले आदमी को अपनी थकान के बावज़ूद भी, भोजन ख़ुद ही तैयार करना पड़ता है–तभी तो पेट भर सकता है–उसी प्रकार उसके पैर चुपचाप, अपने दु:ख की कथा अपने से ही कहते हुए अपने कार्य में संलग्न थे।

उसको एक बार मुड़ना पड़ा। वह एक कम चौड़ा रास्ता था जिसके दोनों ओर बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं के ऊपरी भाग पर चाँदनी बिछी हुई थी।

थकान से शून्य मन में नींद के झोंके आ रहे थे, परन्तु एक डर था पुलिसवाले का, अगर रास्ते में मिल जाए तो उसके सन्देहों को शान्त करना मुश्किल है। डर इसलिए भी अधिक है कि रास्ता अँधेरे से ढँका हुआ, सिर्फ़ अट्टालिकाओं पर गिरी हुई चाँदनी से कुछ-कुछ प्रत्यावर्तित प्रकाश से रास्ते का आकार सूझ रहा है।

मन में शून्यता की एक और बाढ़! नींद का एक और झोंका!! रास्ता दोनों ओर से बन्द होने के कारण शीत से बचा हुआ है–उसमें अधिक गरमी है।

युवक कैसे तो भी चल रहा है। नींद के गरम लिहाफ़ में सोना चाहता है। नींद का एक और झोंका! मन में शून्यता की एक और बाढ़!

युवक के पैरों में कुछ तो भी नरम-नरम लगा–अजीब, सामान्यत: अप्राप्य, मनुष्य के उष्ण शरीर-सा कोमल। उसने दो-तीन क़दम और आगे रखे। और उसका सन्देह निश्चय में परिवर्तित हो गया। उसका सारा शरीर काँप गया। उसकी बुद्धि, उसका विवेक काँप गया। वह यदि क़दम नहीं रखता है तो एक ही शरीर पर–न जाने वह बच्चे का है या स्त्री का, बूढ़े का या जवान का–उसका सारा वज़न, एक ही पर जा गिरे। वह क्या करे? वह भागने लगा एक किनारे की ओर। परन्तु कहाँ–वहाँ तक आदमी सोए हुए थे। उनके शरीर की गरम कोमलता उसके पैरों से चिपक गई थी। वहीं एक पत्थर मिला, वह उस पर खड़ा हो गया, हाँफता हुआ। उसके पैर काँप रहे थे। वह आँखें फाड़-फाड़कर देख रहा था। परन्तु अँधेरे के उस समुद्र में उसे कुछ नहीं दीखा। यह उसके लिए और भी बुरा हुआ। उसका पाप यों ही अँधेरे में छिपा रह जाएगा। उसकी विवेक-भावना सिटपिटाकर रह गई; उसको ऐसा धक्का लग गया कि वह सँभलने भी नहीं पाई। वह पुण्यात्मा विवेक-शक्ति केवल काँप रही थी!

युवक के मन में एक प्रश्न, बिजली के नृत्य की भाँति मुड़-मुड़कर, मटक-मटक कर घूमने लगा–क्यों नहीं इतने सब भूखे भिखारी जगकर, जाग्रत होकर, उसको डंडे मारकर चूर कर देते हैं–क्यों उसे अब तक ज़िन्दा रहने दिया गया?

परन्तु इसका जवाब क्या हो सकता है?

वह हारा-सा, सड़क के किनारे-किनारे चलने लगा। मानो उस गहरे अँधेरे में भी भूखी आत्माओं की हज़ार-हज़ार आँखें उसकी बुज़दिली, पाप और कलंक को देख रही हों। स्टेशन की ओर जानेवाली सीधी सड़क मिलते ही युवक ने पटरी बदल दी।

लम्बी सीधी सड़क पर चाँदनी आधी नहीं थी क्योंकि दोनों ओर अट्टालिकाएँ नहीं थीं; केवल किनारे पर कुछ-कुछ दूरियों से छोटे-छोटे पेड़ लगे हुए थे। मौन, शीतल चाँदनी सफ़ेद कफ़न की भाँति रास्ते पर बिछती हुई दो क्षितिजों को छू रही थी। एक विस्तृत, शान्त खुलापन युवक को ढँक रहा था और उसे सिर्फ़ अपनी आवाज़ सुनाई दे रही थी–पाप! बंगाल की भूख हमारे चरित्र-विनाश का सबसे बड़ा सबूत। उसकी याद आते ही, जिसको भुलाने की तीव्र चेष्टा कर रहा था, उसका हृदय काँप जाता था, और विवेक-भावना हाँफने लगती थी।

उस लम्बी सुदीर्घ श्वेत सड़क पर वह युवक एक छोटी-सी नगण्य छाया होकर चला जा रहा था।

(हंस में प्रकाशित; सम्भावित रचनाकाल 1948-58)