आना न आना रामकुमार का (व्यंग्य) - हरिशंकर परसाई

 


बदनामी अपनी कई तरह की है। एक यही है कि भाषण देने के, उद्घाटन करने के और मुख्य अतिथि होने के भी पैसे ले लेता हूं।

मगर बदनामी इससे भी आगे बढ़ गई है, यह मुझे उस दिन मालूम हुआ। मैं एक शहर व्यक्तिगत काम से गया था। दूसरे दिन शाम को स्थानीय कॉलेज के 2-3 लड़के अपने अध्यापक के साथ आए। मैं खुद परेशान था कि इस शहर में कोई कॉलेज-वॉलेज या कोई संस्था है या नहीं? है तो कोई आता क्यों नहीं? 36 घंटे किसी छोटे शहर में लेखक को पड़े हो जाएं और कोई न आए, तो भी मन न जाने कैसा-कैसा करता है। खैर, वे आए तो तबियत हरी हो गई। उन्होंने कहा–कल हम लोग कॉलेज में आपका सम्मान करना चाहते हैं।

मैं झूठे संकोच नहीं पालता। मैंने कहा– कर डालो। शुभ काम है। कितने बजे आ जाऊं?

वे बोले–4 बजे प्रोग्राम रखा है। हम आपको लेने आ जाएंगे।

मैंने कहा–ठीक है। मैं तैयार रहूंगा।

बात खत्म होनी चाहिए थी। अब आगे कॉलेज के बारे में या मौसम के बारे में या साहित्य के बारे में बातें ही हो सकती थीं। पर वे गुमसुम बैठे थे।

आखिर एक लड़के ने निहायत भोलेपन से कहा–कितना रुपया लेंगे?

मैं काफी बेहया हूं। मगर इस बात ने मेरी भी चमड़ी उधेड़ दी। बदनामी इतनी आगे बढ़ गई है कि सम्मान करनेवाला जानता है कि यह नीच सम्मान करवाने के भी रुपये लेगा। कैसा बेशर्म है!

यह सही है कि किसी समारोह में जाना स्वीकार करते वक्त ही ‘पत्रं पुष्पं’ कहलानेवाली रकम का अंदाज़ दोनों पार्टियों को रहता है।

मैं पहुंचते ही आयोजकों के चेहरों, व्यवहार और आवभगत से हिसाब लगाना शुरू कर देता हूं कि ये अच्छे पैसे देंगे या नहीं? कभी ऐसा भी हुआ है कि ज़्यादा आवभगत करने वालों ने रुपये मुझे कम दिए हैं। लेखक का शंकालु मन है। शंका न हो तो लेखक कैसा? मगर वे भी लेखक हैं जिनके मन में न शंका उठती है न सवाल। ज़्यादा आवभगत होने लगे तो आशंका होती है कि ये पैसे कम होंगे। मैं मन-ही-मन कहता हूं–भैया, ज़्यादा कर रहे हो। नॉर्मल हो जाओ तो मैं भी हो जाऊं। तुम्हारी आवभगत के हिसाब से मेरी घबड़ाहट भी बढ़ रही है।

समारोह के बाद एक लिफाफा दिया जाता है। इस लिफाफे से मुझे सख्त चिढ़ है। हर लिफाफे से मुझे चिढ़ है। लिफाफा हमेशा अपने और दूसरे को धोखा देने के काम आता है। लिफाफा देखकर मैं बेचैन हो उठता हूं। पता नहीं कितने हैं? हैं भी या नहीं? चारों तरफ अंधकार। कोई रोशनी देनेवाला नहीं। मैं विरागी की तरह लिफाफा लेकर जेब में रख लेता हूँ जैसे तुच्छ माया है। पर मन बेचैन रहता है। मैं बातें करते-करते हाथ जेब में डालकर, नोटों को टटोलकर रकम का अंदाज़ा लगा लेता हूं। यह अभ्यास मुझे हो गया है। अगर इसमें नाकामयाब हुआ तो बाथरूम तो कहीं गया नहीं है। मैं बाथरूम में जाकर गिन लेता हूं।

रकम की अनिश्चितता की बेचैनी सबको होती है। जिन्हें नहीं होती वे आदमी नहीं हैं। और हैं भी, तो झूठे हैं। बहुतों में बाथरूम में घुसकर गिनने का नैतिक साहस नहीं होता और वे अशांत मन लेकर औपचारिक सद्भावना और संतोष निभाते रहते हैं।

मैं ऐसा नहीं करता। गिनकर निकलता हूं। और रकम संतोषप्रद होती है तो उन लोगों से कहता हूं–आपका यह इलाका बहुत प्रगतिशील है। मैं बहुत जगह घूमा हूं, पर ऐसा आगे बढ़ा हुआ क्षेत्र मुझे कम ही मिला है।

पर अगर रुपये कम हुए तो कहता हूं–यह इलाका पिछड़ा हुआ है। इसे अभी बहुत प्रगति करनी है।

10-15 रुपये के हेर-फेर में पूरे इलाके को प्रगतिशील या पिछड़ा हुआ घोषित कर देता हूं।

समारोह खत्म हो गया था। मुझे पहली गाड़ी से ही लौटना था। सामान बंध चुका था। होटल के कमरे में स्थानीय प्रबुद्ध जन और बंधु बैठे थे और मेरे भाषण की तारीफ कर रहे थे। मुझे तारीफ बिल्कुल अच्छी नहीं लग रही थी। मैं बार-बार दरवाज़े की तरफ देखता था–रामकुमार अभी तक नहीं आए।

रामकुमार वे सज्जन थे जिनके पास मेरे पैसे थे।

मैंने उन लोगों से कहा–रामकुमार अभी तक नहीं आए।

वे बोले–आते ही होंगे।

एक अध्यापक कहते हैं–सोचने की नई दिशा देते हैं आप।

दिशा? दिशा तो सही वह है जिससे रामकुमार को आना है। नहीं बताना मुझे दिशा, और सोचने की भी कोई खास ज़रूरत नहीं है। मुझे तो यह बताओ कि रामकुमार अब तक क्यों नहीं आए?

वे बंधु कहते हैं–एक कप चाय हो जाए।

चाय आती है। मुझे अच्छी नहीं लगती। रामकुमार ने मेरा स्वाद छीन लिया। एक-दो घूंट लेता हूं और फिर कहता हूं–रामकुमार नहीं आए।

–वे नहीं जानते कि मैं बार-बार रामकुमार को क्यों पूछता हूं।

अब मैं अपने को धिक्कारता हूं–लोभी! तू भी कोई लेखक है? लेखक क्या ऐसा होता है? धिक्कार है!

थोड़ी देर इस धिक्कार से मन को संभालता हूं, पर फिर पूछ उठता हूं–रामकुमार नहीं आए?

अब उन लोगों को अच्छा नहीं लग रहा है। वे शायद सोचते हैं कि कुछ घंटों में ही इन्हें रामकुमार इतने पसंद आ गए और हम कुछ नहीं?

एक सुंदरी आती है। कहती है–बड़ा सुंदर भाषण था आपका। मुझे ऊष्मा का अनुभव नहीं होता। इस वक्त विश्व-सुंदरी भी रामकुमार से घटिया है। सुंदरी मेरी ‘हूं-हां’ से निरुत्साहित होती है। पर देवी, मैं क्या करूँ? रामकुमार तो नहीं आए! अगर वे आ गए होते तो मैं तुमसे बड़े रस से बातें करता।

मैं मन को फिर संभालने की कोशिश करता हूं–बेवकूफ, परेशान क्यों होता है? पैसा ही तो सब कुछ नहीं है। दो हज़ार लड़कों ने तुम्हारा भाषण सुना। इनमें से अगर 50 भी बिगड़ गए तो जीवन सार्थक हो गया। जब तुम बोल रहे थे तब तुम उन लड़कों से चाहे तो तुड़वा सकते थे–परम्परा से लेकर भाग्य-विधाताओं के हाथ-पांव तक।

मेरा मन थोड़ा ऊंचा उठता है। मगर एक मिनट में ही फिर गिरता है और मैं कहता हूं–रामकुमार अभी तक नहीं आए।

उनमें एक बुजुर्ग अध्यापक मेरी बेचैनी समझ गए। उन्होंने अलग ले जाकर कान में कहा–रामकुमार शायद सीधे स्टेशन पैसे लेकर पहुंचें। चिंता मत करिए। अगर न भी आए तो हम भिजवा देंगे।

इन्होंने ऐसा क्यों कहा? ज़रूर पहले से मुझे चरका देने की योजना बन चुकी है। मुझे याद आया लखनऊ का वह वाकया। तीन प्रोफेसर लोग मुझे आगरा की गाड़ी में बिठाने आए। मैं समझा, ये रुपया लाए होंगे। पर वे कहने लगे कि हम समझे, प्रिंसिपल साहब ने आपको दे दिए होंगे। आगरा की गाड़ी सामने खड़ी थी और मेरे पास किराये के पैसे भी नहीं थे। तब उन अध्यापकों ने चंदा करके मेरे लिए टिकट खरीदा। पैसे मेरे आज तक नहीं आए।

मैं ज़्यादा बेचैन हो गया।

गाड़ी का वक्त हो गया। उन लोगों ने डिब्बे में मेरा सामान रखवाया। बैठते-बैठते मैंने फिर दोनों सड़कों पर नज़र दौड़ाई और कहा–रामकुमार अभी तक नहीं आए।

स्टेशन पर दूर-दूर तक रामकुमार कहीं नहीं हैं।

मेरी घबराहट बढ़ती है।

मैं कहता हूं–रामकुमार तो नहीं आए।

वे अब जवाब नहीं देते। परेशान हो गए हैं।

हम प्लेटफॉर्म पर चहलकदमी करते हैं। वे लोग साहित्य और राजनीति की बातें करते हैं। मेरा मन नहीं लगता। मेरे मन में रामकुमार की छवि समाई है।

दूसरे प्लेटफॉर्म पर एक गाड़ी रवाना होने को तैयार खड़ी है। तभी एक औरत सिर पर पोटली रखे भागती है और उसका पीछा एक साधु कर रहा है।