वाह रे मुल्ला - तेरा जवाब नहीं...

 


मुल्ला नसीरुद्दीन को कौन नहीं जानता? उनके अपने मजाकिया स्वभाव से समझाने की आदत दुनिया में बेमिसाल है। मुल्ला न तो नमाज अदा करते थे न मस्जिद जाते थे, यह भी आप जानते ही होंगे। बस इसी कारण मुल्ला को सब नास्तिक व काफिर कहते थे।

एक दिन उनके मोहल्लेवालों ने सोचा कि मुल्ला को मस्जिद जाने व नमाज पढ़ने हेतु समझाया जाए। मोहल्ले में नास्तिक का होना अच्छा नहीं। सो सबने मिलकर मुल्ला को समझाया। मुल्ला ने सबकी बात बड़े ध्यान से सुनी। ...फिर कहा- देखो भाई मैं मस्जिद तो नहीं जा सकता हूँ, पर हां तुमलोग इतना फोर्स कर रहे हो तो मैं अल्लाह को दिन में एकबार याद जरूर कर लूंगा। लेकिन करूंगा अपने वक्त पर तथा अपने तरीके से।

सबने सोचा, ठीक है। न करने से तो अच्छा ही है। उधर मुल्ला ने तो रात के बारह बजे घर की छत पर जाकर चिल्लाना शुरू कर दिया- सुन अल्लाह! मुझे सौ दीनार भिजवा दे; उसके बगैर तेरा छुटकारा नहीं। जबतक तू सौ दीनार नहीं भिजवाता, मैं ऐसे ही रोज रात को नमाज पढ़ता रहूंगा। और ध्यान रखना कि पूरे सौ लूंगा, एक भी कम नहीं लूंगा। ...बस इतना चिल्लाकर वह सो गया। फिर तो यह सिलसिला रोज का हो गया। रोज रात को वह छत पर जाए और तेज आवाज से बात दोहराए। बात वही कि सौ दीनार भिजवा, जबतक तू नहीं भिजवाता तबतक रोज ऐसे ही नमाज पढ़ता रहूंगा।

यह अजब नमाज हुई! और वह भी ऐसी अजब कि मोहल्लेवालों की शामत ही आ गई। उनकी रातों की नींद हराम हो गई। रोज रात मुल्ला चिल्ला-चिल्लाकर पूरे मोहल्ले को उठा देता था। और ऊपर से इबादत भी बेतुकी व ऊटपटांग। इससे तो वह नास्तिक ही अच्छा था। सब मुल्ला को समझाकर पछता रहे थ। अपनी भूल सुधारने हेतु उन्होंने मुल्ला को इबादत छोड़ने हेतु भी कहा, परंतु मुल्ला अडिग था। उसने स्पष्ट कह दिया कि एकबार शुरू कर दी तो कर दी। अब तो इसे अल्लाह ही सौ दीनार देकर छुड़वा सकता है।

अब अल्लाह क्यों सौ दीनार देने लगा? तकलीफ में तो बंदे थे, सो वे ही आगे आए। सबने मिलकर इस मुसीबत से छुटकारा पाने हेतु एक मीटिंग बुलाई। सुझाव काफी आए पर उनमें से एक ही प्रैक्टिकल जान पड़ा; और वह यह कि सब मिलकर निन्यानवे दीनार एकत्रित करते हैं, और जब मुल्ला रात को चिल्लाना शुरू करे तो वे दीनार पोटली में बांधकर उसकी छत पर फेंक देते हैं। चूंकि मुल्ला सौ दीनार मांग रहा है, बार-बार कह भी रहा है कि एक कम नहीं लूंगा; अतः निन्यानवे आए देखकर वह ठुकरा देगा। ...पोटली वापस फेंक देगा। बस हमें हमारे दीनार भी मिल जाएंगे और मुल्ला से छुटकारा भी। वह समझ जाएगा कि अल्लाह पूरे सौ दीनार देने को अभी राजी नहीं।

अब प्लान बन चुका था और इंतजार रात का था। बस रात को मुल्ला ने जैसे ही चिल्लाना प्रारंभ किया कि अल्लाह पूरे सौ दीनार लूंगा, एक कम नहीं लूंगा, कि योजनानुसार निन्यानवे दीनार से भरी थैली मुल्ला की छत पर फेंक दी गई। मुल्ला तो खुश-खुश हो गया। उसने झट से थैली खोल दीनार गिनने शुरू किए। लेकिन यह क्या, यह तो निन्यानवे है। उसने दो-तीन बार और गिने, पर थे निन्यानवे ही। खैर, कोई बात नहीं... उसने दीनार फिर थैली में भरे और थैली हवा में उठाता हुआ बोला- वाह रे अल्लाह, तू भी प्रोफेशनल हो गया है। एक दीनार थैली का काट ही लिया। इतना कहते-कहते उसने थैली जाकर आलमारी में रख दी और सो गया।

उधर मोहल्लेवालों को तो समझ में ही नहीं आया। यह तो दीनार ही चले गए। बेचारे सब रातभर जागे। सुबह-सुबह सीधे सबने मिलकर मुल्ला के घर दस्तक दी। जब सौ मांगे थे तो निन्यानवे क्यों रखे उसका सबब भी जानना चाहा।

मुल्ला ने हँसते हुए कहा- इतनी-सी बात से इतना टेन्शन में क्यों आ जाते हो? तुमलोगों के लिए यह बात नई कहां है? अच्छा बताओ, तुमलोग अल्लाह को जो भी चढ़ाते हो वह कभी अल्लाह तक पहुंचता है? उसे मौलवी ही यह कहकर रख लेते हैं न कि तुमलोगों ने अच्छी भावना से नहीं चढ़ाया, इसलिए अल्लाह ने वह चढ़ावा नहीं स्वीकारा, अतः मजबूरी में इसे हमें रखना पड़ रहा है। जब वहां चुप हो जाते हो तो यहां भी चुप हो जाओ। मैंने भी अल्लाह के प्रोफेशनल हो जाने की आड़ लेकर आपके दीनार रख लिए।

सार:- ...अब मोहल्लेवाले समझें-न-समझें, आप समझ लो कि आप जो मंदिर, मस्जिद या चर्च में चढ़ाते हैं वह भगवान तक न पहुंचा है न पहुंचनेवाला है। और फिर वह भगवान है ही इसलिए कि उसे आपसे ‘‘सिवाय शुद्ध भावना के’’ और कुछ स्वीकार्य ही नहीं है। सो क्यों अपनी मेहनत की कमाई व्यर्थ लुटा रहे हो? उससे तो दो-चार जरूरतमंदों को कुछ दे दो, वादा करता हूँ अल्लाह तक पहुंच जाएगा।