गाँधी की अनासक्ति -सुशोभित

 


30 जनवरी को गाँधीजी की हत्या की गई। 29 जनवरी को प्रार्थना-सभा में उन्होंने अपने जीवन का अंतिम सार्वजनिक वक्तव्य दिया। मैं देख रहा हूँ, प्रार्थना-प्रवचनों को ही अभी तक ठीक से उलीचा नहीं गया है। उसमें गाँधीजी की अंतश्चेतना के संबंध में अनेक गहरे संकेत मिलते हैं। मैं गाँधीजी के उस अंतिम प्रवचन को ध्यान से पढ़ रहा था कि मुझे उसमें एक उल्लेख्य बात दिखलाई दी। उसका संबंध गाँधीजी के चित्त से बहुत गहरा है। मैं पहले गाँधीजी को उद्धृत करूँ।

29 जनवरी को प्रार्थना सभा में गाँधीजी ने कहा-

“अभी कुछ लोग मेरे पास आए, वे शरणार्थी थे या कौन, मैंने पूछा नहीं। उन्होंने कहा- तुमने बहुत ख़राबी तो कर ली है, क्या और करते जाओगे? इससे बेहतर है कि जाओ। हमको छोड़ दो, भूल जाओ, भागो। मैंने पूछा, कहाँ जाऊँ? उन्होंने कहा, तुम हिमालय जाओ। तो मैंने हँसकर कहा कि क्या मैं आपके कहने से जाऊँ? ईश्वर जो हुक्म करता है, वही मैं करता हूँ। ईश्वर चाहे तो मुझको मार सकता है। मैं हिमालय क्यों नहीं जाता? वहाँ रहना तो मुझको पसंद पड़ेगा। वहाँ जाकर शांति मिलेगी। लेकिन मैं अशांति में से शांति चाहता हूँ, नहीं तो उस अशांति में मर जाना चाहता हूँ। मेरा हिमालय यहीं है। आप सब हिमालय चलें तो मुझको भी लेते चलें।”

गाँधीजी सितंबर 1947 में कलकत्ता से दिल्ली पहुँचे थे। उन्हें हरिजन बस्ती में रहना था, किंतु उनकी सुरक्षा के मद्देनज़र उन्हें बिड़ला हाउस में ठहराया गया। यहाँ दिनभर उनसे मेलजोल करने वालों का ताँता लगा रहता। नेहरू-पटेल जब-तब आते रहते। शेष समय में गाँधीजी चरखा चलाते, पत्रों के उत्तर लिखते, ध्यान-मनन-उपवास करते, और हर संध्या पाँच बजे प्रार्थना-सभा में नियम से सम्मिलित होते। 1946 के बाद से ही जिस दिशा में भारत अग्रसर हो चला था, उसमें गाँधीजी अप्रासंगिक मान लिए गए थे। उन्हें भी इस बात की प्रतीति थी। उन्हें देशभर से चिटि्ठयाँ मिलतीं। किसी में उन्हें गालियाँ बकी जातीं, किसी में उन्हें रास्ते से हट जाने को कहा जाता, किसी में नसीहतें और हिदायतें दी जातीं, और गाँधीजी ऐसे निर्मल चित्त के थे कि प्रार्थना-सभा के बाद होने वाले प्रवचनों में इन सबके बारे में अपने गिने-चुने श्रोताओं को बतलाते, जैसे कोई बूढ़ा रस लेकर कहानियाँ सुनाता हो। आज यह हुआ, आज किसी ने मुझे यह पत्र लिखा, आज कोई मुझसे मिलने आया और यह कहा, आज मैंने समाचार-पत्र में यह पढ़ा, यह ख़बर सुनी, यह अफ़वाह मिली आदि इत्यादि, वे ऐसे सबको बतलाते। प्रार्थना-प्रवचनों को खँगाले बिना गाँधीजी के जीवन के उन अंतिम दिनों की मनोदशा को समझना संभव नहीं है।

29 जनवरी को उनसे कहा गया कि आप हिमालय चले जाइए। दूसरे शब्दों में, आपका काम पूरा हो गया, भारत को आज़ादी मिल गई, अब आपकी हमें आवश्यकता नहीं है। अब आप बाधा ही उत्पन्न करेंगे। अंग्रेज़ों से लड़ाई में जो सत्याग्रह उपयोगी था, आंदोलन को नैतिक वैधता दिलाता था, अब भारत के राज्यसत्ता बन जाने पर वही एक रुकावट है। नीति शब्द का एक आयाम रणनीति भी होता है, किंतु गाँधीजी उसे नैतिकता के अर्थ में ही लेते थे। ‘सत्य के प्रयोग’ में उन्होंने कहा कि धर्म को मैं नैतिकता ही मानता हूँ और ईश्वर मेरे लिए सत्य ही है। बँटवारे के बाद निर्मित परिस्थितियों में, जब एक तरफ़ पाकिस्तान की समस्या थी, रियासतों के विलय का संकट था, कश्मीर का मामला था, देश में सांप्रदायिक दंगे चल रहे थे, घोर अराजकता व्याप्त थी, और नई-नवेली हिन्द-सरकार थी, तब राज-समाज ने यह मान लिया था कि राष्ट्रनीति से ही काम चलेगा, गाँधी-नीति की अब ज़रूरत नहीं है। गाँधीजी को हिमालय चले जाना चाहिए।

गाँधीजी इससे बुरा नहीं मानते। किंतु अपनी बात दृढ़ता से रखते हैं। कहते हैं- मैं हिमालय क्यों जाऊँ? अलबत्ता वहाँ मुझे शांति ही मिलेगी। किंतु मुझको अशांति में से निकली हुई शांति चाहिए। दूसरे शब्दों में, मुझे एक आरोपित शांति नहीं, वह शांति चाहिए जो हमने अर्जित की हो, जिसके पीछे हमारे विवेक, संकल्प और नीति का बल हो। आगे गाँधीजी ने कहा, मेरा हिमालय तो यहीं है। आप लोग हिमालय चलें तो मुझे भी लेते चलें। ईश्वर चाहे तो मुझको मार सकता है, मैं अशांति में मर जाने को तैयार हूँ।

एक तपस्वी की आत्मा का आर्तनाद! महाकरुणा से उपजा संकल्प और उस संकल्प को अनावश्यक समझ लिए जाने का शोक! त्याग दिए जाने की पीड़ा और इसके बावजूद संलग्न रहने का हठ! स्वाधीनता आंदोलन के यज्ञ में अपवित्र साधन की समिधा और तिस पर भी शुचिता का सत्याग्रह! यह गाँधी-चरित्र के उजले मानबिंदु हैं, जो ‘प्रार्थना-प्रवचन’ के पन्नों को डूबकर पढ़ने पर आपके सामने उभर आते हैं।

ज्ञानयोग और कर्मयोग का द्वैत! ज्ञानी तो हिमालय चला जाता है। ज्ञानी तो यही मानता है कि विश्व-कल्याण मैं नहीं कर सकता, अपनी अंतरात्मा का उन्नयन कर सकूँ तो वही बहुत। कर्मयोगी का मोक्ष किंतु लोक-समाज के बीच ही है। गाँधीजी से बड़ा कर्मयोगी कौन हुआ है? गाँधीजी ने जैसा सार्वजनिक जीवन जिया, वैसा बीसवीं सदी में और किसने जिया होगा? कुछ भी उनका निजी नहीं है, सब कुछ खुली किताब की तरह है। कुछ उनकी निजी संपत्ति नहीं है। गाँधीजी ने स्वयं को लोकार्पित कर दिया था। हत्यारे की गोली से तब उन्हें मुक्ति मिली? क्या यही इस यज्ञ की पूर्णाहुति हो सकती थी? प्रश्न तब यह भी है कि मनुष्य की नियति ज्ञान है या कर्म? क्या मनुष्य परोपकार से भी सद्गति पा सकता है, या उसे अपने भीतर ही मार्ग तलाशना होगा? तब क्या परमार्थ और स्वार्थ का भेद उपस्थित नहीं होगा? प्रेय को जो त्याग दे, वह तपस्वी है। किंतु श्रेय को भी जो त्याग दे, साधु तो वही कहलाएगा। क्या गाँधीजी नि:श्रेयस तक यात्रा कर सके? गीता के श्लोक अहर्निश जपने वाले में यह कर्ताभाव भी चला आया कि हो-न-हो, मुझमें ही कोई दोष रहा होगा, जो स्वाधीनता के यज्ञ में बाधा आ गई है। मुझमें ही कोई कमी रही होगी। नोआखाली में तब महात्मा ने अपने दोषों के परीक्षण का उपक्रम भी किया।

79 वर्ष के बूढ़े को हत्यारे ने गोली मारी। यह संन्यास की वय थी। वानप्रस्थ की वय भी पीछे छूट गई थी। पचास से पचहत्तर तक व्यक्ति को वानप्रस्थ की भावदशा में रहना चाहिए, वैसा आश्रम-व्यवस्था का तर्क है। संसार में रहकर भी संलिप्त नहीं होना चाहिए, उससे विमुख ही रहना चाहिए। पचहत्तर के बाद तो फिर संन्यास की वेला है। गाँधीजी तो संन्यासी ही थे, किंतु संसार में अपना मोक्ष तलाशते थे। वे सोचते थे कि मैं अकेला सत्य को पा लूँ तो उससे क्या लाभ, मेरे साथ मेरा देश भी चेतना में विकसित हो, तो ही शुभ है। सत्याग्रह की रीति से जैसी विराट सफलताएँ उनको मिलीं, उन्होंने उनका मनोबल बढ़ाया। उन्होंने मान लिया कि वे सामूहिक-चेतना के आरोहण का निमित्त बन सकते हैं।

गाँधीजी ने गीता का भाष्य ‘अनासक्तियोग’ की तरह किया है। अनासक्ति उनके भीतर भी थी, किंतु अपने ध्येय से वे बँध गए थे। सत्याग्रह की भी एक तृष्णा हो सकती है, यह गाँधीजी ने हिमालय नहीं जाकर सिद्ध किया। उनके यहाँ चीज़ों को एक नैतिक क्रम में बाँधने की आत्महंता ज़िद दिखती है।

जब गाँधीजी की आत्मकथा प्रकाशित हो रही थी तो विनोबा ने उनसे कहा- आप सत्यवादी हैं, मिथ्या तो कुछ लिखेंगे नहीं, इसलिए किसी की हानि तो नहीं होगी, किंतु लाभ क्या होगा मालूम नहीं। गाँधीजी बोले- हमारे सभी कामों का परिणाम शून्य है, और उन्होंने हवा में उँगली से बड़ा गोला बनाकर दिखाया। फिर आगे कहा- हमें तो सेवा कर के छूट जाना है।

जब अपने अंतिम प्रवचन में गाँधीजी कहते हैं कि मैं हिमालय नहीं जाता, ईश्वर चाहे तो मुझको मार सकता है, तो वे अपनी उसी बात को आगे बढ़ा रहे होते हैं, जो उन्होंने विनोबा से कही थी। उनका अनासक्तियोग अपनी जगह स्थिर था। अंतर केवल इतना था कि हमारे सभी कामों का परिणाम शून्य है, संभवतया इस सत्य को स्वीकार करना उनके लिए कठिन हो गया था। वे कदाचित् अपने उद्यम का सुफल भी चाहते थे।

बौद्ध दर्शन में बोधिचित्त की दो धाराएँ बतलाई हैं- प्रज्ञा और उपाय। इसका युग्म बनता है- प्रज्ञोपाय। शून्यता-ज्ञान ‘प्रज्ञा’ है। करुणा ‘उपाय’ है। निवृत्ति और प्रवृत्ति का यह मेल आवश्यक है, तभी विश्वमंगल होता है। समरसता आती है। मेरे एक आत्मीय अग्रज ने मुझसे वार्ता में कहा कि “गाँधीजी की प्रज्ञा तो निर्मल है, किंतु उपाय में व्यवहार का दोष है!” इससे उनका यज्ञ पूर्णाहुत नहीं हुआ। अद्वयबोधिचित्त की प्राप्ति नहीं हुई। गाँधीजी युद्धकाल में बोधिचित्त की साधना कर रहे थे। जहाँ कृष्ण-चेतना की आवश्यकता थी, वहाँ वे सुदामा, हरिश्चंद्र और श्रवण कुमार की नीति से संचालित हो रहे थे। हिमालय पर्वत के शिखर जैसी अनुल्लंघ्य यह रीति थी। इसी में उन्होंने स्वयं को नष्ट कर दिया।

गाँधीजी मनुष्यता के इतिहास की महानतम हुतात्माओं में से एक हैं। उनकी जीवन-कथा का नवनीत त्रासद है। अनासक्ति के नानाविध आयामों का एक दृष्टांत भी वह हमारे सम्मुख प्रस्तुत करता है। इति!