गाँधी की अहिंसा -सुशोभित

 


गाँधीजी और अहिंसा- ये दो शब्द एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं। और चूँकि हम एक उदग्र और असंयमी कालखंड में जी रहे हैं, इसलिए आज यही गाँधीजी पर लगाया गया सबसे बड़ा आक्षेप भी है। कहा जाता है कि गाँधीजी ने भारतवर्ष को कायर बना दिया। ‘हिन्द स्वराज’ में गाँधीजी ने कहा था कि बलवान ही सत्याग्रही हो सकता है। आत्मबल की उनकी परिभाषा और वीरता की अन्यों की परिभाषाओं में भेद रहा होगा। यह एक जटिल विषय है और मैं इस पर बात करने का अधिकारी नहीं हूँ। किंतु प्राथमिक रूप से कुछ वृत्तियों को इस विषय में लक्ष्य करूँ।

जिन मित्रों का मत है कि हिंसा ही परम धर्म है, उनको मैं दूर से नमन करता हूँ। किंतु जिनका मत यह है कि प्रतिरक्षा में हिंसा करनी पड़ती है, और तब वह एक बाध्यता है, या आवश्यक बुराई है, उनसे ये पूछा जा सकता है कि प्रतिरक्षा में की गई वह हिंसा धर्म है या आपदधर्म है? दूसरे यह कि वैसे आपदधर्म पर मनुष्य को ग्लानि होना चाहिए या दंभ होना चाहिए? इसमें सेनाओं द्वारा की गई हिंसा भी शामिल है।

बहुधा ऐसा भी होता है कि हिंसा प्रतिरक्षा में नहीं की गई हो और बुराई का अंत या अन्याय का प्रतिकार करने को प्रवृत्त होकर की गई हो। इसमें एक पहलू यह भी है कि भले व्यक्ति को बुराई बलपूर्वक अपने साथ हिंसा में खींच ले गई, क्योंकि अगर वह वैसा नहीं करता तो स्वयं नष्ट हो जाता। तब प्रश्न यह है कि जो भला व्यक्ति विवश होकर युद्ध करने पहुँचा है, उसकी चेतना के भीतर अपने पाप-पुण्य का मानचित्र कैसा बनता है? वो स्वयं से यह तो कहता है कि यह मैंने शुरू नहीं किया, किंतु वह स्वयं से यह नहीं कह सकता मेरे हाथ रक्त में सने नहीं हैं। यह दुरूह है।

जो मित्र कहते हैं कि गीता हमें धर्मयुद्ध के लिए प्रवृत्त करती है, वे यह नहीं बतलाते कि महाभारत समाप्त होने के बाद कुरुक्षेत्र में उत्सव है या विषाद है?

यही तो जटिलता है। पांडव कहते हैं, हमने तो युद्ध नहीं चाहा था, हमने तो केवल पाँच गाँव माँगे थे। दुर्योधन ने कहा, सुई की नोंक बराबर भूमि भी नहीं दूँगा। पांडवों की पत्नी का चीरहरण किया गया, उनको वन भेजा गया। यानी अन्याय की एक लंबी शृंखला है। बुराई का साक्षात वर्णन है। युद्ध अवश्यंभावी हो गया। युद्ध हुआ। फिर अर्जुन क्यों डगमगाया? भीष्म-द्रोण को देखकर क्यों काँपा? मेरे प्रियजनों को कैसे मारूँ, यह क्यों बोला? महाभारत इसीलिए रामायण की तुलना में अधिक जटिल आख्यान है, क्योंकि उसमें अच्छे-बुरे का वैसा स्पष्ट विभाजन नहीं है। कृष्ण ने अर्जुन का भ्रम निर्मूल किया, किंतु दोनों ही पक्षों की युद्ध में क्षति हुई। कवि कुँवर नारायण ने कहीं लिखा था कि अंतिम निष्कर्ष में दोनों ही परास्त करते हैं- सत्य भी, असत्य भी। पक्ष भी, प्रतिपक्ष भी।

भले को बुराई युद्ध में खींच ले जाए, यह भी बुराई है। तब यह देखा जाए कि भलाई युद्ध में जाते समय विवशता का परिचय देती है या उल्टे गौरव का अनुभव करती है? और अगर भलाई को रक्तपात पर गर्व होता है तो उसे अपने भीतर ध्यान से देखना चाहिए कि वो भलाई है या अब बुराई बन चुकी है?

मैंने अन्यत्र कहा है कि गाँधीजी युद्धकाल नहीं शांतिकाल के देवता थे। यह उनका दुर्भाग्य ही था कि उन्होंने स्वयं को गृह युद्ध के बीच में पाया। अगर इतिहास से बुद्ध, महावीर, जीसस, कबीर को उठाकर 1947 में बैठा दिया जाता तो वो क्या करते? क्या निर्णय लेते? वैसा कौन-सा निर्णय तब वे ले सकते थे, जो उनकी विरासत को कलंकित नहीं करता? गाँधीजी को लगता था कि वे क्षति को जितना कम कर सकते थे, उतना कम करने का प्रयास उन्हें करना है। उनके पास इसके सिवा कोई चारा नहीं था।

हमें समझना चाहिए कि गाँधीजी ने अहिंसा को एक ‘सभ्यता-सिद्धांत’ के रूप में प्रतिपादित किया था। जो लोग गाँधीजी की अहिंसा को अनुपयोगी बतलाते हैं, वे प्रकारांतर से यह प्रस्तावना करते हैं कि मनुष्य कभी भला हो ही नहीं सकता, मनुष्य अनिवार्यत: बुरा ही है। गाँधीजी की विफलता यह थी कि वो कभी इस बात को स्वीकार नहीं कर पाए कि मनुष्य स्वभाव से बुरा होता है। इसका परिणाम भी उन्होंने भुगता। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने गाँधीजी की मृत्यु की ख़बर मिलने पर कहा था- “इससे मालूम चलता है कि इस संसार में अच्छा होना कितना ख़तरनाक है!”

इस बात को लेकर गाँधीजी की बड़ी हँसी उड़ाई जाती है कि कोई एक तमाचा मारे तो दूसरा गाल भी आगे कर दो। यों तो यह वाक्य गाँधीजी का नहीं, जीसस क्राइस्ट का है। किंतु आप्तवचनों को हमें अख़बार की तरह नहीं पढ़ना चाहिए। शब्दश: नहीं लेना चाहिए। यह एक जीवन-मूल्य है।

इस संसार में असंख्य लोग जब रोज़मर्रा का अपना जीवन बिताते हैं तो वो किसी युद्ध में रत नहीं होते हैं, वो किन्हीं चरम परिस्थितियों के शिकार नहीं होते हैं। तब अगर विवाद-कलह की स्थिति में एक पक्ष शांति से सब कुछ सहन कर ले तो दूसरा पक्ष आवेग शांत होने पर मन-ही-मन ग्लानि का अनुभव करता है कि नाहक़ ही मैंने उस भलेमानुष को इतना कह दिया और उसने प्रतिकार तक नहीं किया। यह मनुष्य का स्वभाव है। गाँधीजी का अहिंसा का सिद्धांत दूसरे मनुष्य के भीतर छुपी मनुष्यता और नैतिकता और लज्जा को पुकारना है।

इसका दूसरा पहलू भी सच है। अगर दोनों ही व्यक्ति उग्र होकर संघर्ष कर बैठें, तो जिस व्यक्ति के हृदय में ग्लानि की संभावना थी, वह भी नष्ट हो जाती है और वह अगर स्वयं दोषी है, या मन-ही-मन स्वयं को दोषी जानता है, तब भी आवेश में, या अभिमान के वशीभूत होकर अपनी औचित्य-सिद्धि ही करता है। बलप्रयोग से हृदय परिवर्तन के उदाहरण इतिहास में नहीं मिलते। द्वेष कभी दूसरों में सकारात्मक बदलाव नहीं लाता। सद्भाव से ही वह संभव है। हज़ार बार यह सिद्धांत विफल हो, तब भी उसका मूल्य यथावत ही रहने वाला है।

‘हिन्द स्वराज’ ने गाँधीजी ने कहा था कि मनुष्य की सभ्यता का जो इतिहास हमें पढ़ाया जाता है, वह झूठा है। वह केवल सम्राटों के परस्पर युद्धों का इतिहास है। वास्तविक इतिहास तो उन असंख्य लोगों का है, जिन्होंने मनुष्यता के इतने लंबे विकासक्रम में प्रेम, सदाशयता, सहिष्णुता और सद्भावना का परिचय दिया है, क्योंकि अगर ये लोग नहीं होते तो संसार का कभी का नाश हो गया होता।

जब गाँधीजी स्वयं ‘हिन्द स्वराज’ में यह स्पष्ट कर रहे हैं कि युद्धों का इतिहास मनुष्यता का इतिहास नहीं है, तो स्वयं गाँधीजी के द्वारा हमें सिखाए गए अहिंसा के मूल्य का निर्धारण युद्धकाल में उसके औचित्य के आधार पर क्यों किया जाना चाहिए?

तब भी मैं कहूँगा कि गाँधीजी की हठधर्मिता थी, जो वे अहिंसा के सिद्धांत पर अंत तक अडिग रहे। इतिहास की शक्तियों ने उन्हें कुचल दिया। वे शुचिता और आत्मपरिष्कार का एक बिंब लिए बैठे थे और इतिहास आक्रोश से उबल रहा था। इतिहास को उनकी आवश्यकता नहीं थी। तो उसने उनके सीने में तीन गोलियाँ दाग़ दीं। और इसका गर्व भी किया।

किंतु कोई मूल्य किसी ऐतिहासिक प्रसंग में विफल हो जाने से बेकार सिद्ध नहीं हो जाता। यों भी सनातन परंपरा इतिहास की नहीं, शाश्वत मूल्यों की बात करती है। अगर मनुष्य का धर्म अपनी चेतना का निरंतर परिष्कार है, तो समस्त गृहयुद्धों के बावजूद गाँधीजी के सिखाए मूल्य अक्षुण्ण रहेंगे।

अगर शासन-तंत्र लोकतांत्रिक है तो अन्याय के प्रतिकार के लिए असहयोग, सविनय अवज्ञा और अहिंसक आंदोलन ही आज भी इकलौते अनुकूल उपाय हैं। अगर क्रूर सैन्य सत्ता से सामना हो तो आंदोलन भी हिंसक हो जाता है। अलबत्ता इस तरह के हिंसक आंदोलनों ने मनुष्य जाति के इतिहास में एक भी सुंदर चीज़ उत्पन्न नहीं की। फ्रांसीसी क्रांति ने नेपोलियन को जन्म दिया और रूसी क्रांति ने स्तालिन को। नेताजी की फ़ौज भी कोई बहुत मानवीय प्रसंगों के साथ आगे नहीं बढ़ रही थी। कोलैटरल डैमेज उसमें थे। होंगे ही। और जहाँ भी निर्दोष का रक्त बहता है, वहाँ पाप होता है। फिर चाहे धर्मयुद्ध में हो या स्वाधीनता संग्राम में।

न्याय हो, विवशता हो, वीरता हो, दायित्व हो, धर्म हो- जो चाहे हो- किसी और ने शुरू किया और आपने केवल प्रतिक्रिया की हो- हिंसा और हत्या पाप है और जो पाप करेगा, वो फल भुगतेगा। उसकी चेतना में दोष आ जाएगा। उसको रक्त से सनी तलवार को ले जाकर किसी नदी में धोना होगा, किंतु अंतश्चेतना पर लगा दाग़ नहीं मिटेगा।

हर व्यक्ति एक स्वतंत्र चेतना है। उसका अपनी अंतश्चेतना से जीवंत साक्षात होता है। अगर वह लौटकर स्वयं से कह सके कि जब सबके हाथ रक्त से सने थे, तब भी मैंने अपने को निष्कलुष बनाए रखा और यथासंभव इसी की शिक्षा औरों को भी दी, तो यह उसकी अंतरात्मा में चल रहे धर्मयुद्ध में उसकी विजय है।

मेरा मत है कि किसी भी अन्य व्यक्ति की तुलना में गाँधीजी सबसे अधिक स्वयं से वैसी बात कह सकते हैं।