गाँधी का स्वराज्य - सुशोभित

 


लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने अपनी पुस्तक ‘मेरी जीवन यात्रा’ के दूसरे खंड में लिखा है-

“गाँधीजी ने शुरू में ही- सन उन्नीस सौ तीस में- ऐसी भविष्यवाणी कर दी थी कि स्वराज्य की लड़ाई के बाद अगर वे जीवित बचे तो अंग्रेज़ों के साथ जिस तरह की लड़ाई लड़नी पड़ी, वैसी ही अनेक अहिंसक लड़ाइयाँ स्वराज्य के बाद भी लड़नी पड़ेंगी। गाँधीजी कितने क्रांतदृष्टा, पारदर्शी पुरुष थे!”

यह एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथन है। स्वाधीनता सेनानियों के लिए स्वराज्य के मायने अलग-अलग थे। गाँधीजी के लिए यह राजनीतिक स्वाधीनता तक ही सीमित रहने वाली बात नहीं थी। स्वराज्य को सर्वोदय तक पहुँचना था। यह क्रांति ऐसे घटित नहीं हो सकती थी कि केंद्र में कोई शास्ता बैठ जाए तो स्वत: देश का उत्थान हो जाएगा। कि कोई भारतीय प्रधानमंत्री बन जाए और भारतीयों की एक मंत्रिपरिषद् रच दे, फिर कुछ और करने को शेष नहीं रह जाएगा। सर्वोदय ऊपर से नीचे नहीं, नीचे से ऊपर जाता है। समाज की बुनियादी इकाइयों और संरचनाओं से उसकी शुरुआत होती है। चरित्र-निर्माण से राष्ट्र-निर्माण होता है। हर व्यक्ति की इसमें सहभागिता होगी, तभी बात बनेगी। राजा और प्रजा का द्वैत कोई ऊपर से थोपी गई, आरोपित व्यवस्था नहीं होगी, प्रजा में से ही कोई राजा बनेगा, और सेवा कार्य करेगा। और जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक वैसी ही अहिंसक लड़ाइयाँ निरंतर लड़नी होंगी, जैसे अंग्रेज़ों से लड़ी गई थीं। आज़ादी पंद्रह अगस्त को मिलने वाला कोई लड्डू नहीं थी!

गाँधीजी ने इसलिए सत्याग्रह नहीं किया था कि कांग्रेस का कोई नेता विधायक बन जाए, तो कोई मंत्री। कोई प्रधान बन जाए, तो कोई सदर। चंद लोग गद्दीनशीं हो जाएँ और देश पहले की तरह अंधकार में बना रहे। यही कारण है कि संसदीय लोकतंत्र के प्रति गाँधीजी बहुत रूमानी विचार नहीं रखते थे। लोकतंत्र लोक के द्वारा अपना नेता चुनने की प्रविधि है। किंतु अगर लोक में जाग्रति नहीं है तो नेता में कैसे होगी? जैसा राजा, वैसी प्रजा से बड़ा विचार है, जैसी प्रजा, वैसा राजा।

मुझे आश्चर्य होता है, जब मैं इधर सुनता हूँ कि फलाँ पार्टी घृणा की राजनीति कर रही है। तब सोचता हूँ कि लोकतंत्र में उसे इससे मुनाफ़ा मिल रहा होगा, तभी कर रही है। घाटे का सौदा कौन करता है? मंडी में कोई विष बेचकर लाभ कमा रहा है, तो उस विष के ख़रीदार भी होंगे। व्यवस्था में ही दोष हो तो कोई क्या करे? समाज में ही अगर विषबेल हो तो राजनीति में उत्तम चरित्र के नेता कैसे आएँ? किंतु हमें तो केवल ऊपरी बातें करना हैं। फ़ौरी तौर से लक्षणों की पहचान करके उन्हें दोष देना है। और फ़ारिग़ हो जाना है। जड़ में देखने का अवसर किसे है? दूरगामी चिंतन कौन करे?

‘हिन्द स्वराज’ में गाँधीजी ने स्पष्ट कहा था कि इतिहास में केवल राजाओं के युद्धों और अभियानों का वृत्तांत है, किंतु यह मनुष्यता की सच्ची कहानी नहीं है। दुनिया हथियार-बल पर नहीं, आत्मबल पर टिकी है। दया, प्रेम और सत्य उसके आलंबन हैं। नेता समाज में परिवर्तन नहीं लाता है। किंतु जाग्रत समाज ज़रूर एक उत्तम नेता को चुनता है। महत्त्व समाज का है। सबसे बुनियादी इकाई समाज है। यह वही समाज है, जिसमें मैं, आप, हम सम्मिलित हैं। दूसरों पर दोषारोपण तो सरल है, किंतु अपने दोषों का दर्शन करके आत्मपरिष्कार कठिन है। क्रांति सरल है, सत्याग्रह कठिन है। यही कारण है कि साम्यवाद कभी गाँधीजी के सर्वोदय को नहीं समझ सकता। साम्यवाद ऊपर से आरोपित व्यवस्था का नाम है, जिसके मूल में हथियार-बल और हिंसा है। किंतु साधन में ही अशुद्धि हो तो साध्य कैसे पवित्र होगा? गाँधीजी के शब्दों में, “जस्ते की खान में चाँदी कैसे मिले?”

गाँधीजी 30 जनवरी, 1948 को रोज़ की तरह साढ़े तीन बजे उठे थे और प्रात:कालीन प्रार्थना के बाद कांग्रेस-पुनर्संगठन के मसविदे पर काम करने बैठ गए। यह कांग्रेस-पुनर्संगठन का मसविदा क्या था? देखें तो इसमें ग़ैर-कांग्रेसवाद का बीज था। राममनोहर लोहिया से गाँधीजी की वार्ता इस संबंध में 27 जनवरी को हुई थी और 30 की रात को उन्हें फिर मिलना था। किंतु मिल ना सके। गाँधीजी 29 को दिनभर मुलाक़ातियों से भेंट करते रहे थे और शाम तक बहुत थक गए थे। फिर भी वे कांग्रेस-पुनर्संगठन के मसविदे पर काम करने बैठ गए थे, किंतु थकान के कारण इसे पूरा नहीं कर सके। 30 की सुबह उठकर सबसे पहला काम उन्होंने यही किया था। स्वराज्य-प्राप्ति के बाद कांग्रेस का स्वरूप क्या हो, इस पर गाँधीजी निरंतर सोचते थे। वे उसे प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री-सांसद-विधायक उगलने वाली मशीन की तरह नहीं, बल्कि सर्वोदय की दिशा में काम करने वाली संस्था की तरह देखना चाहते थे, जैसी कि वह स्वराज्य से पूर्व थी। 15 अगस्त 1947 के बाद इस पार्टी के मूल्यों में भला क्यों परिवर्तन आना था?

गाँधीवादी चिंतक बनवारी ने एक साक्षात्कार में कहा है-

“जब भी बदलने की बात आती है, हम यही सोचते हैं कि राजसत्ता कैसी हो। हम यह नहीं सोचते कि समाज कैसा हो। जबकि राजसत्ता समाज का एक छोटा-सा हिस्सा है। ये बात अकेले गाँधीजी कहते थे। वे कहते थे, मुझे समझ नहीं आता हम डेमोक्रेसी के पीछे क्यों पड़े हैं, क्योंकि राजसत्ता और डेमोक्रेसी में क्या अंतर है? सोशलिस्ट लोग राज्य की बहुत बात करते हैं, उनको दे दो राज्य। नरेंद्र देव को प्रधानमंत्री बना दो। ये जो करना है, करें। कांग्रेस को तो समाज को खड़ा करने में लगना चाहिए, गाँव-गाँव जाना चाहिए। लेकिन गाँधीजी को यह बात समझ में आ गई थी कि इन लोगों में इतनी समझ नहीं है। ये इतने निष्क्रिय हैं कि इन्होंने ग्राम स्वराज का मतलब ही नहीं समझा। इन्होंने ग्राम स्वराज का मतलब ग्राम-विकास निकाला। इससे ज़्यादा हास्यास्पद और क्या हो सकता है?” [ ‘समास-14’ में प्रकाशित ]

स्वराज्य की गाँधीवादी कल्पना पर यह एक महत्त्वपूर्ण टिप्पणी है। जब 2014 के लोकसभा चुनाव हो रहे थे, तब एक पार्टी के नेता पूरे देश में यह कहते घूम रहे थे कि हमें कांग्रेस-मुक्त भारत बनाना है, और यह हमारी नहीं, स्वयं गाँधीजी की इच्छा थी। कितनी ग़लत बात है यह! अभी हाल ही में राष्ट्रपति महोदय ने भी कहा कि हम सीएए के ज़रिए गाँधीजी की ही बात पूरी कर रहे हैं। ये लोग गाँधीजी को इतने स्थूल अर्थों में ग्रहण करते हैं और फिर उन्हें उद्धृत करके अपना हित साधते हैं। इन्हें इतना भी विवेक नहीं है कि गाँधीजी कांग्रेस-मुक्त भारत की बात नहीं कर रहे थे, वे सत्ता की लिप्सा से संचालित होने वाली संसदीय-राजनीति से भारत को मुक्त रखना चाहते थे। ‘हिन्द स्वराज’ के दिनों से ही वे पार्लियामेंटरी सिस्टम की भर्त्सना करते आ रहे थे। किंतु भारत का दुर्भाग्य तो यही है कि अव्वल तो उसने गाँधी-तत्व का साक्षात किया नहीं, किया तो उसे आत्मसात नहीं किया, और उलटे उनके कथनों के मनमाने अर्थ निकालकर उन्हें विरूपित किया जाता रहा।

नंदकिशोर आचार्य ने अपनी पुस्तक ‘सत्याग्रह की संस्कृति’ में लोकनायक के उपरोक्त कथन को उद्धृत करते हुए एक निबंध लिखा है। उसमें गाँधी-प्रणीत अहिंसक समाज के तीन मुख्य आधार उन्होंने बतलाए हैं। ये तीन आधार हैं- “राजनीतिक विकेंद्रीकरण यानी ग्राम-स्वराज आधारित राजनीतिक व्यवस्था, आर्थिक विकेंद्रीकरण यानी स्वदेशी और ट्रस्टीशिप के आधार पर विकसित अर्थ-व्यवस्था, और इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सत्याग्रह।”

राजनीतिक विकेंद्रीकरण सत्ता की लिप्सा का सर्वनाश करता है। आर्थिक विकेंद्रीकरण विषमता की खाई को पाटता है। और सत्याग्रह चरित्र-निर्माण की कार्यशाला है। क्योंकि देश समाज से बनता है और समाज व्यक्ति से। देश केंद्र में बैठे किसी छत्रपति से नहीं बनता। समाज का अंतिम व्यक्ति ही देश की प्राथमिक इकाई है। सर्वोदय की ज्योति उस तक पहुँचे और सत्याग्रह के मूल्य उसकी आत्मा में परिनिष्ठित हों, तभी सुराज होगा। अन्यथा नहीं। गाँधीजी पर देश-समाज को फिर-फिर विचार करने की आवश्यकता है। वाम और दक्षिण की नूराकुश्ती के दुष्चक्र में फँसी भारतीय चेतना का उत्थान गाँधी-मार्ग से ही हो सकता है, इसमें मुझे तो कोई संदेह नहीं है!

11-12 दिसंबर, 1947 को दिल्ली में रचनात्मक कार्यसमिति की बैठक में जे.बी. कृपलानी और श्री आर्यनायकम् से चर्चा करते हुए गाँधीजी ने जो कहा था, उससे इस लेख का समापन करूँ-

“पहले तो हमें अपना राष्ट्रीय चरित्र सुधारना चाहिए। कोई क्रांति नहीं हो सकती जब तक कि मनुष्य के चरित्र-निर्माण की ओर ध्यान न हो। ...यदि हम राजनीतिक सत्ता को प्रभावित करना चाहते हैं तो सबसे पहली ज़रूरत इस बात की है कि हम अपना घर साफ़ करें। ...हमें ‘पॉलिटिकल पॉवर’ या सत्ता की राजनीति में नहीं पड़ना चाहिए। जल्दी ही हमें मताधिकार मिल जाएगा। यह अच्छी बात है। मगर वयस्क मताधिकार को सत्ता हथियाने का तरीक़ा मानने पर उसका भ्रष्ट तरीक़े से उपयोग किया जाएगा। ...पॉलिटिक्स आज बहुत गंदी हो गई है। हम तो अपनी ओर देखें। अपने अंतःकरण को साफ़ करें। अहिंसा का नाम हमने लिया, काम नहीं किया।

...आज मैं जो कुछ कर रहा हूँ क्या वह आपके दिल में प्रवेश कर गया है? तब जहाँ भ्रष्टाचार होगा, उसे दूर करने की शक्ति आपमें होनी चाहिए। ...हम कांग्रेस कॉन्स्टीट्यूशन (संविधान) को भूल जाएँ। और माना कि संविधान बन भी गया तो भी हमारा काम निपटता नहीं है। हमें तो दूसरी तरह बनना है। आपको प्राइम मिनिस्टर बनने के लालच में नहीं पड़ना होगा। ...कुछ महीने में संविधान बनाने का काम पूरा हो जाएगा, उसके बाद क्या होगा? मान लो कि आपको अपने दिल का संविधान तो मिल जाता है, मगर वह सफल नहीं होता है। पाँच वर्ष के बाद कोई आकर कहे कि ‘आप अपनी चाल चल चुके अब हमें मौक़ा दो।’ आपको हटना होगा। तब वे सत्ता हथियाकर और तानाशाही स्थापित कर कांग्रेस का ख़ात्मा करने की कोशिश करेंगे।

...इसके विपरीत, मान लीजिए आप सत्ता में नहीं जाते हैं मगर जनता पर अपना प्रभाव रखते हैं तो आप जिसे चाहें चुनाव में विजयी बनवा सकते हैं। जब तक मतदाता पर आपका प्रभाव है आप सदस्यता की बात को भूल जाएँ। जड़ का विचार करें और उसका अधिक-से-अधिक ध्यान रखें। ...आत्म-शुद्धि को मुख्य मापदंड बनाएँ। यदि थोड़े से लोगों में भी यह भावना होगी तो वे वातावरण को सुधार सकेंगे। ...जनता पर आपका प्रभाव है तो सरकार प्रभावित हो ही जाएगी, या लोग उनको हटा देंगे। उसमें आपको सोचने की बात नही रहती है।"