गाँधी का सत्य - सुशोभित

 


बचपन में हम सुनते थे कि झूठ बोलना बुरी बात है। हमें हमेशा सच बोलना चाहिए। हमें घर पर वैसी ही सीख दी जाती थी। पाठशाला में भी यही पढ़ाया जाता।

हम उस समय जो कहानियाँ पढ़ते, वे भी इसी बात को सामने रखतीं। कहानियों के नायक सत्यवादी होते। मुश्किलों में भी वे नहीं डिगते। वो कहानियाँ चित्रों के साथ प्रस्तुत की जातीं। बच्चों का मन चित्र में अधिक रमता, कहानी में कम। और सत्यनिष्ठा जैसी चीज़ तो उनकी समझ से परे ही होती।

फिर हम बड़े हुए। हमने देखा कि टीवी पर नेता और सिनेमा में नायक मज़े से झूठ बोल रहा है। हमने उसे चतुरसुजान माना। समाज में हमने देखा कि झूठ बोलने वाले बड़े सफल हैं। लोग पीठ पीछे चाहे जो कहें, उनके सामने सब उनकी सराहना ही करते। इससे हमारी यह सोच बनी कि सच-वच वग़ैरह बच्चों की बातें हैं, बचपन में ही अच्छी लगती हैं। किंतु यह ज़माना भलाई का नहीं है। सीधी उँगली से घी नहीं निकलता है। दुनिया की यही रीत है। दुनिया ऐसे ही चलती है।

बचपन से लेकर बड़े होने तक की हमारी यात्रा झूठ और बेईमानी के साथ सहज होने की रही है।

गाँधीजी इसमें ख़लल डालते हैं। वे हमें असहज बनाते हैं। उनका सरोकार उन बुनियादी मूल्यों से है, जिन्हें अनुपयोगी और आदर्शवादी मानकर ताक पर रख दिया गया था। वे उनकी धूल झाड़कर फिर से हमारे सामने रख देते हैं।

बीते दिनों हमने देखा कि एक नेता ने मंच से झूठ बोला। छोटा-मोटा झूठ नहीं, सफ़ेद रंग का झूठ। वैसा झूठ, जिसे प्रमाणित करने के लिए अनुसंधान की भी आवश्यकता नहीं। वह स्वत: प्रमाणित था। वह कहे जाते ही झूठ था। किंतु उसने बड़े सहज भाव से झूठ कहा। और यह जानते हुए कहा कि पूरा देश सुन रहा है।

नेता ने झूठ कहा। अनुयायियों ने मन-ही-मन जाना कि नेता झूठ बोल रहा है, किंतु वे इससे असहज नहीं हुए। उन्होंने अपमान का अनुभव नहीं किया कि हमारा नेता झूठा है। उनके भीतर कुछ खटका नहीं, उन्हें लज्जा नहीं आई, मुँह छिपाने का भाव मन में पैदा नहीं हुआ। उलटे, उन्होंने इसे नेता की और एक अदा ही समझा। साम-दाम-दंड-भेद : युद्ध जीतने के लिए सब उचित है। राजनीति खोखले आदर्शों से नहीं चलती। तो क्या हुआ अगर नेता ने झूठ बोला। झूठ से क्या हर्ज है? सच बोलने में ही वैसे कौन-से लाल-जवाहर जड़े हैं? क्या धर्मराज युद्धिष्ठिर ने रणक्षेत्र में झूठ नहीं बोला था कि अश्वत्थामा मारा गया?

बचपन से लेकर बड़प्पन तक की हमारी यात्रा का हासिल ये दलीलें हैं। यह जो ‘तो क्या हुआ’ है, यही हमारी उपलब्धि है। गाँधीजी इस ‘तो क्या हुआ’ के विरुद्ध एक गहरा नैतिक प्रतिकार हैं।

अनुकूलन प्रकृति का सिद्धांत है। सच बोलने में हानि है, झूठ बोलने में लाभ है। मनुष्य के लिए आत्मरक्षा और आत्मपोषण में अनुकूलन की ओर झुक जाना सहज है, प्रकृति के सभी प्राणियों की तरह। किंतु मनुष्य के भीतर एक ऐसा तत्व भी है, जो प्रकृति के नियमों का प्रतिकार करता है। जो गुरुत्वाकर्षण को झुठलाता है। जो कहता है भले मुझे हानि हो जाए, किंतु मैं झूठ नहीं बोलूँगा। बचपन से लेकर बड़प्पन तक की हमारी समूची यात्रा हमारे भीतर के उस तत्व का शमन करती है। साधुभाषा में उसे अंत:करण कहते हैं।

गाँधीजी अक्सर कहते थे, मेरी अंतरात्मा इसकी गवाही नहीं देती। या यह कि मैं अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर यह उपवास कर रहा हूँ। या यह कि यह ठीक नहीं है, इसमें न्याय नहीं है, यह मुझे भीतर से अनुभव होता है। और लोग यह सुनकर हँसते थे।

अगर आप गाँधीजी की आत्मकथा पढ़ें तो आप पाएँगे कि छोटी-छोटी बातों के लिए उन्होंने स्वयं को कष्ट दिया, मामूली बातों के अपराध बोध में डूबे रहे, लंबे समय तक पछतावा किया। एक नैतिक संघर्ष आजीवन उनके भीतर चलता रहा। इसे वे आत्मपरीक्षण कहते थे। वे एक-एक भाव की जाँच करते, उनका पृथक्करण करते, उनके त्याज्य और ग्राह्य ऐसे दो भाग बना लेते। जो ग्राह्य समझते, उसके अनुरूप अपना आचरण बना लेते। कई बार यह ग्राह्य हानिकारक भी होता। सभी उनको समझाते कि यह उचित नहीं है, यह व्यावहारिक और बुद्धिसंगत नहीं है, किंतु वे सत्यनिष्ठा पर अडिग रहते। इसकी परिणति कभी भी सुखद नहीं हो सकती थी। इसका वही अंत हो सकता था, जो हुआ। किंतु इसके अलावा कोई और रास्ता भी नहीं था। “मैं मार्ग जानता हूँ, वह तलवार की धार की तरह सीधा है”- गाँधीजी ने कहा था।

गाँधीजी का यह सत्य क्या है? नंदकिशोर आचार्य ने लक्ष्य किया है कि पहले गाँधीजी “ईश्वर सत्य है”, ऐसा कहते थे। बाद में वे “सत्य ही ईश्वर है”, वैसा कहने लगे।

‘सत्य के प्रयोग’ की भूमिका में गाँधीजी ने लिखा है-

“यह सत्य स्थूल, वाचिक सत्य नहीं है। यह केवल हमारा कल्पित सत्य नहीं है, बल्कि स्वतंत्र चिरस्थायी सत्य है, अर्थात परमेश्वर है। परमेश्वर की व्याख्याएँ अनगिनत हैं, क्योंकि उसकी विभूतियाँ भी अनगिनत हैं। ये विभूतियाँ मुझे मुग्ध करती हैं। किंतु मैं पुजारी तो सत्यरूपी परमेश्वर का ही हूँ। वह एक ही सत्य है और दूसरा सब मिथ्या है। यह सत्य मुझे मिला नहीं है लेकिन मैं इसका शोधक हूँ। इस शोध के लिए मैं अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु का त्याग करने को तैयार हूँ और इस शरीर को भी होम करने की मेरी तैयारी है और शक्ति है। मेरे समान अनेकों का क्षय चाहे हो, पर सत्य की जय हो। अल्पात्मा को मापने के लिए हम सत्य का गज कभी छोटा न करें।”

बचपन में जिस दिन मोहनदास ने पैसे चुराए, फिर अपराध बोध में खटे, फिर एक चिट्ठी लिखकर पिता के समक्ष अपराध की स्वीकारोक्ति की, और वह चिट्ठी पढ़कर पिता रोने लगे, और पिता के साथ मोहनदास भी रो पड़े- उस दिन के बाद से फिर मोहनदास के जीवन में असत्य का कोई स्थान नहीं था। सत्य की वह लौ फिर आजीवन जलती रही। कभी डिगी नहीं।

जब भारत-विभाजन का प्रस्ताव गाँधीजी के समक्ष रखा गया तो वे अवाक् रह गए। उनके मुँह से एक ही वाक्य निकला- “यह तो असत्य है!” बलराम नंदा ने इस पर टिप्पणी की है- “गाँधीजी के शब्दकोश में इससे कठोर शब्द कोई दूसरा न था- असत्य!”

मंच पर जाकर पूरे देश को संबोधित करते हुए सफ़ेद झूठ बोलना और उसके बाद भी लज्जित नहीं होना- क्या आप गाँधीजी के जीवन में वैसी किसी घटना की कल्पना भी कर सकते हैं? अगर गाँधीजी होते तो क्या यह इतनी सरलता से संभव हो सकता था? यही अंतर है, मित्र। आकाश और पाताल का भेद है। इस अंतर की चेतना को हमें अपने भीतर सदैव सजीव रखना चाहिए।

क्योंकि, दु:ख यह नहीं था कि नेता ने झूठ बोला। दु:ख यह था कि सबने उसे चुपचाप स्वीकार कर लिया। जिन्होंने विरोध किया, वे वही थे, जो नेता की हर बात का विरोध करते हैं। किंतु दूसरों को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ा। “इसी का नाम राजनीति है”, उन्होंने मुस्कराकर कहा। गाँधीजी होते तो कहते, “नहीं, यह राजनीति नहीं है, यह पापनीति है।”

झूठ बोलना बुरा है, बेईमानी करना पाप है, कभी किसी को कष्ट नहीं देना चाहिए, कभी हिंसा नहीं करनी चाहिए, नेकी करनी चाहिए और मन में उसका अभिमान नहीं रखना चाहिए- ये सब बचपन में दी गई सीखें भले हों, किंतु ये बचकानी बातें नहीं हैं। ये बचपन के साथ ही खंख हो जाने वाली वस्तु नहीं है। ये चिरंतन सत्य हैं।

मनुष्य जब तक जीवित है, वह इन मानदंडों पर भले विफल हो, ये मानदंड कभी विफल नहीं हो सकते। कभी भी नहीं।

एक व्यक्ति समय की धारा में निरंतर खड़ा रहकर हमें यह याद दिलाता रहता है। उसका नाम गाँधी है!