ययाति की कहानी (महाभारत की अनसुनी कहानियाँ -10)

 


जब कच ने संजीवनी विद्या प्राप्त कर ली, तो देवताओं को बहुत हर्ष हो गया। देवताओं ने सोच लिया कि अब राक्षसों पर हमला करने का सही समय है। इस बात पर इंद्र भी सहमत हो गया। फिर वह तीस अन्य देवताओं के साथ, अगले हमले की योजना बनाने के लिए राक्षस राज्य का विश्लेषण करने चल पड़ा। कुछ ही समय में, इंद्र बाक़ी देवताओं के साथ राक्षस राज्य में पहुँच गया।

जब इंद्र राक्षस राज्य में पहुँच गया, तो इंद्र ने कुछ युवा लड़कियों को एक नदी में स्नान करते हुए देखा। फिर इंद्र ने खुद को हवा के रूप में तब्दील कर लिया और लड़कियों के सारे कपड़े शरारत करते हुए एक दूसरे में मिला दिए।

उस लड़कियों के समूह में राक्षस राजा वृषपर्वा की पुत्री ‘शर्मिष्ठा’ और राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री ‘देवयानी’, ये दोनों लड़कियाँ शामिल थी।

जब लड़कियों का स्नान हो गया, तब स्नान के बाद शर्मिष्ठा ने गलती से देवयानी के कपड़े पहन लिए।

जब देवयानी ने शर्मिष्ठा को अपने वस्त्र पहने हुए देखा, तो वह गुस्से में बोली, 'तुमने मेरे कपड़े पहनने की हिम्मत कैसे की? तुम एक राक्षस की पुत्री हो और में एक ब्राह्मण की।'

देवयानी की बातें सुनकर शर्मिष्ठा को बड़ा बुरा लगा। फिर उसने भी देवयानी को ग़ुस्से में सुना दिया। उसने कहा, ‘ब्राह्मण की नहीं, तुम एक भिखारी की पुत्री हो। यह मत भूलना कि मेरे पिता के भिक्षा देने के बाद ही, तुम और तुम्हारे पिता अपना उदरनिर्वाह कर सकते हैं।’

जल्द ही, दोनों का क्रोध बढ़ गया और उनके बीच की लड़ाई सिर्फ़ शब्दों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने एक एक-दूसरे के साथ हाथापाई शुरू कर दीया। शर्मिष्ठा ने देवयानी को पास के एक सूखे कुएँ में घसीटा और गुस्से में आकर उसे कुएँ के अंदर धकेल दिया। फिर, देवयानी की चिंता ना करते हुए, वह ग़ुस्से में उस जगह से चली गई।

देवयानी उस कुएँ में पड़ी रही, लेकिन कोई उसकी मदद करने नहीं आया। कुछ घंटों के बाद, ययाति नामक एक राजा शिकार के अभियान के बाद, थका-हारा पानी की खोज में, उस सूखे कुएँ के पास आ गया। कुएँ के अंदर एक सुंदर युवती को देखकर, वह आश्चर्यचकित हो गया। फिर उसने देवयानी से पूछा, 'हे सुंदरी, तुम कौन हो?'

फिर देवयानी ने ययाति को अपना परिचय दिया और उससे मदद की याचना की। उसने कहा, 'मेरा नाम देवयानी है। में दानवों के गुरु शुक्राचार्य इनकी पुत्री हूँ। कृपया मुझे इस कुएँ से बाहर निकालके मेरी मदद कीजिए।'

क्रोध और बदले की भावना में जलती देवयानी ने ययाति का परिचय नहीं पूछा। देवयानी की मदद की याचना सुनकर, ययाति ने उसे बाहर निकालने के लिए अपना हाथ आगे किया। ययाति का हाथ पकड़कर देवयानी कुएँ से बाहर आ गई। जैसे ही देवयानी कुएँ से बाहर आ गई, ययाति ने उसे अलविदा कहा और वह अपनी राजधानी लौट गया।

देवयानी शर्मिष्ठा से अत्यंत क्रोधित थी और उसने शर्मिष्ठा से बदला लेने की ठान ली थी। फिर उसने अपने पिता शुक्राचार्य को संदेश भेज दिया कि उसके साथ शर्मिष्ठा ने बड़ा निर्दयता पूर्वक व्यवहार किया है और जब तक उसे न्याय नहीं मिल जाता, वह राजधानी में पैर नहीं रखेगी।

जब शुक्राचार्य ने देवयानी का संदेश सुना, तो वह जंगल में पहुँच गए और देवयानी से मिले। जैसे ही देवयानी ने अपने पिता को देखा, उसकी आँखों से आँसू बहना शुरू हो गए। अपने बेटी की इतनी दुःखी अवस्था देखकर, शुक्राचार्य को बुरा लगा। उन्होंने बड़े प्यार से देवयानी को पूछा, ‘बेटी, ऐसा शर्मिष्ठा ने क्या किया, जो तुम इतनी दुःखी हो रही हो?’

इसके बाद देवयानी ने शुक्राचार्य को पूरी घटित घटना सुना दी। देवयानी से सारी घटना सुनने के बाद, शुक्राचार्य ने देवयानी से पूछा, ‘बेटी, तुम्हारे साथ शर्मिष्ठा ने जो व्यवहार किया है, वह वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है। हालांकि, एक चीज़ के बारे में मुझे बताओ। क्या इस घटना में तुम्हारी कोई ग़लती है?’

फिर देवयानी ने उन्हें कहा, 'नहीं पिताजी। इसमें मेरी कोई गलती नहीं है। उसने मुझे कुएँ में धक्का देकर गिरा दिया, इस बात का मुझे दुःख नहीं है। लेकिन उसने आपको एक भिखारी कहा और मुझे एक भिखारी की बेटी कहा। इस बात का मुझे बहुत बुरा लगा है। उसने बाद में यह भी कहा कि हम उसके पिता ने दी हुई भीख पे अपना जीवन चलाते हैं।’

शुक्राचार्य ने फिर देवयानी को शांत करने का प्रयास किया। उन्होंने कहा, 'बेटी, तुम्हें यह पता होना चाहिए कि तुम्हारे पिता एक तपस्वी ऋषि है। हम भिखारी नहीं हैं। ना ही हम जीवन जीने के लिए किसी की प्रशंसा करते है। सच्चाई तो यह है कि देवताओं से लेकर राक्षसों तक, सभी मेरी प्रशंसा करते हैं।’

लेकिन शुक्राचार्य की बातें देवयानी को शांत नहीं कर सकी। उसने कहा, 'पिताजी, जब तक शर्मिष्ठा को सज़ा नहीं होती, तब तक में शांत नहीं हो सकती। शर्मिष्ठा ने जो किया है, वह अत्यंत निंदनीय है। उसने आपके जैसे तपस्वी का अपमान किया है। उसने अपने ही गुरु को भिखारी बुलाया है। ऐसे शिष्य को तो कभी क्षमा नहीं करनी चाहिए। इसके अलावा, उसने मेरे बारे में कुछ सोचे बिना ही मुझे कुएँ में फेंक दिया, इसलिए जब तक उसे ठीक से सजा नहीं दी जाती, मैं राजधानी में कदम नहीं रखूँगी।'

अब शुक्राचार्य को अपने प्रिय पुत्री की दुर्दशा देखकर अत्यंत क्रोध आ गया। वह बड़े ग़ुस्से में राजधानी की ओर चल पड़े और उन्होंने राजा वृषपर्वा के राजदरबार में प्रवेश किया। उन्होंने वृषपर्वा को बताया कि किस तरह शर्मिष्ठा ने देवयानी के साथ दुर्व्यवहार किया है। शुक्राचार्य ने वृषपर्वा को यह भी धमकी दी कि यदि देवयानी को शांत करने में वृषपर्वा विफल रहा, तो वह राक्षस राज्य छोड़ कर चले जाएँगे।

शुक्राचार्य ने दी हुई चेतावनी से राजा घबरा गया। वह जानता था कि उसके राज्य का अस्तित्व शुक्राचार्य की तपस्वी शक्तियों के आधार पर टिका था। वह जानता था कि अगर शुक्राचार्य राज्य छोड़ देंगे, तो राज्य पर जल्द ही देवता हमला बोल देंगे और फिर राक्षसों का विनाश हो जाएगा।

इसलिए, वृषपर्वा जल्दबाजी में जंगल में चला गया और उसने देवयानी से राजधानी में वापस चलने की विनती की। लेकिन देवयानी ने उसके लिए साफ़ मना कर दिया। देवयानी ने वृषपर्वा को बताया कि जब तक उसे न्याय नहीं मिलेगा, वह वन में ही बैठी रहेगी। इसके बाद वृषपर्वा ने उसे पूछा कि उसे न्याय कैसे मिलेगा?

इसपर देवयानी के कहा कि शर्मिष्ठा को उचित सज़ा मिलने पर, उसे न्याय प्राप्त होगा। फिर वृषपर्वा ने देवयानी से कहा कि वह शर्मिष्ठा को देवयानी ने दी हुई कोई भी सज़ा देने के लिए तैयार है। फिर वृषपर्वा ने देवयानी को पूछा कि शर्मिष्ठा को क्या सज़ा मिलनी चाहिए, जिससे उसका हृदय शांत हो जाएगा?

तब देवयानी ने गरजते हुए कहा, 'शर्मिष्ठा ने भिखारी बोलकर, मेरा अपमान किया है। अब तो ऐसी एक ही सज़ा है, जो मेरे मन को शांत कर सकती है। मैं शर्मिष्ठा और उसकी सहस्र दासीयों को अपने दासीयों के रूप में चाहती हूँ। उसे और उसकी दासियों को जिंगदी भर मेरी सेवा करनी होगी। उन्हें मेरे पति के घर भी मेरे साथ आना होगा। अगर यह सम्भव है, तभी मैं राजधानी में प्रवेश करूँगी।’

देवयानी ने जिस क्रूर सज़ा की कामना की थी, उसे सुनकर वृषपर्वा का दिल काँप उठा। उसने फिर से देवयानी को विनती की यह सज़ा बहुत भयानक है और वह कोई और सज़ा दे दें। लेकिन देवयानी अपने माँग पर अड़ी रही। अब वृषपर्वा के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई थी। अगर शर्मिष्ठा देवयानी की दासी नहीं बनी, तो देवयानी राजधानी में नहीं आएगी और फिर शुक्राचार्य उसका राज्य छोड़ कर चले जाएँगे। इससे उसकी प्रजा का भविष्य ख़तरे में पड़ जाएगा।

फिर वृषपर्वा ने भारी मन से शर्मिष्ठा के पास एक दूत भेजा। उस दूत ने शर्मिष्ठा को बताया कि देवयानी उसको और उसके एक हजार दासियों को अपने दासीयों के रूप में चाहती हैं। उस दूत ने शर्मिष्ठा को ये भी बताया कि राजा वृषपर्वा ने उसे पूछा है कि क्या वह देवयानी की दासी बनने के लिए तैयार है?

उस दूत का संदेश सुनकर शर्मिष्ठा को ये पहचानते हुए समय नहीं लगा कि अपने पिता ने ऐसा संदेश तभी भिजवाया होगा, जब वह ख़ुद देवयानी को नहीं मना पाए हैं। उसे यह भी समझ में आ गया था कि अगर वह देवयानी की दासी बनने से मना कर देगी, तो इससे देवयानी नाख़ुश हो जाएगी। देवयानी का दुःख देखकर शुक्राचार्य क्रोधित हो जाएँगे और इससे सारे राक्षस राज्य का अस्तित्व ख़तरे में आ जाएगा।

आख़िरकार, शर्मिष्ठा ने पूरी राक्षस जाति के कल्याण के लिए देवयानी की दासी बनने के लिए अपनी सहमति दे दी।

शर्मिष्ठा अपने एक हजार अन्य दासियों के साथ वन में चली गई और देवयानी का दास्यत्व स्वीकार कर लिया।

इस प्रकार शर्मिष्ठा देवयानी की दासी बन गई और उसने देवयानी की सेवा करते हुए रहना शुरू कर दिया।

ऐसे ही कुछ समय बीत गया। एक दिन, देवयानी, शर्मिष्ठा और अन्य दासियाँ वन में उसी कुएँ के पास चली गई, जिसमें शर्मिष्ठा ने देवयानी को धकेल दिया था। भाग्य के संयोग से, ययाति भी पानी की तलाश में फिर से उसी स्थान पर आ गया।

वह अपने आसपास एक हजार युवा लड़कियों को देखकर आश्चर्यचकित हो गया। फिर उसने देवयानी को देखा और तब उसे याद किया कि वह वही लड़की थी, जिसे उसने कुएँ से बाहर निकाला था।

फिर ययाति देवयानी के पास चला गया। इसके बाद, देवयानी ने ययाति से उसका परिचय पूछा, जो वह पहले पूछना भूल गई थी।

फिर ययाति ने कहा, 'मैं राजा ययाति हूँ। में राजा नहुष का पुत्र हूँ।’

देवयानी यह जानकर हैरान रह गई कि जिस व्यक्ति ने उसे कुए से बाहर निकाला था, वह मशहूर राजा ययाति था। उसने ययाति के बहादुरी और साहस के अनेक किस्से सुने हुए थे। फिर देवयानी ने कुछ क्षण सोचा और फिर अचानक, ययाति से कहा, ‘हे राजन, तुमने मुझे उस दिन कुएँ से बाहर निकाला था, तो मैंने तुम्हारा हाथ पकड़ लिया था। आप एकमात्र ऐसे परपुरुष हैं, जिसने कभी मेरे शरीर को छुआ है, इसलिए मैं पति के रूप में किसी और का स्वीकार नहीं कर सकती। इस कारण, कृपया आप मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करें।'

देवयानी की बात सुनकर ययाति दंग रह गया। जब उसने पहली बात देवयानी को कुएँ के अंदर देखा था, तब वह देवयानी की सुंदरता को देखकर ज़रूर प्रभावित हो गया था। लेकिन जैसे ही देवयानी ने उसे बताया, कि वह एक ब्राह्मण की कन्या है, ययाति ने उसके बारे में सोचना छोड़ दिया था। लेकिन अब ख़ुद देवयानी ने उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा था। ययाति को एक ब्राह्मण कन्या को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करने में अभी भी थोड़ी झिझक हो रही थी, लेकिन देवयानी की सुंदरता को देखकर उसने अंत में उसे पत्नी के रूप में स्वीकार करने के लिए एक शर्त पर हाँ कर दी। ययाति की शर्त यह थी कि उनके विवाह को शुक्राचार्य की सहमति आवश्यक होगी। देवयानी ययाति की यह शर्त मान गई।

जल्द ही, देवयानी ने अपने पिता को संदेश भेजा। देवयानी का संदेश मिलते ही, शुक्राचार्य तुरंत वन में पहुँच गए और उन्होंने ययाति को देवयानी के पति के रूप में स्वीकार कर लिया। इसके बाद, उन्होंने ययाति को यह आशीर्वाद भी दिया कि ययाति अपने क्षत्रिय वर्ण के बाहर विवाह करने से होने वाले पाप से मुक्त रहेगा। इसके बाद, ययाति और देवयानी की शादी शुक्राचार्य की उपस्थिति में उसी समय वन में हो गई और देवयानी अपने पति के घर जाने के लिए तैयार हो गई।

वहाँ से निकलते समय, दोनो ने शुक्राचार्य का आशीर्वाद लेना चाहा। उस समय, शुक्राचार्य ने ययाति से कहा, ‘हे राजा, में अपने पुत्री से बहुत स्नेह करता हूँ और में उसे कभी दु:खी नहीं देख सकता। इस बात का ख़याल रखना कि उसके दिल को कभी कोई ठेस नहीं पहुँचे। एक बात और याद रखना। तुम उसके साथ हमेशा वफ़ादारी से रहना और कभी किसी दूसरे स्त्री के साथ विवाह-बाह्य सम्बंध में आसक्त मत होना।’

शुक्राचार्य से आशीर्वाद मिलते ही, देवयानी, शर्मिष्ठा और अन्य दासियों के साथ, ययाति की राजधानी रवाना हो गई।

ययाति ने देवयानी के लिए भव्य-दिव्य महल बना दिया और उसने शर्मिष्ठा के लिए देवयानी के अनुमति से देवयानी के महल के पास वाले बग़ीचे में एक छोटासा निवासस्थान बना दिया।

कुछ समय के बाद, उचित समय पर देवयानी ने एक पुत्र को जन्म दिया।

उसके कुछ दिन के बाद, शर्मिष्ठा भी गर्भ-धारणा करने के योग्य अवस्था में आ गई। उस समय वह सोचती रही कि कहीं उसका गर्भ धारण करने का काल व्यर्थ ही समाप्त ना हो जाए। उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि कुँवारी होने के कारण उसे गर्भधारणा कैसे होगी। देवयानी की दासी होने के कारण, देवयानी के आज्ञा बिना उसकी शादी होना भी सम्भव नहीं था। वह इसके बारे में सोच ही रही थी कि उसे अपने घर के पास वाले बग़ीचे में ययाति बैठा हुआ दिखाई दिया। ययाति को देखकर उसे लगा कि गर्भ-धारणा करने की उसकी इच्छा को पूरा करने के लिए ययाति से उचित व्यक्ति कोई नहीं हो सकता।

फिर शर्मिष्ठा ययाति के पास गई और उससे कहा, ‘हे राजा, में आपसे कुछ विनती करना चाहती हूँ। में गर्भ-धारणा करने के लिए योग्य समय में हूँ, लेकिन मुझे चिंता हो रही है कि यह समय ऐसे ही व्यर्थ हो जाएगा। मेरा कोई पति नहीं है और एक दासी होने के नाते, भविष्य में मेरी शादी हो ये भी मुश्किल चीज़ है। में बड़ी चिंतित हूँ कि शायद मुझे माँ बनने का सुख कभी प्राप्त नहीं होगा। मेरी आपसे बस यही एक विनती है कि क्या आप मुझसे मिलन करके, मेरी गर्भ-धारणा करने में मदद करेंगे?’

शर्मिष्ठा की विनती सुनकर ययाति चकित हो गया। उसने शर्मिष्ठा की विनती को पूरा करने के लिए मना कर दिया। उसने शर्मिष्ठा से कहा, ‘शर्मिष्ठा, में तुम्हारी भावनाओं को समझ सकता हूँ, लेकिन एक राजा का आचरण ऐसा होना चाहिए, जो धर्म के अनुकूल हो। यह कार्य धर्म के अनुकूल नहीं है। इसके अलावा, मुझे शुक्राचार्य ने कड़ी चेतावनी दी है कि अगर में किसी पर-स्त्री से सम्बंध बनता हूँ, तो परिणाम अच्छे नहीं होंगे। इसलिए में तुम्हारी यह विनती स्वीकार नहीं कर सकता।’

ययाति की बात सुनके शर्मिष्ठा फिर से उसे अनुनय विनय किरने लगी। उसने कहा, ‘हे राजा, आप एक महान राजा हो और में बड़ी आशा से आपके पास आई हूँ। अब मेरा भविष्य भी आपके हाथों में है।’ शर्मिष्ठा की बातें सुनकर, ययाति का दिल पिघल गया। अंत में, उसने शर्मिष्ठा की इच्छा पूरी करने का फ़ैसला कर लिया। फिर शर्मिष्ठा और ययाति ने शर्मिष्ठा के कुटीर में मिलन किया। उसके बाद, ययाति ने भावुक होकर उसे विदाई दे दी।

ययाति के साथ मिलन के पश्चात उचित समय पर, शर्मिष्ठा गर्भवती हो गई और उसने अपने पहले बेटे को जन्म दिया। जब देवयानी ने शर्मिष्ठा के पुत्र के बारे में सुना, तो वह ईर्ष्या से जलने लगी। फिर शर्मिष्ठा के पुत्र के पिता के बारे में पता करने के लिए, देवयानी ने उसे बुलाया और उससे बड़ी सख्ती से पूछताछ की।

शर्मिष्ठा ने देवयानी से झूठ बोला कि उसका पुत्र एक तपस्वी ऋषि के वरदान का परिणाम है। देवयानी के बार-बार पूछने पर भी, शर्मिष्ठा वही उत्तर दोहराती रही। इससे, देवयानी ने शर्मिष्ठा के झूठ पर भरोसा कर लिया।

कुछ वर्षों में, देवयानी ने एक और बेटे को जन्म दिया। उसी प्रकार, शर्मिष्ठा ने भी ययाति के साथ अपने प्रेम-सम्बंध बना लिए और उस संबंध के कारण, उसने दो और बेटों को जन्म दिया। देवयानी ने अपने पुत्रों का नाम यदु और तुर्वसु रखा, और शर्मिष्ठा ने अपने पुत्रों का नाम द्रुह्यु, अनु और पुरु रखा।

ऐसे ही कुछ साल बीत गए और पाँचों लड़के थोड़े बड़े हो गए। शर्मिष्ठा ने जानबूझकर अपने बच्चों को इतने साल तक देवयानी के आँखों से दूर रखा था। उसे पता था कि देवयानी उसके बच्चों से बहुत इर्शा करती है।

एक दिन, शर्मिष्ठा के बच्चे उसके घर के बग़ीचे में खेल रहे थे। तभी ययाति और देवयानी भी वहाँ घूमते-घूमते पहुँच गए। उस क्षण कई सालों के बाद, देवयानी के शर्मिष्ठा के बच्चों को देखा था। जब देवयानी ने शर्मिष्ठा के बच्चों को देखा, तो वह दंग रही गई। उन बच्चों के चेहरे की कई विशेषताएँ ययाति के चेहरे जैसे ही दिखती थी। तब देवयानी को संदेह हुआ और अपना संदेह दूर करने के लिए उसने उन बच्चों को पूछा, ‘बच्चों, तुम्हारे पिता कौन हैं?’

भोले-भाले बच्चों ने ययाति की ओर उंगली उठाई और देवयानी से कहा कि हमारी माँ हमें बताती हैं कि यह हमारे पिताजी हैं।

यह दृश्य देखकर, मानो देवयानी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

उसी क्षण उसकी आँखें आँसुओं से भर गई। ययाति ने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन वह अब एक भी पल वहाँ नहीं रुकना चाहती थी। वह बग़ीचे से भागते-भागते अपने महल वापस आ गई। महल में लौटने के बाद, उसने शर्मिष्ठा को बुलाया और उसे बग़ीचे में घटित घटना को सुना दी। उसके बाद, देवयानी ने शर्मिष्ठा को बड़ी कठोरता से सच बताने के लिए कहा। तब शर्मिष्ठा ने अपने और ययाति के बीच चल रहे प्रेम-संबंधों के बारे में कबूल कर लिया।

अपने पति ने किया हुआ विश्वासघात देखकर देवयानी को बहुत दु:ख हुआ। फिर उसने ययाति को सबक सिखाने का दृढ़निश्चय कर लिया और वह शुक्राचार्य से मिलने तुरंत उनके आश्रम चली गई।

जब ययाति को यह पता चल गया कि देवयानी शुक्राचार्य से मिलने उनके आश्रम चली गई है, तो वह भी शुक्राचार्य के आश्रम रवाना हो गया। उसे डर लग रहा था कि कहीं शुक्राचार्य उसे कोई भयानक शाप न दे दें।

जब तक ययाति शुक्राचार्य के आश्रम पहुँचा, देवयानी ने अपनी दुःख से भरी कहानी अपने पिता को बता दी थी। जैसे ही ययाति ने शुक्राचार्य की कुटिया में प्रवेश किया, ययाति को देखकर शुक्राचार्य के क्रोध की कोई सीमा नहीं रही।

फिर शुक्राचार्य गरजकर बोले, 'हे राजा ययाति, इन्द्रिय-सुख को पाने के लिए तुमने बड़ा महापाप किया है। मैंने तुम्हें बताया था कि पर-स्त्री के साथ कभी कोई सम्बंध मत बनाना, लेकिन तुमने मेरी बात नहीं सुनी। तुम्हारे इस इन्द्रिय-सुख पाने की लालच का कारण तुम्हारी ये युवावस्था है। इसलिए में तुम्हें ये शाप देता हूँ कि तुम्हारी युवावस्था इसी क्षण तुम्हें छोड़कर चली जाएगी। तुम इसी क्षण एक जर्जर वृद्ध बन जाओगे।‘

और उसी क्षण, युवा और सुंदर ययाति अचानक से एक दयनीय बूढ़े आदमी में बदल गया।

ययाति को मानो ऐसा लगा जैसे उसके शरीर की सारी शक्ति उसे छोड़कर चली गई है। उसकी कांतिमान त्वचा अब झुर्रियों से भरी हुई थी। उसके घुटनों को उसका भार झेला नहीं जा रहा था। उसके हाथ और पाँव काँप रहे थे। अपनी ऐसी अवस्था देखकर ययाति भय से आक्रांत हो गया और शुक्राचार्य के चरणों में गिर पड़ा।

शुक्राचार्य के पैर मानों उसने आँसुओं से धो डाले। उसने कहा, 'हे ऋशीवर, मैंने अपने मन का शिकार होके, क्षणिक इंद्रिय-सुख पाने के लिए ऐसा महापाप कर दिया। जो कार्य मैंने किया है, उसके बारे में सोचकर मेरा हृदय पश्चाताप की अग्नि में जल रहा है। में सज़ा के योग्य हूँ, लेकिन आपने जो सज़ा दी है, वह मौत से भी भयंकर है। आप तो ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ हैं। कृपा करके मुझपर थोड़ी दया दिखाइए।’

ययाति की दयनीय स्थिति देखकर, शुक्राचार्य का क्रोध थोड़ा शांत हो गया। उन्हें समझ रहा था कि ययाति सच में अपने किए पर बहुत शर्मिंदा था। फिर शुक्राचार्य ने ययाति पर दया दिखाते हुए कहा, ‘हे राजन, तुम अपना बुढ़ापा अपने किसी भी पुत्र को उसकी युवावस्था के बदले में दे सकते हो। उसके बाद, एक हजार वर्ष तक तुम युवा अवस्था में रहोगे। एक हजार वर्षों के बाद, तुम्हारे पुत्र को उसकी युवा अवस्था वापस मिल जाएगी और तुम्हें तुम्हारा बुढ़ापा भी वापस मिल जाएगा।’

शुक्राचार्य के उपशाप से उसका मन थोड़ा शांत हो गया था। फिर शुक्राचार्य की अनुमति लेकर, ययाति अपने राज्य लौट कर आ गया। आते-आते मन ही मन उसने सोच लिया था कि जो भी पुत्र उसे अपनी युवावस्था देगा, वही उसका उत्तराधिकारी बनेगा। ययाति अभी भी इन्द्रियों से मिलने वाले भोगों से अतृप्त था, इसलिए उसने सोच लिया था कि फिर से युवावस्था प्राप्त करके, वह एक हजार साल तक ज़्यादा से ज़्यादा मात्रा में भोगों का आनन्द लेगा और ख़ुद को तृप्त करने की कोशिश करेगा। उसने सोचा कि एक बार वह तृप्त हो जाए, फिर युवावस्था अपने पुत्र को लौटने में उसे कोई दिक़्क़त नहीं आएगी।

ऐसा सोचकर, ययाति अपने राज्य में आ गया और उसने पाँचों बेटों को बुलाया। यदु, तुरवसु, द्रुह्यु, अनु और पुरु, ये सारे लड़के ययाति के समक्ष खड़े हो गए। फिर उसने अपने पुत्रों के कहा, ‘क्या तुम में से कोई मुझे अपनी युवावस्था का दान करने के लिए तैयार है? जो भी मुझे उसकी युवावस्था देगा, उसे बदले में मेरी वृद्धावस्था प्राप्त होगी। मैं कुछ और साल युवा होकर जीवन जीना चाहता हूँ। आज से एक हजार साल के बाद, मैं तुम्हारी युवावस्था तुम्हें वापस दे दूँगा और मेरी वृद्धावस्था तुमसे ले लूँगा। क्या कोई है, जो अपने पिता के ख़ुशी के लिए ऐसा त्याग कर सकता है?

ययाति की बात सुनकर किसी ने भी जवाब नहीं दिया। फिर कुछ क्षण के बाद, ययाति का सबसे छोटा पुत्र, पुरु बोला, 'पिताजी, में आपकी वृद्धावस्था स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ।’

पुरु की बात सुनकर ययाति ने पुरु को गले से लगा लिया और उसी समय घोषणा कर दी कि पुरु को उसकी युवावस्था एक हजार वर्षों के बाद वापस मिल जाएगी और उसके बाद, वह राज्य का उत्तराधिकारी बनेगा।

फिर ययाति ने पुरु से उसकी युवावस्था ले ली और उसे अपनी वृद्धावस्था दे दी। युवावस्था मिलते ही, ययाति ने इन्द्रिय सुखों का आनंद लेना शुरू कर दिया। ऐसे अनेक वर्ष बीत गए, लेकिन ययाति के मन को इतने भोग भोगकर भी शांति नहीं मिली। एक हजार वर्ष अनेक भोग भोगने के बाद भी ययाति सम्पूर्ण संतुष्ट नहीं हुआ। तब ययाति को इन्द्रिय-सुखों की नश्वरता के बारे में पता चल गया। उसे समझ आ गया कि दुनिया में कोई भी व्यक्ति इन्द्रिय-सुखों से कभी भी सम्पूर्ण सुखी नहीं हो सकता। उसे पता चल गया था कि ये सारे भोग नश्वर और क्षणभंगुर हैं।

फिर ययाति ने सच्ची शांति पाने का फ़ैसला कर लिया और अपना राज्य पुरु को देकर, उसने वन में जाकर तपस्या करने की ठान ली। ययाति ने पुरु को उसकी युवावस्था वापस दे दी और उसका राज्यभिषेक करने के बाद, उसे अपने राज्य का राजा बना दिया।

ययाति ने पुरु को राजा तो बना दिया, लेकिन इस निर्णय की लोगों ने कड़ी निंदा की। लोग मानते थे कि यदु सबसे बड़ा है और वही राजा होने का सच्चा अधिकारी है। लेकिन ययाति ने लोगों की बातों पर ध्यान नहीं दिया। उसने कहा, 'पुरु सबसे छोटा है, लेकिन वही मेरा सच्चा बेटा है। पुरु ने अपने पिता की इच्छा पूरी करने के लिए बहुत बड़ा त्याग किया है। इसलिए वही मेरे राज्य का सच्चा उत्तराधिकारी है।‘

इस प्रकार, ययाति ने पुरु को राजा के रूप में स्थापित कर दिया। भविष्य में, पुरु ने पौरव वंश की शुरुआत की, जिसमें पांडवों और कौरवों ने जन्म लिया।

शारीरिक सुखों की निरर्थकता को स्वीकार करते हुए, ययाति फिर वन में तपस्या करने चला गया।