वेद-व्यास का जन्म (महाभारत की अनसुनी कहानियाँ -7)

 


यह तब की बात है, जब पृथ्वी में वसु नाम का एक सदाचारी राजा रहता था। एक दिन, इंद्र ने उसे निर्देश दिया कि वह चेदिदेश नामक राज्य पर आक्रमण करे। इंद्र के निर्देशों के तहत, वसु ने चेदिदेश पर आक्रमण किया और विजय प्राप्त की। चेदिदेश एक समृद्ध राज्य था। चेदिदेश पर विजय प्राप्त करने के बाद, वसु ने वर्षों तक उस पर शासन किया।

कुछ समय बाद, वह राजगद्दी और उससे मिलने वाली सुखों से विरक्त हो गया। उसके अंदर आध्यात्मिक और ईश्वरीय सुख को पाने की इच्छा जाग्रत हो गई। फिर उसने अपने राज्य का त्याग कर दिया और वह एकांत में तपस्या करने के लिए जंगल में चला गया।

जंगल में उसने घनघोर तपस्या शुरू कर दी। उसके तप का प्रभाव इतना बढ़ा कि इंद्र का आसन डोलयमान होने लगा। तब इंद्र ने सोचा कि वसु इंद्रपद पाने के लिए तप कर रहा है। ऐसा सोचकर इंद्र भयभीत हो उठा कि वसु उसका इंद्रपद छिन लेगा। फिर इंद्र ने वसु की तपस्या में बाधा डालने के लिए एक सटीक योजना बनायी।

एक दिन, इंद्र अन्य देवताओं के साथ वसु के पास गया और उससे कहा, 'हे पुण्यशील राजा, राजा को ऐसे तपस्या में रत रहना शोभा नहीं देता। एक राजा का मुख्य रूप से एक ही कर्तव्य होता है और वह है अपने प्रजा की रक्षा करना। लेकिन तुम प्रजा की रक्षा छोड़कर तप करने में लगे हुए हो। अगर तुम वापस जाके अपने राज्य को संभलोगे, तो निश्चित रूप से तुम एक महान आत्मा कहलाओगे। तो तुम्हें वापस जाकर अपना राज्य सम्भालना चाहिए। यदि तुम अपनी तपस्या को छोड़ने के लिए सहमति देते हो, तो मैं तुम्हें एक ऐसा रथ प्रदान करूँगा, जो आकाश में उड़ने की क्षमता रखता हो। ऐसा दैवी रथ तो केवल देवताओं के पास होता है। तुम अपने इस एक नश्वर शरीर के साथ आकाश में उड़ान भरने वाले पृथ्वी के एकमात्र व्यक्ति बन जाओगे। मैं तुम्हें सिर्फ़ यह दिव्य रथ ही नहीं दे रहा। मैं तुम्हें दैवी कमलों से निर्मित एक माला भी दूँगा। यह कमल कभी नहीं मुरझाते और हमेशा ताज़ा रहते हैं। यदि तुम यह माला किसी युद्ध में पहनते हो, तो कोई भी हथियार तुम्हें चोट नहीं पहुँचा पाएगा। अंत में, मैं तुम्हें एक बाँस की लाठी भी दूँगा। यह बाँस की लाठी मेरा प्रतीक है। यदि तुम इसे अपने राज्य में लगाकर इसकी पूजा करते हो, तो तुम्हारे राज्य की शांति और समृद्धि निश्चित रूप से बनी रहेगी।’

इंद्र की बात सुनकर वसु अपनी तपस्या रोकने के लिए सहमत हो गया। जैसे ही उसने अपनी तपस्या रोक दी, इंद्र ने उसे दैवी रथ, दैवी माला और बाँस की लाठी प्रदान की।

बाद में, वसु के पास दैवी रथ होने के कारण, लोग उसे ‘उपरिचर वसु’ इस नाम से जानने लगे। उपरिचर का अर्थ है, जो आकाश में ऊँचा उड़े ऐसा।

इंद्र की कृपा से, उपरीचर वसु पूरी पृथ्वी का राजा बन गया। उसने चेदि को अपने राज्य की राजधानी घोषित कर दिया और वह अपने राज्य पर वहाँ से राज्य करने लगा।

उपरीचर वसु के पाँच पुत्र थे। वह पाँचो पुत्र बड़े ही शूरवीर थे। बाद में, उपरीचर वसु ने अपने राज्य को पाँच हिस्सों में बाँट दिया। उसने ख़ुद को सारे राज्य का सम्राट घोषित कर दिया और अपने पाँच पुत्रों को एक-एक हिस्से का प्रमुख बना दिया।

उपरीचर वसु अक्सर अपने दैवी रथ में राज्य की यात्रा करता था और अपनी प्रजा के कल्याण की पूरी व्यवस्था करता था। कभी कभी अप्सराएँ और गन्धर्व भी उसके दैवी रथ में उसके साथ उड़ान पर जाते थे।

एक दिन, उपरीचर वसु अपने दैवी रथ में राज्य की यात्रा कर रहा था। तब उसने देखा कि कोलाहल नामक एक पहाड़ ने वासना के आधीन होकर एक नदी को चारों तरफ़ से घेर रखा है। यह देखकर उपरीचर वसु कोलाहल पर क्रोधित हो उठा। फिर उसने नदी को कोलाहल से बचाने के लिए कोलाहल के ऊपर अपने पैर से लाथ मार दी।

उपरीचर वसु के लाथ मारने पर, कोलाहल के बीचोंबीच एक छेद हो गया जिससे बहकर नदी उसके कैद से मुक्त हो गई। नदी उसके क़ैद से मुक्त तो हो गई, परन्तु कोलाहल के सम्पर्क के वजह से नदी गर्भवती हो गई। उसके बाद, नदी ने दो बच्चों को जन्म दे दिया। उसे एक बेटा और एक बेटी पैदा हो गई। नदी ने उपरीचर वसु को कृतज्ञता की वजह से अपने दोनो बच्चे भेंट स्वरूप अर्पण कर दिए।

नदी का बेटा बड़ा होने पर, उपरीचर वसु ने उसे अपनी सेना का सेनापति बनाया और नदी की बेटी बड़ी होने पर, उपरीचर वसु ने उसके साथ शादी कर ली। उस नदी की बेटी का नाम ‘गिरिका’ रखा गया था।

उपरीचर वसु गिरिका के साथ आनंदपूर्वक समय बिताने लगा। कुछ समय के बाद, जब गिरिका गर्भ धारण करने के लिए योग्य अवस्था में थी, तब उसने अपनी अवस्था के बारे में अपने पति को जानकारी दी और उसे अपने साथ कुछ समय बिताने का अनुरोध किया। ठीक उसी समय, उपरिचर वसु के कुछ पूर्वज उसके महल पहुँच गए। उन्होंने उपरिचर वसु को जंगल में जाकर हिरण का शिकार करने की आज्ञा दी। राजा बड़ा दुविधा में अटक गया। अंत में, अपने पूर्वजों के आदेश का पालन करने के लिए वह जंगल में चला गया।

उपरिचर वसु शिकार करने के लिए जंगल में तो चला गया, लेकिन अभी भी उसे उसकी खूबसूरत पत्नी की याद आ रही थी। वह वसंत ऋतु का समय था और प्रकृति ने जंगल को फलों और फूलों से सुशोभित करके रखा था। वह जंगल एक विशाल उद्यान के जैसा दिखाई दे रहा था। चारों ओर सुगंधित हवा चल रही थी। जंगल का ऐसा सुनहरा मौसम देखकर, उपरिचर वसु की कामइच्छा और बढ़ गई। फिर राजा एक विशाल वृक्ष के पास आया और उसकी छाया में बैठ गया। उस वृक्ष पर विभिन्न पक्षी कई गीत गा रहे थे। उसी समय राजा को अपने पत्नी की याद आयी और वह उत्तेजित हो गया। उस उत्तेजना की वजह से उसका वीर्य उसी क्षण स्खलित हो गया।

अपने वीर्य को बर्बाद होने से बचाने के लिए, उसने एक पेड़ के पत्ते पर वीर्य को एकत्रित किया। तभी उसे याद आया कि उसकी पत्नी, गिरिका, अभी गर्भ धारण करने के लिए बिलकुल सही स्थिति में है। इसलिए, उपरिचर वसु ने अपने वीर्य को गिरिका तक पहूँचाने के लिए, कई तरीकों के बारे में सोचना शुरू कर दिया।

अचानक, उसने नज़दीक वाले एक पेड़ पर एक बाज़ को बैठे हुए देखा। फिर राजा ने उस बाज़ को अनुरोध किया कि वह गिरिका तक उसका वीर्य पहुँचाए। बाज़ ने उपरिचर वसु का वीर्य गिरिका तक पहुँचाने में उसकी मदद करने के लिए अपनी सहमति दे दी।

फिर उस बाज़ ने अपनी चोंच में उपरिचर वसु का वीर्य उठाया और उसने आसमान में उड़ान भर दी। वह बाज़ बड़ी तेजी से गिरिका के महल की ओर उड़ रही थी, तभी एक दूसरी बाज़ का ध्यान उस वीर्य लेके उड़ने वाली बाज़ पर गया। दूसरी बाज़ ने सोचा कि पहली वाली बाज़ अपनी चोंच में ज़रूर मांस लेकर जा रही है। ऐसा सोचकर, वह मांस का टुकड़ा छिनने के लिए दूसरी बाज़ ने पहली बाज़ पर हमला कर दिया।

दोनो बाजों के बीच लड़ाई छिड़ गई और आखिरकार, उपरिचर वसु का वीर्य यमुना नदी में गिर गया।

संयोग से, यमुना नदी में ‘अद्रिका’ नाम की एक अप्सरा मछली के रूप में रह रही थी। भूतकाल में, अद्रिका को शाप मिला था कि वह एक मछली के रूप में परिवर्तित हो जाएगी और कुछ समय के बाद, वह दो मानवी शिशुओं को जन्म देगी। उनको जन्म देने के बाद वह, अपने मछली के शरीर से मुक्त होकर अपना दैवी शरीर फिर से हासिल कर लेगी।

अद्रिका ने अपने भाग्य के अनुसार, यमुना नदी में गिरे हुए वीर्य को पी लिया और इससे वह गर्भवती हो गई। गर्भाधान के दस महीने बाद, एक मछुआरे ने उसे पकड़ लिया। जब उसने उसके शरीर को काटा, तब उसके शरीर के अंदर उसे दो मानवी शिशु दिखाई दिए। उन शिशुओं में एक लड़का था और एक लड़की।

शाप के अनुसार, अद्रिका मछली के शरीर से मुक्त हो गई और अपना दैवी शरीर पाकर उसने स्वर्ग में प्रवेश कर लिया।

मछली के शरीर में दो मानवी शिशुओं को पाकर, वह मछुआरा पूरी तरह से चकित हो गया। वह उन बच्चों को लेकर, उपरीचर वसु के पास ले गया और उसे पूरी कथा बता दी। उपरीचर वसु मछुआरे की कथा सुनकर अचंबित रह गया। उसने अद्रिका के लड़के को अपने बेटे के रूप में स्वीकार किया। बाद में, वह लड़का मत्स्य नाम से एक प्रसिद्ध राजा बन गया।

उपरीचर वसु ने अद्रिका की बेटी को मछुआरे को वापस दे दिया। उसने मछुआरे को कहा, ‘तुम इस लड़की को अपने पास रख लेना और अपनी बेटी समझकर इसका पालनपोषण करना।’

वह मछुआरा उस बालिका को पाकर अत्यंत हर्षित हो उठा। उसने उसका नाम 'सत्यवती' रखा और बड़े प्यार से उसने सत्यवती की परवरिश करना शुरू दिया।

जब सत्यवती युवा अवस्था में पहुँच गई, तो उसकी खूबसूरती की ख्याति सारी दिशाओं में फैल गई। वह ना केवल रूप से सुंदर थी, उसका व्यवहार भी सद्गुणों से भरा हुआ था। लेकिन उसके जीवन में बस ही कमी थी। मछुआरों के साथ संपर्क के कारण, उसके शरीर से मछली की गंध आती थी।

सत्यवती नदी के पार नाव चलाने में अपने पिता की मदद करती थी। एक दिन, पराशर ऋषि नामक एक महान ऋषि अपनी तीर्थयात्रा पूरी करते हुए नदी के तट पर पहुँच गए। जब उन्होंने सत्यवती को देखा, तो उन्हें उसकी सुंदरता ने मोहित कर दिया। पराशर ऋषि के मन में उससे मिलन करने की इच्छा हो गई।

फिर उन्होंने सत्यवती को यमुना नदी के पार ले जाने का अनुरोध किया। सत्यवती ने उन्हें नदी के दूसरे तट पर ले जाने के लिए अपनी सहमति दर्शाई। फिर पराशर ऋषि नाव में बैठ गए और सत्यवती ने नाव चलाना शुरू कर दिया।

जब नाव नदी में एक द्वीप के पास पहुँच गई, तो पराशर ऋषि ने सत्यवती से कहा, 'हे सुंदरी, मैं तुम्हारी सुंदरता से मोहित हो गया हूँ। कृपया मेरे प्यार का स्वीकार करो और मुझे अपने साथ मिलन करने की सम्मति दे दो।’

पराशर ऋषि की बात सुनकर सत्यवती शर्मा गई। लेकिन फिर उसने पराशर ऋषि से कहा, ‘हे ऋषिवर, इस नदी के किनारे कई ऋषि-मुनि रहते हैं। वह लोग हमें आसानी से देख सकते हैं, इसलिए में आपकी यह इच्छा पूरी नहीं कर पाऊँगी।’

सत्यवती की बात सुनकर, पराशर ऋषि ने अपनी तपस्वी शक्तियों का इस्तेमाल किया और उस क्षेत्र में घना कोहरा पैदा किया। कोहरे के कारण अचानक उस द्वीप पर काला अँधेरा हो गया और इसके कारण किसी को भी द्वीप पर की कोई भी चीज़ देख पाना असम्भव हो गया। इस अंधेरे के कारण सत्यवती की कुछ चिंता ज़रूर दूर हो गई, लेकिन फिर भी वह चिंतित थी।

सत्यवती ने पराशर ऋषि से कहा, 'हे ऋषिवर, इस कोहरे ने हमारे लिए एक निजी जगह ज़रूर बनाई है, लेकिन मुझे अभी भी एक चिंता है। अगर मैंने तुम्हारे साथ मिलन किया, तो मैं अपना कौमार्य खो दूँगी। मैं अभी भी अपने पिता के संरक्षण में उनके घर में निवास कर रही हूँ, इसीलिए अपना कौमार्य खोकर घर लौटना मेरे लिए उचित नहीं है।’

इसके बाद पराशर ऋषि ने उसे उत्तर दिया, 'हे सुंदरी, जब तुम मेरी इच्छा पूरी कर दोगी, तब में अपनी शक्ति से तुम्हारा कौमार्य तुम्हें फिर से बहाल कर दूँगा। इसके अलावा, में तुम्हारी कोई एक और इच्छा भी पूरी कर दूँगा।’

तब सत्यवती ने कहा, 'हे ऋषिवर, अगर आप मेरा कौमार्य मुझे फिर से बहाल कर देंगे, तो में आपकी इच्छा ज़रूर पूरी कर दूँगी। अगर आप मुझे कोई आशीर्वाद देना चाहते हो, तो मेरी एक इच्छा है। मेरे शरीर से मछली की गंध आती है। मेरी यह इच्छा है कि मुझे इस गंध से छुटकारा मिले और मेरे शरीर से मीठी-मीठी खुशबू आने लगे।'

सत्यवती की इच्छा सुनकर, पराशर ऋषि ने उसे मनचाहा वरदान दे दिया। फिर सत्यवती के सम्मति के अनुसार उन्होंने उसके साथ मिलन किया। उसके बाद, पराशर ऋषि उस द्वीप को छोड़कर अपनी यात्रा पूरी करने निकल पड़े।

पराशर ऋषि के वरदान के परिणामस्वरूप, सत्यवती के शरीर से एक स्वर्गीय सुगंध निकलने लगी। ये सुगंध इतनी बेहतरीन थी कि इसके परिणाम स्वरूप लोगों ने उसे 'गंधवती' बुलाना शुरू कर दिया। उसकी गंध इतनी शक्तिशाली थी कि कोई भी उस गंध को बड़े दूर से ही सूँघ सकता था। इसकी वजह से, लोगों ने उसे 'योजनगंधा' यह नाम भी दे दिया।

पराशर ऋषि के साथ हुए मिलन के परिणामस्वरूप सत्यवती गर्भवती हो गई। पराशर ऋषि की तपस्वी शक्ति से, सत्यवती ने केवल एक दिन के भीतर ही नौ महीने की गर्भाधान की अवधि पूरी की और एक तेजस्वी लड़के को जन्म दिया। चमत्कार से, वह लड़का भी उसी दिन में बड़ा हो गया और बड़ा होने के बाद उसने अपनी माँ से कहा, 'माँ, मैं संसार में नहीं रहना चाहता। में तपस्या करके आध्यात्मिक उन्नति करना चाहता हूँ, इसलिए मैं संसार का त्याग करके जंगल में तपस्या के लिए जाना चाहता हूँ। कृपया मुझे ऐसा करने की अनुमति दे देना। लेकिन तुम चिन्ता मत करना। जब भी तुम्हें मेरी सहायता की ज़रूरत पड़े, तब तुम मुझे मानसिक रूप से पुकार लेना। में तुम्हारी सहायता करने के लिए, तुम्हारे पास तुरंत आ जाऊँगा।’

तब सत्यवती ने अपने पुत्र को तपस्वी जीवन में प्रवेश करने की अनुमति दे दी। अपनी माँ से उचित अनुमति मिलने के बाद, वह जंगल की ओर निकल गया। पराशर ऋषि और सत्यवती का यही पुत्र आगे जाके ‘वेद-व्यास’ के नाम से विश्व वन्दनीय हो गया।