उत्तंक की गुरु-दक्षिणा (महाभारत की अनसुनी कहानियाँ -12)

 


पिछले कथा में, हमें ये पता चला कि आयोद-धौम्य का वेद नामक एक शिष्य था।

आयोद-धौम्य के आश्रम में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, वेद ने अपने घरेलू जीवन में प्रवेश कर लिया। अपने घर लौटकर, वेद ने तीन बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।

उन तीन बच्चों में से एक था - उत्तंक।

एक दिन, वेद को यज्ञ से जुड़े कुछ काम के लिए बाहर जाना था। तो उन्होने उत्तंक को बुलाया और उसे कहा, 'उत्तंक, मैं कुछ दिनों के लिए घर से दूर जा रहा हूँ। इस दौरान, तुम मेरे घर में रहना और घरेलू कामों का ठीक से ध्यान रखना।' उत्तंक को घर में रुकने की आज्ञा देकर, वेद अपने घर से चल पड़े।

इसके बाद, अपने गुरु की आज्ञानुसार, उत्तंक ने अपने गुरु के घर में रहना शुरू कर दिया और बहुत ज़िम्मेदारी के साथ घरेलू कार्यों की देखभाल करने लगा। एक दिन, कुछ घरेलू महिलाएँ उसके पास आ गई और उन्होंने उत्तंक से कहा, 'उत्तंक, तुम्हारे गुरु की पत्नी अभी गर्भधारणा करने के लिए योग्य समय में है। तुम्हें अपने गुरु की जगह लेकर, योग्य कार्य कर लेना चाहिए, जिससे उसका यह काल व्यर्थ नहीं जाएगा।’

उत्तंक उनकी बातें सुनकर दंग रह गया और उसने ऐसा करने से साफ़ तौर पर मना कर दिया।

कुछ दिनों के बाद, वेद यात्रा से घर लौटकर आ गए। तब किसी ने उन्हे इस बारे में बताया कि कैसे उत्तंक ने घरेलू गतिविधियों का ठीक से ध्यान रखा और कैसे उसने उन दिनों में नैतिकता से भरे निर्णय ले लिए। वेद उत्तंक की सेवा से प्रसन्न हो गए और उन्होने उत्तंक को आशीर्वाद दिया, 'उत्तंक, में तुम्हारे सेवा से बहुत प्रसन्न हूँ। में तुम्हें यह आशीर्वाद देता हूँ कि तुम वेदों के बड़े जानकार बन जाओगे।‘

अपने गुरु से आशीर्वाद पाकर उत्तंक धन्य-धन्य हो गया। उसने अपने गुरु ने कहा, 'गुरुदेव, आपने मुझे अपने पवित्र धर्मग्रंथों का और प्राचीन शास्त्रों का ज्ञान प्रदान दिया है। अब जाने से पहले, में भी आपको कुछ दक्षिणा प्रदान करना चाहता हूँ। कृपा करके मुझे बताइएँ कि में आपको क्या दक्षिणा दूँ?’

उत्तंक की बात सुनकर वेद ने कहा, 'उत्तंक, तुम कुछ समय इंतजार करो। उचित समय आने पर, मैं तुम्हें बता दूँगा कि मुझे तुमसे दक्षिणा में क्या चाहिए।’

अपने गुरु के आदेश के अनुसार, उत्तंक ने कुछ दिनों तक प्रतीक्षा की। लेकिन वेद ने उसे दक्षिणा के बारे में कुछ भी नहीं बताया। कुछ दिनों के बाद, उत्तंक फिर से वेद के पास चला गया और उनसे पूछा, ‘गुरुदेव, आपने मुझसे कहा था कि आप मुझे दक्षिणा के बारे में कुछ समय के बाद बताएँगे। इतने दिन बीत गए, लेकिन आपने अभी तक कुछ नहीं बताया। क्या आपने दक्षिणा के बारे में कुछ सोचा है?’

उत्तंक की बात सुनकर, वेद ने कहा, 'उत्तंक, तुम मेरी पत्नी के पास जाओ और उससे पूछो कि उसे तुम्हारे दक्षिणा के स्वरूप में क्या चाहिए। वह जो काम तुम्हें करने के लिए बोलेगी, मैं भी उस काम को तुम्हारी दक्षिणा मानकर स्वीकार कर लूँगा।’

अपने गुरु की आज्ञा मानकर, उत्तंक वेद की पत्नी से मिला और उनसे कहा, ‘में गुरुदेव को कुछ दक्षिणा देना चाहता हूँ। तो उन्होंने कहा है कि में आपसे पूछ लूँ कि दक्षिणा के रूप में मुझे क्या करना होगा।’

वेद की पत्नी ने उत्तंक से कहा, 'उत्तंक, मैं चाहती हूँ कि तुम राजा पौष के पास जाकर, उससे उसके पत्नी के कर्णकुंडल लेकर आ जाओ। चार दिनों के बाद, मैं अपने घर में एक पवित्र समारोह आयोजित करने का सोच रही हूँ। उस समारोह में कुछ ब्राह्मण हमारे घर पर भोजन करेंगे। मैं उस समारोह के दौरान उन कर्णकुंडलों को पहनना चाहती हूँ। यदि तुम उचित समय पर उन कर्णकुंडलों को मेरे पास लाने में सफल हो गए, तो मैं तुम्हें आशीर्वाद प्रदान करूँगी।'

वेद के पत्नी की इच्छा सुनकर, उत्तंक ने उनसे कहा कि वह राजा पौष के पत्नी के कर्णकुंडल लाने की पूरी कोशिश करेगा।

उसके बाद, उत्तंक तुरंत राजा पौष के महल की तरफ़ चल पड़ा।

जब उत्तंक राजा पौष के महल की तरफ़ जाने के लिए सड़क पर चल रहा था, तब उसने एक बड़ा विचित्र दृश्य देखा। एक बहुत लम्बा आदमी, एक विशालकाय बैल की सवारी कर रहा था। जैसे ही उस आदमी ने उत्तंक को देखा, वह आदमी चिल्लाया, 'अरे, इस बैल का गोबर खाओ और इसका मूत्र पी लो।'

उस आदमी की बातें पहले तो उत्तंक को बड़ी विचित्र लगी। उसने गोबर खाने से या मूत्र पीने से साफ़ मना कर दिया। लेकिन वह आदमी फिर से चिल्लाया, 'तुम्हारे गुरु ने भी भूतकाल में यही किया था, इसलिए तुम्हें भी बिना संदेह के इस बैल के गोबर को खाना चाहिए और इसके मूत्र को पीना चाहिए।'

उत्तंक ने हमेशा अपने गुरु के पदचिन्हों पर चलने की कामना की थी, इसलिए उसने उस बैल का गोबर खाया और उसका मूत्र पी लिया। बाद में, उसने खड़े-खड़े अपने हाथ और मुँह धोए, और अपनी यात्रा जारी रखी।

एक लंबा रास्ता तय करने के बाद, आखिरकार उत्तंक राजा पौष के महल में पहुँच गया। जैसे ही राजा पौष को पता चला कि महल में कोई तपस्वी आया है, राजा ख़ुद उसकी अगवानी करने चला गया। उसने उत्तंक को बड़े ही आदरभाव के साथ अपने महल में आमंत्रित किया। उसके बाद, पौष राजा ने उत्तंक से पूछा कि वह उत्तंक के लिए क्या कर सकता है।

उत्तंक ने राजा से कहा, 'हे राजा, मैं तुमसे कुछ माँगने के लिए यहाँ आया हूँ। मुझे आपके पत्नी के कर्णकुंडल चाहिए। मैं उन्हें अपने गुरु की पत्नी को मेरी गुरु-दक्षिणा के रूप में अर्पण करना चाहता हूँ।’

उत्तंक की बात सुनकर, राजा पौष ने जवाब दिया, 'वह कर्णकुंडल आपको मिले, इसमें मेरी कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन वह कर्णकुंडल रानी के हैं, तो आप उसे ही उन कर्णकुंडलों के लिए पूछ लेंगे तो बेहतर होगा। आप स्वयं रानी के निवास जाकर, उससे कर्णकुंडलों के बारे में पूछ लीजिए।’

राजा पौष की बात सुनकर, उत्तंक स्वयं रानी के निवासस्थान पर चला गया, लेकिन रानी के निवासस्थान में उसे रानी नहीं मिली। वह निराश होकर राजा पौष के पास लौट आया और उसने राजा से गुस्से में कहा, 'हे राजा, लगता है कि तुम अपने पत्नी के कर्णकुंडल मुझे नहीं देना चाहते, इसलिए रानी के निवासस्थान में रानी के न होने के बावजूद, तुमने मुझे वहाँ पर भेज दिया।’

राजा पौष ने उत्तंक से कहा, ‘नहीं, ऐसी बात नहीं है। मेरी पत्नी उसके निवासस्थान में ही है। अगर वह आपको नहीं दिखी तो इसका कोई और कारण हो सकता है। मेरी पत्नी का आचरण बहुत ही पवित्र है और वह किसी अपवित्र इंसान के सामने कभी प्रकट नहीं होती। कृपया आप याद कीजिए कि क्या आपने कोई धर्म के विरुद्ध कार्य किया है, जिससे आप अपवित्र हो गए हो।’

उत्तंक ने सोचना शुरू कर दिया। फिर उसे याद आया कि जब उसने बैल का गोबर खाया था और मूत्र पीया था, तब उसने अपने हाथ और मुँह खड़े-खड़े ही धो लिए थे। शास्त्र कहते हैं कि कुछ खाने के बाद, ख़ुद को अच्छे से स्वच्छ करना पवित्रता के लिए आवश्यक है। इस तरह, उत्तंक को समझ आ गया की उसने शास्त्रों में बताए गए नियमों का उल्लंघन किया है।

अपने अपवित्रता का कारण पता चलने के बाद, उत्तंक ने राजा पौष से कहा, ‘मुझे लगता है कि आखरी बार खाना खाने के बाद, मैंने ख़ुद को अच्छे से साफ नहीं किया। कृपया मुझे एक ऐसी जगह प्रदान करें, जहाँ बैठने की जगह हो और पानी की व्यवस्था हो। उस जगह बैठकर, मैं अपने आप को ठीक से शुद्ध कर लूँगा। मुझे विश्वास है कि मैं उसके बाद रानी से मिल सकूँगा।’

राजा ने उत्तंक के विनती के अनुसार, उसको बैठने की जगह दे दी। इसके बाद, उत्तंक ने खुद को साफ करने के लिए निम्नलिखित क्रिया की। उसने पूर्व दिशा की तरफ अपना मुँह करके अपने हाथ, पैर और मुँह को धोया। फिर उसने सारी दिशाओं में पानी छींटा। फिर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में तीन बार पानी लेके उसको पी लिया। फिर उसने अपने चेहरे को दो बार पोंछा और अंत में, अपने आँखों को, नाक को और कान को ऊँगली पानी में डुबोकर, उस ऊँगली से स्पर्श किया।

अपने आप को उचित तरीके से शुद्ध करने के बाद, उत्तंक ने फिर से एक बार रानी के निवासस्थान में प्रवेश किया। अब, रानी उसे दिखाई दे रही थी। फिर उसने रानी को अपनी यात्रा का उद्देश्य समझाया और उससे उसके कर्णकुंडल माँग लिए।

रानी ने उत्तंक को ख़ुशी-ख़ुशी अपने कर्णकुंडल दे दिये और उससे कहा, 'उत्तंक, इन कर्णकुंडलों की बहुत सावधानी से रक्षा करना क्योंकि सर्पों का राजा, तक्षक, इनको प्राप्त करना चाहता है। मुझे लगता है कि वह इन कर्णकुंडलों की चोरी करने प्रयास ज़रूर करेगा।’

पहले तो, उत्तंक ने रानी को धन्यवाद दिए कि उसने अपने कर्णकुंडल उत्तंक को दे दिए थे। उसके बाद, उसने रानी को आश्वासन दिया कि वह कर्णकुंडलों की निश्चित रूप से रक्षा करेगा।

रानी से कर्णकुंडल प्राप्त करने के बाद, उत्तंक राजा पौष के पास गया और राजा के आभार व्यक्त किए। उसके बाद, उत्तंक ने राज्य से निकलकर अपने गुरु के आश्रम वापस जाना चाहा। लेकिन, राजा पौष ने उसे जाने की अनुमति नहीं दी। राजा पौष ने उसे कहा, 'उत्तंक, आप मेरे एक सन्माननिय अतिथि हैं। मैं लंबे समय से श्राद्धविधि के समारोह का आयोजित करना चाहता था, लेकिन मुझे उसके लिए कोई योग्य ब्राह्मण नहीं मिल रहा था। आज आप हमारे घर आए हो और आपसे बढ़कर कोई दूसरा अतिथि मुझे इस समारोह के लिए नहीं मिल सकता। इसलिए, आप कुछ और समय यहाँ रुकिए और इस समारोह को सम्पन्न कीजिए।’

उत्तंक ने राजा की इच्छा को अपनी सहमति दे दी लेकिन उसने राजा को विधि की तैयारी जल्द से जल्द करने के निर्देश दे दिए।

इसके बाद, बस कुछ ही समय में, समारोह के लिए बना हुआ भोजन उत्तंक को परोसा गया।

उत्तंक खाना खाने ही वाला था, लेकिन खाने में बाल देखकर वह चौंक गया। विधि के खाने में बाल देखकर उत्तंक अत्यंत क्रोधित हो गया। वह अपने क्रोध में राजा पौष पर बरस पड़ा। उसने राजा पौष को कहा, 'हे राजा, तुमने एक तपस्वी को अशुद्ध भोजन दिया है। लगता है कि यह भोजन ऐसे स्त्री ने बनाया है जिसकी दृष्टि ही नहीं थी, इसलिए मैं तुम्हें भी शाप देता हूँ कि तुम भी भविष्य में अपनी दृष्टि खो दोगे।’

हालाँकि, राजा पौष भोजन की शुद्धता के बारे में आश्वस्त था, इसलिए उत्तंक का क्रोध देखकर राजा भी उत्तंक पर क्रोधित हो गया।

पौष राजा ने उत्तंक ने कहा, 'उत्तंक, आपने मुझे बिना किसी कारण शाप दे दिया है, तो मैं भी आपको नि:संतान रहने का शाप देता हूँ।’ राजा पौष का शाप सुनकर उत्तंक को आश्चर्य हुआ। उसने राजा पौष राजा से कहा, ‘हे राजा, मुझे सच में अशुद्ध भोजन परोसा गया है, लेकिन तुम मुझे ही शाप दे रहे हो। ये न्याय नहीं है। अगर तुम्हें इतना ही भरोसा है कि भोजन शुद्ध है, तो तुम ही आकर इसकी जाँच पड़ताल कर लो।’

तब राजा स्वयं अपने स्थान से उठकर आया और उसने उत्तंक के खाने की जाँच की। तब राजा पौष को पता चल गया कि भोजन में सच में बाल है। इसके अलावा उसे यह भी समझ आ गया कि भोजन ठंडा है। इस प्रकार से, उसे पता चल गया कि उत्तंक का भोजन वास्तव में अशुद्ध है।

फिर राजा ने उत्तंक की क्षमा माँगी और उसके लिए दूसरे भोजन की व्यवस्था की। राजा पौष ने क्षमा माँगने पर उत्तंक का क्रोध कम हो गया। फिर राजा पौष ने उत्तंक से विनती की कि उत्तंक अपना शाप वापस ले लें। हालांकि, उत्तंक ने ऐसा करने में अपनी असमर्थता बताई। उत्तंक ने कहा, 'मैं अपने शाप को वापस लेने में सक्षम नहीं हूँ क्योंकि जो मैंने कहा है, वह सच होकर रहता है। लेकिन में इतना ज़रूर बताता हूँ कि तुम्हारी दृष्टि-हीनता लम्बे काल तक नहीं टिकेगी। थोड़े ही समय में आपकी दृष्टि आपको पुनः प्राप्त हो जाएगी।’

इसके बाद उत्तंक ने पौष राजा से कहा, 'हे राजा, तुमने वास्तव में मुझे अशुद्ध भोजन पेश किया था और उस भोजन को शुद्ध बताया था। इसलिए, ग़लती तो तुम्हारी है। तुम्हें अपना शाप वापस लेना चाहिए।'

लेकिन पौष राजा ने भी अपना शाप वापस लेने में असमर्थता बताते हुए जवाब दिया, ‘उत्तंक, मैं अपना शाप वापस नहीं ले सकता, क्योंकि मैं अभी भी गुस्से में हूँ। हमारे शास्त्र कहते हैं कि कठोर शब्दों के उच्चारण के बावजूद एक ब्राह्मण का हृदय मक्खन की तरह कोमल होता है, इसलिए एक ब्राह्मण आसानी से क्षमा कर सकता है। लेकिन एक क्षत्रिय की बात अलग है। युद्ध से कठोर बना हुआ उनका हृदय इतने जल्दी शांत नहीं होता। एक क्षत्रिय के हृदय को शांत करने के लिए काफ़ी समय चाहिए और मेरे हृदय में अभी शांतता नहीं आयी है, इसीलिए में आपको क्षमा कर के मेरा शाप वापस लेने में समर्थ नहीं हूँ।’

राजा पौष की बात सुनकर उत्तंक को बुरा लगा लेकिन उसे विश्वास था कि राजा पौष का शाप उसकी निर्दोषता के कारण उस पर प्रभाव नहीं डालेगा।

इसके बाद, उत्तंक ने राजा पौष का समारोह सम्पन्न किया और राजा से अपने गुरु आश्रम में वापस जाने की अनुमति ले ली।

फिर उत्तंक ने अपनी वापसी यात्रा शुरू की। राजा पौष के पत्नी के कर्णकुंडल उसे प्राप्त हो गए थे। इसके कारण वह संतुष्ट था और जल्दी-जल्दी चल रहा था, ताकि वह गुरु के आश्रम समय पर पहुँच सके। जब वह सड़क पर खुशी से चल रहा था, तो उसने दूर से एक नग्न भिखारी को उसकी दिशा में आते हुए देखा।

वह भिखारी एक समय दिखाई देता था, तो दूसरे समय अदृश्य हो जाता था। उस भिखारी को देखकर, उत्तंक को बड़ा अजीब सा लग रहा था।

चलते-चलते, उत्तंक ने महसूस किया कि वह राजा के महल से काफी दूर चला आया था। फिर उसे रास्ते में प्यास भी लग गई थी। प्यास लगने के कारण, वह रास्ते में रुक गया और उसने सड़क के किनारे बहने वाली नदी का पानी पीने का फैसला कर लिया। उसने रानी के कर्णकुंडल नदी के किनारे रख दिए और वह स्वयं नदी के अंदर चला गया। पानी पीने से पहले, उसने अपने गुरु की वंदना शुरू की। अपने गुरु की वंदना करते हुए भी उसकी आँखें रानी के कर्णकुंडलों पर थी। इसके बाद, उसने जो देखा, वह देखकर, उत्तंक पूरा चकित हो गया। अचानक, वह नग्न भिखारी दौड़ता हुआ उस स्थान पर आया, जहाँ रानी के कर्णकुंडल रखे हुए थे। उस नग्न भिखारी ने उन कर्णकुंडलों को उठाया और कर्णकुंडलों को उठाकर, वह भिखारी ज़ोर भागने लगा।

उत्तंक ने भिखारी को रानी के कर्णकुंडल चुराते हुए देखा। वह तुरंत उसका पीछा शुरू करना चाहता था, लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाया। वह अपनी गुरुवंदना कर रहा था, इसीलिए अपनी गुरुवंदना पूरी होने तक उत्तंक को रुकना पड़ा। जैसे ही उत्तंक ने अपनी गुरुवंदना पूरी की, वह पूरी शक्ति के साथ उस नग्न भिखारी के पीछे भागा।

उस भिखारी का लम्बे समय तक पीछा करने के बाद, उत्तंक ने उसे पकड़ लिया। लेकिन जैसे ही उत्तंक ने उसे छुआ, उस भिखारी ने स्वयं को सर्प के रूप में बदल दिया। इसके बाद, वह जमीन के एक छेद में चला गया। तब उत्तंक को समझा कि वह नग्न भिखारी कोई नहीं लेकिन तक्षक था। राजा पौष की पत्नी ने उत्तंक को तक्षक से बचने के लिए सूचित किया था।

उत्तंक की आँखों के सामने से, रानी के कर्णकुंडल चोरी हो गए थे। इस बात पर, उत्तंक को बड़ा खेद हो रहा था। इसके बाद, उत्तंक ने किसी हालत में उन कर्णकुंडलों को वापस पाने की ठान ली। फिर उत्तंक ने एक लकड़ी की छड़ी उठाई। उस छड़ी से, वह उस छेद में खुदाई करने लगा, जिसके अंदर तक्षक ग़ायब हो गया था। उत्तंक ने सोचा था कि वह उस छेद को बड़ा करके उसमें प्रवेश कर लेगा, तो वह तक्षक तक पहुँचने में सफल हो जाएगा, लेकिन ज़मीन कठोर होने के कारण उत्तंक का प्रयास निरर्थक जा रहा था।

इंद्र स्वर्गलोक से उत्तंक के इन प्रयासों को देख रहा था।

उत्तंक की ऐसी अवस्था देखकर, इंद्र को उसके प्रति दया का भाव उत्पन्न हो गया और उसने उत्तंक की मदद करने की ठान ली। जहाँ पर तक्षक ने ज़मीन में प्रवेश किया था, ठीक वहाँ पर उसने अपने वज्र को ज़मीन पर मार दिया। वज्र ने ज़मीन पर जोर से धमाका किया। वज्र के प्रहार के कारण, जिस छेद में तक्षक घुस गया था, वह छेद उत्तंक के जाने लायक बड़ा हो गया। छेद बड़ा होने के बाद, उत्तंक को अब नागलोक का रास्ता साफ़ दिखाई दे रहा था।

उत्तंक उस रास्ते से गुजरते हुए, ज़मीन के नीचे छिपे हुए नागलोक तक पहुँच गया। नीचे जाने के बाद, उत्तंक को अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। नागलोक में कई भव्य महल, सुंदर-सुंदर हवेलीयाँ और मनोरंजन के लिए कई विशाल बग़ीचे थे। नागलोक की खूबसूरती देखकर, उत्तंक उस में पूरी तरह खो गया।

कुछ क्षण जाने के बाद, उत्तंक होश में आ गया और सोचने लगा कि तक्षक ने चुराये हुए कर्णकुंडलों को किस तरीक़े से वापस पाया जा सकता है? कुछ क्षण सोचने के बाद, उसे एक युक्ति सूझी। उसने सोचा कि शायद तक्षक की प्रशंसा करनेपर, वह खुश होकर कर्णकुंडलों को स्वयं ही लौटा दे। उत्तंक अपने युक्ति पर खुश हो गया और फिर उसने तक्षक की प्रशंसा करना शुरू कर दिया। हालांकि, लंबे समय के बाद भी तक्षक वहाँ प्रकट नहीं हुआ। अपनी युक्ति अपयशी होते देख, उत्तंक फिर से निराश हो गया।

अचानक, उसने एक कोने में बड़ा ही विचित्र दृश्य देखा। उसने देखा कि दो महिलाएँ वहाँ काले और सफेद धागों से चरख़ा घुमाकर कपड़ा बुन रही थी। उस चरखे के बारह पहिए थे और उसे छे लड़के घुमा रहे थे। उन दो महिलाओं के अलावा, उत्तंक ने घोड़े पर सवार एक ऊंचे आदमी को भी देखा। वह आदमी उत्तंक की तरफ़ देख रहा था। उसको देखकर उत्तंक को अंदाज़ा हो गया कि कोई दिव्य मनुष्य है। यह जानकर उत्तंक ने उसकी प्रार्थना करना शुरू कर दिया।

उत्तंक की प्रार्थना से वह दैवी मनुष्य प्रसन्न हो गया। उसने उत्तंक के कहा, ‘हे ब्राह्मण, में तुम्हारी स्तुति सुनकर प्रसन्न हुआ। में तुम्हारी क्या सहायता कर सकता हूँ?’

उत्तंक ने उसे कहा, 'हे देव, तक्षक ने मेरे कर्णकुंडल चुरा लिए हैं। मैं उन कर्णकुंडलों को वापस पाना चाहता हूँ, लेकिन मुझे समझ नहीं आ रहा कि मुझे तक्षक से वह कर्णकुंडल वापस कैसे मिलेंगे?’

उत्तंक की बात सुनकर, उस ऊँचे मनुष्य ने उस से कहा, ‘मुझे तुम्हारी परेशानियों का हल पड़ा है। एक काम करो, तुम इस घोड़े पर फूँक मार दो।’

जैसे ही उत्तंक ने घोड़े पर फूँक मारी, आग की विशाल लपटें घोड़े के शरीर से चारों दिशाओं में बाहर निकलने लगी। यह अद्भुत चमत्कार देखकर, उत्तंक दंग रह गया। उस आग के लपटों ने महलों को अपने चंगुल में लेना शुरू कर दिया और सारे नागलोक में बहुत बड़ा हंगामा खड़ा हो गया। सारे साँप अपनी जान बचाके भागने लगे।

पूरे राज्य के संभावित विनाश से भयभीत होकर, तक्षक उसी समय उत्तंक के सामने आया और उसे आग को बुझाने की विनती की। फिर उसने चोरी किए हुए कर्णकुंडल लौटा दिए और उत्तंक से अपने किए की माफ़ी माँगी।

जैसे ही उत्तंक को कर्णकुंडल वापस मिल गए, उसने दैवी मनुष्य को विनती की कि वह उस विनाशकारी आग को रोक दें। फिर उस दैवी मनुष्य ने घोड़े के शरीर से निकलती आग को रोक दिया।

कर्णकुंडल मिलने के बाद, कुछ पल के लिए, उत्तंक बड़ा खुश था लेकिन एका-एक उसके चेहरे पर निराशा छा गई। उत्तंक को निराश देखकर, दैवी आदमी ने पूछा, ‘कर्णकुंडल मिलने के बावजूद, तुम निराश लग रहे हो। क्या कर्णकुंडल मिलने के बाद भी तुम्हें ख़ुशी नहीं हुई?’

फिर उत्तंक ने उस दैवी मनुष्य को निराशाजनक आवाज़ में कहा, ‘हे देव, आज वह शुभ दिन है, जब मेरे गुरुदेव की पत्नी इन कर्णकुंडलों को पहनकर आश्रम में ब्राह्मणभोज का आयोजन करने वाली है। लेकिन, में आश्रम से इतना दूर हूँ कि मैं आश्रम में समय पर नहीं पहुँच पाउँगा। पहुँचने में देरी होने पर, मेरे गुरुदेव की पत्नी इन कर्णकुंडलों को नहीं पहन पाएगी और मेरा वचन टूट जाएगा। इसी कारण, में दु:खी हो रहा हूँ।’

उत्तंक के इस परेशानी का भी उस दैवी मनुष्य के पास समाधान था। उसने उत्तंक से कहा, ‘हे ब्राह्मण, तुम चिंता मत करो। इस दिव्य घोड़े पर बैठकर तुम अपने गंतव्य स्थान के बारे में सोचो। यह घोड़ा बस कुछ ही पलों में, तुम्हें तुम्हारे इच्छित स्थान पर लेकर चला जाएगा।’

दैवी मनुष्य के बातों को सुनकर उत्तंक को बड़ी राहत मिली। उसने दिव्य घोड़े पर चढ़कर, अपने गुरु के आश्रम के बारे में सोचा और फिर, बस कुछ ही पलों में वह गुरु के आश्रम पहुँच गया। जब वह उसके गुरु के निवास पर पहुँचा, तो उसने देखा कि उसके गुरुदेव की पत्नी स्नान करके अपने बालों में कंघी कर रही थी और ब्रह्मणभोज के लिए तैयार हो रही थी। तब उत्तंक ने उनके समक्ष जाकर, आदरपूर्वक उन्हें कर्णकुंडल भेंट किए। कर्णकुंडलों को देखकर, उसके गुरु की पत्नी अतिप्रसन्न हो गई। उन्होने उत्तंक से कहा, 'उत्तंक, तुमने एकदम सही समय पर मुझे कर्णकुंडल भेंट किए हैं। इससे में अतिशय प्रसन्न हूँ। में तुम्हें आशीर्वाद देती हूँ कि तुम्हें एक उज्जवल भविष्य की प्राप्ति हो जाएगी।’

गुरु की पत्नी को कर्णकुंडल भेंट करके, उत्तंक अपने गुरु के पास उनका आशीर्वाद चला गया। उत्तंक को देखकर, वेद आनंदीत हो गए। फिर वेद ने उत्तंक से पूछा, ‘उत्तंक, तुम्हें आने में इतनी देर क्यों लगी?'

तब उत्तंक ने उन्हें बताया कि कैसे तक्षक ने कर्णकुंडल चुरा लिए थे और कैसे उत्तंक ने उन्हें फिर से प्राप्त किया। इसके बाद, उत्तंक ने वेद को विभिन्न जीवों, पुरुषों और महिलाओं के बारे में बताया, जो उसे राजा पौष के महल के रास्ते पर और नागलोक में मिले थे। इसके बाद, उसने अपने गुरु से विनती की कि वह इन प्राणियों की वास्तविक पहचान बताएँ।

वेद ने कहा, 'उत्तंक, जो दो महिलाएँ नागलोक में चरख़ा घुमा रही थी, वह धाता और विधाता थीं। उनके काले और सफेद धागे, रातों और दिनों को दर्शाते हैं। उस चरखे पर जो बारह आरे लगे हुए थे, वह एक वर्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं, और वह छे लड़के जो वह चरख़ा घुमा रहे थे, वह छे मौसम दर्शाते हैं। नागलोक में, घोड़े के ऊपर सवार लंबा आदमी इंद्र था, और उसका घोड़ा बनकर अग्निदेव आए थे। राजा पौष के महल के रास्ते पर तुमने जो बैल देखा, वह हाथियों का राजा ऐरावत था, और जो ऊँचा आदमी उस पर सवार था, वह इंद्र था। उसने जो बैल का गोबर तुम्हें खिलाया, वह वास्तव में अमृत था। उस अमृत ने तुम्हें नागलोक में जीवित रखा। इंद्र मेरा अच्छा दोस्त है, इसलिए उसने तुम्हारी यात्रा में तुम्हारी सहायता की।'

वेद द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण को सुनकर, उत्तंक का अपने गुरु के प्रति आदरभाव और भी बढ़ गया। उसने वेद को इंद्र और अन्य देवताओं से प्राप्त मदद के लिए धन्यवाद दिए। अब उसे समझ आ रहा था कि केवल गुरुदेव के कृपा के कारण ही वह गुरु दक्षिणा देने में सफल हो पाया था।

इस तरह, उत्तंक ने अपने गुरु को दक्षिणा दी और घरेलू जीवन में प्रवेश करने के लिए वह उनके आश्रम से घर लौटकर आया।