सर्वशक्तिमान गरुड़ (महाभारत की अनसुनी कहानियाँ -3)

 


कश्यप ऋषि की दो पत्नियाँ थीं, कद्रू और विनता।

उन दोनो की सेवा से खुश होकर, कश्यप ऋषि ने उन्हें बताया कि वह उन दोनो को एक-एक वरदान दे देंगे, जिससे उनकी एक-एक इच्छा पूरी हो जाएगी। यह बात सुनकर कद्रू और विनता दोनों खुश हो गए।

कद्रू ने फिर यह इच्छा व्यक्त की कि एक हजार शक्तिशाली साँप उसे बच्चों के रूप में प्राप्त हो जाए। विनता ने केवल दो बेटों की कामना की। लेकिन उसने कहा कि उसके दोनों बेटे बहादुरी, शक्ति और आकार में कद्रू के एक हजार बेटों को पिछे छोड़ दे।

कश्यप ऋषि ने दोनों को यह कहते हुए आशीर्वाद दिया कि, ‘तुम दोनो को अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार पुत्र प्राप्त होंगे, लेकिन तुम दोनों को अपने-अपने भ्रूण की सुरक्षा सावधानीपूर्वक करनी पड़ेगी।’

ऐसा कहने के बाद, उन्होंने अपनी पत्नियों को आशीर्वाद दे दिए और तपस्या करने के लिए वह वन में चले गए।

नियत समय पर, कद्रू ने एक हजार अंडों को जन्म दिया और विनता ने दो अंडे दिए। उनके अंडों को दो गर्म बरतनों में अलग-अलग रखा गया। पाँच सौ वर्षों के बाद, कद्रू के अंडे पूरी तरह से परिपक्व हो गए और फिर, एक हजार साँप अंडों की खोल को फाड़कर बाहर आ गए। अपने एक हजार बच्चों को देखकर, कद्रू ख़ुशी से गदगद हो गई।

लेकिन विनता के अंडों का कुछ भी नहीं हुआ। कद्रू की ख़ुशी देखकर, वह उससे ईर्ष्या करने लगी। अधीर होकर, उसने अपने एक अंडे को तोड़ दिया, लेकिन अंडे के अंदर तब तक भ्रूण का पूरा विकास नहीं हुआ था। भ्रूण के शरीर का ऊपरी आधा हिस्सा ही पूरी तरह से विकसित हो गया था, लेकिन कमर के नीचे उसका कोई विकास नहीं हुआ था।

अपनी माँ द्वारा दिखाई गई जल्दबाजी के कारण, वह अविकसित भ्रूण अत्यंत दु:खी हो गया। कुछ क्षण के बाद, उसे अपने ही माता पर क्रोध आ गया। क्रोधित स्वर में, उसने अपनी माँ को शाप दिया, 'तुमने अधिरता के कारण समय से पहले ही मेरा खोल तोड़ दिया, इसलिए मेरा विकास अधूरा रह गया। में तुम्हें शाप देता हूँ कि तुम एक दासी बन जाओगी। अब से पाँच सौ साल बाद, तुम्हारा एक शक्तिशाली बेटा दूसरा अंडा तोड़कर दुनिया में आएगा। वह तुम्हें गुलामी के बंधन से मुक्त करेगा।'

ऐसा कहकर, वह अविकसित भ्रूण आकाश में उड़ गया और बादलों में गायब हो गया। बाद में, वही सूर्य का सारथी बन गया और उसे ‘अरुण’ यह नाम दिया गया।

अरुण का जन्म होने के कुछ दिनों बाद, कद्रू और विनता जंगल में भटक रहे थे, तब उन्होंने दूर से उच्चैःश्रवा नाम के दिव्य और शक्तिशाली घोड़े को देखा। जब देवताओं ने और दानवों ने अमृत पाने के लिए दूध-सागर का मंथन किया था, तब उच्चैःश्रवा सागर मंथन से प्राप्त हुआ था। उच्चैःश्रवा के सात सिर थे, और उसमें उड़ने की भी क्षमता थी।

कद्रू और विनता उस घोड़े को देखकर रोमांचित हो गए। उच्चैःश्रवा को दूर से देखकर कद्रू ने विनता से पूछा, 'तुम्हें क्या लगता है कि उच्चैःश्रवा कौनसे रंग क्या है?'

तब विनता ने आत्मविश्वास से जवाब दिया, 'मुझे यकीन है कि वह सफेद रंग का है।'

लेकिन इस बात पर कद्रू ने असहमति जताई और कहा, 'मुझे लगता है कि इसकी पूँछ को छोड़कर इसका पूरा शरीर सफ़ेद है। लेकिन इसकी पूँछ काली है। इसका मतलब यह हुआ की घोड़ा पूरा सफ़ेद नहीं है।'

अपने भाग्य के प्रभाव में आकर, विनता ने कहा, 'क्या तुम घोड़े के रंग पर शर्त लगाना चाहती हो?'

कद्रू ने उत्तर दिया, 'ज़रूर। जो शर्त हार जाएगा, उसे दूसरे का गुलाम बनाकर उसकी सेवा करनी पडेगी।'

विनता ने शर्त को मान लिया। फिर, दोनों ने सुबह होते ही, घोड़े के नज़दीक जाकर, उसकी बारीकी से जाँच करने का फैसला किया।

रात में, कद्रू शर्त हारने और विनता का गुलाम बनने के बारे में बहुत चिंतित हो गई। उसने अपने एक हजार सर्प पुत्रों को बुलाया और उन्हें आदेश दिया कि वे छोटे-छोटे काले बालों जैसे आकार में परिवर्तित हो जाएँ और खुद को उच्चैःश्रवा की पूँछ से इस तरह जोडे की उसकी पूँछ काली दिखने लगे। जिससे कि वह शर्त जीत जाए।

लेकिन साँपों ने ऐसे गलत काम में खुद को शामिल करने से इनकार कर दिया। बेटों की अवहेलना कद्रू को सहन नहीं हुई। उसे ग़ुस्सा आ गया और उसने ग़ुस्से में अपने ही बेटों को एक भयानक शाप दिया। उसने कहा, 'तुमने मेरी आज्ञा नहीं मानी हैं, तो अब तुम सब मेरा शाप सुन लो। राजा जनमेजय के सर्प-मेध यज्ञ के दौरान, अग्नि तुम सबको खा जाएगी।' अपने ही माँ ने दिया हुआ भयंकर शाप सुनकर सारे साँप डर गए। फिर वह अपने माँ के पास गिड़गिड़ाने लगे कि वह अपना शाप वापस ले ले, लेकिन कद्रू ने ऐसा करने में अपनी असमर्थता दिखाई। फिर सारे साँप निराश होकर वहाँ से चले गए।

ब्रह्मांड का एक नियम था। किसी भी शाप को सच्चा होने के लिए, यह आवश्यक था कि ब्रह्माजी उस शाप को अपनी मंजूरी दे दें।

जब ब्रह्माजी ने कद्रू के शाप के बारे में सुना, तो उन्होंने उस शाप को अनुमोदन दे दिया। उन्होंने सोचा कि यह शाप जहरीले साँपों की बढ़ती संख्या को कम करके, अन्य निष्पाप जानवरों को लाभ पहुँचाएगा।

शाप को मान्यता देने के बाद, ब्रह्माजी ने कश्यप ऋषि को बुलाया और उन्हें सांत्वना दी, 'साँप आपके बच्चे हैं। इस शाप के बारे में सुनकर, आप निश्चित रूप से दुखी होंगे, लेकिन उनके पास घातक विष भी है। वे हमेशा अन्य निर्दोष जीवों को काटने का इरादा रखते हैं। ये शाप साँपों की संख्या कम करेगा और अन्य प्राणियों की भलाई में सहायता करेगा। नियति ने उनके विनाश के लिए, पहले से ही यह योजना बनाई है और कद्रू का शाप तो केवल एक साधन है। आप व्यथित मत होना। मैं अभी आपको एक आशीर्वाद देता हूँ। आशीर्वाद के रूप में, मैं आपको एक ऐसी विद्या सखाऊँगा, जो किसी भी शक्तिशाली विष को बेअसर कर देगी।’

इस प्रकार, ब्रह्माजी ने कश्यप ऋषि को घातक विष का इलाज सिखाया। इसके बाद, अपने बच्चों का भाग्य और ब्रह्माजी ने सिखाई हुई विदया, इन डोनो चीज़ों का स्वीकार करके कश्यप ऋषि अपने आश्रम में वापस चले आए।

दूसरी ओर, कद्रू और विनता ने सुबह उच्चैःश्रवा के जाँच के लिए जाने की तैयारी शुरू कर दी। इस बीच, कद्रू के एक हजार सर्प पुत्रों ने आपस में चर्चा की और अपनी माँ की आज्ञा का पालन करने का निश्चय किया। उन्होंने सोचा कि हम अगर उसकी आज्ञा का पालन करे, तो शायद कद्रू खुश हो जाए और अपना शाप वापस ले ले। फिर सारे साँप उच्चैःश्रवा के पास पहुँचे। सब ने अपने शरीर को बालों के समान छोटे रूप में परिवर्तित किया। इसके बाद, सब ने अपना रंग भी काला कर लिया। इस प्रकार, अपना रूप बदलने के बाद, उन्होंने खुद को उच्चैःश्रवा घोड़े की पूँछ से जोड़ लिया। अब ऐसा लग रहा था, जैसे उच्चैःश्रवा की सफ़ेद पूँछ, अभी काले रंग में बदल गई हो।

जब कद्रू और विनता ने घोडे की जाँच की, तब उन्होंने देखा कि उच्चैःश्रवा की पूँछ को छोड़कर, उसका पूरा शरीर सफेद था। उन्होंने देखा कि उसकी पूँछ काले रंग की थी। इस प्रकार से विनता शर्त हार गई और कद्रू की दासी बन गई। तब विनता को अरुण ने दिया हुआ शाप याद आ गया। तब अरुण ने उसे यह भी बताया था कि उसका दूसरा पुत्र उसे ग़ुलामी की बेड़ियों के मुक्त कर देगा।

फिर विनता ने अगले पाँच सौ वर्षों तक दूसरे अंडे की अच्छे से देखभाल की। फिर उस अंडे का खोल तोड़कर, पक्षियों का राजा गरुड़ उसमें से निकल आया। जैसे ही वह अंडे से बाहर आया, उसने भोजन की तलाश में आकाश में ऊँची छलांग लगा दी। उसने उड़ते-उड़ते आकाश में कई ऊँचाइयाँ छू ली। उसने अपने आकार में भी काफी वृद्धि की। जब देवताओं ने उसे देखा, तब उन्हें वह हवा में तेजी से उड़ती हुई अग्नि की एक विशाल गेंद की तरह दिखाई दिया।

उस अग्नि की गेंद को देखकर, देवता भयभीत हो गए और गलती से उन्होंने ये यह मान लिया कि आग की गेंद के रूप में स्वयं अग्निदेव हैं। फिर सारे देवता मिलकर अग्निदेव के पास चले गए। देवताओं ने अग्निदेव को अपना आकार और तेज़ कम करने का अनुरोध किया। तब अग्निदेव ने देवताओं का भ्रम दूर कर दिया। अग्निदेव ने उन्हें बताया कि आग की विशाल गेंद के समान दिखाई देने वाला असल में कश्यप ऋषि का पुत्र है, जो अपनी अथाह शक्ति के कारण इतना तेजोमय और वेगवान है। तब सभी देवताओं ने गरुड से प्रार्थना की। उसे अपना आकार और तेज कम करने की विनती की। गरुड ने देवताओं की विनती स्वीकार कर ली और अपना आकार और तेज़ कम कर दिया।

देवताओं को प्रसन्न करने के बाद, जब गरुड़ आकाश में उड़ रहा था, तब ब्रह्माजी ने गरुड़ को बुलाया। उन्होंने गरुड़ से कहा, ‘हे गरुड़, सूर्य ने दुनिया को अपनी भयंकर किरणों से जलाने का फैसला किया है। दुनिया को बचाने के लिए तुम्हारे मदद की आवश्यकता है।‘

फिर गरुड़ ने ब्रह्माजी से कहा, ‘मैं अपना सहयोग देने के लिए तैयार हूँ, लेकिन सूर्य ने दुनिया को जलाने का फ़ैसला क्यूँ कर लिया है?

ब्रह्माजी ने गरुड़ के प्रश्न का उत्तर देना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा, ‘जब देवताओं और राक्षसों ने अमृत प्राप्त करने के लिए दूध-सागर का मंथन किया था, तब अमृत बाहर निकल कर आ गया था। उसके बाद, भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप में देवताओं को अमृत परोसना शुरू किया। तब राहु नाम के एक राक्षस ने भी एक देवता के रूप में स्वयं को परिवर्तित कर दिया और देवताओं के शिबिर में प्रवेश करके वह अमृत पीने लगा। जब सूर्य ने राहु को पहचान लिया, तो उसने राहु को भगाने के लिए उससे लड़ाई शुरू कर दी। अन्य देवताओं और ऋषियों ने राहु को परास्त करने में सूर्य की उतनी ज़्यादा मदद नहीं की। उनसे निराश होकर, सूर्य ने दुनिया को नष्ट करके, उन्हें सबक़ सिखाने का फैसला कर लिया है।’

सूर्य के क्रोध का कारण पता चलने पर, गरुड़ ने ब्रह्माजी से कहा, ‘अब मुझे इस बात का पता चल गया है कि सूर्य ने दुनिया का विनाश करने की क्यों ठान ली है। अब आप मुझे यह बताइए कि दुनिया को बचाने के लिए मुझे क्या करना होगा?’

तब ब्रह्माजी ने गरुड़ को दुनिया को बचाने का उपाय बताया। उन्होंने कहा, ‘हे गरुड़, तुम अपने भाई, अरुण, के पास चले जाओ। तुम उसे अपने पीठ पर बिठाके पूर्व दिशा की ओर चले जाना। पूर्व दिशा में जाके, तुम अरुण को सबसे ऊँचे पर्वत पर छोड़ कर आ जाना। फिर जब सूर्य पूर्व दिशा की ओर से आएगा, तब अरुण उसके रथ पर सवार हो जाएगा और सूर्य का सारथी बन जाएगा। अरुण आकार में बड़ा है। वह शीतल और शांत है। जब सूर्य अपना तेज़ बढ़कर दुनिया का विनाश करना चाहेगा, तो अरुण का शरीर सूर्य और पृथ्वी के बीच में रहकर उस तेज़ को सोख लेगा। इस प्रकार से, दुनिया सूर्य के प्रकोप से बच जाएगी।’

फिर गरुड़ ने ब्रह्माजी को वंदन किया और वह अरुण के पास जाने के लिए निकल पड़ा। अरुण के पास जाकर, गरुड़ने दुनिया को बचाने के लिए अरुण की मदद माँगी। अरुण मदद करने के लिए तैयार हो गया।

फिर गरुड़ ने अपने भाई, अरुण को अपनी पीठ पर बिठाया और उसे एकदम ऊँचे पूर्वी पहाड़ों पर छोड़ दिया। जैसे ही सूर्य पूर्व दिशा में उभरकर आ गया, अरुण सूर्य के रथ पर विराजमान हो गया और उसका सारथी बन गया। जब सूर्य ने अपनी आग बढ़ायी, तब अरुण की शीतलता ने वह सारी आग सोख ली। इस प्रकार से, गरुड़ ने अरुण की मदद से दुनिया का नाश होने से बचाया।

इसके बाद, गरुड़ अपनी माता, विनता के पास गया, जो कद्रू की दासी बनके सेवा कर रही थी।

कद्रू ने उसी समय विनता से उसे और उसके सर्प पुत्रों को समुद्र के बीच एक सुंदर द्वीप पर ले जाने के लिए कहा। विनता ने कद्रू को अपनी पीठ पर लाद लिया और गरुड़ ने कद्रू के एक हजार सर्प पुत्रों को अपनी पीठ पर ले लिया। फिर गरुड़ और विनता अपनी-अपनी सवारी को लेके समुद्र के उस सुंदर द्वीप की तरफ चल पड़े।

रास्ते में, गरुड़ को गुस्सा आ रहा था। जिस तरीके से उसे और उसकी माँ को कद्रू की आज्ञाओं का पालन करना पड रहा था, वह देखकर वह क्रोधित हो रहा था। क्रोधित होकर, वह आकाश में काफ़ी ऊँचाई तक चला गया। उसके पीठ पर बैठे साँपों को सूर्य की गर्मी महसूस हो रही थी। जैसे-जैसे गरुड ऊँचा उडता गया, वैसे-वैसे साँपों की तकलीफ़ बढ़ती जा रही थी। अत्यधिक गर्मी के कारण वह बेहोश भी हो रहे थे।

कद्रू ने देखा कि गर्मी उसके बेटों को झुलसा रही है। यह देखकर, उसने इंद्र की प्रशंसा करना शुरू कर दिया।

उसकी प्रार्थनाओं से प्रसन्न होकर, इंद्र ने बादलों को भारी बारिश करने का आदेश दिया। आसमान में काले बादल छा गए और भयंकर बारिश शुरू हो गई। फिर साँपों को गर्मी से राहत मिली और वे अपनी माँ के पास सुरक्षित तरीक़े से उस द्वीप पर पहुँच गए।

वह द्वीप बड़ा ही सुंदर था। वह कई महलों, बगीचों, झीलों और पेड़ों से भरा हुआ था। वहाँ के पेड़ फलों और फूलों से लदे हुए थे।

थोड़ी देर तक आनंद लेने के बाद, साँपों ने गरुड़ से उन्हें किसी अन्य सुंदर स्थान पर ले जाने के लिए कहा। साँप के मुँह से आज्ञा सुनकर शक्तिशाली गरुड ने अपमानित महसूस किया।

उसे साँपों पर बड़ा ग़ुस्सा आ रहा था, लेकिन साथ ही उसे निराशा भी महसूस हो रही थी। फिर गरुड़ निराश होकर अपनी माँ के पास चला गया और उससे उसने पूछा, 'माँ, हमें साँपों और कद्रू के आदेशों को मानने की क्यों ज़रूरत है?'

'बेटे, क्योंकि मैं कद्रू की गुलाम हूँ। कुछ सालों पहले, मैंने उससे एक शर्त लगायी थी, जो में धोखे से हार गई थी। उसके बाद से, गुलामी का यह दुर्भाग्य मुझ पर गिर गया है,' विनता ने जवाब दिया।

गरुड़ अपनी माँ की दुर्दशा देखकर व्यथित हो गया। माँ को किसी भी हालत में गुलामी से मुक्त करने का फैसला उसने कर लिया। फिर वह अपने सर्प भाइयों के पास गया और उनसे पूछा, 'भाइयों, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ, ताकि आप मेरी माँ को अपनी दस्यता से मुक्त कर दोगे?'

साँपों ने आपस में चर्चा की और गरुड़ को अपनी माँग प्रस्तुत की। उन्होंने कहा, 'हे गरुड़, अगर तुम अपनी माँ को हमारी दास्यता से मुक्त करना चाहते हो, तो तुम्हें हमारे लिए स्वर्ग से अमृत लाना पडेगा।’

'ठीक है। मैं तुम्हारे लिए अमृत ले के आऊँगा।‘ गरुड़ ने उत्तर दिया, ‘अपनी माँ को गुलामी से मुक्त करने के लिए गरूड़ ने युद्ध में देवताओं को हराने और अमृत छीनने का फैसला किया। फिर वह आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए विनता से मिलने गया और उससे पूछा कि वह देवताओं के साथ होने वाले विशाल युद्ध से पहले, अपनी भूख को संतुष्ट करने के लिए क्या खा सकता हैं?’

विनता ने गरुड़ को भोजन के संभावित स्रोतों के बारे में निर्देश दिया। वह जानती थी कि उसका बेटा बेहद शक्तिशाली है और उसे पूरा यक़ीन था कि गरुड़ युद्ध में अवश्य जीतेगा। उसने फिर गरुड़ को ‘विजयी भव:’ बोलकर विजयी होने का आशीर्वाद दिया। विनता से आशीर्वाद लेने के बाद, गरुड़ उसने बताए हुए भोजन के सम्भावित स्रोतों की ओर चल गया। विनता ने बताया हुआ भोजन खाने के बाद भी, उसकी भूक शांत नहीं हुई।

फिर गरुड़ अपने पिता के पास आशीर्वाद लेने के लिए गया और उसने कश्यप ऋषि से कहा, 'पिताजी, मैं माँ को दास्यता से मुक्त करने के लिए, स्वर्ग से अमृत लाने जा रहा हूँ। मुझे इस महान युद्ध के पहले उचित भोजन चाहिए, जो मुझे युद्ध करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा प्रदान करे। मुझे माँ के निर्देश के अनुसार भोजन तो मिला था, लेकिन फिर भी मुझे भूख लगी है। कृपया मुझे भोजन का ऐसा स्रोत बताइए जिससे मेरी भूख शांत हो।'

फिर कश्यप ऋषि ने गरुड़ को कहा, 'मेरे प्रिय पुत्र, पास में एक सरोवर है। दो विशाल जानवर वहाँ रहते हैं और वे एक-दूसरे के बहुत विरोधी हैं। एक बार, ये दो जानवर भाई थे, लेकिन अंततः, उनके बीच कलह विकसित हो गया। उन्हें क्रमशः विभावसु और सुप्रतिका कहा जाता था। विभावसु एक ऋषि था, लेकिन वह गुस्सेल स्वभाव का था। सुप्रतिका विभावसु से उम्र में छोटा था। छोटा होने पर भी, सुप्रतिका हमेशा चाहता था कि उनकी संयुक्त संपत्ति दोनों के बीच विभाजित हो जाए। विभावसु सोचता था कि यह एक मूर्खता का विचार है। एक दिन, इस मतभेद के कारण भाइयों के बीच एक गंभीर संघर्ष हुआ और दोनों ने एक-दूसरे को शाप दे दिया। शाप के परिणामस्वरूप सुप्रतिका एक विशालकाय हाथी में बदल गया और विभावसु एक विशाल कछुए में परिवर्तित हो गया। धन के लोभ के कारण उनकी लड़ाई हो गई, जिससे उनका पतन हो गया। तुम इन जानवरों को खा सकते हो और अपनी भूख शांत कर सकते हो। हाथी की ऊंचाई छह योजन है और उसका घेराव बारह योजन है। कछुए की ऊंचाई तीन योजन है और उसका घेराव दस योजन है।‘ (एक योजन लगभग बारह से पंद्रह किलोमीटर की दूरी के बराबर होता है)

अपने पिता से आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद, गरुड़ सरोवर के ऊपर उडने लगा। जैसे ही वे दो विशालकाय जानवर उसे दिखे, उसने आकाश से बड़े ही तेज़ी से नीचे झपट्टा मार लिया। उसने अपने एक पंजे में हाथी और दूसरे पंजे में कछुए को पकड़ लिया। फिर गरुड़ ने सोचा, ‘अब ऐसी जगह कहाँ मिलेगी, जहाँ वह इतने विशाल जीवों को रखकर उनका सेवन कर पाए?’

फिर वह अलम्बा नामक स्थान पर गया, जो दैवी वृक्षों से भरा हुआ था। गरुड़ के पंखों से बनी हवाओं से पेड़ झुलस गए और भय से काँपने लगे। गरुड़ ने देखा कि पेड़ भयभीत हो रहे हैं, तो उसने कहीं और जाने का फ़ैसला कर लिया।

थोड़ा आगे उड़ने के बाद, वह एक विशाल पेड़ के पास आया। उस विशाल पेड़ ने तो गरुड़ से बातें करना शुरू किया। उस पेड़ ने गरुड़ को अपने सबसे बड़े शाखा पर बैठने के लिए आमंत्रित किया। उस शाखा की लंबाई सौ योजन थी (एक योजन मतलब बारह से पंद्रह किलोमीटर की दूरी के बराबर होता है)।

जैसे ही गरुड़ ने शाखा पर बैठने की कोशिश की, वह शाखा उसके भार के कारण टूट गई और वह शाखा नीचे गिरने लगी। अचानक, गरुड़ ने देखा कि उस शाखा से नीचे वालखिल्य ऋषि अपनी तपस्या करते हुए लटक रहे थे। (वालखिल्य ऋषि अंगूठे के आकार के ऋषि थे और वे संख्या में साठ हजार थे। उनका आकार छोटा था, लेकिन वह महान तपस्वी थे।)

गरुड़ को लगा कि गिरने वाली शाखा ऋषियों को नुकसान पहुँचा के घायल कर देगी। उसने तुरंत झपट्टा मारा और गिरती हुई शाखा को अपनी चोंच में पकड़ लिया। उसके बाद, वह अपने पिता के पास चला गया क्योंकि वालखिल्य ऋषियों की तपस्या को वह भंग नहीं करना चाहता था। फिर उड़ते हुए, गरुड़ उस शाखा को लेकर अपने पिता के पास पहुँच गया।

कश्यप ऋषि ने वालखिल्य ऋषियों को प्रार्थना करके उनको शाखा छोड़ने का अनुरोध किया। फिर कश्यप ऋषि ने वालखिल्य ऋषियों को गरुड़ को आशीर्वाद देने के लिए कहा ताकि गरुड़ अमृत लाने में सफल हो जाए। कश्यप ऋषि की प्रार्थना सुनकर, वालखिल्य ऋषि शाखा से नीचे उत गए। उन्होंने गरुड़ को युद्ध के लिए आशीर्वाद दे दिया। उसके बाद वह अपनी तपस्या जारी रखने के लिए हिमालय चले गए।

फिर कश्यप ऋषि ने गरुड़ को एक स्थान के बारे में सूचित किया, जहाँ वह विशाल शाखा को छोड़कर, हाथी और कछुए को खा सकता है। वह स्थान पहाड़ों की चोटी पर था और वह पहाड़ एक लाख योजन दूर था। गरुड़ अपने तेज़ गति के कारण कुछ ही क्षणों में वहाँ पहुँच गया। पहाड़ की चोटी पर शाखा छोड़ने के बाद, उसने हाथी और कछुए को खाकर अपना भोजन कर लिया।

उर्जावान होकर, उसने आकाश में छलाँग लगाई और वह स्वर्ग की ओर चल पड़ा।

इस बीच, देवताओं को स्वर्ग में कई अपशकुन दिखना शुरू हो गए। जैसे कई दैवी हथियार अपने आप ही एक-दूसरे से लड़ने लगे। विशाल बादल अचानक आसमान में दिखाई देने लगे और वह बादल खून की बौछार करने लगे। उल्काओं ने दिन में टूटना शुरू कर दिया। देवताओं की मालाएँ मुरझाने लग गई। इन अपशकुनों ने भविष्य में आने वाले एक जबरदस्त खतरे का संकेत देवताओं को दिया।

इन अशुभ घटनाओं को देखते हुए, इंद्र देवताओं के गुरु, ब्रहस्पति के पास गया। ब्रहस्पति ने इंद्र को बताया कि पराक्रमी गरुड़ अमृत के जाने के लिए आ रहा है, यही इन अपशकुनों का कारण है। उन्होंने इंद्र को चेतावनी दी कि गरुड़ को शक्तिशाली वालखिल्य ऋषियों ने भी जीत का आशीर्वाद दिया है।

तब इंद्र को अचानक याद आया कि कैसे एक बार उसने वालखिल्य ऋषियों का मजाक उड़ाया था और कैसे वालखिल्य ऋषियों ने इंद्र का इंद्रपद छिनकर वहाँ पर दूसरे इंद्र को प्रस्थापित करने के लिए एक महायज्ञ का आरम्भ कर दिया था। लेकिन इस संकट से, कश्यप ऋषि की दया के कारण इंद्र बाल-बाल बच गया था।

इसकी कथा कुछ इस प्रकार है। बहुत समय पहले, कश्यप ऋषि ने पुत्र को जन्म देने के लिए, एक यज्ञ समारोह आयोजित करने का निर्णय लिया था। समारोह की आवश्यकताओं के लिए कई लोग उनकी मदद कर रहे थे। यज्ञ की लकड़ीयाँ लाने के लिए इंद्र और वालखिल्य ऋषि जिम्मेदार थे। अपने दैवी शक्ति का उपयोग करके इंद्र लकड़ी का एक विशाल ढेर लेकर आया, लेकिन वालखिल्य ऋषि आकार में छोटे होने के कारण, पलाश के पेड़ की केवल एक छोटी टहनी ला सके। वालखिल्य ऋषि जब वह छोटी टहनी ले जा रहे थे, तब गाय के खुर से बने गड्ढे में भरे पानी में वह फँस गए। तब इंद्र वालखिल्य ऋषियों के सिर के ऊपर से अपने दैवी रथ में हँसते हुए चला गया और उनकी मदद भी नहीं की। इस प्रकार, इंद्र ने वालखिल्य ऋषियों का अपमान किया था।

वालखिल्य ऋषि तब क्रोधित हो गए। फिर वालखिल्य ऋषियों ने सोचा कि ये इंद्र अहंकारी है, इसलिए एक दूसरा इंद्र पैदा करते है और इस इंद्र को इंद्रपद से निकाल देते है। ऐसा सोचकर वालखिल्य ऋषियों ने दूसरे इंद्र को पैदा करने के लिए एक महायज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने ऐलान किया कि उन्होंने पैदा किया हुआ दूसरा इंद्र वर्तमान इंद्र की तुलना में सौ गुना अधिक शक्तिशाली होगा।

वालखिल्य ऋषियों का यज्ञ देखकर इंद्र भयभीत हो गया और कश्यप ऋषि के चरणों में गिर पड़ा। इंद्र ने कश्यप ऋषि से विनती की कि वह उसे उसका सिंहासन बचाने में मदत करे।

कश्यप ऋषि ने वालखिल्य ऋषियों से मुलाकात की और उनसे अनुरोध किया, 'यह इंद्र ब्रह्माजी की इच्छा से सिंहासन पर बैठा है। दूसरा इंद्र उत्पन्न करना ब्रह्माजी की इच्छा के विरुद्ध होगा, इसलिए इस इंद्र को अपना सिंहासन बरकरार रखने देना चाहिए। आपके यज्ञ से जो इंद्र उत्पन्न होगा, वह पक्षियों का राजा होने दीजिए।

वालखिल्य ऋषि कश्यप ऋषि के अनुरोध पर सहमत हुए, लेकिन उन्होंने भी कश्यप ऋषि से एक विनती की। उन्होंने कहा, ‘इस यज्ञ से जो इंद्र उत्पन्न होगा, वह पक्षियों का राजा ज़रूर बनेगा। ऐसे पक्षियों के राजा को आप पुत्र के रूप में स्वीकार कर लीजिए।’ कश्यप ऋषि ने पक्षियों के राजा को पुत्र रूप में स्वीकार करने के लिए अपनी अनुमति दे दी। इस प्रकार से, गरुड़ का जन्म हुआ था और इंद्र का सिंहासन बच गया था।

ब्रहस्पति से मिलने के बाद, इंद्र अमृत की रक्षा करने वाले देवताओं के पास गया और उन्हें गरुड़ की असीम शक्तियों के बारे में चेतावनी दी। देवताओं ने फिर अमृत की सुरक्षा बढ़ा दी और सभी प्रकार के हथियारों को एकत्रित किया। इस प्रकार, उन्होंने गरुड़ के साथ लड़ाई के लिए खुद को तैयार कर दिया।

जल्द ही, देवताओं को गरुड़ स्वर्ग की तरफ़ आते हुए दिखाई दिया। फिर गरुड़ ने जरासी भी देर न करते हुए, देवताओं पर हमला बोल दिया। अपनी चोंच, नाख़ून और पंखों के साथ देवताओं पर उसने कहर बरपाया। देवता गरुड़ की असीम शक्ति का सामना नहीं कर सके और जल्द ही युद्ध के मैदान से भाग गए। भागने से पहले, उन्होंने जिस जगह पर अमृत का घड़ा रखा हुआ था, उसके आसपास एक भव्य आग लगा दी।

गरुड़ ने उस आग को देखा, जिसकी लपटें स्वर्ग के भी ऊँची जा रही थी। देवताओं ने ऐसी महाभयंकर आग लगाकर सोचा कि वे गरुड़ को इस आग से डरा देंगे, लेकिन गरुड़ की अथाह शक्ति का उन्हें ज़रा भी अंदाजा नहीं था।

आग की विशालकाय लपटें देखकर गरुड़ मन ही मन मुस्कुराया और फिर ख़ुद को आठ हजार और सौ मुँह वाले एक अजत्र पक्षी में बदल दिया। उस पक्षी का आकार हज़ारों हाथियों से भी कई गुना बड़ा था।

फिर वह इस नए रूप के साथ पानी लाने के लिए एक नदी की ओर गया। तेजी से उसने नदी में से पानी अपने जबड़ों में भर लिया और वह युद्ध के मैदान में लौटा। उसने अपने आठ हजार और सौ जबड़ों से पानी के तेज़ फ़ौवारे बरसाकर, उस विशालकाय आग को कुछ ही पलों में बुझा दिया।

जैसे ही आग बुझ गई, गरुड़ को उस कमरे का दरवाजा दिखाई दिया, जिसके अंदर अमृत का घड़ा रखा हुआ था। लेकिन उस कमरे के अंदर जा पाना इतना आसान नहीं था। उस कमरे के दरवाज़े में घुसने के लिए जो द्वार था, उसके सामने एक चक्र बड़े तेज़ी से घूम रहा था। उस चक्र के बीच में कुछ धारदार आरे लगे हुए थे। उस द्वार तक पहुँचने के लिए उस चक्र से पार होना ज़रूरी था। लेकिन उन धारदार आरों के बीच से निकलकर उस द्वार तक पहुँचना, मानो अपने मौत को न्योता देने जैसा था।

लेकिन गरुड़ के पास इस समस्या का भी हल था। जैसे ही गरुड़ ने उस चक्र को देखा, उसने अपना आकार एक चींटी की भाती छोटा कर दिया और फिर वह तेज़ रफ़्तार से उड़कर, उन धारदार आरों के बीच से उस कमरे के द्वार तक पहुँच गया।

द्वार से अंदर प्रवेश करते ही उसे अमृत का घड़ा दिखाई दिया। वह घड़ा देखते ही गरुड़ के चेहरे पर ख़ुशियाँ छा गई, लेकिन उस घड़े को पाने के लिए उसे एक और मुसीबत से गुज़रना ज़रूरी था।

जैसे ही गरुड़ उस घड़े की ओर बढ़ा, दो विशालकाय विषैले साँपोंने उसपर हमला कर दिया। उन साँपों की आँखों से तो मानो अंगारे बरस रहे थे। वह केवल एक ही दृष्टिपात से किसी को भी भस्मसात करने की क्षमता रखते थे। उनकी विष से सराबोर जीव्हा अपने भक्ष्य के लिए लपलपा रही थी। लेकिन गरुड़ के पास इस मुसीबत का भी तोड़ था।

गरुड़ ने फिर अपने विशाल पंखों को ज़ोर-ज़ोर से फड़फड़ाना शुरू किया। इससे हवा में धूल के बादल छा गए। फिर गरुड़ ने पंखों से उन बादलों की दिशा ऐसी मोड़ दी कि वह सारी धूल उन विशालकाय विषैले साँपों के आँखों में चली गई। फिर कुछ पल के लिए साँपों ने अपनी आँखे बंद कर ली। बस उसी पलों में गरुड़ ने उन साँपों पर हमला कर दिया और अपने नुक़िले चोंच से साँपों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।

सभी बाधाओं को पराजित करने के बाद, गरुड़ अंत में अमृत के घड़े तक पहुँच गया। वह घड़ा देवताओं ने एक चबूतरे पर रखा हुआ था। गरुड़ ने बड़े ही गर्व से वह अमृत का घड़ा उठाया और फिर तीव्र गति से आकाश की और उड़ा। उसके चोंच के आघात से अमृत का घड़ा जहाँ रखा हुआ था, उस कमरे का छत तहस-नहस हो गया।

जब गरुड़ अमृत का घड़ा लेकर आकाश से गुज़र रहा था, तब अचानक ही उसके सामने भगवान विष्णु प्रकट हो गए। जैसे ही गरुड़ ने भगवान विष्णु को देखा, वैसे ही वह आकाश में रुक गया और उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

भगवान विष्णु गरुड़ के आत्म-संयम से प्रसन्न हो गए थे। साक्षात अमृत पास होने पर भी गरुड़ ने उसे पीने के बारे में सोचा भी नहीं था, इसलिए उन्होंने ख़ुद आकर गरुड़ को अपने दर्शन का लाभ दिया था।

फिर भगवान विष्णु ने गरुड़ से कहा, 'हे पराक्रमी गरुड़, तुम्हारे आत्म-संयम से मैं प्रसन्न हूँ। इस अमृत के घड़े के कारण इतने लड़ाई-झगड़े हो गए, लेकिन ऐसा अमृत तुम्हारे पास होने पर भी तुमने इसे छुआ तक नहीं। तुम्हारे संयम की तो सच में दाद देनी चाहिए। जो भी तुम्हारी इच्छा है, मुझसे माँग लो। मैं तुम्हें वरदान देना चाहता हूँ।'

तब गरुड़ ने कहा, 'हे भगवन, मेरी दो इच्छाएँ हैं। पहली इच्छा यह है कि मैं अमृत पीये बिना ही अमर होना चाहता हूँ और दूसरी यह कि मुझे हमेशा आपके स्थान से ऊपर वाला स्थान चाहिए।’

भगवान विष्णु ने कहा, ‘तथास्तु!’ और ऐसा कहके गरुड़ की दोनों इच्छाएँ भगवान विष्णु ने पूरी कर दी।

भगवान विष्णुने गरुड़ को अपने स्थान से ऊँचा स्थान देने के लिए, उसे अपने ध्वजस्तंभ पर विराजमान कर दिया।

जब गरुड़ की दोनों इच्छाएँ भगवान विष्णु मान गए, तब गरुड़ ने कहा, 'हे भगवान, मैं भी आपकी कोई इच्छा पूरी करना चाहता हूँ।’

गरुड़ की बात सुनकर, भगवान विष्णु ने कहा, ‘हे गरुड़, मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे वाहक बन जाओ।’

गरुड़ भगवान विष्णु की ये माँग सुनकर बहुत खुश हो गया। उसने भगवान की सेवा करने के लिए अपना जीवन अर्पण करने को तुरंत सहमती दे दी।

भगवान विष्णु से आशीर्वाद प्राप्त करके, गरुड़ ने अपनी यात्रा फिर से शुरू कर दी।

इसी बीच, जैसे ही इंद्र ने देखा कि गरुड़ अमृत का घड़ा लेकर उड़ रहा है, उसने गरुड़ का पीछा करना शुरू कर दिया था। इंद्र गरुड़ का सामर्थ्य देखकर बहुत प्रभावित हो गया था। गरुड़ को कैसे हराया जाये, इसका कोई उपाय उसे नहीं सूझ रहा था।

फिर इंद्र ने अमृत को वापस पाने के लिए एक अंतिम रास्ता अपनाने का सोचा। अपने विनाशकारी वज्र की तरफ देखते हुए उसने सोचा की गरुड़ वज्र के सामने कभी नहीं टिक पाएगा।

उसने अपना एक हाथ शरीर के दूर निकालते हुए वज्र का आवाहन किया। जैसे ही उसने वज्र का चिंतन किया, वज्र उसके हाथ में प्रकट हो गया। फिर उसने गरुड़ को लड़ाई के लिए आमंत्रित किया और अपना वज्र गरुड़ की ओर फेंक दिया।

वज्र ने गरुड़ के ऊपर प्रहार तो ज़रूर किया, लेकिन वज्र से गरुड़ को कोई भी नुकसान नहीं पहुँचा

तब, गरुड़ ने इंद्र को संबोधित किया, 'हे इंद्र, तुम्हें पता होना चाहिए कि वज्र का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। लेकिन तुम्हारे और दधीचि ऋषि (दधीचि ऋषि की हड्डियों का उपयोग वज्र को बनाने में हुआ था) के सम्मान के रूप में, मैं अपने एक पंख को त्याग रहा हूँ।'

ऐसा कहकर गरुड़ ने अपने एक पंख को निकालकर ज़मीन पर फेंक दिया। उस पंख ने आकाश से ज़मीन पर गिरते हुए, सभी दिशाओं में अपना प्रकाश फैला दिया। इससे गरुड़ का नाम ‘सुपर्ण’ पड़ गया।

गरुड़ की शक्ति देखकर अब इंद्र पूरी तरह अचंबित हो चुका था। उसे पता था कि गरुड़ शक्तिशाली है। लेकिन गरुड़ का सामर्थ्य इतना ज़्यादा होगा, ये इंद्र ने कभी नहीं सोचा था। गरुड़ ने इंद्र का अभिमान चकनाचुर कर दिया था और अब इंद्र समझ गया था कि गरुड़ से दुश्मनी करने में उसका कोई फ़ायदा नहीं है।

फिर बड़े आदर के साथ इंद्र ने गरुड़ से कहा, 'हे पराक्रमी गरुड़, मैं तुम्हारी प्रचंड शक्ति से आश्चर्यचकित हो गया हूँ। कृपया मुझे इस शक्ति की सीमा बताओ। ऐसे शक्तिशाली जीव के साथ शत्रुता करना मूर्खता है, इसलिए हमारी शत्रुता भुलकर, कृपया तुम मेरी मित्रता का स्वीकार करो।'

गरुड़ ने उत्तर दिया, 'हे इंद्र, मुझे तुम्हारी मित्रता स्वीकार है। बुद्धिमान लोगों के लिए अपने शक्तियों की प्रशंसा करना उचित नहीं है, लेकिन अब हम दोस्त बन गए हैं, तो मैं अपनी शक्तियों की सीमा तुम्हें बताऊँगा। मुझमें इतना सामर्थ्य भरा हुआ है कि मैं बिना थके हुए, अनिश्चित काल तक, तीनों लोकों का पालनपोषण कर सकता हूँ।'

गरुड़ की अथाह और अनंत शक्ति के बारे सुनकर, गरुड़ के प्रति इंद्र का आदर और भी बढ़ गया।

तब इंद्र ने गरुड़ से विनयपूर्वक निवेदन किया, 'हे पराक्रमी गरुड़, अब हम मित्र बन गये हैं, तो में तुम्हें एक विनती कर रहा हूँ। वह अमृत का घड़ा मुझे वापस दे दो। अगर ये अमृत किसी अयोग्य व्यक्ति के हाथ लग गया, तो वह अमर हो जाएगा और दुनिया के लिए एक बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा।'

इंद्र की चिंता सुनकर, गरुड़ ने उसे उत्तर दिया, 'हे इंद्र, मैं किसी के उपभोग के लिए ये अमृत नहीं चुरा रहा हूँ। मैं तो केवल अपने माँ को दास्यत्व के मुक्त करने के लिए इस अमृत को ले कर जा रहा हूँ। मेरी माँ, मेरे सर्प भाई और उनकी माँ, इनके दास्यत्व में फँसी है। मेरे सर्प भाइयों ने मुझे वचन दिया है कि अगर मैं उनको ये अमृत दे दूँगा, तो वे मेरी माँ को अपनी दास्यता से मुक्त कर देंगे। लेकिन मैं तुम्हारी चिंता समझता हूँ। अगर साँपों को भी अमृत पीने के लिए मिलता हैं, तो उनकी अमरता अन्य जानवरों के लिए खतरनाक हो सकती है। लेकिन तुम परेशान मत होना। मैंने इस समस्या का तोड़ सोच लिया है। मैंने साँपों से केवल यह वादा किया था कि मैं उन्हें अमृत का घड़ा लाकर दे दूँगा। इसलिए, जैसे ही मैं उन्हें यह घड़ा दे दूँगा, मैं अपना वचन पूरा कर दूँगा। साँपों को घड़ा देकर, में उनसे अपनी माँ को मुक्त करने के लिए बोल दूँगा। जैसे ही वे मेरी माँ को मुक्त कर देंगे, तुम इस घड़े को वहाँ से चुरा कर चले जाना। इस तरह, मैं अपनी माँ को गुलामी से मुक्त कर दूँगा और तुम अमृत को गलत हाथों में गिरने से बचा लोगे।'

गरुड़ की योजना से, इंद्र बहुत प्रसन्न हुआ और इंद्र ने उसे एक वरदान देने की इच्छा व्यक्त की।

गरुड़ ने कहा, 'साँपों को मेरा भोजन बनने दो।'

इंद्र ने इसपर अपनी सहमति जताई और इस प्रकार से साँप गरुड़ का भोजन बन गए।

गरुड़ ने फिर अपने सर्प भाइयों के पास उड़ान भरी और दर्भ की घास पर अमृत का घड़ा रख दिया।

इसके बाद, वह साँपों के पास गया और उसने बड़ी खुशी में साँपों से कहा, 'मैं अपने वचन के अनुसार अमृत लेकर आया हूँ। तुम सब नहा-धोकर इसे शांति से पी सकते हो। अब मैंने अपना वादा पूरा किया है, तो मेरी माँ को इसी समय अपनी गुलामी से मुक्त कर दो।’

गरुड़ की बात सुनकर साँपों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। साँपों ने कहा, 'ठीक है। हम ऐलान करते हैं कि विनता को हमने अपनी गुलामी से मुक्त कर दिया है।'

इस तरह, गरुड़ ने विनता को गुलामी से मुक्त कर दिया।

फिर, साँप नहाने के लिए चले गए। उन्होंने सोचा कि नहाकर शुद्धि करके अमृत पिया जाए। जैसे ही सारे साँप नहाने के लिए चले गए, इंद्र अपना वेश बदलकर उनके घर में घुस गया और दर्भ घास पर रखा अमृत का घड़ा चुराकर वह वहाँ से भाग गया।

नहाने के बाद, साँप बड़े उत्साह के साथ वापस आए, लेकिन अमृत का घड़ा उन्हें कहीं नहीं मिला।

अमृत के ऐसे खो जाने पर, सारे साँप चौंक गए और हताशा में, जिस जगह पर अमृत को रखा गया था, उस जगह को चाटने लगे। उस जगह पर दर्भ घास रखी हुई थी। दर्भ घास की तेज़ धार के कारण उनकी जीभ दो भागों में विभाजित हो गई।

तब से, साँपों की जीभ दुभाजीत अवस्था में हैं और अमृत के संपर्क में आने के कारण दर्भ घास पवित्र हो गया है।

अपनी माँ को ग़ुलामी से मुक्त करने के बाद, गरुड़ प्रसन्नतापूर्वक उसके साथ जंगल में रहने लगा और अपने भोजन के लिए साँपों का भक्षण करके, उसको आनंदीत करने लगा।