सर्प-मेध यज्ञ की कथा (महाभारत की अनसुनी कहानियाँ -6)

 


एक दिन, राजा जनमेजय अपने मंत्रियों के साथ दरबार में बैठा था। अचानक, राजा जनमेजय को अपने पिता परीक्षित की याद आ गई। अपने पिता के अकस्मात् मृत्यु के बारे में सोचकर, वह शोककुल हो गया। फिर उसने अपने मंत्रियों से अपने पिता की मृत्यु कैसे हो गई, यह पूछा।

फिर मंत्रियों ने राजा जनमेजय को परीक्षित की मृत्यु के बारे में बताना शुरू कर दिया। परीक्षित ने शमीक ऋषि का अपमान कैसे किया और फिर श्रृंगी ने परीक्षित को कैसे शाप दिया, इसके बारे में बड़े विस्तार से मंत्रियों ने राजा जनमेजय को बताया। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को सुनाने के बाद, मंत्रियों ने बताया कि कैसे तक्षक ने राजा परीक्षित को अपने घातक दंश से मार दिया। फिर मंत्रियों ने राजा जनमेजय से कहा कि इस प्रकार से परीक्षित की मृत्यु के लिए तक्षक ही ज़िम्मेदार है, लेकिन अभी तक तक्षक को इस घोर अपराध का दंड नहीं मिला है।

फिर राजा जनमेजय ने अपने मंत्रियों से कहा, ‘यह बात सच है कि मेरे पिता की मौत तक्षक के काटने से हुई थी, लेकिन इसके लिए में तक्षक को पूरी तरह से ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकता। मेरे पिता के मृत्यु का कारण उन्हें दिया गया शाप भी है। इसके कारण, तक्षक को दंड देना उचित नहीं है।’

लेकिन फिर मंत्रियों ने राजा जनमेजय से कहा, ‘महाराज, तक्षक ने ना केवल राजा परीक्षित को दंश किया, उसने तो कश्यप ऋषि को भी राजा परीक्षित को बचाने नहीं दिया। हम आपको अभी एक कथा सुनाते है, जिससे आपको पता चलेगा कि तक्षक ही राजा परीक्षित के मृत्यु का कारण है।’

ऐसा कहकर मंत्रियों ने राजा जनमेजय को कथा सुनाना शुरू कर दीया। उन्होंने कहा, ‘जब कश्यप ऋषि ने राजा परीक्षित को दिए गए शाप के बारे में सुना, तो वह राजा परीक्षित को बचाने के लिए निकल पड़े। रास्ते में चलते चलते, वह एक जंगल से गुज़र रहे थे, तब तक्षक अचानक उनके सामने प्रकट हो गया और उन्हें उसने वापस जाने के लिए कहा। लेकिन कश्यप ऋषि ने वापस जाने के लिए मना कर दिया, तो उसने कश्यप ऋषि को अपने शक्ति का प्रदर्शन दिखाने की चुनौती दे दी। फिर तक्षक ने एक पेड़ को दंश करके, उस पेड़ को अपने घातक विष से जला दिया। लेकिन कश्यप ऋषि ने अपनी विद्याद्वारा उस पेड़ का फिर से निर्माण करके, तक्षक के विष का प्रभाव उतार दिया। अपने विद्या का प्रताप दिखाने के बाद तो, तक्षक कश्यप ऋषि को मनाने में लग गया कि क्यों उन्हें परीक्षित को बचाने नहीं जाना चाहिए। अंत में, बड़ा धन देकर तक्षक ने कश्यप ऋषि को उस वन से उनके आश्रम वापस भेज दिया और इस प्रकार, तक्षक ने कश्यप ऋषि को राजा परीक्षित को बचाने नहीं दिया।’

अपने मंत्रियों की कथा सुनकर, राजा जनमेजय के मन में अब तक्षक के प्रति क्रोध उत्पन्न हो रहा था। फिर उसने अपने मंत्रियों से एक और बात पूछी, ‘लेकिन बीच जंगल में घटित इस घटना के बारे में आपको कैसे पता चला?’

तो मंत्रियों ने कहा, ‘महाराज, जब तक्षक कश्यप ऋषि से जंगल में मिला था, तब वहाँ पर एक दूसरा मनुष्य भी था, जो जंगल में लकड़ियाँ इकट्ठा करने गया था। जब उस मनुष्य ने जंगल में तक्षक को देखा, तो वह डर के मारे एक पेड़ पर चढ़कर छिप गया। फिर तक्षक ने कश्यप ऋषि को चुनौती देकर, उसी पेड़ को दंश किया जिसपर वह मनुष्य छिप गया था। तक्षक के ज़हर के कारण, पेड़ के साथ, वह मनुष्य भी जलकर राख हो गया। बाद में, कश्यप ऋषि ने अपनी विद्या का उपयोग करते हुए, पेड़ के साथ-साथ उस मनुष्य को भी चमत्कारिक रूप से पुनर्जीवित किया। उसके बाद, उस मनुष्य ने देखा कि तक्षक ने बहुत सारा धन देकर कश्यप ऋषि को उनके आश्रम वापस भेज दिया है। इस प्रकार, तक्षक ने अपने पूरी शक्ति का ज़ोर लगाते हुए कश्यप ऋषि को राजा परीक्षित को बचाने से परावृत्त कर दिया। यह देखकर वह मनुष्य दु:खी हो गया। कुछ दिन बाद, उस मनुष्य ने राजधानी का दौरा किया और हमें जंगल में घटित इस घटना को विस्तार पूर्वक बताया।’

जब राजा जनमेजय ने यह घटना सुनी तो वह दुखी हो गया और अपने पिता की याद में उसके आँखों से अश्रुओं की धाराएँ बहाने लग गई। उसे अब भरोसा हो गया कि तक्षक ने ही अपने पिता की हत्या कर दी है।

कुछ समय के बाद, राजा जनमेजय का दुःख क्रोध में परिवर्तित हो गया। उसने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने की कसम खा ली। फिर उसने अपने मंत्रियों से कहा, ‘में तक्षक को इस अपराध का दंड अवश्य दूँगा। में अपने पिता की मृत्यु का बदला अवश्य लूँगा। में सर्प-मेध यज्ञ का आयोजन करके न केवल तक्षक को मार डालूँगा, बल्कि दुनिया के सभी साँपों को सर्प-मेध यज्ञ की आग में जलाकर नष्ट कर दूँगा। तुम सभी लोग सर्प-मेध यज्ञ के समारोह की तैयारी शुरू कर देना। में जल्दी से जल्दी इस यज्ञ को सम्पन्न होते हुए देखना चाहता हूँ।’

ऐसा कहकर, राजा जनमेजय ने अपने मंत्रियों को सर्प-मेध यज्ञ की तयारी करने के आदेश दे दिए।

फिर मंत्रियों ने सर्प-मेध यज्ञ की तैयारी बड़ी ज़ोरों-शोरों से शुरू कर दी। उन्होंने सबसे पहले भूमि का एक टुकड़ा सर्प-मेध यज्ञ के लिए चुन लिया। फिर उन्होंने यज्ञ के लिए सभी आवश्यक सामग्री खरीद ली और कई ज्ञानी ब्राह्मणों को सर्प-मेध यज्ञ के लिए आमंत्रित कर दिया। इसके बाद, बड़े-बड़े वास्तुकारों ने उस चुनी हुई जगह पर, सर्प-मेध यज्ञ के मंच का निर्माण शुरू किया।

एक दिन, यज्ञ के मंच का निर्माण करने वाले एक वास्तुकार ने अचानक एक अनुचित घोषणा कर दी। उसने कहा, 'मुझे लग रहा है कि सर्प-मेध यज्ञ का समारोह पूर्णत्व को प्राप्त नहीं होगा। इस भूमि का उद्घाटन करने के लिए जो समय चुना गया था, वह इस समारोह के अपूर्णता का संकेत देता है। मुझे यह भी लग रहा है कि एक तपस्वी इस महान यज्ञ में विघ्न का कारण बनेगा।’

वास्तुकार ने की हुई घोषणा ने राजा जनमेजय को चिंतित कर दिया। फिर उसने अपने सैनिकों को निर्देश देते हुए कहा कि यज्ञ के दिन उसके अनुमति के बिना किसी को भी यज्ञ के स्थान में प्रवेश नहीं करने दें।

यज्ञ के निर्धारित दिन पर, ब्राह्मणों ने काले कपड़े पहन कर यज्ञ के लिए खुद को तैयार कर दिया। फिर वह यज्ञ के चारों ओर बैठ गए और उन्होंने मंत्रों का जाप शुरू कर दिया। जैसे ही मंत्रों का उद्घोष शुरू हुआ, मंत्रों के शक्तियों ने मानों पूरे ब्रह्मांड में अपने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया। सारे साँप डर के मारे काँपने लग गए। ब्राह्मणों ने जैसे-जैसे मंत्रों के साथ साँपों के नाम पुकारे, वैसे-वैसे कोई अज्ञात शक्ति उन साँपों को खिंचकर सर्प-मेध यज्ञ में गिराने लगे। कुछ ही समय में, सभी आकार के, जहरीले और बिना-ज़हर वाले, युवा और बूढ़े, अलग-अलग रंग वाले, सैकड़ों साँप यज्ञ की आग में गिरने लगे। जैसे-जैसे साँप यज्ञ में गिरने लगे, वह मदद के लिए एक-दूसरे को पुकारने लगे। लेकिन यज्ञ की आग और मंत्रों की शक्ति के कारण, उनका एक दूसरे को मदद करना असम्भव था। साँपों के जले हुए शरीर की बदबू पूरी हवा में फैल चुकी थी। यज्ञ के मंच पर साँपों के शरीर की पिघली हुई चर्बी बहने लगी थी।

इस बीच, जैसे ही तक्षक ने देखा कि राजा जनमेजय ने सर्प-मेध यज्ञ शुरू किया है, वह ख़ुद की जान बचाने के लिए स्वर्ग में भाग गया और इंद्र के सामने अपनी जान बचाने की प्रार्थना की। इंद्र ने कहा, 'मैंने तुम्हारे बारे में पहले ही ब्रह्माजी से बात की है। उन्होंने मुझे आश्वासन दिया है कि तुम्हें सर्प-मेध यज्ञ के विनाश से कोई हानि नहीं पहुँचेगी। इसलिए, तुम आराम से स्वर्ग में रह लेना।’

इंद्र की बातें सुनकर, तक्षक का अशांत मन शांत हो गया और उसने स्वर्ग में रहना शुरू कर दिया।

इधर, सर्प-मेध यज्ञ साँपों की प्रजाति पर अपना क़हर ढाये जा रहा था। अगणित साँप सर्प-मेध यज्ञ में गिरकर, अपनी जान से हाथ धो चुके थे। जब वासुकी ने यह हानि होते हुए देखा, तो उसका हृदय काँप उठा। उसने देखा कि उसके परिवार के कई सदस्य सर्प-मेध यज्ञ में गिरकर जिंदा जलाए जा रहे थे। फिर उसे ब्रह्माजी ने बतायी हुई बात याद आ गई कि उसके बहन का पुत्र, आस्तिक, सर्प-मेध यज्ञ से साँपों की प्रजाति को बचाएगा।

तब वासुकी अपनी बहन के पास गया और उसने उससे विनती करते हुए कहा, 'बहन, राजा जनमेजय के सर्प-मेध यज्ञ ने हमारे पूरे जाति को ख़तरे में डाल दिया है। यह महाविनाशक यज्ञ रोकने के लिए राजा जनमेजय के पास अपने पुत्र, आस्तिक, को भेज दो। ब्रह्माजी के वचनों के अनुसार आस्तिक ही हमारा तारणहार है।‘

वासुकी की बहन ने तुरंत अपने बेटे आस्तिक को बुलाया और उससे कहा, 'मेरे बेटे, वह समय आ गया है, जब तुम्हें अपने जीवन के उद्देश्य पूरा करना है। तुम राजा जनमेजय के पास जाओ और इस महाविनाशक सर्प-मेध यज्ञ का अंत करो।'

आस्तिक ने अपने माँ से कहा, 'माँ, कृपया मुझे सर्प-मेध यज्ञ की कहानी विस्तार से बताना, ताकि इस सर्प-मेध यज्ञ को में रोकने में कामयाब हो सकूँ।’

पहले, वासुकी की बहन ने आस्तिक को कद्रू के शाप के बारे में बताया। इसके बाद, उसने आस्तिक को जरत्कारु ऋषि के साथ हुए अपने विवाह के बारे में और आस्तिक के जन्म के बारे में विस्तार से बताया।

पूरी कहानी सुनने के बाद, आस्तिक ने वासुकी को और अपनी माँ को आश्वस्त स्वर में कहा, 'मैं राजा जनमेजय के पास जाऊँगा और यज्ञ को रोककर वापस आऊँगा। अब आप चिंता मत करो।'

ऐसा आश्वासन देकर, आस्तिक सर्प-मेध यज्ञ के स्थल पर पहुँच गया। लेकिन राजा जनमेजय के निर्देश के अनुसार उसे अंदर जाने के लिए सैनिकों ने मना कर दिया। लेकिन आस्तिक भी इतने जल्दी हार मानने वालों में से नहीं था। वह सर्प-मेध यज्ञ के द्वार पर डट कर खड़ा हो गया और उसने द्वारपालों की स्तुति करना शुरू कर दिया। कुछ देर में, द्वारपाल आस्तिक की स्तुति सुनकर खुश हो गए और उन्होंने उसे पूछा, ‘हे तपस्वी, तुम्हें क्या चाहिए?’ तब आस्तिक ने उनसे विनती की कि उसे सर्प-मेध यज्ञ के स्थल पर जाने की इच्छा है। फिर द्वारपालों ने आस्तिक को सर्प-मेध यज्ञ के स्थल पर प्रवेश दे दिया।

सर्प-मेध यज्ञ के स्थान पर प्रवेश करने के बाद, आस्तिक ने राजा जनमेजय और अन्य ब्राह्मणों की प्रशंसा करना शुरू कर दिया।

आस्तिक ने राजा जनमेजय से कहा, 'हे आदरणीय राजा, आपके द्वारा हो रहे सर्प-मेध यज्ञ की तैयारी वास्तव में शानदार है। इसका नेतृत्व ऐसे अनेक आदरणीय ब्राह्मण कर रहे हैं, जिनकी तपस्या सूर्य की तरह चमक रही हैं। यह सर्प-मेध यज्ञ, वास्तव में, इंद्र द्वारा किए गए दस हजार यज्ञों के बराबर है।'

राजा जनमेजय और ब्राह्मण आस्तिक की प्रशंसा से बहुत प्रसन्न हुए। राजा जनमेजय ने तब अन्य ब्राह्मणों से आस्तिक को एक वरदान देने की अनुमति माँगी। लेकिन ब्राह्मणों ने राजा जनमेजय से कहा कि तक्षक के बली के बाद ही आस्तिक को वरदान दिया जाए।

फिर राजा जनमेजय ने ब्राह्मणों को जल्दी से जल्दी तक्षक यज्ञ में डालने के लिए कहा। फिर ब्राह्मणों ने मंत्रों के साथ तक्षक के नाम का उच्चारण किया, लेकिन वह आकाश में दिखाई नहीं दिया। तक्षक आकाश में ना प्रकट होने पर सारे ब्राह्मण चकित हो गए। फिर उन्होंने ध्यान किया और तक्षक कहा छिप कर बैठा है, इसके बारे में पता किया। अपने तपस्वी शक्तियों के द्वारा वह समझ गए कि तक्षक स्वर्ग में इंद्र की दया से छिपा हुआ है। यह बात ब्राह्मणों ने राजा जनमेजय को बताई। तो राजा जनमेजय ने ब्राह्मणों को बोला कि वह अपने सबसे शक्तिशाली मंत्रों का प्रयोग करे, ताकि तक्षक स्वर्ग से खिंचकर यज्ञ में गिर जाए।

ठीक उसी समय, इंद्र ने स्वर्ग में ऐलान किया कि वह ख़ुद राजा जनमेजय का सर्प-मेध यज्ञ देखने जाएगा। फिर उसने अपने साथ बाक़ी देवताओं को भी निमंत्रित किया। वह सभी देवता, इंद्र के साथ दैवी रख में सर्प-मेध यज्ञ के ठीक ऊपर आकाश में प्रकट हो गए। इंद्र के साथ सर्प-मेध यज्ञ देखने ख़ुद तक्षक भी आया था। उसने ख़ुद को इंद्र के कपड़ों के नीचे छिपा लिया था।

फिर राजा जनमेजय के निर्देशों के अनुसार ब्राह्मणों ने बहुत शक्तिशाली मंत्रों का उच्चारण करना शुरू कर दिया। लेकिन फिर भी तक्षक आकाश में नहीं प्रकट हो रहा था। एक बार फिर से, ब्राह्मणों ने ध्यान लगाया और तब उन्हें पता चला कि तक्षक इंद्र के कपड़ों के नीचे छिपा हुआ है। यह देखने के बाद, ब्राह्मणों ने यह बात राजा जनमेजय को बताई।

यह सुनकर राजा जनमेजय ने क्रोधित होते हुए ब्राह्मणों को आदेश दिया, 'उस पापी तक्षक को यज्ञ में गिरना ही होगा। अगर ज़रूरत पड़े, तो तक्षक सहित इंद्र को भी यज्ञ की आग में झोंक दो।'

फिर ब्राह्मणों ने मंत्रों का जाप बड़े आक्रामक तरीके से शुरू कर दिया। मंत्रों की शक्ति के कारण तक्षक के साथ-साथ इंद्र भी यज्ञ की अग्नि के ओर जोर से खींचा चला आया। यह देखकर इंद्र घबरा गया। उसने तक्षक को अपने कपड़ों से बाहर निकाला, उसे हवा में फेंक दिया और बाक़ी देवताओं के संग, वह सर्प-मेध यज्ञ के स्थल से गायब हो गया।

मंत्रों की शक्ति ने तक्षक को बेहोश कर दिया था। वह तेज़ गति से यज्ञ की तरफ खिंचा चला आ रहा था और कुछ ही पलों में वह यज्ञ में गिरने वाला था। उसको आसमान में देखकर सारे ब्राह्मण और राजा जनमेजय आनंदीत हो गए। फिर ब्राह्मणों ने राजा जनमेजय की तरफ़ देखकर कहा, 'हे राजा, तक्षक अब जल्द ही यज्ञ में गिरने वाला है। जैसे ही वह यज्ञ में गिर जाएगा, आपकी इच्छा पूरी हो जाएगी। अब आप अपने अतिथि को मनचाहा वरदान दे सकते हैं।'

फिर आनंदित होकर राजा जनमेजय ने आस्तिक की ओर रुख किया और उससे कहा, ‘हे तपस्वी, में तुम्हारी स्तुति से प्रसन्न हूँ। कृपा करके मुझे बताओ कि तुम्हारी क्या इच्छा है? मैं उसे तुरंत पूरी कर दूँगा।’

तब आस्तिक ने कहा, 'महाराज, मेरी यह इच्छा है कि इस यज्ञ को तुरंत रोका जाए और इसके बाद, साँपों को नुकसान नहीं पहुँचाया जाए।’

अस्तिक की माँग सुनकर, राजा जनमेजय बहुत परेशान हुए। उन्होंने कहा, 'हे तपस्वी, मैं तुम्हारी इच्छानुसार स्वर्ण, रजत और गायों की कितनी भी राशि दे सकता हूँ, लेकिन कृपया मुझे इस यज्ञ को जारी रखने दों।'

इसके बाद आस्तिक ने राजा को समझाने की कोशिश की, 'मैं साँपों का रिश्तेदार हूँ। मैंने अपनी माँ से वादा किया है कि मैं यज्ञ को रोक दूँगा, इसलिए यह एकमात्र वरदान है, जो मैं चाहता हूँ।'

लेकिन राजा जनमेजय अड़े रहा कि वह यज्ञ नहीं रोकेगा, क्योंकि अभी तक तक्षक का आग में गिरना बाकी था। कुछ समय पहले, तक्षक यज्ञ की तरफ़ बड़े ज़ोर से आया था, लेकिन जैसे ही वह यज्ञ के क़रीब आया, बड़े ही चमत्कारिक तरीक़े से, वह यज्ञ के थोड़े ऊपर आकाश में लटक गया। ब्राह्मणों ने सारे मंत्रों का ज़ोर लगा दिया, लेकिन तक्षक आकाश में ही लटका रहा। किसी समर्थ्यशाली शक्ति ने उसे आकाश में ही रोक के रखा था।

तक्षक को आकाश में लटकता हुआ देखकर राजा जनमेजय ने आस्तिक से दृढ़ता से कहा, 'मैं यज्ञ को रोक नहीं सकता। कृपया आप कुछ और वरदान माँग लीजिए।'

इस क्षण पर, जो ब्राह्मण यज्ञ को आगे बढ़ा रहे थे, उन्होंने राजा जनमेजय से कहा, ‘महाराज, आपने पहले ही इस आतिथि को उसकी इच्छा पूरी करने का वचन दे दिया है। आप इसकी इच्छा पूरी करने में देर मत कीजिए। कहीं ये क्षुब्ध हो गया, तो आपको शाप दे बैठेगा।’

ब्राह्मणों की बात सुनकर राजा जनमेजय कुछ क्षण सोच में चला गया। यह सच था की उसने आस्तिक को इच्छापूर्ति का वचन दिया था। अभी धर्म के अनुसार, अपने दिए हुए वचन का पालन करना उसको ज़रूरी था। लेकिन राजा जनमेजय यज्ञ को रोकना भी नहीं चाहता था, क्योंकि तक्षक किसी चमत्कार से अभी भी आकाश में लटका हुआ था।

लेकिन आख़िरकार, राजा जनमेजय ने आस्तिक की इच्छा पूरी करने के लिए अपनी सहमति दे दी और सर्प-मेध यज्ञ को रोकने का आदेश दे दिया।

जैसे ही राजा जनमेजय ने यज्ञ को रोका, पूरे साँपों में खुशी की लहर दौड़ गई। आस्तिक ने ना केवल साँपों को विनाश से बचाया, बल्कि उसने अपने तपस्वी शक्ति से तक्षक को भी मृत्यु से बचा लिया। तक्षक को इंद्र ने हवा में उड़ाने के बाद, आस्तिक ने अपनी तपस्वी शक्तियों का उपयोग करके तक्षक को आकाश में ही ठहरा दिया और इस प्रकार से, तक्षक यज्ञ के अग्नि में नहीं गिरा और उसकी जान बच गई।

आखिरकार, राजा जनमेजय ने अपने मन को शांत किया और आवश्यक अनुष्ठानों के साथ सर्प-मेध यज्ञ को समाप्त कर दिया। उसने यज्ञ के लिए आए हुए ब्राह्मणों को उचित धन देकर सम्मानित किया। उसने उस वास्तुकार को भी पुरस्कृत किया, जिसने यज्ञ के अपूर्णता की भविष्यवाणी की थी। अंत में, उसने आस्तिक को सम्मानित किया और उसे अपने अश्वमेध समारोह के लिए प्रमुख पुजारी बनने का अनुरोध किया। आस्तिक ने राजा जनमेजय के इस विनती को अपनी सहमती दर्शाई।

इसके बाद, आस्तिक अपनी माँ और वासुकी के पास लौट आ गया। जैसे ही वह अपने घर पहूँचा, अन्य साँप भी उसकी प्रशंसा में उसके चारों ओर इकट्ठा हो गए।

फिर आस्तिक ने उन्हें कथा सुनाई कि कैसे उसने सर्प-मेध यज्ञ को रोका और सारे साँपों की जान बचा ली। वह कहानी सुनकर सारे साँप प्रसन्न हो गए और उन्होंने आस्तिक को एक वरदान देने की इच्छा व्यक्त की। तब आस्तिक ने कहा, 'अगर तुम मुझे कोई वरदान देना चाहते हो, तो मेरी यह इच्छा है कि जो भी इंसान मेरी कथा आदरपूर्वक सुनेगा, कोई भी साँप उसे कभी भी नहीं काटेगा।' सभी साँपों ने आस्तिक के इस इच्छा को बड़े हर्ष के साथ सहमति दे दी।

फिर आस्तिक ने अपनी माँ का और वासुकी का आशीर्वाद लिया। उसके बाद, अपनी तपस्या फिर से शुरू करने के लिए, वह जंगल में चला गया।