ऋषि आयोद-धौम्य और उनके शिष्य (महाभारत की अनसुनी कहानियाँ -11)

 


जब राजा जनमेजय हस्तिनापुर पर शासन कर रहा था, तब उनके राज्य में अयोद-धौम्य नाम के एक ऋषि रहते थे। उनके तीन शिष्य थे, जिनका नाम था आरुणि, उपमन्यु और वेद।

एक दिन, धुँवादार बारिश हो रही थी और बारिश के कारण सारे नदी-नाले अपने चरम सीमा तक बह रहे थे।

जब आयोद-धौम्य ने ऐसी बारिश देखी, तो उन्हें थोड़ी चिन्ता हो रही थी कि कहीं नालों से बहता हुआ पानी मेड़ तोड़कर खेत में आ गया, तो सारी फ़सल को ख़राब कर देगा। तो आयोद-धौम्य ने अपने शिष्य आरुणि से कहा, 'आरुणि, देखो कितनी तेज़ बारिश हो रही है। तुम अभी खेत में जाओ और देखों की कहीं अपने खेत की मेड़ टूटी हुई तो नहीं है। अगर नालों में बहता हुआ पानी खेत में आ गया तो, हमारी सारी फ़सल ख़राब हो जाएगी। अगर तुम्हें दिखे कि मेड़ टूट चुकी है, तो उसे ठीक करके ही वापस आ जाना।'

अपने गुरु की आज्ञा मानकर, आरुणि खेत में चला गया। जब वह खेत में पहुँच गया, तब उसने देखा की मेड़ एक जगह टूट चुकी है और नालों का पानी बड़े ज़ोर के साथ अंदर आ रहा है। फिर आरुणि ने खेत की मिट्टी उठाकर मेड़ जहौं टूटी हुई थी, वहाँ लगाना शुरू किया। लेकिन बारिश की तेज़ी और पानी का प्रवाह, इसके कारण मिट्टी वहाँ रुक नहीं रही थी। अंत में जब मिट्टी मेड़ पर नहीं टिक पाई, तब आरुणि ने स्वयं को ही उस जगह लिटा दिया और पानी का प्रवाह अपने शरीर से रोक दिया।

कुछ समय में, सर्दी से आरुणि का शरीर अकड़ गया, लेकिन अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए, वह मेड़ पर डटे रहा और शरीर में पीड़ा होने पर भी आरुणि वहाँ से नहीं हिला।

उसी दिन शाम को, आयोद-धौम्य ने आरुणि को आश्रम में अनुपस्थित पाया। फिर उन्होंने दूसरे शिष्यों से आरुणि के बारे में पूछताछ की।

एक शिष्य ने कहा, 'आरुणि खेत में मेड़ ठीक है या नहीं, वह देखने गया था। वह अभी तक नहीं लौटा है।’

उस शिष्य की बात सुनकर, आयोद-धौम्य कुछ शिष्यों के साथ खेत में आरुणि को ढूँढने निकल पड़े।

खेत में पहुँचने पर, आयोद-धौम्य ने आरुणि को पुकारा, ‘आरुणि, तुम कहाँ हो? इधर आओ मेरे बच्चे।'

जब आरुणि ने अपने गुरुदेव की आवाज़ सुनी, तो वह खड़ा हो गया और भागते-भागते अपने गुरु के पास आ गया। आयोद-धौम्य ने देखा कि आरुणि का पूरा शरीर गीला हो गया था, वह ठंडी से काँप रहा था और उसके कपड़ों पर कीचड़ लगा हुआ था। आरुणि की ऐसी दयनीय हालत देखकर आयोद-धौम्य का हृदय द्रवित हो गया।

उन्होंने आरुणि से कहा, ‘आरुणि, तुम खेत में अभी तक क्या कर रहे थे? और तुम्हारी ऐसी हालत कैसे हो गई?’

आरुणि ने अपने गुरु को प्रणाम करते हुए कहा, ‘गुरुदेव, जब मैं खेत में आया, तो मुझे दिखाई दिया कि बारिश का पानी मेड़ को तोड़कर खेत में आ रहा था। जहाँ पर मेड़ टूटी हुई थी, वहाँ मैंने मिट्टी लगाने की कोशिश की, लेकिन मिट्टी पानी के वेग के कारण वहाँ टिक नहीं रही थी। फिर मैंने पानी को रोकने के लिए, ख़ुद को मेड़ पर लिटा दिया। अभी आपका आवाज़ सुनने के बाद, में उठकर यहाँ चला आया, लेकिन अभी फिर से मेड़ से पानी अंदर आ रहा है। कृपया मुझे बताएँ कि अब मुझे क्या करना चाहिए।'

आयोद-धौम्य ने देखा कि आरुणि ने व्यक्तिगत असुविधा उठाकर भी उनके आदेश को अंजाम दिया था। यह देखकर आयोद-धौम्य प्रसन्न हो गए। गुरु के प्रति आरुणि का समर्पण देखकर, उन्होंने आरुणि को अपना आशीर्वाद देते हुए कहा, 'आरुणि, गुरुआज्ञा के प्रति तुम्हारी निष्ठा सच में सराहनीय है। अभी तुमने मेड़ से उठकर पानी के प्रवाह को फिर से खोल दिया है, इसलिए आज से लोग तुम्हें ‘उद्दालक’ इस नाम से जानेंगे। तुमने मेरे आदेश का पालन करने के लिए जो कटिबद्धता दिखाई, उसके लिए मैं प्रसन्न हूँ। में तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि वेदों का सारा ज्ञान तुम्हारे हृदय में प्रकट हो जाएगा।’

फिर आरुणि को आशीर्वाद देकर, आयोद-धौम्य ने अपने सारे शिष्यों से साथ मेड़ को ठीक किया जिससे पानी का प्रवाह खेत में जाना बंद हो गया।

अपने गुरु से आशीर्वाद प्राप्त होने के बाद, आरुणि ने उनसे घरेलू जीवन में प्रवेश करने की अनुमति ली और वह गुरु के आश्रम से अपने घर लौटकर आ गया।

आयोद-धौम्य का और एक शिष्य था, जिनका नाम था उपमन्यु।

उपमन्यु आश्रम में गायों को चराने की और दिनभर उनकी देखभाल करने की सेवा करता था। वह सुबह जल्दी उठकर गायों को लेकर खेत ले जाता और फिर शाम होने पर लौट कर आ जाता था।

एक दिन, जब उपमन्यु गायों को लेकर शाम को आश्रम लौट आया, तो आयोद-धौम्य ने उसे बुलाया और कहा, 'उपमन्यु, तुम दिनभर गायों की देखभाल करते हो। तो खेत में क्या खाते हो?'

फिर उपमन्यु ने अपने गुरु को जवाब दिया, 'गुरुदेव, मैं अपने भोजन के लिए भिक्षा इकट्ठि करता हूँ। भिक्षा में मुझे जो मिल जाता है, वह में भोजन में खा लेता हूँ।'

उपमन्यु की बात सुनकर, आयोद-धौम्य नाराज़ हो गए। उन्होंने उपमन्यु से कहा, 'उपमन्यु, भिक्षा को माँगने के बाद, उसे ख़ुद खाकर तुम अपने गुरु के प्रति उचित सम्मान नहीं दिखा रहे हो। जब कोई शिष्य भिक्षा माँगे, तो उसे पहले वह भिक्षा अपने गुरु को अर्पण करनी चाहिए। अगर गुरुदेव उस भिक्षा से कुछ हिस्सा वापस दे, तो केवल वही हिस्सा प्रसाद समझकर खा लेना चाहिये। कल से, तुम जो भी भिक्षा लेकर आओगे, सबसे पहले वह भिक्षा मुझे अर्पण करोगे। उसके बाद, में जो हिस्सा तुम्हें दूँगा, बस वही हिस्सा तुम खा सकते हो।’

उपमन्यु आयोद-धौम्य ने बताई हुई बात पर सहमत हो गया।

अगली सुबह, उपमन्यु उठकर भिक्षा एकत्रित करने चला गया। भिक्षा लाने के बाद, उसने आयोद-धौम्य के निर्देश के अनुसार अपनी सारी भिक्षा आयोद-धौम्य को अर्पण कर दी। हालाँकि, आयोद-धौम्य ने उसे उसके भोजन के लिए कुछ भी वापस नहीं दिया। भोजन के लिए कुछ ना मिलने पर, उपमन्यु चकित हो गया, लेकिन अपने गुरु को कुछ ना बोलते हुए, वह गायों को लेकर खेत में चला गया।

शाम को, जब उपमन्यु आश्रम वापस लौट के आया, तो आयोद-धौम्य को लगा कि जैसे उपमन्यु ने भरपेट खाना खाया हो।

तब आयोद-धौम्य ने उपमन्यु को बुलाया और उससे पूछा, 'उपमन्यु, सुबह में, मैंने तुम्हारे भिक्षा से तुम्हें कुछ भी वापस नहीं दिया, लेकिन फिर भी ऐसा लग रहा है, जैसे तुमने पेट भरके खाना खाया हो। अभी तुम क्या खाके अपना पेट भर रहे हो?’

तो उपमन्यु ने कहा, 'गुरुदेव, जब आपने मेरी भिक्षा से कुछ वापस नहीं दिया, तो भूख लगने पर, में दूसरी बार भिक्षा माँगने चला गया। मैंने अपनी दूसरी यात्रा में जो भिक्षा प्राप्त कीं, वही खाके मैंने अपना पेट भरा है।’

उपमन्यु का उत्तर सुनकर आयोद-धौम्य नाराज हो गए। उन्होंने उपमन्यु को डाँटते हुए कहा, 'उपमन्यु, यह गुरु की आज्ञापालन का उचित तरीका नहीं है। तुमने जो किया, वह एक लालची कार्य है। यदि तुम दूसरी बार भिक्षा माँगने जाओगे, तो अन्य जरूरतमंद लोगों को कम भिक्षा मिलेगी, इसलिए तुम कल से दूसरी बार भिक्षा माँगने के लिए मत जाना।’

उपमन्यु ने अपने गुरु के दिए हुए निर्देश को स्वीकृति दे दी।

अगले दिन, जब उपमन्यु गायों को चराके खेत से लौटा, तो वह अपने गुरु के दर्शन करने चला गया। तब आयोद-धौम्य ने देखा कि उपमन्यु के चेहरे पर भूख के कोई निशान नहीं है। तो उन्होंने उपमन्यु से पूछताछ की, 'उपमन्यु, मैंने सुबह तुम्हारी पूरी भिक्षा ले ली और तुम्हें दूसरी बार भिक्षा माँगने से भी मना कर दिया, लेकिन ऐसा लग रहा है कि तुम अभी भी भूखे नहीं हो। अब तुम क्या खा रहे हो?’

उपमन्यु ने कहा, "मैं अभी गायों का दूध पी रहा हूँ।’

तब आयोद-धौम्य ने उपमन्यु से कहा, 'मेरी आज्ञा के बिना तुम्हारा गाय का दूध पीना अनुचित है, इसलिए में तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि आज से तुम गाय का दूध नहीं पीओगे।'

उपमन्यु ने आयोद-धौम्य की बात पर अपनी सहमती दे दी।

अगली शाम, जब उपमन्यु खेत से वापस आया, तब आयोद-धौम्य ने देखा कि उपमन्यु अभी भी बहुत स्वस्थ है। फिर उन्होंने उपमन्यु से पूछा, 'उपमन्यु, अब तुम क्या खाकर अपना गुज़ारा कर रहे हो?’

तब उपमन्यु ने कहा, 'गुरुदेव, जब बछड़े गायों का दूध पीते हैं, तो वे झाग पैदा करते हैं। मैं उस झाग को खाता हूँ और अपना पेट भरता हूँ।’

तब आयोद-धौम्य ने उपमन्यु से कहा, 'उपमन्यु, वह बछड़े दयालु हैं। वह देखते हैं कि तुम दिनभर भूखे हो, इसलिए वह अधिक झाग पैदा करते हैं ताकि तुम उसे खा सको। इस वजह से उनका पूर्ण पोषण नहीं हो पा रहा हैं, इसलिए मैं तुम्हें दूध का झाग खाने से भी मना करता हूँ।'

उपमन्यु ने आयोद-धौम्य के निर्देश पर अपनी सहमती जता दी।

अगले दिन, वह गायों के साथ खेत में गया। अब सुबह उसने भिक्षा तो इकट्ठा की थी लेकिन आदेश के अनुसार उसने अपनी सारी भिक्षा अपने गुरु को समर्पित कर दी थी। उसके बाद, आयोद-धौम्य ने उसके खाने के लिए उसे भिक्षा नहीं लौटायी थी। अब वह ना ही दूध पी सकता था, ना ही दूध का झाग खा सकता था। शाम होते-होते उपमन्यु को ज़ोर की भूख लग गई और वह भूख से तड़पने लगा।

अत्यंत भूखा होने के कारण, उसने पेड़ पर लगे फलों को खाने का सोच लिया, लेकिन खेत में उसे कोई फल का पेड़ नहीं मिला। फिर उसने सोचा कि फल नहीं तो पेड़ के पत्ते खाकर ही अपनी भूख मिटा लेते है। ऐसा सोचकर, उसने एक पेड़ के पत्ते खा लिए। लेकिन वह पेड़ जहरीला निकल गया। पत्तों में जो ज़हर था, उस ज़हर के कारण उसकी दृष्टि चली गई और वह अंधा हो गया। भूख से क्षुब्ध उपमन्यु ने अब अपनी आँखें भी खो दी थी। फिर उसने आश्रम जाने के लिए रास्ता खोज निकालने की कोशिश की, लेकिन दुर्भाग्य से वह एक अंधेरे कुएँ में गिर गया।

इधर जब शाम को उपमन्यु खेत से नहीं लौटा, तो आयोद-धौम्य ने उपमन्यु के बारे में पूछताछ की। लेकिन किसी को उपमन्यु के बारे में कोई ख़बर नहीं थी। तो आयोद-धौम्य ने अपने दूसरे शिष्यों को अपने साथ ले लिया और उनके साथ, वह उपमन्यु को ढूँढने खेत में निकल पड़े।

खेत में पहुँचते ही, आयोद-धौम्य ने पुकारा, 'उपमन्यु, तुम कहाँ हो?'

जब उपमन्यु ने अपने गुरुदेव की आवाज़ सुनी, तो उसने कुएँ से उत्तर दिया, 'गुरुदेव, मैं इस कुएँ के तल में हूँ।'

उपमन्यु की आवाज़ सुनकर, सब आयोद-धौम्य के साथ कुएँ के पास पहुँच गए। आयोद-धौम्य ने उपमन्यु से पूछा कि वह कुएँ के तल में कैसे जा गिरा? फिर उपमन्यु ने अपने गुरु को पूरी कथा सुना दी। उपमन्यु की कहानी सुनकर आयोद-धौम्य ने उसे धीरज बँधाया और कहा, ‘उपमन्यु, तुम अश्विनी कुमारों की प्रार्थना करना। वह देवताओं के वैद्य हैं। वह आकर तुम्हारी ज़रूर मदत करेंगे।’ ऐसा कहकर आयोद-धौम्य अपने बाक़ी शिष्यों के साथ आश्रम लौट कर आ गए।

जैसे गुरु ने निर्देश दिया था, वैसे उपमन्यु ने ऋग्वेद के मंत्रों को गाकर अश्विनी कुमारों की प्रार्थना करना शुरू कर दिया। कुछ ही समय में, अश्विनी कुमार उपमन्यु के सामने प्रकट हो गए और उसे पूछा की उसे क्या मदद चाहिए। तब व्यथित उपमन्यु ने उन्हें कहा कि उसकी दृष्टि खो गई है और वह अपनी आँखों को ठीक करना चाहता हैं। तो अश्विनी कुमारों ने कहा, 'उपमन्यु, हम तुम्हारे द्वारा गाए हुए मंत्रों से प्रसन्न हैं। हम तुम्हें एक दैवी औषधि देंगे। तुम इसे खा लो। इससे तुम्हारी आँखों की रोशनी फिर से वापस आ जाएगी।’ ऐसा कहकर, अश्विनी कुमारों ने उपमन्यु को एक दैवी औषधि प्रदान की।

लेकिन उपमन्यु ने उस दैवी औषधि को खाने से मना कर दिया। उसने अश्विनी कुमारोंसे कहा, ‘ वंदनिय अश्विनियों, मुझे दैवी औषधि देने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद हैं, लेकिन मैं इसे अपने गुरु को अर्पित किए बिना नहीं खा सकता।’

उपमन्यु की बात सुनकर, अश्विनी कुमारोंने कहा, ‘उपमन्यु, कुछ साल पहले, तुम्हारे गुरु आयोद-धौम्य ने अभी हमें उनकी मदद के लिए बुलाया था और तब हमने आयोद-धौम्य को यही दैवी औषधि प्रदान की थी। उस समय, आयोद-धौम्य ने अपने गुरु को यह औषधि प्रदान किए बिना ही उसका सेवन कर लिया था। इसलिए, तुम्हें भी अपने गुरु के आचरण का उदाहरण लेकर, यह औषधि अपने गुरु को अर्पण किए बिना ही इसका सेवन कर लेना चाहिए।’

लेकिन उपमन्यु ने ऐसा करने से साफ़ मना कर दिया। उसने कहा, 'वंदनिय अश्विनियों, कृपया मुझे क्षमा करें, लेकिन में तभी यह औषधि खा सकता हूँ, जब इसे में अपने गुरु को अर्पण करूँगा और मेरे गुरुदेव मुझे इसे खाने के लिए अनुमति दे देंगे।’

उपमन्यु की गुरुभक्ति से अश्विनी कुमार प्रसन्न हो गए। फिर उपमन्यु को आशीर्वाद देते हुए उन्होंने कहा, ‘उपमन्यु, तुम्हारी गुरुभक्ति से हम अति-प्रसन्न हैं। हम तुम्हारी दृष्टि अभी ठीक कर देंगे।’

ऐसा कहकर, उन्होंने उपमन्यु की आँखें तुरंत ठीक कर दी। आँखें ठीक होने पर, उपमन्यु आयोद-धौम्य के आश्रम चला गया। आश्रम में जाकर उसने आयोद-धौम्य को अश्विनियों के साथ हुई घटना के बारे में बताया।

उपमन्यु की कहानी सुनने के बाद, आयोद-धौम्य उसकी भक्ति से प्रसन्न हुए। प्रसन्न होकर उपमन्यु को आशीर्वाद देते हुए उन्होंने कहा, 'उपमन्यु, वेदों का सारा ज्ञान तुम्हारे भीतर चमक उठेगा और तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल हो जाएगा।'

अपने गुरु से आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद, उपमन्यु ने गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के लिए गुरु से अनुमति ली और वह अपने घर लौटकर आ गया।

आयोद-धौम्य का एक और शिष्य था जिसका नाम था वेद। एक दिन, आयोद-धौम्य ने वेद को बुलाया और उसे अपने घर पे नौकर के रूप में रहने के लिए कहा। वेद ने आयोद-धौम्य के घर रहकर कड़ी मेहनत की। उसकी कड़ी मेहनत ने थोड़े ही समय में आयोद-धौम्य को प्रसन्न कर दिया। आयोद-धौम्य ने उसे वेदों का ज्ञान और एक उज्ज्वल भविष्य का आशीर्वाद दे दिया।