परिक्षित को शाप (महाभारत की अनसुनी कहानियाँ -4)



 परीक्षित अर्जुन का पौत्र था। अपने दादा की तरह ही, वह एक महान धनुर्धर और एक शक्तिशाली योद्धा था।

एक दिन, वह शिकार के लिए एक जंगल में चला गया। जंगल मैं शिकार करते समय, उसे एक हिरण दिखाई दिया। उसने बड़े ध्यान से हिरण पर अपना निशाना साध लिया और उसके दिशा में एक तीर चलाया। उस तीर ने हिरण को छेद दिया, लेकिन हिरण जमीन पर नहीं गिरा। घायल होकर वह जंगल में भाग गया।

परीक्षित को यह देखकर बड़ा ही आश्चर्य हो रहा था क्योंकि ऐसा पहली बार हो रहा था कि किसी जानवर को परीक्षित का तीर लगने के बावजूद, वह जानवर ज़िंदा बचकर भाग निकला हो। इस घटना से अचंबित होकर, परीक्षित ने उस हिरण का पीछा करने का फैसला किया। धनुष को अपने कंधे से लटकाकर उसने हिरण के पीछे दौड़ना शुरू कर दिया।

भागते-भागते वह घने जंगल में चला गया, लेकिन तब तक हिरण उसकी आँखों से ओझल हो चुका था। परीक्षित फिर हताश हो गया। अब तो उसे भूख और प्यास का भी एहसास हो रहा था। एक हिरण से धोखा खाकर, उसे अपने ऊपर थोड़ा ग़ुस्सा भी आ रहा था।

जंगल में चलते-चलते वह वापस अपनी राजधानी जाने की सोच ही रहा था, तब अचानक से उसे एक साधु दिखाई दिया। साधु अपनी आँखें बंद करके गौशाला में ध्यानमग्न अवस्था में बैठा हुआ था।

परीक्षित उस साधु के पास चला गया और उसे कहा, 'हे ब्राह्मण, मैं राजा परीक्षित हूँ। मैंने एक हिरण को अपने बाण से घायल कर दिया है। क्या ऐसे घायल हिरण को तुमने यहाँ से भागते हुए देखा है?’

परीक्षित की बात सुनकर साधु ने अपनी आँखें खोलीं और फिर बड़े ही शांति से परीक्षित पर दृष्टिपात करके वह साधु फिर से ध्यानमग्न हो गया।

साधु की चुप्पी देखकर परीक्षित का ग़ुस्सा और भी बढ़ गया। फिर परीक्षित ने सोचा कि यह साधु ज़रूर ध्यान लगाने का नाटक कर रहा है क्योंकि उसे प्रश्न का उत्तर नहीं देना। अपनी भूख और प्यास से परेशान परीक्षित ग़ुस्से से भरकर गौशाला से बाहर आ गया।

बाहर जाते समय उसने देखा कि घास पर एक मरा हुआ साँप पड़ा है। उसने मन में ही सोचा कि उसे घमंडी साधु को सबक़ सिखाना ही पड़ेगा। उसने अपने धनुष से वह मरा हुआ साँप उठाया और साधु के गले में लपेट दिया।

परीक्षित के इस घृणास्पद काम के बावजूद, साधु शांत रहकर ध्यान में व्यस्त रहा।

ग़ुस्से में आकर, परीक्षित ने अपनी मति को खो दिया था। वह साधु कोई साधारण साधु नहीं था। वे तो एक महान तपस्वी शमीक ऋषि थे। वह मौन व्रत का पालन कर रहे थे और यही कारण था कि वह कुछ बोल नहीं रहे थे।

जब परीक्षित राजधानी लौट आया, तो उसका ग़ुस्सा थोड़ा शांत हो गया। ग़ुस्सा ठंडा होने पर, उसका विवेक भी जाग गया। अपने घृणास्पद काम के बारे में सोचकर, अब उसे ख़ुद पर ही बड़ी शर्म महसूस हो रही थी।

जब परीक्षित और शमीक ऋषि के बीच ये सारी घटना घट रही थी, तब शमीक ऋषि का पुत्र, श्रृंगी, अपने गोशाला से दूर लकड़ियाँ ढूँढने गया था। इसके बीच, श्रृंगी का काशी नामक एक मित्र, श्रृंगी को ढूँढते-ढूँढते गोशाला आ गया था। गोशाला में जब उसने शमीक ऋषि के गले में मरा हुआ साँप देखा, तो काशी को बड़ा ही आश्चर्य हुआ। तब काशी ने अपने तपोबल से जान लिया कि ये सब राजा परीक्षित का काम है। काशी ने फिर अपने मित्र श्रृंगी को ढूँढ निकाला और उसे कहा, ‘हे श्रृंगी, तुम इधर लकड़ियाँ जुटाने में लगे हो और उधर कोई तुम्हारे पिता का घोर अपमान करके गया है। अगर तुम उनके सच्चे पुत्र हो, तो तुम अपने पिता के साथ हुए व्यवहार का बदला ले लो।’

श्रृंगी को काशी की बात पहले समझ नहीं आयी। फिर उसने काशी को सब कुछ विस्तार से बताने की विनती की। तब काशी ने घटित घटना श्रृंगी को बतायी। फिर काशी ने श्रृंगी बताया कि कैसे राजा परीक्षित ने ध्यानमग्न शमीक ऋषि के गले में एक मृत साँप डाल दिया। अपने पिता के साथ हुए इस धोर अपमान के बारे में सुनकर श्रृंगी ग़ुस्से से भर गया।

फिर उसने अपने कमंडलु से हाथ में पानी लिया और क्रोधित होकर परीक्षित को शाप दे दिया, 'में ये शाप देता हूँ कि जिस परीक्षित ने एक मृत साँप मेरे पिता के गले में डाला है, वह परीक्षित सात दिन के अंदर मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। साँपों का राजा तक्षक परीक्षित को अपने घातक दंश से मार गिराएगा।’

परीक्षित को शाप देने के बाद, श्रृंगी दौड़ते दौड़ते गोशाला पहुँच गया। शमीक ऋषि अभी भी अपने ध्यान में डुबे हुए थे और वह मृत साँप अभी भी उनके गले में लटक रहा था।

श्रृंगी ने अपने पिता के गले में लिपटे हुए साँप को अपने हाथों से हटाया। अपने महान पिता के साथ किया हुआ व्यवहार देखकर, उसे अत्यंत दुःख हो रहा था। अपने पिता में चरणों में बैठकर वह फिर फुदक-फुदक कर रोने लगा। श्रृंगी के रोने की आवाज़ से शमीक ऋषि का ध्यान टूट गया और उन्होंने अपनी आँखे खोल दी।

तब श्रृंगी ने शमीक़ ऋषि से कहा, 'पिताजी, परीक्षित ने वास्तव में घोर दुराचार किया है, लेकिन आप चिंता मत कीजिए। मैंने उस पापी राजा को शाप दे दिया है। तक्षक के काटने से वह केवल सात ही दिनों में मर जाएगा।

शमीक़ ऋषि यह सुनकर अत्यंत दुखी हो गए। उन्हें बुरा लगा कि श्रृंगी ने ग़ुस्से में आकर परीक्षित को ऐसा भयानक शाप दे दिया था।

उन्होंने फिर श्रृंगी को शांत करने का प्रयास किया। उन्होंने कहा, 'मेरे बेटे, तुमने ग़ुस्से के अधीन होकर राजा परीक्षित को शाप देकर अच्छा नहीं किया। राजा हमारी रक्षा करता है और उस सुरक्षा के कारण ही, हम सफलतापूर्वक आध्यात्मिक कार्य कर सकते हैं। राजा के बिना एक राज्य अराजक बनने के लिए बाध्य है और अराजक राज्य में, असामाजिक तत्व निश्चित रूप उपद्रव पैदा करेंगे, इसलिए राजा परीक्षित को माफ़ करना ही उचित था। इसके अलावा, राजा परीक्षित भूखा और प्यासा था। वह मेरे मौनव्रत के बारे में भी नहीं जानता था।’

अपने पिता के शब्द सुनकर श्रृंगी का ग़ुस्सा शांत हो गया। उसे यह एहसास हुआ कि उसने ग़ुस्से में आकर जल्दबाज़ी में परीक्षित को सच में एक भयानक शाप दे दिया था। लेकिन वह जनता था कि उसकी तप साधना इतनी ज़्यादा थी कि एक बार वह कुछ बोले, तो वह सत्य होकर ही रहता था। फिर उसने शमीक ऋषि से कहा, 'पिताजी, मुझे अपनी भूल का अहसास तो हो रहा है। लेकिन अब क्या किया जाये? मेरा शाप निश्चित रूप से सच होगा क्योंकि मैंने बोली हुई कोई भी बात कभी झूठ नहीं होती।’

फिर शमीक़ ऋषि ने श्रृंगी से कहा, 'बेटे, हमें राजा परीक्षित को जल्द से जल्द बता देना चाहिए कि उसकी जान ख़तरे में है। मैं अभी किसी शिष्य को भेजकर राजा को ये बात बता देता हूँ।’ ऐसा कहने के बाद, शमीक़ ऋषि ने श्रृंगी को सलाह दी, ‘मेरे पुत्र, तुम एक बात का ध्यान रखना। जो धर्म के मार्ग पर चलता है, उसे क्रोध छोड़ देना चाहिए और क्षमाशील स्वभाव धारण करना चाहिए। क्रोध तपस्या को नष्ट कर देता है और दयालुता शांति और आध्यात्मिक योग्यता प्रदान करती है।'

अपने पिता की सलाह सुनकर, श्रृंगी ने अपने पिता को कहा कि वह अपना क्रोधी स्वभाव छोड़ने की पूरी कोशिश करेगा।

फिर शमीक़ ऋषि ने अपने एक शिष्य को परीक्षित के पास भेज दिया। उस शिष्य ने परीक्षित को उसके आने वाले मृत्यु की चेतावनी दी।

जब परिक्षित ने शमीक़ ऋषि के शिष्य से सुना, तो उसने सोचा, ‘चलो अच्छा ही हुआ। मेरे पापकर्म का मुझे दंड मिल जाएगा। ऐसे दयालु ऋषि के साथ दुर्व्यवहार करने का यही अंजाम होना चाहिए। मुझे अपनी मृत्यु स्वीकार है।’

शमीक ऋषि के शिष्य के लौटने पर, परिक्षित उसने अपने मंत्रियों को बुलाया और उन्हे सारी घटित घटना बता दी। परिक्षित ने अपने  मंत्रियों से कहा, ‘मेरी मृत्यु सात दिनों में होने वाली है। मेरे जाने के बाद तुम लोग राज्य का ख़याल रखना।’

अपने राजा के मृत्यु की बात सुनकर सारे मंत्री शोकांतिक हो गए। उन्होंने कहा, ‘महाराज, हमें आपको बचाने का एक मौक़ा तो दीजिए। हम ऐसी व्यवस्था करेंगे की तक्षक आप तक पहुँच ही नहीं पाएगा और फिर ऋषि का शाप व्यर्थ हो जाएगा।’

परिक्षित जानता था कि ऐसे तपस्वी ऋषि का शाप कभी व्यर्थ नहीं जा सकता, लेकिन फिर भी उसने मंत्रियों के योजनाओं को सहमति दे दी।

फिर मंत्रियों ने परिक्षित के लिए एक ऐसे महल की रचना की जो केवल एक ही स्तंभ पर बना हुआ था और वह स्तंभ भी बहुत ऊँचा था। उस स्तंभ के चारों ओर दिन-रात कड़ी सुरक्षा रखी गई थी। अनुमति के बिना, किसी चींटी का भी महल तक पहुँचना सम्भव नहीं था। मंत्रियों ने परिक्षित को उस महल में रख दिया। फिर मंत्रियों ने उस महल में परिक्षित के चारों ओर हर समय कुशल चिकित्सकों को रखना शुरू कर दिया। उन चिकित्सकों के पास ऐसी जड़ी-बूटियों थी, जिससे साँप का घातक से घातक जहर भी उतर जाये। सिर्फ़ चिकित्सकों को परिक्षित के पास रखकर मंत्री संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने ऐसे कुशल ब्राह्मणों को भी महल में रखा, जो साँप का भयंकर विष केवल मंत्रजाप से उतार देते थे। ऐसी कड़ी व्यवस्था करने के बाद मंत्री आश्वस्त हो गए कि अब परिक्षित को शाप से कोई ख़तरा नहीं है।

उधर, जब कश्यप ऋषि को श्रृंगी के शाप के बारे में पता चला, तो उन्होंने परिक्षित को बचाने की ठान ली। कश्यप ऋषि को ब्रह्माजी ने ऐसी विद्या सिखायी थी कि उस विद्या के बल पर, वह किसी भी विष का प्रभाव नष्ट कर सकते थे। कश्यप ऋषि ने सोचा कि अपने विद्या के बल पर, परिक्षित को जीवनदान देने के बाद उन्हें भरपूर प्रसिद्धि मिल जाएगी। कश्यप ऋषि ने यह भी सोचा कि परिक्षित को बचाकर अंत में राजा से धन की प्राप्ति भी की जा सकती है।

ऐसा सोचकर शाप के ठीक सात दिन बाद, कश्यप ऋषि परिक्षित से मिलने के लिए उसके राज्य की ओर चल पड़े।

जब तक्षक को पता चला कि कश्यप ऋषि परिक्षित को बचाने के लिए जा रहे हैं, तब वह चिंतित हो गया। उसे पता था कि कश्यप ऋषि एक महान तपस्वी हैं और वह चाहे तो परिक्षित को बचा सकते हैं। तो तक्षक ने ठान ली कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह कश्यप ऋषि को परिक्षित से मिलने से रोक कर रहेगा।

कश्यप ऋषि जब जंगल से गुज़रकर परीक्षित के राज्य के तरफ़ जा रहे थे, तब तक्षक एक ब्राह्मण के रूप में उनके सामने आ गया। उसने कश्यप ऋषि को संबोधित किया, 'हे ब्राह्मण, तुम इतनी जल्दबाजी में कहाँ जा रहे हो?'

'आज साँपों का राजा, तक्षक, राजा परीक्षित को अपने ज़हरीले दंश से मारने की कोशिश करने वाला है। मैं उस ज़हर का तोड़ जनता हूँ। इसलिए, मैं राजा परीक्षित को बचाने उसके राज्य जा रहा हूँ,' कश्यप ऋषि ने ब्राह्मण के वेश में आए हुए तक्षक को जवाब दिया।

फिर तक्षक ने कश्यप ऋषि की हिम्मत तोड़ने की कोशिश की। उसने कहा, 'हे ब्राह्मण, मैं वही तक्षक हूँ। मुझे लगता है कि आपकी यात्रा निरर्थक होने वाली है। मेरा जहर इतना शक्तिशाली है कि कोई भी उपाय मेरे ज़हर पर प्रभावशाली नहीं हो सकता। अगर में परीक्षित को काट लूँगा, तो उसकी मृत्यु निश्चित है।’

कश्यप ऋषि को अपनी विद्या पर ख़ूब भरोसा था। उन्होंने तक्षक से कहा, 'हे तक्षक, स्वयं ब्रह्माजी ने मुझे इस विद्या का दान दिया है। मुझे लगता है कि ऐसा कोई भी विष इस पूरे धरा पर नहीं है, जिसका दुष्प्रभाव मेरी विद्या से ना उतर जाये। इसी कारण, में परीक्षित को बचाने ज़रूर जाऊँगा।’

तक्षक भी इतने जल्दी हर मानने वाला नहीं था। उसने कश्यप ऋषि को चुनौती देते हुए कहा, 'यदि आप को आपकी विद्या के ऊपर इतना ही भरोसा है, तो मैं भी इसका परीक्षण करना चाहूँगा। मैं आपके सामने ही एक पेड़ को अपने ज़हरीले दाँतों से काट लूँगा। अगर आप इसको फिर से जीवनदान दे पाये, तो मैं आपकी विद्या पर भरोसा रखूँगा।’

कश्यप ऋषि ने तक्षक की चुनौती स्वीकार कर ली।

तक्षक ने पास के एक वृक्ष को अपने घातक नुकीले दाँतों से काट दिया। उसका जहर इतना ख़तरनाक था कि पेड़ न केवल मर गया, बल्कि जलकर राख हो गया। फिर तक्षक ने उस राख के पास खड़े होकर बड़े ही गर्व से कश्यप ऋषि की तरफ़ देखा।

कश्यप ऋषि शांति से आगे बढ़े और उन्होंने अपने मुट्ठी में उस पेड़ की राख उठाई। वह राख अपने दोनो हाथों में रखकर, उन्होंने मंत्रों का जाप शुरू कर दिया। मंत्रों की दिव्य शक्ति द्वारा उस राख से एक छोटा पौधा उग कर आ गया। उस पौधे पर दो पत्ते लगे हुए थे। फिर कश्यप ऋषि ने उस पौधे को उस पेड़ की राख पर रख दिया, जो ज़मीन पर पड़ी हुई थी। पौधे को वहाँ रखकर, उन्होंने हाथ जोड़कर मंत्रजाप शुरू कर दिया। धीरे-धीरे ज़मीन पर गिरी हुई राख कम होना शुरू हो गया और पौधा बढ़ने लगा। कुछ ही समय में ज़मीन पर गिरी हुई सारी राख पौधे में बदल गई। धीरे-धीरे, कश्यप ऋषि ने सभी पत्तों, टहनियों, फलों और फूलों के साथ उस सटीक पेड़ का निर्माण कर दिया, जो तक्षक ने जलाकर राख कर दिया था।

तक्षक को कश्यप ऋषि ने किए हुए चमत्कार से बड़ा झटका लगा। लेकिन फिर भी उसने कश्यप ऋषि से कहा, 'हे ऋषिवर, आपकी शक्ति वास्तव में अद्भुत है। आपने इस मृत वृक्ष को भी पुनर्जीवित किया है। लेकिन मुझे लगता है कि आप राजा परीक्षित को पुनर्जीवित करने में सफल नहीं हो सकते। उसका जीवन पहले ही एक शक्तिशाली तपस्वी द्वारा दिए गए शाप से छोटा हो गया है। यदि आप राजा को बचाने में विफल रहते हैं, तो इतने सारे वर्षों में जमा की हुई आपकी प्रसिद्धि कुछ ही क्षणों में मिट्टी में मिल जाएगी। इसके अलावा, अगर आप परीक्षित को बचाने का विचार छोड़ दोगे, तो में आपको बहुत सारा धन दे दूँगा।'

तक्षक की बातें सुनकर, कश्यप ऋषि कुछ क्षण ध्यान में चले गए। उन्होंने ध्यान में देखा कि परीक्षित का जीवन वास्तव में ही शाप के कारण छोटा हो गया है, इसीलिए उसे बचाना मुश्किल काम है। अपने प्रयास की अनिश्चितता को पहचानते हुए, उन्होंने तक्षक का कहना मान लिया और अपने आश्रम वापस जाने का फ़ैसला किया।

अत्यंत अनंदीत होकर, तक्षक ने कश्यप ऋषि को भारी संपत्ति भेंट की।

कश्यप ऋषि को वापस भेजने के बाद, तक्षक ने अपना रूख परीक्षित के ओर बढ़ाया। उसे पता चल गया था कि परीक्षित बहुत सुरक्षा के साथ जीवन जी रहा है। फिर तक्षक ने एक ऐसी कुटिल योजना बनायी जिससे परीक्षित तक पहुँचने में वह सफल हो जाए।

तक्षक ने कुछ सर्पों को ब्राह्मणों के रूप में परीक्षित से मिलने के लिए भेज दिया। उन ब्राह्मणों ने आशीर्वाद के रूप में कई फल भी अपने साथ रख लिए। ब्राह्मणों से मिलने के लिए और उनसे आशीर्वाद पाने के लिए परीक्षित राज़ी हो गया। परीक्षित को मिलने के बाद, उन ब्राह्मणों ने उसे अपने साथ लाए हुए फल आशीर्वाद उसे के रूप में दे दिए। परीक्षित ने बड़े आदर के साथ उन फलों का स्वीकार कर लिया। परीक्षित को आशीर्वाद देकर, वह झूठे ब्राह्मण वापस चले गए।

परीक्षित ने अपने मंत्रियों को ब्राह्मणोंद्वारा प्रस्तुत स्वादिष्ट फल खाने के लिए आमंत्रित किया। सबने मिलकर, एक स्तम्भ के ऊपर बने हुए महल में फलाहार शुरू कर दिया। परीक्षित ने एक फल उठाया और उसे अपने दाँतों से काट लिया। अचानक, उसने देखा कि एक छोटा सा कीड़ा फल के अंदर रेंग रहा है। उस कीड़े की आँखें काली थी और उसका शरीर तांबे के रंग का था।

परीक्षित वह कीड़ा देखकर आश्चर्यचकित रह गया, क्योंकि वह कीड़ा दिखाने में डरावना था। लेकिन परीक्षित को यह मालूम नहीं था कि वह कीड़ा स्वयं तक्षक ही था! तक्षक ने अपनी शक्तियों का उपयोग करके ख़ुद को एक कीड़े में बदल दिया था, ताकि वह फल में छिपकर परीक्षित तक पहुँच सके।

जैसे ही परीक्षित ने उस कीड़े को देखा, उसे शायद अपनी नज़दीक आई हुई मृत्यु का अहसास हुआ। उसने उस कीड़े को उठाया और अपनी हथेली पर रखा। फिर उसने अपने मंत्रियों को संबोधित किया, 'मुझे ऐसा लग रहा है, जैसे मेरी मृत्यु की घड़ी पास आ गई है। लेकिन मुझे मेरी मृत्यु का भय नहीं है। मैं तो चाहता हूँ कि तपस्वी का शाप सच को जाए और मुझे अपने कर्म का प्रायश्चित करने का मौक़ा मिल जाए।'

जैसे ही परीक्षित ने ऐसा कहा, तक्षक ने अपना मूल रूप धारण कर लिया और परीक्षित पर हमला बोल दिया। उसने अपने शरीर को परीक्षित के शरीर पर कसना शुरू कर दिया। इससे परीक्षित की साँसे धीमी होने लगी। फिर तक्षक ने अपने खूंखार दातों से परीक्षित की गर्दन पर प्रहार किया और अपना घातक जहर उसके शरीर में छोड़ दिया।

तक्षक के प्रहार से परीक्षित बिजली का झटका लगे ऐसे ज़मीन पर गिर गया और कुछ ही क्षणों में उसके प्राण शरीर से निकल गए।

तक्षक का भयानक रूप देखकर सारे मंत्री महल से भाग गए।

परीक्षित को मारने के बाद तक्षक ने फ़ुत्कारते हुए सारे महल में अपना ज़हर फैला दिया। तक्षक का जहर इतना शक्तिशाली था कि इससे पूरा महल जलकर राख हो गया।

ऐसी तबाही मचाने के बाद, तक्षक आकाश के माध्यम से उड़ान भरकर वहाँ से भाग गया।

तक्षक के जाने के बाद, सारे दुःखी मंत्री इकट्ठे हुए और उन्होंने परीक्षित का अंतिम संस्कार किया। बाद में, उन्होंने राजा के युवा बेटे ‘जनमेजय’ को राज्य का नया सम्राट घोषित कर दिया।