पांडवों का जन्म (महाभारत की अनसुनी कहानियाँ -17)

 


धृतराष्ट्र के विवाह के बाद, भीष्म ने पांडु शादी की योजना बनाना शुरू कर दिया। पांडु के लिए पत्नी के लिए रूप में भीष्म ने ‘कुंतीभोज’ की पुत्री ‘कुंती’ को चुन लिया। यदु राजा शूरसेन कुंती के वास्तविक पिता थे और कुंती का मूल नाम ‘प्रथा’ था। लेकिन कुंती के जन्म बाद शूरसेन ने अपनी पुत्री प्रथा को अपने अपत्यहिन भाई ‘कुंतीभोज’ को दे दिया था। इसके बाद, प्रथा का नाम कुंती रखा गया था।

कुंती का रूप अतिशय सुंदर था और वह एक सदाचारि कन्या थी। अपनी युवावस्था में, कुंती ने दुर्वासा ऋषि की सेवा करके उनसे एक अद्भुत वरदान पा लिया था। दुर्वासा ने कुंती को यह वरदान दिया था कि वह किसी भी देवता को बुलाकर, उससे पुत्रप्राप्ति कर सकती है। जब कुंती युवावस्था में पहुँची, तो कुंतीभोज ने उसका स्वयंवर आयोजित किया और उस स्वयंवर में अनेक राजा-महाराजाओं को बुलावा भेजा गया।

कुंती के स्वयंवर की ख़बर सुनकर, उस स्वयंवर के लिए भीष्म ने पांडु को भेज दिया। स्वयंवर के दिन, जब कुंती स्वयंवर के सभा में पहुँची, तो उसने पांडु को देखा। पांडु को देखकर, कुंती को उससे उसी क्षण प्रेम हो गया और इसके बाद कुंती ने पांडु के गले में वरमाला डालकर सारे राजा-महाराजाओं में उसे चुन लिया। यह देखकर बाकी राजा मत्सर से जलने लगे, लेकिन उन राजाओं ने पांडु को लड़ने की चुनौती नहीं दी और वह अपने-अपने राज्य वापस चले गए। इसके बाद कुंतीभोज ने पांडु और कुंती का विवाह बड़े धूमधाम के साथ सम्पन्न कर दिया।

विवाह कुछ समय के बाद, पांडु कुंती के साथ हस्तिनापुर वापस आया। कुछ दिन के बाद, भीष्म ने सोचा कि पांडू को एक और पत्नी होनी चाहिए। फिर भीष्म ने अपने साथ कुछ मंत्रियों को ले लिया और वह मद्र देश के राजा के पास चला गया। मद्र देश के राजा की कन्या माद्री अपने अलौकिक सुंदरता के कारण सारे राज्यों में प्रसिद्ध थी। मद्र देश के राजा ने एक भव्य समारंभ का आयोजन करके, भीष्म का स्वागत किया। समारंभ के बाद, भीष्म ने मद्र देश के राजा की कन्या, माद्री, का हाथ पांडु के साथ विवाह के लिए माँगा। भीष्म की माँग सुनकर, मद्र देश के राजा ने अपनी कन्या को महाराज पांडु को देने में अपनी स्वीकृति दे दी। पिता के स्वीकृति के बाद, भीष्म माद्री को हस्तिनापुर लेकर आ गया।

हस्तिनापुर में माद्री और पांडु का विवाह हो गया। उसके बाद, पांडु माद्री और कुंती के साथ खुशी-खुशी रहने लगा।

माद्री के साथ शादी होने के तीस दिन बाद, पांडु अपनी सेना साथ में लेकर चारों दिशाओं के राजाओं को जीतने की मोहिम पर निकल पड़ा। बहादुर पांडु ने बहुत कम समय में सारे राजाओं को हरा दिया। जो भी राजा पांडु को युद्ध की चुनौती दे रहे थे, उन सबको पांडु की सेना से हारना पड रहा था।

जब ऐसे कई सारे राजाओं को पांडु ने हरा दिया, तो उन राजाओं ने पांडु को पृथ्वी के सबसे बहादुर राजा की उपाधि प्रदान की। इस प्रकार, सारे राजाओं को हराने के बाद, पांडु हस्तिनापुर वापस आ गया, तो सारी प्रजा ने उसका भव्य तरीक़े से स्वागत किया। इतने बड़े पराक्रम के बाद, लोग पांडु की तुलना उसके महान पूर्वज ‘भरत’ से करने लगे थे। हस्तिनापुर वापस आते हुए, पांडु अपने साथ ख़ूब सारा धन लेकर आया था। धृतराष्ट्र के निर्देश के अनुसार, पांडु ने वह संपत्ति भीष्म, विदुर और सत्यवती इनमें बाँट दी।

इसके कुछ समय के बाद, पांडु अपनी दोनो पत्नियों को लेकर वन में चला गया और वहीं पर रहने लगा। वन में रहने के बावजूद, धृतराष्ट्र ने पांडु के सेवा के लिए वहाँ पर बख़ूबी व्ययस्था कर ली थी। पांडु और उसकी रानियों की सेवा के लिए यहाँ पर कई सेवक मौजूद थे।

एक दिन, पांडु शिकार करने के लिए निकल पड़ा। शिकार ढूँढते-ढूँढते, वह वन में घूम रहा था। तब उसने देखा कि एक बहुत बड़ा हिरन, हिरनी के साथ, यौनक्रीड़ा करने में व्यस्त था। हिरन को देखकर, पांडु ने अपना धनुष निकाला और उस हिरन के ऊपर पाँच बाण चला दिए। अपने बाणों के आघात से उसने हिरन और हिरनी दोनों को घायल कर दिया।

जैसे ही उस हिरण को पांडु के बाण लगे, वह हिरन मनुष्य की आवाज में ज़ोर से चिल्लाया और तड़पते हुए जमीन पर गिर गया। यह चमत्कार देखने के बाद, पांडु दौड़ते-दौड़ते उस तड़पते हुए हिरन के पास पहुँच गया। फिर हिरन ने पांडु से कहा, ‘हे राजा, तुमने एक बहुत बड़ा पापकर्म किया है और तुम्हें इसका दंड अवश्य मिलेगा।’

उस हिरन की बात सुनकर, पांडु ने उसे कहा, ‘मुझे दंड क्यों मिलेगा? तुम्हें पता होना चाहिए कि हम क्षत्रियों को शिकार करने का अधिकार है, इसलिए मेरे व्यवहार में कोई पाप नहीं है।’

यह सुनकर, हिरन ने कहा, ‘तुमने एक हिरन की शिकार की है, इस बात पर मुझे कोई आक्षेप नहीं है, लेकिन जब मैं अपने साथी के साथ यौन-क्रीड़ा कर रहा था, उसी वक़्त तुमने मुझे मारना चाहा, यह उचित नहीं है। यौनक्रीड़ा करने का अधिकार तो सारे जीवों को है। इसके अलावा, मैं तुम्हें बता देता हूँ कि मैं हिरन नहीं हूँ। मैं तो ‘किंदम’ नाम का ऋषि हूँ। मैंने कड़ी तपस्या करके अनेक सिद्धियाँ प्राप्त की हुई है। मनुष्य रूप में यौन-क्रीड़ा करते हुए मुझे संकोच होता है, इसलिए हिरण का रूप लेकर, मैं अपने पत्नी के साथ यौन-क्रीड़ा कर रहा था। हे राजा, तुम्हारा व्ययहार सच में अनुचित है और इसलिए, मैं तुम्हें शाप देता हूँ कि अगली बार जब तुम अपनी पत्नी के साथ यौन-क्रिडा करोगे, तो तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी और जिस पत्नी के साथ तुम यौन-क्रिडा करोगे, वह पत्नी भी तुम्हारे साथ चिता पर जलकर राख हो जाएगी।’ इतना कहने के बाद, उस ऋषि ने अपने शरीर को त्याग दिया।

उसके बाद, पांडु अपने घर वापस चला आया। घर आने के बाद, पांडु ने अपनी दोनों पत्नियों को ऋषि के शाप के बारे में बताया। उन तीनों ने मिलकर इस शाप पर खूब शोक किया।

अब पांडु ने अपने मन में ठान लिया कि वह अपने इंद्रियों को संयम में रखेगा और ब्रह्मचर्य का पालन करके ज्ञान प्राप्ति कर लेगा। ऐसा सोचकर, पांडु ने घोषणा कर दी कि वह अब वन में ही रहेगा और सन्यासी का जीवन व्यतीत करके कभी राजमहल वापस नहीं जाएगा।

फिर उसने अपने पत्नियों को राजमहल वापस जाने की सलाह दे दी। जब कुंती और माद्री ने पांडु की घोषणा सून ली, तब वे दोनों बहुत व्यथित हो गई। दोनों ने पांडु को खूब विनती की कि वह उनको भी उसके साथ वन में ही रुकने की अनुमति दे दें। दोनों की विनती को सुनकर, पांडु ने कुंती और माद्री को उसके साथ वन में रहने की सम्मति दे दी। कुंती और माद्री को पता था कि अब उन्हें भी पांडु के साथ ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वानप्रस्थ जीवन व्यतीत करना पड़ेगा। उसके बाद, तीनों ने अपने सारे आभूषण और संपदा ब्राह्मणों में बाँट दी और अपने सारे सेवकों को अपने राज्य में वापस भेज दिया।

जब धृतराष्ट्र को अपने भाई को मिले हुए शाप के बारे में पता चला, तो धृतराष्ट्र ख़ूब व्यथित हो गया। इधर पांडु ने वन में ऋषि-मुनियों के साथ अपना समय बिताना शुरू कर दिया। वह उन लोगों में घुल-मिलकर रहने लगा। वह ऋषि-मुनि भी उससे खूब प्रीति करने लगे।

एक दिन, पांडु ने कुछ ऋषि-मुनियों को ब्रह्मलोक जाते हुए देखा। तो उसने भी ऋषि-मुनियों के सामने दो पत्नियों के साथ ब्रह्मलोक जाने की इच्छा जताई।

किंतु पांडु की ब्रह्मलोक जाने की इच्छा के बारे में सुनकर, ऋषि-मुनियों ने पांडु को ब्रह्मलोक के दुर्गम रास्ते के बारे में चेतावनी दे दी। ऋषि-मुनियों ने पांडु को बताया कि ब्रह्मलोक जाने का रास्ता कठिनाइयों से भरा हुआ है। उस रास्ते में कई सारे क्षेत्र ऐसे हैं, जो बर्फ़ से ढके हुए हैं। उन जगहों पर, केवल ऋषि-मुनि ही जा सकते हैं। इस प्रकार, ऋषि-मुनियों ने पांडु से कहा की कि वह ब्रह्मलोक जाने का अपना विचार त्याग दें। उन्होंने पांडु को ऐसा भी बताया कि शायद पांडु इस यात्रा में सफल हो जाए, लेकिन उसकी दोनों पत्नियाँ यह यात्रा सुरक्षित तरीक़े से नहीं कर पाएँगी।

यह सुनने के बाद पांडु अत्यंत व्यथित हो गया। तो ऋषि-मुनियों ने पांडु को उसके ह्रदय का सच्चा दुःख उन्हें बताने के लिए कहा। ऋषि-मुनियों की बात सुनकर, पांडु ने उनसे कहा कि, ‘हे महान ऋषियों, अभी मेरे पास अभी कोई पुत्र नहीं हैं। मेरी मृत्यु के बाद मेरे साथ मेरे पूर्वजों का उद्धार होना कठिन हैं। शास्त्र कहते हैं कि एक पुरुष को अपने जीवन में चार प्रकार के ऋण चुका देने चाहिए। उन चार प्रकार के ऋणों में देवताओं के प्रति ऋण, ऋषियों के प्रति ऋण, मनुष्यों के प्रति ऋण और अपने पूर्वजों के प्रति ऋण शामिल हैं। मैंने यज्ञ करके देवताओं को प्रसन्न कर लिया हैं। मैंने तपस्या करके और शास्त्रों का पठन करके ऋषियों को प्रसन्न कर लिया हैं और मैंने एक एक सदाचारि जीवन व्यतीत करके सारे मनुष्यों के प्रति अपना ऋण चुका दिया हैं। लेकिन कोई पुत्र ना होने के कारण, मैंने अपने पूर्वजों के प्रति अपना कर्ज, अभी तक नहीं चुकाया है। वेद-व्यास ने आकर मेरी माता को पुत्र-प्राप्ति करने में मदद की थी। अब आप ही बताइए कि मुझे पुत्रों की प्राप्ति कैसे होगी?’

पांडु की व्यथा सुनकर, ऋषि-मुनियों ने उससे कहा, ‘हे पांडू, तुम चिंता मत करो। यह हमारा आशीर्वाद है कि भविष्य में, तुम्हारे पत्नियों के गर्भ से तेजस्वी पुत्रों का जन्म होगा। पुत्रों की प्राप्ति के लिए तुम किसी दूसरे उचित पुरुष की मदद ले सकते हो।’

इसके बाद, पांडु अपने घर वापस आ गया और उसने कुंती को किसी ऐसे पुरुष की मदद से पुत्र-प्राप्ति करने को कहा, जो तपस्या में पांडु से अग्रगण्य हो। कुंती को समझाने के लिए, उसने कुंती को एक कथा सुनानी शुरू कर दी। पांडु के कहा, ‘हे कुंती, किसी एक ज़माने में, पृथ्वी पर ‘शरदंडयनी’ नाम की एक क्षत्रिय स्त्री रहती थी। शरदंडयनी को उसके पति ने किसी उचित पुरुष से मदद लेकर पुत्रों की प्राप्ति करने के लिए कहा था। आदेश मिलने पर, शरदंडयनी ने स्नान किया और वह रात में एक चौराहे पर चली गई। वहाँ उसे एक सदाचारि ब्राह्मण मिल गया। शरदंडयनी ने उस ब्राह्मण को पुत्र-प्राप्ति के लिए मदद की याचना की। वह ब्राह्मण उसे मदद करने के लिए तैयार हो गया। फिर शरदंडयनी ने उस ब्राह्मण की मदद से तीन तेजस्वी पुत्रों को जन्म दे दिया। हे कुंती, तुम भी शरदंडयनी के आचरण का अनुकरण करो और किसी ऐसे पुरुष की मदद से पुत्र-प्राप्ति करो, जो तपस्या में मुझ से अग्रगण्य हो।’

पांडु का आदेश सुनकर, कुंती व्यथित हो गई। उसने अपने पति से कहा, ‘महाराज, मैं कभी किसी पर-पुरुष के साथ सम्बंध नहीं बना सकती। मेरे लिए कोई दूसरा पर-पुरुष आपसे अग्रगण्य नहीं हो सकता। मैं आपको पुरु वंश के एक राजा की कथा सुनती हूँ। उस राजा का नाम व्युशिताश्व था। व्युशिताश्व के पत्नी का नाम ‘भद्रा’ था। एक दिन, राजा व्युशिताश्व यज्ञ करके देवताओं को और ऋषि-मुनियों को प्रसन्न कर रहा था। राजा व्युशिताश्व का यज्ञ देखकर, ख़ुद देवता और अन्य ऋषि-मुनि उस यज्ञ के स्थान पर प्रकट हो गए। वहाँ पर प्रकट होकर, देवताओं ने सोमरस पी लिया और ख़ुद ही राजा के यज्ञ के विधी करने लगे। स्वयं देवताओं ने उस यज्ञ का विधि करने के कारण, राजा व्युशिताश्व उस यज्ञ के प्रभाव से बलवान हो गया। फिर उसने, दूसरे राजाओं को अपने अधिपत्य में ला लिया और उन राजाओं से भारी मात्रा में धनराशि प्राप्त कर ली। इसके बाद, उस राजा ने अश्वमेध यज्ञ जैसे कई महायज्ञ किए, जिससे वह और शक्तिशाली बन गया।

इस प्रकार, राजा व्युशिताश्व अत्यंत शक्तिशाली बन गया था, लेकिन उसमें एक ही कमी थी। वह अत्यंत भोग-विलसि था। अति भोग भोगने के कारण उसे एक असाध्य बीमारी ने घेर लिया। उस बीमारी के प्रभाव से राजा व्युशिताश्व की मृत्यु हो गई। अपने पति की ऐसी असामयिक मृत्यु देखकर, पुत्रहीन भद्रा अत्यंत दु:खी हो गई। अपने पति के मृत शरीर को आलिंगन देकर, वह फूटफूटकर विलाप करने लगी और अपने पति को फिर से ज़िंदा होने के लिए निवेदन करने लगी। तभी, एक चमत्कार हो गया। उसके पति ने अपने मृत शरीर से भद्रा से कहा कि वह भद्रा को एक वरदान देने के लिए तैयार है। तब भद्रा ने कहा कि उसे पुत्र चाहिए क्योंकि पुत्रहिन होने के कारण उसकी रक्षा करने के लिए अब कोई भी नहीं है। तब उसके मृत पति की आवाज़ ने घोषणा की कि वह चंद्र की आँठवी या चौदवी रात को आकर भद्रा की गर्भधारणा करेगा।

भद्रा ने उचित समय पर अपने शैया पर लेटकर अपने मृत पति की राह देखी। तब भद्रा के पति के मृत शरीर ने आकर भद्रा से सम्बंध बना लिए और उसकी गर्भवती होने में मदद की। इस प्रकार, भद्रा ने सात पुत्रों को जन्म दिया।

महाराज, आप को भी राजा व्युशिताश्व की तरह अपने तपस्वी शक्तियों का उपयोग करना चाहिए। इससे, मुझे पुत्रप्राप्ति भी हो जाएगी और मुझे किसी पर-पुरुष से सम्बंध भी नहीं बनाने पड़ेंगे।’

कुंती की बात सुनकर, पांडु ने कहा, ‘हे कुंती, मैं अपनी तपस्वी शक्तियों का उपयोग ज़रूर कर सकता हूँ, लेकिन मैं एक और बात तुम्हें बताना चाहता हूँ। भूतकाल में, स्त्रीयाँ अनेक पुरुषों के साथ सम्बंध बनाकर रखती थी। वह अपनी इच्छा के अनुसार घुमती थी और किसी एक पुरुष या परिवार के साथ नहीं रहती थी। उत्तरी दिशा में रहने वाली कुरु स्त्रीयों का व्यवहार तो अभी तक ऐसा ही है। इस प्रकार, पुराने समय में ऐसे व्यवहार को पापी नहीं माना जाता था। किसी स्त्री का केवल एक ही पुरुष के साथ सम्बंध बनाकर रहना, यह नियम अभी-अभी बनाया हुआ है। अब मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ, जिससे तुम्हें यह पता चलेगा कि यह नियम समाज में कैसे स्थापित हो गया।

भूतकाल में ‘उद्दालक’ नामक एक ऋषि रहते थे। उनका एक पुत्र था, जिसका नाम था था ‘श्वेतकेतु’। एक दिन एक ब्राह्मण उनके घर आ गया। उद्दालक और श्वेतकेतु के समक्ष, उस ब्राह्मण ने श्वेतकेतु के माता का हात पकड़कर उसे खिंचकर अपने साथ ले जाना चाहा। अपनी माता को ऐसे ले जाते हुए देखकर, श्वेतकेतु कोपित हो गया, लेकिन उसे समझाते हुए उद्दालक ने कहा कि अगर उसकी माता उस ब्राह्मण के साथ जाने के लिए तैयार है, तो उसे कोई नहीं रोक सकता। लेकिन श्वेतकेतु को यह बात अच्छी नहीं लगी और उसने एक ऐसे नियम की घोषणा कर दी, जिसने वर्तमान व्यवहार की नींव रच दी।

श्वेतकेतु ने कहा - मैं आज से यह घोषणा करता हूँ कि जो महिलाएं अपने पति के प्रति वफादार नहीं रहेंगी, उन्हें पापी माना जाएगा। भ्रूण हत्या करके जो पाप होता है, ठीक वही पाप ऐसी बेवफा महिलाओं का होगा। उसी तरह, जो पुरुष अपनी पत्नी को छोड़कर दूसरी स्त्रियों के साथ सम्बंध बनाएँगे, ऐसे पुरूषों को भी पापी माना जाएगा।

हे कुंती, इस प्रकार वर्तमान व्यवहार की नींव रची गई थी। सौदसा ने भी अपने पत्नी मदयंती को वशिष्ठ ऋषि के साथ सम्बंध बनने के लिए कहा था और उसके बाद, अश्मक का जन्म हुआ था। मेरा जन्म भी तब सम्भव हो पाया, जब मेरी माता ने वेद-व्यास की मदद ली थी। इसलिए, तुम्हें भी किसी उच्चतर पुरुष के साथ सम्बंध बनाकर पुत्रों को जन्म दे देना चाहिए।’

जब कुंती ने देखा की पांडु उसको किसी पर-पुरुष के साथ सम्बंध बनकर पुत्रों की प्राप्ति करने के लिए समझाने में लगा हुआ है, तब कुंती ने उसे अपना एक रहस्य बता दिया। कुंती ने पांडु से यह रहस्य अनेक वर्षों तक छुपाकर रखा था। उसने पांडु से कहा, ‘महाराज, जब मैं अपने पिता के घर थी, तब मैं ऋषि-मुनियों की ख़ूब सेवा करती थी। एक दिन हमारे घर, दुर्वासा ऋषि आए थे। वह मेरी सेवा से प्रसन्न हो गए और फिर उन्होंने मुझे एक मंत्र दे दिया। उस मंत्र के प्रभाव से मैं किसी भी देवता को बुलाकर, उससे पुत्र की प्राप्ति कर सकती हूँ। अगर मुझे आपके अलावा किसी पर-पुरुष से पुत्रों की प्राप्ति करनी होगी, तो देवताओं को बुलाकर उनसे पुत्रों को प्राप्ति करना ही उचित रहेगा।’

कुंती की बात सुनकर, पांडु आनंदित हो गया। उसे एक सदाचारि और नितिवान पुत्र चाहिए था। तो उसने कुंती से कहा, ‘कुंती, मुझे लगता है कि तुम्हारा सुझाव एकदम उत्तम है। मुझे एक नितिवान पुत्र चाहिए, इसलिए हमें न्याय के देवता, यमराज, को बुला लेना चाहिए।’

इस प्रकार, कुंती ने पुत्र-प्राप्ति के लिए यमराज को बुला लिया। जब यमराज की कृपा से कुंती को पुत्र की प्राप्ति हो गई, तो एक दैवी आवाज़ ने आकाश में घोषणा कर दी, ‘इस लड़के का नाम युधिष्ठिर होगा। यह सबसे नितिवान और धर्म-परायण मनुष्य बनेगा। कुछ सालों में यह सम्पूर्ण पृथ्वी का सम्राट बन जाएगा।’ इस प्रकार, धर्म-परायण युधिष्ठिर का जन्म हो गया।

युधिष्ठिर के जन्म के बाद, पांडु ने कुंती से कहा, ‘हे कुंती, अब हमें एक बलवान पुत्र की प्राप्ति भी करनी चाहिए। इसलिए, तुम वायुदेव को बुला लेना और उनसे पुत्र की प्राप्ति कर लेना।’

पांडु के सुझाव के बाद, कुंती ने वायुदेव को बुला लिया और उनसे एक ऐसी बलवान पुत्र की माँग की जो सबका अहंकार नष्ट कर सके। कुंती की विनती सुनने के बाद, वायुदेव ने उसे एक शक्तिशाली पुत्र दे दिया। जब कुंती के उस पुत्र का जन्म हुआ, तो आकाश में एक दैवी आवाज़ ने घोषणा कर दी, ‘इस लड़के का नाम भीम होगा। यह सारे मनुष्यों में एक महा-बलशाली मनुष्य बनेगा और अनेक महान योद्धाओं को युद्ध में धुल चटाएगा।’

कुंती को जिस दिन भीम हो गया था, उसी दिन गांधारी ने दुर्योधन को जन्म दे दिया था।

भीम के जन्म के कुछ दिन बाद, कुंती एक ऊँचे पहाड़ पर भीम को अपने हाथों पर लेकर सुला रही थी। अचानक, उसके समने एक बाघ आ गया। बाघ को देखकर कुंती डर के कारण उछल गई और उसकी गोद से भीम पहाड़ की खाई में जा गिरा। नीचे बड़े-बड़े पत्थर और चट्टाने थी। छोटासा भीम ऊँचाई से गिरने के बाद उन चट्टानों पर ज़ोर से गिर गया। लेकिन भीम के शरीर को एक खरोंच तक नहीं आई और भीम जिस चट्टान पर गिर गया था, उसके टुकड़े-टुकड़े हो गए। यह दृश्य देखकर, पांडु को अचम्बित रह गया।

कुछ समय के बाद, पांडु को एक ऐसा पुत्र पाने की इच्छा हो गई, जो युद्ध की कला में अतिशय निपुण हो और पुरे विश्व में अपने युद्ध-कौशल्य के कारण प्रसिद्धी हासिल कर सके। पांडु ने सोचा कि ऐसे पुत्र को प्राप्त करने के लिए, इंद्र से उचित कोई और देवता नहीं हो सकता।

फिर पांडु कुंती के पास गया और उसे अपने मन की बात बता दी। पांडु के कुंती से कहा, ‘हे कुंती, मुझे युद्ध-कला में अतिशय निपुण बालक चाहिए। मुझे लगता है कि ऐसा बालक प्राप्त करने के लिए इंद्रदेव से उचित कोई और देवता नहीं हो सकते। ऐसे बालक की प्राप्ति के लिए, में घोर तपस्या करके इंद्रदेव को प्रसन्न करने जा रहा हूँ। जब तक में तप में लगा हुआ हूँ, तुम भी व्रत का पालन करके इंद्रदेव को प्रसन्न करो, ताकि उसके बाद, उनकी कृपा से हमें मनचाहा बालक मिल सके।’

फिर पांडु ने अपनी घोर तपस्या शुरू कर दी। वह दिन भर सिर्फ़ एक पैर पर खड़े होके, इंद्रदेव की आराधना करता रहा। उस समय कुंती ने भी अपने व्रत का पालन करना शुरू कर दिया था। ऐसे ही एक लम्बा काल चला गया और उसके बाद, इंद्र पांडु के समने प्रकट हो गया। इंद्र ने पांडु को एक ऐसे पुत्र का वरदान दे दिया, जो एक सर्वश्रेष्ठ योद्धा बन जाए।

फिर पांडु ने कुंती को इंद्र को अपने मंत्र से बुलाकर उससे पुत्र प्राप्त करने के लिए कहा। फिर कुंती ने इंद्र को बुला लिया और इंद्र ने कुंती को बालक प्रदान दिया। जब उस बालक का जन्म हो गया, तो एक दैवी आवाज़ ने आकाश में घोषणा कर दी कि उस बालक का नाम अर्जुन रखा जाए। जब वह दैवी आवाज़ आकाश में घोषणा कर रहा था, तब कुंती और अर्जुन के ऊपर आकाश से फुलों की बरसात हो रही थी। कई ऋषि-मुनि और देवता कुंती के सामने प्रकट होकर, उसके पुत्र की प्रशंसा कर रहे थे।

अर्जुन के जन्म के कुछ समय बाद, पांडु ने सोचा कि और पुत्रों की प्राप्ति की जाए। इस विचार से प्रेरित होकर, वह कुंती के पास आ गया और उसने कुंती को अन्य देवताओं को मंत्र से बुलाने के लिए कहा। लेकिन कुंती ने ऐसा करने से मना कर दिया। उसने कहा, ‘महाराज, मैं अब देवताओं को नहीं बुला सकती। जो स्त्री पाँच या पाँच से ज़्यादा पुरुषों के साथ सम्बंध बनाती है, ऐसी स्त्री एक वेश्या बन जाती है। इस कारण, में किसी और देवता को बुलाकर पुत्रों की प्राप्ति नहीं कर सकती।’

फिर एक दिन, माद्री पांडु से मिली और बड़े दुःख के साथ उसे अपने मन की व्यथा बताई। उसने पांडु से कहा, ‘महाराज, कुंती और मैं, हम दोनों आपनी पत्नियाँ हैं। कुंती को तो तीन पुत्रों की प्राप्ति हो चुकी है, लेकिन मेरी गोद अभी तक ख़ाली है। मैं भी माँ बनने का सुख चाहती हूँ। कृपा करके आप कुंती के पास जाइए और उससे यह विनती कीजिए कि उसका पुत्र-प्राप्ति का मंत्र मुझे मिल जाए। उस मंत्र की मदद से मैं भी देवताओं का आवाहन करके पुत्रों की प्राप्ति कर पाऊँगी।’

माद्री की विनती सुनकर, पांडु उसकी मदद करने के लिए तैयार हो गया। फिर पांडु कुंती के पास गया और उसे कहा कि वह माद्री को अपना मंत्र देकर देवताओं का आवाहन करने में उसकी मदद करे। कुंती ने माद्री को अपना मंत्र देने के लिए स्वीकृति दे दी। उसके बाद, कुंती माद्री के पास चली गई और उससे कहा, ‘हे माद्री, तुम्हें जिस देवता से पुत्र-प्राप्ति करनी है, उस देवता पर ध्यान लगाकर, तुम मेरे साथ इस मंत्र का उच्चारण करना। इससे तुम्हारे सामने वह देवता प्रकट हो जाएँगे और फिर तुम्हें इच्छित पुत्र को वरदान रूप में दे देंगे।’

फिर माद्री ने अश्विनी कुमारों के ऊपर अपना ध्यान लगाया और कुंती के पीछे-पीछे मंत्र को पढ़ना शुरू कर दिया। कुछ ही क्षणों में अश्विनीकुमार जुड़वाँ देवताओं के रूप में प्रकट हो गए और माद्री को गर्भवती बनाकर वहाँ से चले गए। उचित समय के बाद, माद्री ने दो जुड़वाँ लड़कों को जन्म दे दिया। कुंती के पुत्रों के तरह, जब माद्री के लड़कों का जन्म हो गया, तब एक दैवी आवाज़ ने आकाश में घोषणा कर दी कि लड़कों का नाम ‘नकुल और सहदेव’ रखा जाए।

कुछ समय ऐसे ही बीत गया। फिर एक दिन, पांडु कुंती के पास गया और उसने फिर से एक बार माद्री को मंत्र देने की विनती की। लेकिन पांडु की विनती को कुंती ने अस्वीकार कर दिया। कुंती ने पांडु से कहा, ‘महाराज, जब मैंने माद्री को पहली बार मंत्र दिया था, तो उसने जुड़वाँ देवताओं को बुलाकर दो पुत्रों की प्राप्ति कर ली। मैंने उसे कहा था कि वह केवल एक ही पुत्र की प्राप्ति कर सकती है। इस प्रकार, माद्री ने पहले ही मेरे साथ धोका किया हुआ है। अगर फिर से मैं उसे मंत्र दे दूँगी, तो शायद उसे और दो पुत्र हो जाएँगे और वह चार पुत्रों की माता बन जाएगी। मुझ से ज़्यादा पुत्र होने पर, वह मुझ से श्रेष्ठ बन जाएगी। इसलिए, अब मैं अपना मंत्र माद्री को नहीं दे सकती।’ ऐसा कहकर, कुंती ने माद्री को मंत्र देने से मना कर दिया और पांडु ने भी उस दिन के बाद कुंती से माद्री को मंत्र देने की विनती नहीं की।

इस प्रकार, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव इन पाँच पांडवों का जन्म एक-एक साल के अंतराल में हो गया। पाँचो पांडव अतिशय सुंदर और तेजस्वी बालक थे। हर एक बालक के जन्म के बाद, वन में रहने वाले ऋषि-मुनियों ने बालकों के नामकरण संस्कार किए थे।

पांडवों के जन्म के कुछ वर्षों बाद, एक दुखद घटना घटी। एक दिन, पांडु ने माद्री का आकर्षक रूप देखा और वह अपना संयम खो गया। उसने माद्री को पास लेने की कोशिश की। लेकिन किंदम ऋषि द्वारा दिए गए श्राप के कारण, माद्री के पास जाते ही पांडु की मृत्यु हो गई। माद्री ने भी पांडु के चिता में कूदकर उसका जीवन समाप्त कर दिया। फिर कुंती ने माद्री के बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी उसके कंधो पर उठा ली।

पांडु और माद्री की मृत्यु के बाद, कुंती वन के ऋषि-मुनियों के साथ हस्तिनापुर लौट आई। उस समय धृतराष्ट्र हस्तिनापुर पर शासन कर रहा था। ऋषि-मुनियों ने धृतराष्ट्र और भीष्म को घटित घटनाएँ बता दी। पांडु और माद्री की मृत्यु की खबर सुनकर, हर कोई दुखी हो गया। फिर कुंती और पांडव हस्तिनापुर में ही रहने लगे।

इस प्रकार, पांडव और कौरव महल में एकसाथ बढ़ने लगे और आगे जाकर, पांडवों ने और कौरवों ने कृपाचार्य और द्रोणाचार्य से शस्त्रविद्या की सिख ली।