कृप, द्रोण और अश्वत्थामा का जन्म (महाभारत की अनसुनी कहानियाँ -18)


 गौतम ऋषि का शरद्वत नामक एक पुत्र था। जब शरद्वत का जन्म हुआ था, तो वह अपने हाथों में बाणों को लेकर ही इस दुनिया में आया था। इस प्रकार, बचपन से ही उस बालक को शास्त्रों से कम और शस्त्रों से ज्यादा लगाव था।

एक दिन, शरद्वत ने ठान लिया कि जितनी लगन से कोई तपस्वी वेदों का ज्ञान पाने के लिए तपस्या करता है, उतनी ही लगन से वह शस्त्रों का ज्ञान पाने के लिए तपस्या करेगा। ऐसा निश्चय करने के बाद, शरद्वत ने हाथ में धनुष और बाण उठाएं और वह एक विशिष्ट आसन लगाकर भगवान की आराधना करने में लीन हो गया।

ऐसे ही कई साल बीत गए। उसकी घनघोर तपस्या के प्रभाव से इंद्र का आसन भी डोलायमान होने लगा। यह देखकर इंद्र घबरा गया। उसे लगा कि यह ब्राह्मण तपस्या से शक्तियां हासिल करके उसका इंद्रपद छीन लेगा। तो इंद्र ने शरद्वत की तपस्या भंग करने के लिए एक कुटिल योजना बनाई। उसने जनपदी नामक एक अप्सरा को बुलाया और उसे कहा, ‘हे जनपदी, पृथ्वी पर शरद्वत नामक एक ब्राह्मण शक्तियां पाने के लिए तपस्या कर रहा है। तुम अभी पृथ्वी पर जाओ और तुम्हारी सुंदरता का जाल फैलाकर उसकी तपस्या भंग कर दो।’

इंद्र का आदेश मानकर, जनपदी शरद्वत की तपस्थली पर आ गई।

उसने अतिशय अल्प वस्त्रों में शरद्वत के तपस्थली के आसपास भटकना शुरू कर दिया। जब शरद्वत की नजर उस पर पड़ी, तो अलौकिक सुंदरता वाला जनपदी का सुडौल शरीर देखकर, शरद्वत के मन में उसके के साथ मिलन करने की प्रबल इच्छा प्रकट हो गई। वह इच्छा इतनी तीव्र थी कि इससे शरद्वत का पूरा शरीर कंपायमान हो गया। लेकिन कुछ ही समय में तपस्या के प्रभाव के कारण शरद्वत ने अपने ऊपर आए हुए संकट को पहचान लिया। उसका विवेक जाग गया और उसने अपने इंद्रियों को फिर से वश में करते हुए, वासना के इस आवेग को रोक दिया। किंतु कुछ समय पहले आई हुई तीव्र उत्तेजना की लहर मैं उसका वीर्य अनैच्छिक रूप से स्खलित हो गया।

इतने वर्षों की अपनी साधना ऐसे खंडित होते देखकर, शरद्वत को असीम दुख हुआ। जो धनुष और बाण हाथ में लिए वह साधना में लीन था, वह धनुष और बाण उसके हाथों से नीचे गिर गए। ख़ुद के ऊपर उसे भारी संताप आया और उसने आत्म-विश्लेषण करने के लिए उस स्थान से दूर जाने का निश्चय कर लिया।

ऐसा निश्चय करने के बाद, शरद्वत उसी क्षण जनपदी अप्सरा से और उसके तपस्थली से कहीं दूर चला गया।

कुछ समय के बाद, पृथ्वी पर गिरा हुआ शरद्वत का तेजस्वी वीर्य दो हिस्सों में बट गया। उसके वीर्य के दो हिस्सों से एक लड़का और एक लड़की का जन्म हुआ। उन बालकों के स्थान के नज़दीक शरद्वत का धनुष्य और बाण भी गिरे हुए थे।

इसके कुछ समय के बाद, उस जगह पर राजा शांतनु शिकार करने के लिए चला गया। जब उस जगह पर शांतनु के कुछ सैनिक घूम रहे थे, तब एक सैनिक को धनुष और बाणों के बीच दो सुंदर बालक मिल गए। वह बच्चे जिस स्थिति में वहां पड़े थे, वह देखकर उस सैनिक ने यह अनुमान लगा लिया कि निश्चित रूप से उन बालकों को कोई वहां पर छोड़ कर चला गया है. यह देखकर वह उन दो बालकों को राजा शांतनु के पास लेकर चला गया। जब शांतनु ने उन बालकों को देखा, तो उसके दिल में उनके प्रति दयाभाव पैदा हो गया और उसने उन बालकों को अपने साथ महल ले जाने का फैसला कर लिया।

फिर शांतनु ने उन दोनों बालकों का भरण-पोषण कर के उन्हें बड़ा करने का फैसला कर लिया। शांतनु ने बालक का नाम ‘कृप’ और बालिका का नाम ‘कृपी’ रखा, क्योंकि उन दोनों बालकों को पहली बार देखने के बाद, शांतनु के दिल में अपार दयाभाव उत्पन्न हो गया था।

उधर शरद्वत ने भी अपनी तपस्या फिर से शुरू कर दी थी और उसने कई अमोघ शस्त्रों का ज्ञान हासिल कर लिया था। उसके दिव्यदृष्टि से वह देख रहा था कि उसका पुत्र और पुत्री राजा शांतनु के महल में बढ़ रहे हैं।

एक दिन, शरद्वत राजा शांतनु के पास चला गया और उसने शांतनु को बताया की कृप और कृपी दरअसल उसके बच्चे हैं। फिर उसने शांतनु को विस्तार से उनके जन्म की कहानी सुनानी शुरू कर दी।  शांतनु को वह कहानी सुनाने के बाद, उसने शांतनु से कहा की वह कृप को साथ ले जाकर उसे शस्त्र विद्या देना चाहता है। शांतनु ने उसकी विनती को स्वीकार करते हुए कृप को शरद्वत के पास ज्ञानार्जन करने के लिए भेज दिया। इस प्रकार से कृप ने अपने पिता से शस्त्रों की सारी विद्या सीख ली और कुछ ही समय में वह शस्त्रविद्या का ज्ञाता बन गया।

इसके कुछ साल बाद, जब कृप ने कौरवों और पांडवों को शस्त्रविद्या सिखानी शुरू कर दी, तो लोग उन्हें कृपाचार्य कहकर पुकारने लगे। इस कथा से हमें यह पता चला कि कृपाचार्य का जन्म कैसे हुआ था। अगली कथा हमें द्रोणाचार्य के जन्म के बारे में बताएगी।

गंगा के उद्गम स्थान पर, भारद्वाज ऋषि नाम के एक महान ऋषि रहते थे। वह अपने आश्रम में रहकर तपस्या में लीन रहते थे और सुबह गंगा को अर्घ्य देने के लिए नदीतट पर चले जाते थे।

एक दिन सुबह, वह गंगानदी अर्घ्य को देने के लिए नदी तट पर चले गए। उसी समय, ‘घ्रुताची’ नाम की स्वर्ग की अप्सरा भी गंगा नदी में स्नान करने के लिए वहां आई थी। जब भारद्वाज ऋषि गंगा नदी से बाहर आए, तो उन्होंने गंगा नदी के तट पर घ्रुताची को घूमते हुए देखा। उसके वस्त्र पानी से भीगे हुए थे। अप्सरा को ऐसी अवस्था में देखकर भारद्वाज ऋषि उसकी तरफ आकर्षित हो गए और उसके साथ मिलन करने की तीव्र इच्छा उनके मन में जाग गई।

इस उत्तेजना के कारण उनका वीर्य अनैच्छिक रूप से स्खलित हो गया। अपना वीर्य व्यर्थ ना जाए, यह सोचकर उन्होंने तुरंत उसको एक मिट्टी के एक द्रोण में उठा लिया। कुछ समय के पश्चात, उसी वीर्य से एक बालक का जन्म हो गया। उसका जन्म मिट्टी के द्रोण में रखे हुए वीर्य से हुआ था, इसलिए उसका नाम भी द्रोण रखा गया।

पिता के आश्रम में रहते हुए, द्रोण ने सारे शास्त्रों की विद्या आत्मसात कर ली। जब द्रोण की उम्र विवाह योग्य हो गई, तो भारद्वाज ऋषि ने उनका विवाह शरद्वत ऋषि की बेटी कृपी से कर दिया। इस प्रकार, द्रोण और कृपी अपने गृहस्थ जीवन का पालन करते हुए आश्रम में रहने लगे।

कुछ समय ऐसे ही बीतने के बाद, द्रोण ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए उनकी घोर तपस्या करना शुरू कर दिया। जब शिवजी उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए, तो द्रोण ने उनसे उन्हीं की तरह शूरवीर पुत्र वरदान के रूप में मांगा। उस वरदान के परिणाम स्वरूप, द्रोण और कृपी को एक लड़का हुआ। जब उस लड़के का जन्म हुआ, तब वह लड़का घोड़े की तरह हिनहिनाया। उसकी ऐसी हिनहिनाहट सुनकर, सारे आश्रमवासी आश्चर्यचकित हो गए और इस प्रकार उस बालक का नाम अश्वत्थामा पड़ गया। जब भारद्वाज ऋषि ने अश्वत्थामा की हिनहिनाहट सुनी, तो उन्होंने यह ऐलान कर दिया कि वह बालक भविष्य में खूब सारे क्षत्रियों का संहार करेगा।

भगवान शिवजी के कृपा से, अश्वत्थामा के ललाट पर जन्म से ही एक विशेष मणि लगा हुआ था। वह मणि अश्वत्थामा की भूख, प्यास, वेदना और थकावट इन चीजों से रक्षा करता था।