कच और संजीवनी (महाभारत की अनसुनी कहानियाँ -9)

 


शुक्राचार्य राक्षसों के गुरु थे।

घोर तपस्या करके, उन्होंने संजीवनी की विद्या हासिल कर ली थी। संजीवनी एक ऐसी विद्या थी, जिसकी मदद से मृतकों को पुनर्जीवित किया जा सकता था। जब शुक्राचार्य ने संजीवनी को अर्जित किया, तब उन्होंने युद्ध में मरने वाले राक्षसों को पुनर्जीवित करना शुरू कर दिया, जिससे राक्षस लड़ाईयों में लगभग अजेय बन गए।

देवताओं के गुरु, बृहस्पति, संजीवनी विद्या नहीं जानते थे, इस वजह से लड़ाई में देवता राक्षसों के सामने अत्यंत कमजोर पड़ने लगे।

अंत में, देवताओं ने एक तरकीब सोची। वह बृहस्पति के सबसे बड़े पुत्र, कच, के पास चले गए और उससे कहा, 'हे कच, जबसे शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या अर्जित की है, हमारा राक्षसों को हराना लगभग नामुमकिन हो चुका है। इस कारण, देवताओं के पास भी संजीवनी विद्या होना बहुत ज़रूरी हो गया है। लेकिन संजीवनी विद्या हमें इतनी आसानी से नहीं मिल सकती। हमें इस विद्या को शुक्राचार्य से पाना होगा। ऐसा मुश्किल काम तो बस तुम ही कर सकते हो। तुम शुक्राचार्य के पास जाकर उनके शिष्य बन जाओ और संजीवनी की विद्या प्राप्त करने का प्रयास करो।‘

देवताओं की विनती सुनने के बाद, कच उनकी मदद करने के लिए तैयार हो गया।

जाते जाते देवताओं ने कहा, ‘एक और बात याद रखना। शुक्राचार्य की देवयानी नामक एक बेटी है, और वह उन्हें बहुत प्रिय है। इसलिए तुम अगर उसको खुश करने में कामयाब हो गए, तो तुम्हें अपने काम में बहुत मदद मिलेगी।’

देवताओं की बातें कच ने बड़े ध्यान से सून ली और जल्द ही, वह राक्षसों की राजधानी के लिए चल पड़ा। वहाँ पहुँचकर, उसने शुक्राचार्य से मुलाक़ात की। मिलने के बाद, उसने शुक्राचार्य को बड़े आदर के साथ वंदन किया और उन्हें कहा, ‘हे ऋषिवर, मेरा नाम कच है। मैं बृहस्पति का सबसे बड़ा पुत्र हूँ। कृपा करके, मुझे आप अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लीजिए। अगर आप मुझे शिष्य रूप में स्वीकार कर लेते हैं, तो मैं ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करके एक हजार वर्षों तक आपकी सेवा करता रहूँगा।'

शुक्राचार्य ने सेवा के प्रति कच की कटीबद्धता को पसंद किया और उसे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया।

जैसे ही शुक्राचार्य ने कच को स्वीकार किया, उसने अपने गुरु की सेवा में ख़ुद को झोंक दिया। कच आश्रम के सारे कार्यों का ध्यान रखने लगा। वह जंगल में जाके अपने गुरु के लिए फल और फूलों की व्यवस्था करता। वह आश्रम की गायों का ख़याल रखता और उन्हें चराने के लिए खेत ले जाता। वह नदी से पानी भरकर आश्रम लेकर आता। इस तरह से, उसने शुक्राचार्य को अपनी सेवा परायणता से प्रसन्न कर दिया। देवताओं के उपदेश अनुसार, वह देवयानी को भी प्रसन्न कर देता। वह गायन, नृत्य और विभिन्न संगीत वाद्ययंत्रों की मदद से देवयानी का मनोरंजन करता। कभी-कभी वह जंगल से देवयानी के लिए भी फूल और फल लेके आता और उन्हें उपहार के रूप में देवयानी को दे देता। कच की सेवपरायणता को देखकर देवयानी भी उससे बहुत खुश रहती थी। धीरे-धीरे, देवयानी को कच के साथ समय बिताना अच्छा लगने लगा और कुछ समय के बाद, देवयानी को कच के प्यार हो बैठा।

ऐसे ही पाँचसौ साल बीत गए। आखिरकार, राक्षसों को कच के संजीवनी प्राप्त करने की योजना के बारे में पता चल ही गया। कच की योजना के बारे में सुनकर, वह क्रोधित हो गए और उन्होंने कच को कड़ा सबक सिखाने का फैसला किया।

एक दिन, जब कच जंगल के एक हिस्से में गायों को चरा रहा था, तब राक्षस वहाँ पर उसके पीछे-पीछे चले गए। फिर उन्होंने कच को जान से मार डाला। उसे मारने के बाद, राक्षसों ने उसके शरीर के टुकड़े करके, उन टुकड़ों को भेड़ियों और गीदड़ों को खिला दिया।

शाम के समय, सारी गाएँ कच के बिना ही आश्रम वापस लौट आयी। कच को ना देखकर देवयानी चिंतित हो गई। वह शुक्राचार्य के पास चली गई और उनसे कहा, 'पिताजी, सारी गाएँ आश्रम लौट आई है, लेकिन कच उनके साथ नहीं दिख रहा। वह अभी तक जंगल से नहीं लौटा। मुझे लग रहा है कि शायद उसके साथ कुछ बुरा हुआ है। कृपा करके आप उसका पता कीजिए।’

देवयानी के अनुरोध को सुनकर, शुक्राचार्य ने अपनी तपस्वी सिद्धियों का उपयोग किया। तब उन्हें ध्यान में पता चल गया कि कच की मौत हो चुकी है। यह जानकार, उन्होंने अपनी संजीवनी विद्या का उपयोग किया और कच को आश्रम बुलाया। संजीवनी की प्रभाव से, कच के शरीर के टुकड़े भेड़ियों और गीदड़ों का पेट चिरकर, उनसे बाहर आकर, शुक्राचार्य के आश्रम में उड़ते हुए आ गए। फिर वह टुकड़े आश्रम में एकत्रित को गए और इस प्रकार कच ज़िंदा हो गया।

कच ने अपनी जान बचाने के लिए शुक्राचार्य को धन्यवाद दिए। उसके बाद उसने शुक्राचार्य और देवयानी को बताया कि किस तरह उसे राक्षसों ने मार दिया था और जंगली जानवरों को खिला दिया था।

इस घटना के कुछ दिनों बाद, देवयानी ने कच को जंगल जाके कुछ फूल लाने के लिए कहा। जब कच जंगल में गया, तब राक्षसों ने उसे देखा और उसको जीवित देखकर वह चौंक गए। उन्होंने तब अनुमान लगाया की ज़रूर शुक्राचार्य ने अपने संजीवनी के बल पर उसे जीवनदान दिया होगा। फिर सारे राक्षस कुछ तरकीब ढूँढने लगे, जिससे कच संजीवनी के प्रभाव के पुनर्जीवित ना हो सके।

फिर उनको एक तरकीब सूझी। इस बार, राक्षसों ने कच को पकड़कर उसे मार दिया और उसके शरीर को पिसकर, पानी में मिलाकर, उसका एक घोल बना दिया। फिर उस घोल को उन्होंने समुद्र में मिला दिया। ऐसा करके, अब राक्षस आश्वस्त हो गए कि अब कच पुनर्जीवित नहीं हो पाएगा।

इसके बाद, जब कच शाम को आश्रम नहीं लौटा, तो देवयानी ने फिर से शुक्राचार्य से इस बारे में बात की। शुक्राचार्य ध्यान में चले गए और उन्हें कच की मौत का पता चल गया। एक बार फिर, उन्होंने संजीवनी का उपयोग किया और कच को बुला लिया। कच के शरीर के कण समुद्र से निकलकर उड़ते हुए शुक्राचार्य के आश्रम आ गए और वहाँ पर एकत्रित हो गए। इस प्रकार, कच फिर से पुनर्जीवित हो गया।

इसके कुछ दिन बाद, देवयानी ने कच को फलों के लिए जंगल में भेज दिया। फिर एक बार, राक्षस कच को जीवित देखकर चकित हो गए और सोच में डूब गए कि अब ऐसा क्या किया जाए कि जिससे कच का बचना नामुमकिन हो जाए। कुछ क्षण सोचकर फिर उन्होंने एक योजना बनायी। उन्होंने कच को मार डाला और उसके शरीर को जला दिया। फिर उन्होंने उसके शरीर की राख को शुक्राचार्य की शराब में मिला दिया और वह शराब शुक्राचार्य को पीने के लिए दे दी। दिन में शुक्राचार्य वह शराब पी गए।

उस दिन की शाम में, कच जंगल से वापस नहीं आया और देवयानी कच को लेकर चिंतित हो गई। वह फिर से शुक्राचार्य के पास चली गई और उन्हें कहा, 'पिताजी, कच फिर से गायब हो गया है। कृपा करके पता लगाइए कि वह कहाँ है?'

लेकिन शुक्राचार्य फिर से कच का पता लगाने में अनिच्छुक थे। उन्होंने देवयानी से कहा, 'देवयानी, राक्षसों ने कच को शायद फिर से मार दिया है। मुझे लगता है कि राक्षस उसे जीवित नहीं छोड़ेंगे, इसलिए उसे पुनर्जीवित करने का कोई मतलब नहीं है। तुम एक ऋषि की बेटी हो। तुम्हे नश्वर इंसानों में इतना आसक्त होना शोभा नहीं देता।’

शुक्राचार्य के वचन सुनकर देवयानी के आँसू फूट पड़े। फिर उसने फूटफूटकर अपने पिता से विनती की, 'पिताजी, कृपा करके आप कच के बारे में पता लगाइए। अगर कच को कुछ हो गया, तो में कच के बिना जी नहीं पाऊँगी।’

देवयानी की अवस्था देखकर शुक्राचार्य का दिल पिघल गया। वह अपनी बेटी को कभी भी दुःखी नहीं देख सकते थे। उन्होंने फिर से एक बार ध्यान लगाया और कच के बारे में खोजना शुरू किया। तब उन्हें ध्यान में पता चला कि कच मर चुका है। फिर से, उन्होंने संजीवनी का अवाहन किया और कच को बुलाने का निश्चय कर लिया। जैसे ही उन्होंने कच को बुलाया, शुक्राचार्य के पेट से कच ने बोलना शुरू किया, 'गुरुदेव, कृपया मुझे मत बुलाइए। में आपके शरीर में हूँ। अगर मैं आपके शरीर से बाहर आ गया, तो इससे आप के जान को हानि पहुँच सकती है।’

कच को अपने पेट से बातें करते हुए देखकर शुक्राचार्य को आश्चर्य हुआ। तब शुक्राचार्य ने कच से पूछा, ‘वत्स, तुम मेरे पेट में कैसे पहुँच गए?’ तब कच ने उन्हें सारी घटित घटना सुना दी कि कैसे राक्षसों ने उसे मारकर जला दिया और उसकी राख शुक्राचार्य के शराब में मिला दी।

कच की बातें सुनकर, शुक्राचार्य ने देवयानी से कहा, ‘देवयानी, कच मेरे पेट के अंदर है। अगर मैं संजीवनी का उपयोग करके उसे पुनर्जीवित करने की कोशिश करूँगा, तो वह मेरा पेट फाड़कर बाहर आ जाएगा और इससे मेरी तुरंत मृत्यु हो जाएगी।’

शुक्राचार्य की बातें सुनकर देवयानी के दुःख का ठिकाना न रहा। अत्यधिक दुखी होकर, उसने शुक्राचार्य से कहा, ‘पिताजी, मैं आपके बिना अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकती। आप कच को जीवित करने का कुछ और तरिका खोज निकालिए।’

शुक्राचार्य ने फिर कुछ क्षणों के लिए सोचा और उन्हें इस पेचीदा स्थिति पर एक समाधान मिल गया। उन्होंने कच से कहा, 'वत्स, इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए, मुझे एक समाधान मिल गया है। मैं तुम्हें संजीवनी विद्या अपने पेट में ही सिखा दूँगा। इससे जब तुम मेरा पेट चिरकर, मेरे शरीर से बाहर आ जाओगे, तब तुम संजीवनी का उपयोग करके, मुझे जीवित कर पाओगे।’

कच शुक्राचार्य की बातें सुनकर अत्यंत प्रफुल्लित हो गया। फिर शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या का ज्ञान कच को अपने पेट में दिया और संजीवनी की मदद से कच को अपने शरीर के बाहर बुला लिया। कच शुक्राचार्य का पेट चिरकर, उनके शरीर से बाहर निकला। जैसे ही वह बाहर आया, उसने संजीवनी की विद्या का उपयोग करके शुक्राचार्य को पुनर्जीवित कर दिया।

फिर वह अपने गुरु के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और उनसे कहा, ‘गुरुदेव, आपने मेरे जीवन को अपने ज्ञान से सिंचित कर दिया है, इसलिए मैं आपको ही अपना सच्चा पिता और अपनी सच्ची माता मानता हूँ। सच में, एक सच्चे गुरु से बड़ा कीमती उपहार इस जीवन में कोई नहीं है।’ ऐसा कहकर, कच ने शुक्राचार्य से आशीर्वाद लिया।

कच को जीवित करके, शुक्राचार्य सोच में डूब गए। उन्होंने सोचा कि राक्षस उन्हें कच की राख पिला सके, क्योंकि वह शराब पिते है। फिर उन्होंने सोचा कि शराब एक इंसान को अपने अच्छाई के रास्ते से भ्रष्ट कर देती है। उन्हें लगा कि ख़ास करके, शास्त्रों को जानने वाले विद्वान ब्राह्मणों को शराब नहीं पीनी चाहिए। इसके बाद, उन्होंने ब्राह्मणों को शराब पीने से रोकने के लिए एक शाप दे दिया। उन्होंने कहा, 'इस दिन से, अगर कोई भी ब्राह्मण शराब पीने का अपराध करता है, तो वह पाप किसी दूसरे ब्राह्मण को मारने के बराबर का पाप माना जाएगा। लोग ऐसे ब्राह्मणों का तिरस्कार करेंगे और ऐसा व्यक्ति अपने ब्राह्मणत्व से गिरा हुआ घोषित कर दिया जाएगा।’

इसके बाद, शुक्राचार्य ने उन राक्षसों को बुलाया, जिन्होंने कच की राख उनके शराब में मिलाई थी। उन्होंने राक्षसों को बड़ी सख्ती से निर्देश दिए, 'कच ने मुझसे संजीवनी का ज्ञान सफलतापूर्वक प्राप्त कर लिया है। फिर भी, वह कुछ समय के लिए मेरे पास रहेगा और मेरी सेवा करेगा। भविष्य में किसी भी तरह से उसे नुकसान मत पहुँचाना। नहीं तो, तुम्हारे उस काम के परिणाम अच्छे नहीं होंगे।’

इसके बाद, कच शुक्राचार्य के आश्रम में शांति से रहकर उनकी सेवा करता रहा। शुक्राचार्य के निर्देश के बाद, राक्षसों ने कच को परेशान नहीं किया।

कुछ सालों के बाद, कच ने अपनी हजार वर्षों की सेवा पूरी की। अपनी सेवा पूरी करने के बाद, उसने अपने घर लौटने की अनुमति शुक्राचार्य से ले ली।

इसके बाद, कच देवयानी के पास चला गया और उसे बताया कि उसकी एक हजार वर्षों की सेवा का व्रत अभी पूरा हो गया है और वह अपने घर वापस जा रहा है।

कच की बात सुनकर, देवयानी ने उससे कहा, 'कच, मुझे तुमसे प्यार हो गया है और में तुमसे शादी करना चाहती हूँ। तुम्हारे एक हजार वर्ष के ब्रह्मचर्य का व्रत अब पूरा हो गया है। तुम मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लो। फिर हम, शास्त्रों के अनुसार शादी कर लेंगे।’

देवयानी की बातें सुनकर, कच ने उसे विनम्रता से जवाब दिया, 'हे देवयानी, मुझे खेद है, लेकिन मैं तुम्हारा प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सकता। तुम मेरे गुरु की पुत्री हो, इसलिए तुम्हारे प्रति मुझे गुरू के जैसा ही आदरभाव है। इसलिए, मैं तुम्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता।'

कच का जवाब सुनकर देवयानी दु:खी हो गई लेकिन फिर भी उसने कच को समझाने की कोशिश की, 'कच, तुम जब तक यहाँ पे थे, मैंने हमेशा ही तुम्हारा ध्यान रखा है। में अगर पिताजी को बार-बार विनती नहीं करती, तो तुम फिर से ज़िंदा नहीं होते। क्या तुम्हें इन चीज़ों के बारे में थोड़ी भी परवाह नहीं है? मैंने हमेशा ही तुम्हे अपने पति के रूप में सोचा है, इसलिए तुम्हारा मुझे छोड़कर जाना उचित नहीं है।’

देवयानी की बातें सुनकर कच ने उसे जवाब दिया, 'हे देवयानी, मैंने तुम्हें पहले ही बता दिया है कि मैं तुम्हारा अपने गुरु के बराबर सम्मान करता हूँ। इसके अलावा, तुम्हारा जन्म अपने पिता के शरीर के अंश से हुआ है और मेरा पुनर्जीवन भी उनके शरीर में रहने के बाद ही हुआ है। चूँकि हम दोनों उनके पेट में रह चुके है, हमारा रिश्ता एक-दूसरे के प्रति भाई-बहन की तरह है, इसलिए में तुम्हारा प्यार स्वीकार नहीं कर सकता।'

अंत में, जब देवयानी को पता चला कि कच उसका स्वीकार नहीं करेगा, तो वह क्रोधित हो गई। उसने ग़ुस्से में आकर कच को कहा, 'यदि तुम मेरा स्वीकार नहीं करना चाहते तो ठीक है, लेकिन तुम अब मेरे शाप के लिए तैयार हो जाओ। तुम्हारे द्वारा अर्जित की हुई संजीवनी विद्या तुम्हारे कभी काम नहीं आएगी। तुम किसी को भी इस विद्या से जीवनदान नहीं दे पाओगे।’

कच ने तब देवयानी को उत्तर दिया, 'हे देवयानी, मैंने कोई बुरा काम नहीं किया है, इसलिए में इस शाप के लायक नहीं हूँ। फिर भी, तुमने मुझे यह शाप दिया है। अब तुम मेरी भी एक बात सुन लो। तुमने मुझे यह शाप एक ब्राह्मण के साथ शादी करने की इच्छा से दिया हुआ है। अब मैं भी शाप देता हूँ कि तुम्हारी शादी किसी भी ब्राह्मण से कभी भी नहीं होगी। तुम्हारे शाप के कारण भले ही संजीवनी का मेरा आवाहन व्यर्थ हो जाए, लेकिन जिस किसी को में संजीवनी का ज्ञान दूँगा, उसके लिए संजीवनी की विद्या ज़रूर काम आएगी।’

इस प्रकार, कच ने देवयानी को शाप दिया और उसने फिर स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया। स्वर्ग में सारे देवता उसके आगमन का इंतजार कर रहे थे। जैसे ही कच ने स्वर्ग में प्रवेश किया, इंद्र और अन्य सभी देवताओं ने बड़े धूमधाम से उसका स्वागत किया।