भीष्म का जन्म (महाभारत की अनसुनी कहानियाँ -13)

 


यह कथा तब की है, जब महाभिष नाम का राजा पृथ्वी पर राज्य करता था।

महाभिष बहुत ही शूरवीर राजा था, उसे सारे अस्त्रों और शस्त्रों को चलाना आता था। शूरवीर होने के बावजूद, वह सदाचारी भी था और हमेशा सत्य-वचन बोलता था। उसके जीवन काल में उसने एक हजार अश्वमेध यज्ञ किए थे। इसके परिणामस्वरूप उसने इंद्र को प्रसन्न कर लिया था और उसे स्वर्ग की प्राप्ति हो गयी थी।

एक दिन स्वर्ग में, सारे निवासी ब्रह्माजी का पूजन करने के लिए एकत्रित हो गए थे। उस समारोह में कई सारे देवता, कई पुण्यात्मा राजा-महाराजा और अनेक ऋषि-मुनि उपस्थित थे। उस सभा में महाभिष भी था और वहाँ पर, नदीयों में श्रेष्ठ, गंगा भी मौजूद थी। गंगा की दैवी सुंदरता देखकर, महाभिष पहले ही उसके तरफ़ आकर्षित हो गया था।

जब ब्रह्माजी की पूजा शुरू हो गई, तब अचानक कहीं से एक हवा का झोंका आया और उसके कारण, गंगा का शुभ्र वस्त्र ऊपर उठ गया। वस्त्र ऊपर उड़ने के कारण, गंगा का सुंदर शरीर सबको दिखाई दिया। विनयशीलता के कारण, जो भी सभा में मौजूद था, उन्होंने अपनी आँखें नीचे झुका दी। सिर्फ महाभिष गंगा के शरीर को अभिलाषा से देखता रहा।

जब ब्रह्माजी ने महाभिष का यह कृत्य देखा, तो उन्हें उसकी असभ्यता पर बहुत गुस्सा आ गया। फिर उन्होंने महाभिष को शाप देते हुए कहा, ‘हे राजन, गंगा के शरीर को अभिलाषा के नजरों से देखते हुए, तुमने अपनी असभ्यता का प्रदर्शन किया है। जिस प्रकार, इतने श्रद्धास्पद समूह में तुमने यह काम किया है, उससे यह सिद्ध हो जाता है कि तुम स्वर्ग में रहने लायक नहीं हो। इसलिए मैं तुम्हें शाप देता हूँ कि तुम पृथ्वी पर मनुष्य रूप में जन्म लोगे। इसके साथ, मैं यह भी बता देता हूँ कि जहाँ-जहाँ तुम जाओगे, गंगा भी तुम्हारे पीछे-पीछे पृथ्वी पर आती रहेगी। गंगा तुम्हें अपनी कृत्यों से गुस्सा दिलाती रहेगी। गंगा ने किए हुए कार्य तब इतने हिंसक होंगे कि तुम उन्हें देखकर कोपित हो जाओगे। जब तुम्हारा क्रोध इतना बढ़ जाएगा कि उसके शरीर के प्रति तुम्हारी वासना ख़त्म हो जाएगी, तब मेरा शाप भी उठ जाएगा। तुमने पिछले जन्म में अच्छे काम किए हैं। इसको याद करते हुए, मैं तुम्हें पथ्वीपर तुम्हारे माता और पिता चुनने की छूट दे देता हूँ।’

ब्रह्माजी का शाप सुनकर, महाभिष को अपने किए का बहुत पछतावा हो गया। फिर उसने ब्रह्माजी से कहा, ‘हे प्रभु, मैंने सच में एक बहुत बड़ा पाप किया है और इस पाप का प्रायश्चित मुझे ज़रूर करना चाहिए। मैं पृथ्वी पर जन्म लेने के लिए तैयार हूँ। आपने मुझे मेरे माता और पिता चुनने की अनुमति दे दी, इसके लिए में आपका ऋणी हूँ। मैं चाहता हूँ कि मैं प्रतिपा नामक एक सदाचारी राजा के यहाँ जन्म लूँ।’

ब्रह्माजी ने महाभिष की यह विनती स्वीकार कर ली।

उसके बाद, महाभिष स्वर्ग से पृथ्वी की ओर चल पड़ा। ब्रह्माजी के वचनों के अनुसार गंगा भी महाभिष के पीछे-पीछे स्वर्ग से निकल पड़ी।

जब गंगा स्वर्ग से बाहर निकल रही थी, तब उसे रास्ते में आठ वसु मिल गए। (वसु स्वर्ग में रहने वाले आठ देवता हैं) गंगा ने देखा कि वसु काफ़ी दुखी और तेजोहिन दिखाई दे रहे थे। उनकी ऐसी दयनीय हालत देखकर, गंगा ने उन्हें पूछा, ‘हे वसुओं, तुम इतने दुखी क्यों हो?’

तब वसुओं ने गंगा से कहा, ‘हे माँ गंगे, हमें वशिष्ठ ऋषि ने शाप दे दिया है कि हमें पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में जन्म लेना पड़ेगा। मनुष्य के रूप में जन्म लेने के लिए तो हमें किसी सामान्य स्त्री की कोख से जन्म लेना पड़ेगा। इससे हम काफ़ी विचलित है और यही हमारे दुःख का कारण है।’

जब गंगा ने वसुओं की बात सुनी, तो उसने उनके कठिन परिस्थिति पर एक समाधान प्रस्तुत किया। उसने कहा, ‘ब्रह्माजी के वचनों के अनुसार, मुझे भी पृथ्वी पर जाकर रहना पड़ेगा। मैं जब पृथ्वी पर चली जाऊँगी, तो मैं तुम्हारी माँ बनकर तुम्हें शाप से मुक्त करने में मदद करूँगी। इस प्रकार, तुम्हें किसी सामान्य स्त्री की कोख से जन्म नहीं लेना पड़ेगा और तुम्हारे समस्या का समाधान हो जाएगा।’

गंगा का समाधान सुनकर, सारे वसु आनंदित हो गए। फिर गंगा ने उनसे पूछा, ‘लेकिन मुझे एक बात बताओ कि तुम अपने पिता के रूप में किसे चाहते हो?’ गंगा का प्रश्न सुनकर, वसुओं ने उसे उत्तर दिया, ‘प्रतिपा नाम के सदाचारि राजा के घर शान्तनु नामक एक शूरवीर राजा का जन्म होगा। हमें महाराज शान्तनु ही हमारे पिता के रूप में चाहिए।’

वसुओं ने किया हुआ पिता का चयन देखकर, गंगा आनंदित हो गई। उसके बाद, उसने वसुओं से कहा, ‘वसुओं, तुमने अपने पिता के रूप में शान्तनु को चुनकर, मुझे काफ़ी राहत दी है। ब्रह्माजी के वचनों के अनुसार, जब में पृथ्वी पर चली जाऊँगी, तब मेरा राजा महाभिष के साथ विवाह होना निश्चित है। यह राजा महाभिष ही भविष्य में शान्तनु के रूप में राजा प्रतिपा के घर जन्म लेने वाले हैं। इस प्रकार, जब में शान्तनु से शादी करूँगी, तो में तुम्हारी माँ बन जाऊँगी और शान्तनु तुम्हारे पिता बन जाएँगे।’

जब गंगा ने अपनी बात पूरी की, तो वसुओं ने उसे एक विचित्र अनुरोध किया। उन्होंने कहा, ‘हे माँ गंगे, हम चाहते हैं कि पृथ्वी पर हमारे जन्म से कुछ की क्षणों के बाद, तुम हमें अपने पानी में डुबोकर मार डालो, ताकि हमें पृथ्वी पर ज्यादा समय नहीं रहना पड़े और हमें अपना दिव्य शरीर तुरंत वापस मिल जाए।’

वसुओं की विनती को गंगा ने स्वीकार किया। उसने वसुओं से कहा, ‘मैं तुम्हें वचन देती हूँ कि मैं सात पुत्रों को जन्म देने के बाद तुरंत अपने पानी में डुबोकर पृथ्वी से मुक्त कर दूँगी। परंतु, मैं आँठवें पुत्र को नहीं मारना चाहती। इससे, मेरे और मेरे पति के बीच जो सम्बंध स्थापित हुए हैं, वह व्यर्थ नहीं जाएँगे।’

गंगा के इस शर्त का वसुओं ने स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा, ‘हम आठ वसु अपने शक्तियों का आँठवाँ हिस्सा तुम्हारे आँठवे पुत्र को दे देंगे। हम सबके आशीर्वाद से, वह आँठवा पुत्र बलशाली और शूरवीर बनेगा। लेकिन हमारी ऐसी इच्छा है कि वह आँठवा पुत्र जीवन में पुत्रहिन रहे।’ वसुओं ने रखी हुई ये शर्त गंगा ने मान ली।

गंगा के साथ ऐसा वार्तालाप करके, वसु अपने-अपने रास्ते चले गए और गंगा महाभिष के पीछे-पीछे पृथ्वी पर चली आई।

उस समय, पृथ्वी पर राजा प्रतिपा अपनी राजगद्दी को छोड़कर गंगा के उद्गम स्थान पर बैठकर, तपस्या करने में व्यस्त था। एक दिन, गंगा एक सुंदर युवती का रूप लेकर, नदी के पानी से निकलकर बाहर आ गई और राजा प्रतिपा के दाहिने जाँघ पर बैठ गई। उस समय, राजा प्रतिपा अपनी तपश्चार्य करते हुए ध्यान में बैठे हुए थे। गंगा दाहिने जाँघ पर बैठते ही, राजा प्रतिपा का ध्यान टूट गया। अपने नज़दीक एक अतिशय सुंदर युवती को देखकर, वह चकित हो गया। फिर प्रतिपा ने उस सुंदर युवती से पूछा, ‘हे सुंदरी, तुम्हारी सुंदरता सच में अवर्णनिय है। तुम कौन हो और तुम क्या चाहती हो?’

तब गंगा ने कहा, ‘मैं तुमसे शादी करना चाहती हूँ।’ गंगा का उत्तर सुनकर प्रतिपा ने उसके निवेदन को विनम्रता से मना कर दिया। उसने कहा, ‘हे सुंदरी, मैं तुम्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि मुझे तुम्हारे वर्ण के बारे में नहीं पता।’

तब गंगा ने कहा, ‘हे राजन, मैं कोई सामान्य स्त्री नहीं हूँ, मैं तो यहाँ स्वर्ग से आई हूँ, इसलिए मेरा कोई वर्ण नहीं है।’

उसके बाद, प्रतिपा ने कहा, ‘हे सुंदरी, मैंने अपनी राजगद्दी को छोड़ दी है और ब्रह्मचर्य का व्रत लेकर रखा है। अभी मैं यहाँ वन में रहकर तपस्या में रत हूँ। इसके अलावा, तुम मेरे दाहिने जाँघ पर बैठी हो और दाहिनी जाँघ हमेशा पुत्री या फिर पुत्रवधू इसके लिए होती है। इस कारण, मैं तुम्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता। लेकिन मैं तुम्हें अपनी पुत्रवधू के रूप में जरूर स्वीकार कर सकता हूँ। जब मुझे लड़का होगा, तो मैं उसकी शादी तुम्हारे साथ कर दूँगा।’

जब गंगा ने प्रतिपा के वचन सुने, तो गंगा ने राजा से कहा, ‘हे राजन, मैं तुम्हारे पुत्र के साथ विवाह करने के लिए तैयार हूँ, लेकिन मेरी एक शर्त है। तुम्हारे पुत्र ने कभी, मेरे किसी कार्य को लेकर मुझसे प्रश्न नहीं करना चाहिए। अगर उसने कभी मेरे कार्य को लेकर मुझसे तर्क-वितर्क किया, तो मैं उसे सदा के लिए छोड़ कर चली जाऊँगी।’ प्रतिपा ने गंगा की इस शर्त को स्वीकार कर लिया। उसके बाद, गंगा वहाँ से गायब हो गई और अपने दैवी लोक वापस चली गई।

गंगा को दिया हुआ वचन निभाने के लिए, प्रतिपा ने अपनी तपस्या छोड़ दी। पुत्र को जन्म देने के लिए, वह अपने राजमहल वापस आ गया।

कुछ समय के बाद, राजा प्रतिपा पिता बन गया। उसकी पत्नी ने एक तेजस्वी बालक को जन्म दे दिया। प्रतिपा ने उस बालक का नाम शान्तनु रखा। ब्रह्माजी के शाप के अनुसार, महाभिष ने ही शान्तनु के रूप में पृथ्वी पर जन्म लिया था।

जब शान्तनु बड़ा हो गया और उसकी आयु शादी करने योग्य हो गई, तब एक दिन, प्रतिपा ने उसे कहा, ‘मेरे बेटे, अब तुम्हारी आयु शादी करने लायक हो चुकी है। तुम मेरी बात ध्यान से सुनना। एक दिन, एक दैवी सुंदरता वाली युवती तुम्हारे पास आएगी और तुमसे शादी करने की इच्छा व्यक्त करेगी। तुम उसे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेना। इसके अलावा, मैं अभी जो तुम्हें बताऊँगा, उस बात को ध्यान से सुनना। शादी के बाद, उस सुंदरी को तुम कभी उसके कार्यों के बारे में प्रश्न मत करना। तुम्हें उसके कार्य बहुत निष्ठुर लग सकते हैं, लेकिन उसके साथ इस बारे में कोई तर्क-वितर्क मत करना। अगर तुमने उसके कार्यों को लेकर उससे कोई सवाल पूछा, तो वह तुम्हें छोड़कर सदा के लिए चली जाएगी।’

इस प्रकार, प्रतिपा ने अपने बेटे को समझाया और शान्तनु को राजगद्दी पर बिठाके, वह वन में तपस्या करने चला गया।

एक दिन, शान्तनु शिकार करने के लिए वन में चला गया। जब वह गंगा नदी के किनारे पानी पीने के लिए आ गया, तो उसे नदी के तट पर घूमती हुई अत्यंत सुंदर युवती दिखाई दी। उस युवती ने एक सफेद वस्त्र पहना हुआ था और उसका शरीर खूब सारे दैवी आभूषणों से विभूषित था।

जैसे ही शान्तनु ने उसे देखा, वह उसके प्यार में पड़ गया। वह अत्यंत सुंदर युवती कोई और नहीं, बल्कि गंगा ही थी।

फिर शान्तनु गंगा के पास गया और बड़ी विनम्रता से उससे पूछा, ‘हे सुंदरी, तुम कौन हो और नदी के तट पर तुम क्या कर रही हो? शान्तनु का प्रश्न सुनकर, गंगा ने उसको उत्तर दिया। उसने कहा, ‘हे राजन, तुम्हारे पिता ने तुम्हें मेरे बारे में बताया ही होगा। मैं वही दैवी युवती हूँ, जिसके भाग्य में तुमसे शादी करना लिखा हुआ है।’

गंगा के मुँह से शादी की बात सुनकर, शान्तनु का चेहरा आनंदित हो गया। शान्तनु की ख़ुशी देखकर गंगा ने कहा, ‘हे राजन, में आपसे शादी करने के लिए तैयार हूँ, लेकिन उसके लिए आपको मेरी एक शर्त स्वीकार करनी पड़ेगी।’ शान्तनु ने कहा, ‘अगर तुम मुझसे शादी करने के लिए तैयार हो, तो मैं तुम्हारी किसी भी शर्त को स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ।’

यह सुनकर गंगा ने कहा, ‘मेरी शर्त ऐसी है कि शादी के बाद, तुम कभी मेरे कार्य को लेकर मुझसे प्रश्न नहीं करोगे। मेरा कार्य चाहे कितना भी निर्दयी क्यों ना लगे, अगर तुमने मुझसे उस बारे में तर्क-वितर्क किए, तो मैं तुम्हें सदा के लिए छोड़ कर चली जाऊँगी।’

शान्तनु गंगा की विलक्षण सुंदरता को देखकर, उसके प्रति इतना मोहित हो गया था कि कुछ सोचे बिना ही उसने यह शर्त स्वीकार कर ली। उसने गंगा का परिचय तक नहीं पूछा और जल्दी से शादी करने के लिए गंगा को विनती की।

जैसे ही शान्तनु ने गंगा की शर्त को ‘हाँ’ कर दिया, गंगा शान्तनु से शादी करने के लिए मान गई। फिर शान्तनु गंगा को लेकर अपने राज्य वापस आ गया और उसने गंगा के साथ शादी कर ली।

शादी के बाद, दोनो ने एक दूसरे के साथ खुशी-खुशी रहना शुरू कर दिया। गंगा के प्यार में जैसे शान्तनु पूरी दुनिया भूल गया था। गंगा को पाकर, वह मन ही मन ख़ुद को बड़ा भाग्यशाली समझने लगा था।

ऐसे कुछ दिन बितने के बाद, गंगा गर्भवती हो गई। कुछ महीनों के बाद, गंगा ने अपने पुत्र को जन्म दे दिया। अपने पुत्र को जन्म देने के बाद, गंगा ने अपने पुत्र को गोद में उठाया और उसे अपने साथ गंगानदी के तट पर लेकर गई। फिर, गंगा ने उस नन्हें से बालक को नदी के पानी में यह कहते हुए डुबो दिया कि – मेरे बच्चे, मैं यह तुम्हारे भलाई के लिए ही कर रही हूँ।

गंगा को अपने पुत्र को पानी में डुबोता देखकर, शान्तनु एकदम दंग रह गया। वह गंगा से इस बारे में प्रश्न करने ही वाला था, तो उसे याद आ गया कि उसने गंगा को ‘प्रश्न ना करने का’ वचन दिया था। उसे लगा कि शायद दूसरा पुत्र होने पर, गंगा का ह्रदय-परिवर्तन हो जाएगा, लेकिन दूसरा पुत्र होने के बाद भी गंगा ने उसे नदी में डुबो दिया। यह दृश्य देखकर, शान्तनु का हृदय खूब विचलित हुआ। लेकिन वह गंगा को कुछ नहीं बोल पाया। मन ही मन, उसे डर लग रहा था कि कहीं गंगा उसे छोड़कर ना चली जाए।

ऐसा करते-करते, गंगा ने अपने सात बालकों को शान्तनु के सामने नदी में डुबोकर मार दिया। हर बार, बालक पैदा होते ही गंगा उसको अपने साथ नदी के तट पर ले जाती और उस बालक को - ‘मेरे बच्चे, यह मैं तुम्हारे भलाई के लिए ही कर रही हूँ’ - ऐसा कहकर, नदी में डुबो देती।

अपने सात पुत्रों को आँखों के सामने मृत्यु के घाट उतरते देख, शान्तनु का दिल अब पूरी तरह से विदीर्ण हो चुका था। जो गंगा पहले उसे सुख की मूर्ति लगती थी, अब वही गंगा उसे बच्चों को मारने वाली डाकिण लगने लगी थी। उसे यही समझ में नहीं आ रहा था कि कोई माँ अपने बच्चों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार भला कैसे कर सकती है। उसे यह भी समझ नहीं आ रहा था कि इतना कोमल व्यवहार करने वाली गंगा बालक को जन्म देते ही कैसे बदल जाती है। सात बार ऐसा भयंकर और निर्दई दृश्य देखने के बाद, अब शान्तनु से रहा नहीं जा रहा था। उसने मन में ठान लिया था कि जो भी हो जाए, वह अपने आठवें पुत्र को ज़रूर बचाएगा।

कुछ समय ऐसे ही बीत गया और गंगा ने अपने आँठवें पुत्र को जन्म दे दिया। फिर गंगा ने अपने पुत्र को गोद उठाया और उसे उठाकर, वह नदी के तट की ओर चलने लगी। शान्तनु जानता था कि गंगा इस बच्चे को भी पानी में डुबोकर मारने वाली है, इसलिए शान्तनु भी गंगा के पीछे-पीछे नदी के तट की तरफ चलने लगा। जैसे ही गंगा अपने पुत्र को नदी में डूबाने के लिए आगे बढ़ी, शान्तनु ने आगे आकर उसका हाथ पकड़ लिया और क्रोधित होकर उससे कहा, ‘हे नारी, तुम कैसी माँ हो? क्या तुम्हारे दिल में अपने बच्चों के लिए कोई प्यार नहीं है? इन बच्चों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? इन निर्दोष बालकों को तुम क्यों मार रही हो?’

जैसे ही शान्तनु ने गंगा से ये सवाल पूछे, गंगा ने अपने बालक को गोद में पकड़कर मंद-मंद तरीके से मुस्कुराना शुरू किया। फिर अचानक से उसने अपना सामान्य मानवी रूप छोड़कर, एक दिव्य रूप धारण कर लिया। फिर उसने शान्तनु के साथ बातें करना शुरू कर दिया। उसने कहा, ‘हे राजन, तुमने मुझे वादा किया था कि तुम मेरे किसी कार्य को लेकर, मुझसे कभी प्रश्न नहीं पूछोगे। लेकिन आज तुमने मुझ से प्रश्न पूछकर, अपने वचन को तोड़ दिया है। इसलिए मैं तुम्हारे साथ अब नहीं रह सकती। मैं तुम्हें छोड़कर जा रही हूँ।’

गंगा का दिव्य रूप देखकर, शान्तनु पूरी तरह से चकित हो चुका था।

फिर शान्तनु ने गंगा से कहा, ‘हे देवी, कृपा करके मुझे बताओ कि तुम कौन हो और अपने ही पुत्रों को तुमने क्यों मारा? इन बालकों की मृत्यु के बारे में जब मैं सोचता हूँ, तो मेरा ह्रदय दुःख से विदीर्ण हो जाता है। मैं यही सोचने लग जाता हूँ कि इन बच्चों की मृत्यु के लिए मैं भी ज़िम्मेदार हूँ, क्योंकि मैं स्वार्थ के कारण सब कुछ शांति से देखता रहा। मैंने तुम्हें यह पाप करने से नहीं रोका। ऐसा सोचकर, मैं बहुत दुखी हो रहा हूँ।’

राजा की भावनाओं को सुनकर, गंगा ने उसे धीरज बंधाना शुरू किया। गंगा ने कहा, ‘हे राजन, तुम इतना दु:खी मत बनो। मैं नदियों में श्रेष्ठ गंगा हूँ और जो सात पुत्र मैंने पानी में डुबो दिए हैं, यह स्वर्ग में रहने वाले ‘वसु’ नामक देवता हैं। वशिष्ठ ऋषि के शाप की वजह से उन्हें पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा था। मैंने उनके जन्म लेने के कुछ क्षणों के बाद उन्हें अपने प्रवाह में डुबो दिया और उनकी मानवी शरीर से मुक्तता की। यह सब मैंने उनकी इच्छा के अनुसार किया। इसलिए, तुम उनके मृत्यु पर दु:ख व्यक्त मत करो। तुम उनके मृत्यु के लिए कदापि ज़िम्मेदार नहीं हो।’

गंगा का स्पष्टीकरण सुनकर, शान्तनु के हृदय को थोड़ी शांति मिल गई। फिर उसने गंगा से पूछा, ‘हे देवी, इन्होंने ऐसा क्या गुनाह किया था कि वशिष्ठ ऋषि ने इनको पृथ्वी पर जन्म लेने का शाप दे दिया?’

तब गंगा ने शान्तनु को वसुओं के द्वारा की हुई चोरी के बारे में बताना शुरू किया, ‘वशिष्ठ मुनि के पास एक दिव्य गाय थी, जिसका नाम नंदिनी था। नंदिनी सारे घरेलू जानवरों में सबसे श्रेष्ठ थी। नंदिनी के पास मनचाही चीज प्रदान करने की अद्भुत शक्ति थी। ऐसी नंदिनी दिनभर वशिष्ठ मुनि के आश्रम में रहती, आसपास के खेत में जाकर चारा खाती और आजू-बाजू के जंगलों में आनंद से विचरण करते रहती थी। एक दिन, आठ वसु अपने परिवारों के साथ पृथ्वी पर भ्रमण कर रहे थे, तब उन्हें अचानक से नंदिनी दिखाई दी। उन वसुओं में एक वसु था, जिसका नाम था ‘द्यु’। नंदिनी को देखकर द्यु ने अपने पत्नी से कहा कि जो मनुष्य नंदिनी का दूध पिता है, वह मनुष्य दस हजार सालों तक जवान रहता है। द्यु के वचन सुनकर, उसकी पत्नी नंदिनी के तरफ़ आकर्षित हो गई। द्यु के पत्नी ने द्यु से कहा कि हम नंदिनी को घर लेकर जाते हैं ताकि में इसे अपने एक दोस्त को दे सकूँ। अपने पत्नी की बातें सुनकर, द्यु ने पहले तो उसे मना कर दिया। लेकिन द्यु ने मना करने पर, उसकी पत्नी उससे रूठ गई। अंत में, अपने पत्नी को मनाने के लिए, द्यु ने नंदिनी की चोरी करने की ठान ली। द्यु को लगा कि ऐसा करके, वह अपने पत्नी की नज़र में ऊपर उठ जाएगा। द्यु ने नंदिनी को चुराना चाहा, लेकिन नंदिनी उसके साथ नहीं जाना चाहती थी। फिर द्यु और उसके सात भाइयों ने मिलकर नंदिनी की ज़बरदस्ती से चोरी कर ली। नंदिनी को लेकर, सारे वसु स्वर्ग चले गए।

शाम को, जब वशिष्ठ ऋषि को नंदिनी आश्रम में नहीं दिखी, तो उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से नंदिनी की खोज करना शुरू कर दिया। तब उन्हें पता चला कि नंदिनी को चुराकर, आठ वसु उसे स्वर्ग ले गए हैं।

जैसे ही वशिष्ठ ऋषि को इस चीज का पता चला, वह एकदम क्रोधित हो गए। क्रोध में आकर उन्होंने सारे वसुओं को शाप दे दिया कि चोरी के दुष्कर्म के लिए उन्हें सामान्य मनुष्य की तरह, पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ेगा।

जब वसुओं को वशिष्ठ ऋषि के शाप के बारे में पता चला, तो सारे वसु उनके चरणों में गिर पड़े और उनसे अपने किए की माफ़ी माँगने लगे। वसुओं का गिड़गिड़ाना देखकर, वशिष्ठ ऋषि के मन में दया का भाव उत्पन्न हो गया। उन्होंने वसुओं को उपशाप देते हुए कहा कि द्यु को छोडकर, बाक़ी सब लोगों को पृथ्वी पर लम्बे समय तक नहीं रुकना पड़ेगा। चोरी के दुष्कर्म का मुख्य कर्ता तो द्यु है। द्यु को पृथ्वीपर लम्बे समय तक रहना पड़ेगा और मनुष्य जन्म की यातनाएँ भोगनी पड़ेगी।

हे राजन, जिन सात पुत्रों को जन्म के तुरंत बाद, मैंने अपने पानी में डुबोया हैं, वे वही सात वसु हैं, जिन्हें पृथ्वीपर बस कुछ ही क्षणों के लिए रुकने का उपशाप मिला था। लेकिन यह आँठवा बालक जो मेरी गोद में सो रहा है, यह वही अभागा द्यु है, जिसे अपनी पूरी आयु पृथ्वी पर मनुष्य रूप में रहना है।

हे राजन, इस प्रकार आप अपने सात बालकों के मृत्यु पर शोकाकुल मत होना।’

इतना कहकर, गंगा अपने आठवें पुत्र के साथ वहाँ से अंतर्धान हो गई।

गंगा के वहाँ से जाने के बाद, शान्तनु दु:खी हृदय के साथ अपने राजमहल वापस लौट आ गया। उसे इस बात का दुख हो रहा था कि गंगा अपने साथ उस के आठवें पुत्र को भी लेकर चली गई थी और इस प्रकार, उसका वंश आगे बढ़ाने के लिए, उसके पास अब कोई नहीं था।

ऐसे ही कुछ साल बीत गए। एक दिन शान्तनु गंगा नदी के तट पर शिकार करने के लिए चला गया था। तब अचानक उसने देखा कि नदी का प्रवाह काफी छोटा हो गया है। यह अद्भुत दृश्य देखकर, उसने इसके कारण की खोज करना शुरू कर दिया। तब कुछ ही दूरी पर, उसे एक तेजस्वी युवक दिखाई दिया, जिसने एक दैवी शस्त्र से गंगा के पूरे प्रवाह को रोककर रखा था।

उस तेजस्वी युवक को देखकर, शान्तनु को ऐसा लगा कि जैसे वह युवक उसका और गंगा का आँठवाँ पुत्र था, जिसे गंगा अपने साथ लेकर चली गई थी। जैसे ही शान्तनु उस युवक से बात करने के लिए आगे बढा, उस युवक ने अपनी दैवी विद्या का इस्तेमाल करके राजा को भ्रमित कर दिया और वह युवक वहाँ से अंतर्धान हो गया। यह चमत्कार देखने के बाद, शान्तनु ने गंगा के तट पर बैठकर गंगा को प्रार्थना करना शुरू कर दिया, ‘हे देवी, कृपा करके अपना आँठवाँ पुत्र मुझे वापस दे दो, ताकि मेरा वंश आगे बढ़ सके।’

शान्तनु की प्रार्थना सुनकर, गंगा उस तेजस्वी युवक के साथ नदी के तट पर प्रकट हो गई और उसने शान्तनु से कहा, ‘हे राजन, यह तेजस्वी युवक आपका और मेरा आँठवाँ पुत्र हैं। मैंने इसका नाम ‘देवव्रत’ रखा हुआ है। मैं देवव्रत को आपको लौटाने आई हूँ, ताकि आपका वंश आगे बढ़ सके। इतने सालों में, मैंने इसे सारे शस्त्रों और शास्त्रों का ज्ञान दे दिया है। देवव्रत राजा के सारे कर्तव्यों को भी भलीभाँति जानता है। इस प्रकार, इसका विद्याभ्यास भी पूर्ण हो चुका है और यह राजा बनने के लिए सक्षम है। आप इसे ले जाइए। यह भविष्य में बहुत सारे महान कार्यों को अंजाम देने वाला है।’

गंगा की बातें सुनकर, शान्तनु आनंदित हो गया। उसके बाद वह अपने पुत्र को लेकर हर्षोल्हास के साथ अपने राजधानी लौटकर आ गया।

राजधानी में लौटने के बाद, शान्तनु ने देवव्रत को अपने राजगद्दी का वारिस घोषित कर दिया।

यही देवव्रत आगे चलकर अपने भीषण प्रतिज्ञा की वजह से ‘भीष्म’ इस नाम से जगप्रसिद्ध हो गया।