भरत वंश की शुरुआत (महाभारत की अनसुनी कहानियाँ -8)

 


एक उस समय की कथा है, जब पृथ्वी पर दुष्यंत नाम का एक बहादुर और सदाचारी राजा रहता था।

दुष्यंत का साम्राज्य पूरी पृथ्वी पर फैला हुआ था और वह अपनी प्रजा के साथ नैतिकता से व्यवहार करता था। वह इतना शक्तिशाली था कि वह मंदार पर्वत को अपने बाहों में उठा सके। दैवी हथियारों के बारे में भी उसे ज्ञान था। जब वह लड़ाई करता था, तो वह सूरज की भाँति चमकता था।

दुष्यंत की तरह , उसकी प्रजा भी बहुत गुणी थी। लोग किसी भी भौतिक परिणाम की अपेक्षा के बिना, अपने कर्तव्य में रत रहते थे।

उसके राज्य की ज़मीन इतनी उपजाऊ थी कि खेतों में ख़ूब मेहनत किए बिना ही, पर्याप्त अनाज का उत्पादन हो जाता था। इस प्रकार से, प्रजा राजा दुष्यंत के राज्य में खुशी से रहती थी।

एक दिन, दुष्यंत को शिकार के लिए जाने की इच्छा हो गई। उसने कुछ चुने हुए बहादुर सैनिकों और मंत्रियों को इकठ्ठा किया और वह जंगल की ओर चल पड़ा।

शिकार करने के लिए, दुष्यंत ने एक घने जंगल को चुन लिया। वह जंगल विभिन्न प्रकार के जानवरों से भरा हुआ था। जंगल में पहुँचते ही राजा और उसके सैनिकों ने अपने हथियार निकाले और उन्होंने जंगली जानवरों की शिकार करना शुरू कर दिया। राजा ने जब अपनी शिकार पूरी की, तब सारे सैनिक खाना खाने के लिए बैठ गए और उन्होंने खाना खाना शुरू कर दिया। लेकिन दुष्यंत के मन में अभी भी शिकार करने की इच्छा थी। इसलिए जब सारे सैनिक अपनी भूख बुझाने में व्यस्त थे, दुष्यंत ने अपने भरोसेमंद मंत्रीयों और सैनिकों के साथ दूसरे जंगल में प्रवेश किरने की ठान ली।

जंगल में लम्बा अंतर चलने के बाद, उसे एक विशाल बंजर भूमि नज़र आ गई। इतना चलने के बावजूद सिर्फ़ एक बंजर भूमि को देखकर, वह परेशान हो गया। अचानक, उस बंजर भूमि के दूसरे छोर पर, उसने कुछ हरियाली देखी। हरियाली को देखकर उसके चेहरे पर एक मुस्कान छा गई। वह उस बंजर भूमि को पार करके, उस हरियाली की ओर आगे बढ़ा। वहाँ पर, उसे एक बहुत ही ख़ूबसूरत जंगल मिल गया।

उस दूसरे जंगल में कई घने पेड़ थे। उन पेड़ों को कई लताओं ने सुशोभित करके रखा था। जंगल की ज़मीन पर मुलायम घास फैली हुई थी।

उस जंगल का हर एक पेड़ फलों से भरा हुआ था और जंगल में आल्हादित करने वाली हवा चल रही थी। फूलों से लदी हुई हरी-भरी घास उस हवा पर झूल रही थी और पक्षियों की किलोल ने पूरे क्षेत्र को संगीतमय बना दिया था।

दुष्यंत उस वन की असीम सुंदरता को देखकर उसमें खो गया। उस जगह की दैवी सुंदरता को देखकर वह अपनी भूख और प्यास को भी भूल चुका था।

जंगल की सुंदरता का आनंद लेते हुए, दुष्यंत जंगल में चलने लगा। कुछ समय के बाद, उसे वहाँ पर किसी ऋषि का आश्रम दिखाई दिया। वह आश्रम मालिनी नदी के किनारे स्थित था। उस आश्रम के अंदर बहुत से ब्राह्मण ऋग्वेद के पवित्र मंत्रों का जाप कर रहे थे। दुष्यंत को पता था कि कण्व ऋषि का आश्रम भी मालिनी नदी के किनारे स्थित था। तो राजा ने यह सोचा कि उसके सामने जो आश्रम स्थित था, वह कण्व ऋषि का ही होना चाहिए। ऐसा सोचकर, वह कण्व ऋषि का आशीर्वाद लेने के लिए उत्सुक हो गया और उसने कण्व ऋषि को मिलने का फैसला कर लिया। फिर उसने अपने सैनिकों को आश्रम के बाहर रुकने की आज्ञा दी और स्वयं एक सामान्य परिवेश पहनकर उस आश्रम में चला गया।

आश्रम में प्रवेश करने पर, उसने चारों ओर कण्व ऋषि की खोज करना शुरू कर दिया, लेकिन उसे कण्व ऋषि कहीं दिखाई नहीं दिए। फिर उसने वहाँ पर बैठे हुए ब्राह्मणों को कण्व ऋषि की कुटिया के बारे में पूछा। फिर वहाँ पर बैठे ब्राह्मणों ने उसे कण्व ऋषि की कुटिया दिखाई। कण्व ऋषि के आशीर्वाद के उत्सुक राजा ने फिर उस कुटिया के परिसर में प्रवेश किया। उसे उस कुटिया के परिसर में भी कोई नहीं मिला। तो फिर उसने पुकार लगाई, 'क्या कोई अंदर है?'

जैसे ही दुष्यंत ने आवाज़ लगाई, तपस्वी वेश में एक सुंदर युवती मुस्कुराते हुए कुटिया से निकल कर आ गई और उसने दुष्यंत का स्वागत किया। दुष्यंत का स्वागत करने के बाद, उसने दुष्यंत को पैर धोने के लिए पानी दिया और राजा से कुटिया में पधारने का कारण पूछा।

दुष्यंत ने कहा, 'मैं कण्व ऋषि का आशीर्वाद लेना चाहता हूँ, लेकिन वह मुझे आश्रम में कहीं मिले नहीं। तो में उन्हें ढूँढते-ढूँढते, उनके कुटिया तक आ गया।’

फिर उस युवती ने उत्तर दिया, 'मेरे पूज्य पिताजी फल लेने जंगल में गए हुए हैं। वह शीघ्र ही लौट कर आ जाएँगे। कृपया उनके आने तक आप प्रतीक्षा कीजिए।’

युवती की बात सुनकर दुष्यंत चकित रह गया। वह युवती कण्व ऋषि को अपना पिता बता रही थी, लेकिन राजा को पता था की कण्व ऋषि तो ब्रह्मचारी है। अपना संदेह दूर करने के लिए फिर से दुष्यंत ने उस युवती से पूछा, ‘प्रसिद्ध कण्व ऋषि तो एक सच्चे ब्रह्मचारी हैं। यह संभव नहीं है कि वह आपके पिता हैं। कृपया मुझे सच्चाई बताइए कि आप कौन हो?’

तब, वह युवती मुस्कुराई और उसने दुष्यंत से कहा, 'हे राजा, तुम सच बोल रहे हो। कण्व ऋषि तो ब्रह्मचारी हैं। दरसल बात ऐसी है कि में उनके शरीर के अंश से पैदा नहीं हुई हूँ, लेकिन उन्होंने ही मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया है। इस कारण, में उन्हें ही अपना पिता मानती हूँ। मैं अब तुम्हें अपने जन्म की कहानी सुनाती हूँ, ताकि में तुम्हारी शंकाओं का समाधान कर सकूँ।’

तभी दुष्यंत ने उस युवती की आकर्षक मुस्कान देखी और वह उसके प्रति आकर्षित हो गया। फिर उसने देखा कि उस युवती का शरीर भी बड़ा सुडौल है और उसके व्यवहार में भी विनम्रता भरी हुई है। उस युवती के इतने सारे गुण देखने के बाद, दुष्यंत उसके प्यार में पड गया।

उस युवती ने अपने जन्म की कहानी दुष्यंत को सुनानी शुरू कर दी, ‘बहुत समय पहले, विश्वामित्र ऋषि घोर तपस्या में लगे हुए थे। विश्वामित्र के तप के कारण इंद्र का आसान डोलयमन हो रहा था। इंद्र ने सोचा कि विश्वामित्र इंद्रपद को छिनने की इच्छा से तप कर रहे हैं। इसलिए, वह सतर्क हो गया और उसने ठान ली कि वह विश्वामित्र की तपस्या भंग करके रहेगा। फिर उसने मेनका नामक एक स्वर्गीय अस्परा को बुलाया और विश्वामित्र को आकर्षित करके उनकी तपस्या भंग करने का आदेश उसे दे दिया। लेकिन मेनका इस कार्य को नहीं करना चाहती थी। विश्वामित्र के क्रोधी स्वभाव के बारे में उसे पता था। वह डर रही थी कि कहीं विश्वामित्र उसे कोई भयानक शाप ना दे बैठे। किंतु, इंद्र ने मेनका की एक ना सुनी। वह अपने आदेश पर टिका रहा और उसने मेनका को किसी भी हालत में विश्वामित्र की साधना भंग करने के लिए कहा।

आखिरकार, मेनका विश्वामित्र के पास जाने के लिए तैयार हो गई, लेकिन उसने अपनी सहायता के लिए दो और देवताओं को साथ भेजने के लिए इंद्र से विनती की। मेनका ने कहा की उसे विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए वायुदेव और कामदेव की सहायता चाहिए। इंद्र ने सहजता से अन्य दो देवताओं को उसके साथ भेजकर, उसे आवश्यक सहायता प्रदान करने के लिए अपनी सहमत दे दी।

इसके बाद, मेनका ने विश्वामित्र की साधना स्थली में प्रवेश किया और विश्वामित्र के चारों ओर उसने नृत्यगान करना शुरू कर दिया। मेनका के नृत्यगान की वजह से विश्वामित्र की समाधि कुछ क्षण के लिए खुल गई। ठीक उसी समय, वायुदेव ने हवा का एक तेज़ झोंका पैदा किया और इससे मेनका के कपड़े उड़ गए। मेनका ने अपने कपड़े पकड़ने का बहुत प्रयास किया, लेकिन वह अपने कपड़ों को नहीं पकड़ पायी। तब विश्वामित्र ने मेनका के सुंदर शरीर को देखा। ठीक उसी समय, कामदेव ने अपनी जादू चलायी और विश्वामित्र के मन में मेनका के साथ मिलन करने की तीव्र इच्छा पैदा हो गई।

विश्वामित्र ने मेनका को अपनी इच्छा के बारे में बताया। विश्वामित्र से मिलन के लिए मेनका ने अपनी सहमति दर्शाई। फिर, मेनका और विश्वामित्र के सम्बंध के परिणामस्वरूप मेनका गर्भवती हो गई।

निश्चित समय के बाद, मेनका ने एक लड़की को जन्म दिया। तभी इंद्र ने आकर उसे बताया कि अब पृथ्वी पर उसका कार्य समाप्त हो चुका है और उसे स्वर्ग में वापस आना पड़ेगा। इंद्र का आदेश मानकर, उसने अपनी बालिका को मालिनी नदी के किनारे रखा और वह स्वर्ग के लिए रवाना हो गई।

वह बालिका मालिनी नदी के तट पर बड़ी ही असहाय स्थिति में पड़ी रही। उस क्षेत्र में कई खतरनाक जानवर अक्सर आते थे, इसलिए उस बालिका की जान को काफ़ी ख़तरा था। कुछ समय बाद, गिद्धों के एक झुंड ने उसे देखा। उस अनाथ को देखकर उनके मन में दया का भाव उत्पन्न हुआ और उसकी रक्षा करने के लिए गिद्धों ने उसे चारों ओर से घेर लिया।

बाद में, कण्व ऋषि मालिनी नदी के किनारे से अपने आश्रम लौट रहे थे, तब उन्होंने उस निराधार बालिका को गिद्धों के झुंड के बीच में देखा। उस बालिका को देखकर उनके मन में करुणा का भाव प्रकट हो गया और वह उसे घर लेकर आ गए। उन्होंने उस बालिका को आश्रय प्रदान किया और उसे अपनी बेटी के रूप में पाल-पोसकर बड़ा किया। हे राजन्! मैं वही बालिका हूँ।

शास्त्रों ने कहा है कि पिता तीन प्रकार के हो सकते हैं। पहले प्रकार का पिता हमें शरीर प्रदान करता हैं। दूसरे प्रकार का पिता हमारे शरीर की रक्षा करता हैं और तीसरे प्रकार का पिता हमारा पालन-पोषण करता हैं। इस प्रकार से, मैंने हमेशा कण्व ऋषि को अपना सच्चा पिता माना हैं।

कण्व ऋषि ने मुझे पक्षियों (शाकुंतों) से घिरा हुआ पाया था, इसलिए उन्होंने मुझे ‘शकुंतला’ नाम दिया। शकुंतला का अर्थ है, पक्षियों द्वारा संरक्षित।’

दुष्यंत शकुंतला के जन्म की कहानी सुनकर बेहद रोमांचित हो गया। उसने शकुंतला से कहा, 'शकुंतला, तुम्हारा सुंदर रूप देखकर मुझे तुमसे प्यार हो गया है। कृपया मेरा प्रस्ताव स्वीकार करो और मेरी पत्नी बन जाओ। मैं तुम्हारे लिए सब कुछ करने को तैयार हूँ। मैं तुम्हारे लिए दुनिया के सबसे कीमती रत्न और आभूषण ले आऊँगा। अगर वह पर्याप्त नहीं हैं, तो मैं तुम्हें अपना पूरा राज्य भी देने के लिए तैयार हूँ। कृपया मेरे प्यार का स्वीकार करो। हम इसी पल गंधर्व विधि का उपयोग करके शादी कर सकते हैं, ताकि हमारी शादी के लिए केवल आपसी समझौता ही पर्याप्त हो।'

शकुंतला ने फिर दुष्यंत को जवाब दिया, 'हे राजन, मुझे लगता है कि हमें मेरे पिता के लौटने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। उनकी अनुमति मिलने के बाद ही हमें शादी करनी चाहिए।'

लेकिन शकुंतला से शादी करने के लिए, दुष्यंत कुछ क्षण भी रुकने के लिए तैयार नहीं था। अपना प्रस्ताव स्वीकार करने के लिए, उसने शकुंतला को मनाने का प्रयास किया। उसने कहा, 'हे प्रिये, धर्म ने कहा है कि गंधर्व रूप से किया हुआ विवाह क्षत्रियों के लिए स्वीकार्य है। हम धर्म के अनुरूप जाकर ही विवाह कर रहे हैं, इसीलिए में तुम्हें मेरा प्रस्ताव स्वीकार करने का अनुरोध करता हूँ।'

अंत में, शकुंतला ने दुष्यंत का प्रस्ताव स्वीकार किया और कहा, 'हे राजन, मैं आपकी पत्नी बनने के लिए तैयार हूँ, लेकिन मेरी एक शर्त हैं। आपका और मेरा पुत्र ही आपके सिंहासन का उत्तराधिकारी होना चाहिए।'

दुष्यंत ने खुशी-खुशी शकुंतला द्वारा रखी गई शर्त को सहमति प्रदान की और उसके साथ गंधर्व रूप से विवाह कर लिया। विवाह करने के बाद उसने शकुंतला को गले लगा लिया। शकुंतला के साथ मिलन के बाद, दुष्यंत ने उससे वादा किया, 'शकुंतला, अब मुझे अपनी राजधानी लौट जाना चाहिए। कुछ दिनों में, मैं अपनी सेना को यहाँ भेजूँगा और तुम्हें अपने राजधानी लेके जाऊँगा।’

ऐसा कहने के बाद, दुष्यंत कण्व ऋषि के आश्रम से अपनी राजधानी की ओर चल पड़ा। अपनी वापसी की यात्रा पर उसे बड़ी चिंता हो रही थी। उसे लग रहा था कि शायद कण्व ऋषि अपने बेटी के इस प्रकार के विवाह से खुश नहीं होंगे।

दुष्यंत के जाने के कुछ समय बाद कण्व ऋषि जंगल से अपने कुटिया में लौट आए, लेकिन शकुंतला उनका स्वागत करने दरवाजे पर नहीं गई। उसने जो शादी का निर्णय लिया था, उस निर्णय से वह बहुत शर्मिंदा थी। उसे लग रहा था कि कण्व ऋषि उसके निर्णय से नाराज़ हो जाएँगे।

लेकिन कण्व ऋषि ने पहले से ही अपनी दिव्यदृष्टि के माध्यम से शकुंतला के विवाह के बारे में जान लिया था। जैसे कण्व ऋषि ने अपने कुटिया में प्रवेश किया, उन्होंने शकुंतला से बात की। उन्होंने उससे कहा, 'बेटी, तुम्हें शर्मिंदा होने की कोई ज़रूरत नहीं है। गंधर्व रूप से किया हुआ विवाह क्षत्रिय धर्म के विरुद्ध नहीं है। इसके अलावा, राजा दुष्यंत एक बहादुर राजा है। तुम दोनों का पुत्र भी उसके जैसा ही शक्तिशाली होगा। यह मेरा आशीर्वाद है कि तुम्हारा पुत्र बड़ा होके चारों दिशाओं में अपने राज्य का विस्तार करेगा और अंत में, वह पूरी पृथ्वी पर शासन करेगा।'

कण्व ऋषि की बातें सुनकर, शकुंतला को बहुत राहत मिली। उसने आदरपूर्वक अपने पिता के पैर छू लिए। फिर उसने कण्व ऋषि से कहा, ‘पिताजी, पहले तो में बहुत चिंतित थी लेकिन आपकी बातें सुनकर मुझे बहुत राहत मिली है। कृपा करके मुझे एक और आशीर्वाद दीजिए। में चाहती हूँ कि पुरु वंश के राजाओं का राज्य कभी खंडित ना हो।’

शकुंतला की इच्छा सुनकर, कण्व ऋषि ने उसे मनचाहा आशीर्वाद दे दिया। पुरु वंश के राजाओं के लिए अखंडित राज्य की कामना करके, शकुंतला ने दुष्यंत का राज्य मानों सुरक्षित कर लिया था क्योंकि दुष्यंत भी पुरु वंश का ही राजा था।

कुछ दिन बाद, दुष्यंत से हुए मिलन के परिणामस्वरूप शकुंतला ने गर्भ धारण किया।

उचित समय के बाद, शकुंतला ने एक तेजस्वी बच्चे को जन्म दिया, जो दिखने में अतिसुंदर था। वह बच्चा बहुत जल्दी बड़ा हो गया और बड़े होने के दौरान उसने अपार शक्ति अर्जित की। केवल छे साल की उम्र में, वह बाघ, शेर, हाथी और सूअर जैसे जंगली जानवरों की शिकार करने लगा। इतनी छोटी उम्र में, वह सारे जंगली जानवरों को बाँध लेता था और फिर उनकी सवारी करता था। आश्रम के निवासी उसकी करतूत देखकर दंग रह जाते। उसके ऐसे कारनामे देखकर, सबने उसे 'सर्वदमन' कहना शुरू कर दिया, क्योंकि उसने सभी जंगली जानवरों को अपने अधीन कर लिया था।

एक दिन जब कण्व ऋषि ने बालक की ऐसी अपार शक्ति का अवलोकन किया, तो उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, 'राजा दुष्यंत को आश्रम छोड़े हुए काफी समय हो चुका है, लेकिन अभी तक उन्होंने कोई संदेश नहीं भेजा है। मुझे लगता कि दुष्यंत के बेटे ने अभी आवश्यक ताकत हासिल कर ली है और राजा के रूप में उसके राज्याभिषेक का यह सही समय है। इसके अलावा, शकुंतला भी कई सालों से इसी आश्रम में रही है। एक विवाहित लड़की को अपने माता-पिता के स्थान पर ज्यादा समय तक नहीं रहना चाहिए, क्योंकि इससे उसकी प्रतिष्ठा खराब हो जाती है। इसलिए हमें जल्द से जल्द शकुंतला को राजधानी ले जाना चाहिए।’

इस प्रकार, कण्व ऋषि ने अपने एक शिष्य को शकुंतला और सर्वदमन के साथ दुष्यंत के राज्य की राजधानी भेज दिया।

राजधानी पहुँचने के बाद, शकुंतला दुष्यंत के दरबार में चली गई, जहाँ दुष्यंत अपने पुरोहितों, उपदेशकों और मंत्रियों के साथ बैठा हुआ था।

फिर शकुंतला ने दुष्यंत से कहा, 'हे राजन, में कण्व ऋषि का आश्रम छोड़कर अभी आपके साथ यहाँ रहने आयी हूँ। मेरे साथ यह जो बालक है, वह हमारा पुत्र है। अब, कृपया आप अपना वचन पूरा करें और इसका राज्यभिषेक करें।’

शकुंतला की बात सुनकर दुष्यंत ने उसे बड़े आश्चर्य से देखा। फिर दुष्यंत ने उससे कहा, 'हे स्त्री, तुम कौन हो और यह लड़का कौन है? तुम किस वचन की बात कर रही हो? मुझे कुछ भी याद नहीं है। मेरे दरबार आकर ये कैसी बातें कर रही हो। अब चुपचाप तुम यहाँ से चली जाओ।’

दुष्यंत की बातें सुनकर शकुंतला को अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। पहले तो उसे अपने आपपर बड़ी शर्म महसूस हुई, लेकिन कुछ क्षणों के बाद उसके शरीर में क्रोध की लहर सी आ गई। उसने फिर क्रोध में आकर दुष्यंत से कहा, 'हे राजन, आप सच जानते हैं लेकिन फिर भी आप झूठ का सहारा ले रहे हैं। आप सोचते हैं कि जिस क्षण आप मुझसे मिले थे, उस क्षण आप अकेले थे। लेकिन आप सर्वव्यापी भगवान को भूल रहे हैं। वह भगवान ही अब हमारे विवाह का साक्षी है। वह भगवान जानता है कि कण्व ऋषि के आश्रम में आपने मेरे साथ गंधर्व रूप से विवाह किया था। वह जानता है कि मैं आपकी पत्नी हूँ और यह आपका बेटा है, जिसे मैंने अपने गर्भ में पाला है। जब यह पैदा हुआ था, तो एक दैवी आवाज ने घोषणा की थी कि वह भविष्य में एक सौ अश्व-मेध यज्ञ करेगा। शास्त्र भी कहते हैं कि एक समर्पित पुत्र पूर्वजों को नरक से बचाता है और एक वफादार पत्नी अपने पति का साथ मृत्यु के बाद भी नहीं छोड़ती। लेकिन फिर भी, यदि आप इतने हृदयहीन हैं कि आप मुझे अस्वीकार करना चाहते हैं, तो मैं आश्रम लौट जाऊँगी। लेकिन आपको अपने पुत्र को स्वीकार करना होगा। आपको उसे सिंहासन का उत्तराधिकारी बनाना होगा।’

किंतु, शकुंतला की भावनात्मक भाषा का दुष्यंत पर कोई असर नहीं पड़ा। उसने शकुंतला को असंवेदनशील आवाज में जवाब दिया, 'हे स्त्री, जो मैंने पहले कहा है, मैं अभी भी वही कह रहा हूँ। में तुम्हें और तुम्हारे इस पुत्र को नहीं जानता। मुझे पता है कि में सच बोल रहा हूँ और तुम झूठ बोल रही हो। अब, मेरे दरबार से निकल जाओ।’

दुष्यंत के शब्दों से शकुंतला अत्यधिक क्रोधित हो गई। फिर उसने दुष्यंत से कहा, 'हे राजन, आप मुझे झूठी कह रहे हो लेकिन मुझे पता है कि सत्य सबसे बड़ा गुण हैं। एक सत्य का मूल्य तो एक हजार अश्व-मेध यज्ञों से भी अधिक होता है। तो, यह स्पष्ट रूप से जान लीजिए कि में सच बोल रही हूँ और आप झूठ बोल रहे हो। आप अपने वचन से विचलित होकर, बहुत बड़ा पाप कर रहे हो। लेकिन एक बात का आप भी ध्यान रखिए। जब आप संसार से विदा हो जाओगे, तो मेरा पुत्र पूरी पृथ्वी पर विजय प्राप्त कर लेगा और फिर कई सालों तक इस धरा पर राज करेगा।'

फिर शकुंतला अपने बेटे के साथ दरबार छोड़कर, आश्रम जाने के लिए निकली। जैसे ही वह पीछे मुड़ी, एक दैवी आवाज़ ने सम्पूर्ण दरबार में आकाशवाणी कर दी। उस दैवी ध्वनि के द्वारा की गई घोषणा को दरबार में बैठे सभी पुरोहितों और मंत्रीयों ने भी सुन लिया। उस आकाशवाणी ने कहा, 'हे राजा दुष्यंत, शकुंतला सच बोल रही है। वह तुम्हारी पत्नी है और यह लड़का तुम्हारा ही पुत्र है। अब, इन दोनों का स्वीकार करो और लड़के का नाम ‘भरत’ रख दो।'

जैसे ही दुष्यंत ने आकाशवाणी सुनी, उसका चेहरा ख़ुशी से प्रफुल्लित हो गया। फिर उसने खुशी-खुशी अपने दरबार में बैठे सभी लोगों को बताया कि वह शुरू से ही सच्चाई जानता था। लेकिन अगर उसने शकुंतला और उसके बेटे का स्वीकार सिर्फ़ शकुंतला के बातों पर भरोसा रखकर किया होता, तो उनका स्वीकार उसके राज्य की प्रजा कभी नहीं करती। इसलिए प्रजा के मन से संदेह दूर करने के लिए, उसे यह सब नाटक करना पड़ा।

दुष्यंत फिर अपनी पत्नी और बेटे के पास पहुँच गया। उसने अपने बेटे को गले लगा लिया और शकुंतला को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। आकाशवाणी के निर्देशरूप उसने अपने लड़के का नाम ‘भरत’ रख दिया।

और जैसा कि उसने शकुंतला से वादा किया गया था, उसने भरत को अपने सिंहासन पर बिठाके उसका राज्यभिषेक कर दिया।

इसके बाद, भरत ने पृथ्वी पर सभी राजाओं को जीत लिया और कई महान यज्ञ किए। उसके वीरता को सन्मानित करते हुए लोगों ने उसे ‘चक्रवर्ती’ और ‘सार्वभौम’ जैसी कई उपाधियाँ प्रदान की।

राजा भरत के नाम से ही भारतीय उपमहाद्वीप का नाम ‘भारत’ रखा गया।