अर्जुन की विद्यानिष्ठा (महाभारत की अनसुनी कहानियाँ -20)

 


आख़री कथा में हमने देखा कि किस प्रकार द्रोणाचार्य ने राजकुमारों को अपनी छत्रछाया में लेकर उन्हें शस्त्रविद्या का ज्ञान प्रदान करना शुरू कर दिया। राजकुमारों की उचित पढ़ाई हो पाए इसलिए भीष्म ने द्रोणाचार्य को उनके आश्रम के लिए एक बहुत बड़ी जगह दे दी थी। वहां पर द्रोण ने अपना आश्रम बना लिया और राजकुमारों को पढ़ाना शुरू कर दिया।

पढ़ाई के दौरान, अर्जुन विद्यानिष्ठा और गुरुनिष्ठा के कारण द्रोण का सबसे पसंदीदा शिष्य बन गया। इससे अर्जुन उसके भाइयों से शस्त्रविद्या में और बेहतर बनते चला गया।

नीचे दी गई घटना अर्जुन की गुरुनिष्ठा दर्शाती है।

एक दिन, द्रोणाचार्य ने शिष्यों को एक-एक करके अपने कुटी में बुलाया और उनसे कहां, ‘वत्स, मैं तुम्हें अपनी शस्त्रविद्या प्रदान करके, एक शूरवीर और धैर्यशाली योद्धा बनाऊंगा. ताकि तुम समरांगन में बड़े-बड़े योद्धाओं को धूल चटा सको। लेकिन इसके लिए तुम्हें मुझे एक वचन देना पड़ेगा। मेरे दिल में एक इच्छा है, जो समरांगन में एक घनघोर युद्ध जीतकर ही पूरी हो सकती है। तुम आज मुझे वचन दो कि जब तुम यह शस्त्रविद्या अर्जित करोगे, तो उसके बाद मैंने बताया हुआ कार्य अपनी जान देकर भी सिद्ध करोगे।’

अपने गुरु से यह बात सुनने के बाद, सारे राजकुमार द्रोणाचार्य से कुछ नहीं बोले। लेकिन जब अर्जुन की बारी आई, तो अर्जुन ने अपने गुरु के सामने यह शपथ ली कि वह मृत्यु को आलिंगन देकर भी अपने गुरु ने बताया हुआ कार्य सिद्ध करके रहेगा।

जब द्रोणाचार्य ने वह शब्द सुने, तो वह अर्जुन का समर्पण देखकर प्रेम से गदगद हो गए। फिर उन्होंने अर्जुन को अपने गले लगा लिया और उससे कहा कि वही उनका सच्चा शिष्य है।

जब सारे राजकुमार द्रोण के आश्रम में पढ़ाई करने के लिए रहते थे, तो उन्हें आश्रम के दूसरे काम भी करने पड़ते थे। वह मिलकर नदी पर चले जाते और वहां से पानी भरकर आश्रम की सेवा करते।

जब सारे राजकुमार नदी पर पानी भरने जाते, तो द्रोणाचार्य सारे राजकुमारों को छोटा मुंह वाला  घड़ा दे देते। किंतु वह उनके पुत्र अश्वत्थामा को  बड़े मुंह वाला  घड़ा पानी भरने के लिए देते थे। इस प्रकार, अश्वत्थामा नदी से पानी भरकर आश्रम जल्दी वापस आ जाता और उसके बाद, द्रोणाचार्य पुत्रप्रेम के वश होकर उसे शस्त्रविद्या के अनेक गूढ़ रहस्यों के बारे में बताते, जिन्हें वह बाकी राजकुमारों से छुपा कर रखते थे।

इस कारण अश्वत्थामा शस्त्रविद्या में दूसरे राजकुमारों से सरस बनता जा रहा था। लेकिन बुद्धिमान अर्जुन से यह बात नहीं छुप पाई। जब अर्जुन ने यह चीज देखी, तो अर्जुन ने भी अश्वत्थामा को मिलने वाली विशेष शिक्षा को पाने का निश्चय कर लिया।

अब जब द्रोणाचार्य शिष्यों को पानी भरने के लिए नदी पर भेजते, तब अर्जुन वरूणास्त्र का इस्तेमाल करके अपने घड़े को  अश्वत्थामा से भी जल्दी भर लेता और फिर खुद द्रोणाचार्य के पास आकर बैठ जाता। इस प्रकार, द्रोणाचार्य अश्वत्थामा को जो कुछ विशेष सूचनाएं देते, वह शिक्षा अर्जुन भी आत्मसात कर लेता। इससे अर्जुन भी शस्त्रविद्या में दूसरे राजकुमारों से श्रेष्ठ बनने लगा था।

एक दिन, द्रोणाचार्य ने आश्रम में खाना बनाने वाले रसोइए को बोल दिया कि वह अर्जुन को कभी अंधेरे में खाना न दे। रसोईया भी द्रोणाचार्य के आदेश का पालन करके अर्जुन को कभी अंधेरे में खाना नहीं देता था। किंतु एक दिन जब अर्जुन खाना खा रहा था, तो बड़े जोर से हवा चली और इसकी वजह से जलाया हुआ दिया बुझ गया।

तब अर्जुन ने एक दिलचस्प बात देखी। उसने यह देखा कि अंधेरे में भी उसके हाथ को यह पता था कि उसका भोजन कहां है और उसका मुंह कहां है। इससे उसके मन में एक विचार आया कि अगर उसका हाथ अंधेरे में भोजन करना जानता है, तो वह अंधेरे में बाण चलाना भी जरूर सीख जाएगा। ऐसा विचार करके अर्जुन ने फिर अंधेरे में ही धनुर्विद्या का अभ्यास करना शुरू कर दिया।

एक दिन, द्रोणाचार्य को रात में बाणों की ध्वनि सुनाई दी।  वह ध्वनि सुनकर, द्रोणाचार्य सोचने लगे कि इतने रात आश्रम में बाण कौन चल रहा है? वह अपनी कुटिया से बाहर आए, तब उन्होंने देखा कि अर्जुन बाणों को चलाने का प्रयास कर रहा है।

यह देखने के बाद द्रोण ने उससे पूछा कि वह क्या कर रहा है? तब अर्जुन ने उन्हें सारी घटित घटना सुना दी और बताया कि वह अपने हाथों को ऐसे प्रशिक्षण दे रहा है, जिससे वह अंधेरे में भी लक्ष्य का भेदन अचूक तरीक़े से कर सके।

शिष्य की विद्या पाने के प्रति, इतनी तीव्रता को देखकर द्रोणाचार्य का ह्रदय गदगद हो गया और उन्होंने अर्जुन से कहा, ‘हे अर्जुन, विद्या अर्जित करने के लिए तुम्हारी तत्पारता देखकर मैं प्रसन्न हो गया हूँ। मैं तुम्हें धनुर्विद्या की ऐसी शिक्षा दूँगा जिससे पूरी पृथ्वी पर तुमसे श्रेष्ठ धनुर्धर कोई नहीं होगा।’

द्रोणाचार्य ने रसोइए को अर्जुन को अंधेरे में भोजन ना परोसने की आज्ञा क्यों दी, इसका उल्लेख कथा में स्पष्ट तरीके से नहीं आता। लेकिन यह सम्भव है कि वह पुत्रप्रेम के कारण केवल अश्वत्थामा को ही अंधकार में धनुर्विद्या चलाने की शिक्षा देना चाहते थे। लेकिन नियति के मन में तो कुछ और ही था और इस प्रकार, अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का वचन के देने के बाद, वह अंधेरे में तीर चलाने की विद्या अर्जुन को देने में मजबूर हो गए।

इसके बाद, महाभारत में निषाद पुत्र एकलव्य की भी कथा आती है। जब द्रोणाचार्य की ख्याति संपूर्ण आर्यावर्त में फैल गई, तो उनके पास दूर-दूर से अनेक राजकुमार विद्यार्जन के लिए आना शुरू हो गए। उन राजकुमारों में से एक राजकुमार था - एकलव्य।

एकलव्य निषादों का राजा हिरण्यधनु का पुत्र था। एकलव्य ने द्रोणाचार्य के आश्रम में आकर बड़ी नम्रता से उन्हें खुद को शिष्य स्वीकार करने की विनती की। किंतु द्रोणाचार्य ने उस विनती को  यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि एक निषाद पुत्र होने के कारण वह उसे शिष्य रूप में स्वीकार नहीं कर सकते।

लेकिन सच्चाई तो कुछ और ही थी. द्रोणाचार्य ने एकलव्य को परख लिया था और उन्हें पता था कि उसके अंदर, धनुर्विद्या में अर्जुन को भी हराने की क्षमता थी। इससे उन्होंने अर्जुन को दिया हुआ वचन झूठा हो जाता कि वह अर्जुन को पृथ्वीका सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाएंगे।

जब द्रोणाचार्य ने एकलव्य का शिष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया, तो उसे बहुत बुरा लगा। किंतु शिक्षा पाने के प्रति उसका निश्चय बहुत दृढ़ था। फिर एकलव्य वन में चला गया और वहां जाने के बाद, उसने द्रोणाचार्य की मिट्टी की एक मूर्ति बनाई। उस मूर्ति की पूजा करके वह दिन रात धनुर्विद्या की कठोर अभ्यास करने लगा।

एक दिन, जिस वन में एकलव्य का निवास था, उस वन में द्रोणाचार्य शिष्यों के साथ पहुँच गए। उनके साथ अन्य सेवक और एक पालतू कुत्ता भी था।

कुछ समय के बाद, सारे राजकुमारों ने वन में धनुर्विद्या का अभ्यास करना शुरू कर दिया। उस वक़्त, वह पालतू कुत्ता वन में इधर-उधर भटक रहा था। अचानक उस कुत्ते ने एकलव्य को देखा और फिर कुत्ते ने एकलव्य के ऊपर ज़ोर-ज़ोर से भोंकना शुरू किया। कुत्ते के भौंकने से एकलव्य के अभ्यास में व्यवधान पैदा हो गया। इससे परेशान होकर एकलव्य ने उस कुत्ते के ऊपर सात बाण चला दिए। वह सात बाण उस कुत्ते के मुंह में इस प्रकार फँस गए कि उस बाणों से उसका भोंकना बंद हो गया। लेकिन उसे किसी भी प्रकार की क्षति नहीं पहुंची।

इसके बाद, वह कुत्ता भागता हुआ राजकुमारों के पास चला आया। कुत्ते के मुंह में विशेष प्रकार से मारे गए बाणों को देखकर सारे राजकुमार दंग रह गए। वह दृश्य देखकर, अर्जुन विशेष रुप से पीड़ित और दुखी हो गया क्योंकि ऐसी धनुर्विद्या तो वह स्वयं भी नहीं जानता था।

फिर सारे राजकुमार उस कुत्ते को लेकर द्रोणाचार्य के पास पहुँच गए। सबको लगा कि द्रोणाचार्य को उस धनुर्धर के बारे में ज़रूर पता होगा, जिसने वह करतब किया था। किंतु जब सारे राजकुमार द्रोणाचार्य से मिले, तो उन्हें पता चला कि द्रोणाचार्य को भी ऐसे कुशल धनुर्धर के बारे में कुछ पता नहीं था।

फिर सारे राजकुमारों ने चारों दिशाओं में उस अज्ञात धनुर्धर की खोज करना शुरू कर दी। कुछ समय के बाद, राजकुमारों को एक विचित्र वस्त्रों में एक धनुर्धारी दिखाई पड़ा। उससे पूछताछ करने पर इस चीज की पुष्टि हो गई कुत्ते के ऊपर उसी ने बाणों को चलाया था।

जब राजकुमारों ने उस युवक से उसका परिचय पूछा, तो उसने बताया कि उसका नाम एकलव्य है और वह निषादों के राजा हिरण्यधनु का पुत्र है। एकलव्य ने यह भी कहा कि वह द्रोणाचार्य के मार्गदर्शन से वन में धनुर्विद्या की पढ़ाई कर रहा है।

यह सुनते ही सारे राजकुमारों को बहुत बड़ा धक्का लगा। खासतौर पर, अर्जुन को बहुत बुरा लगा। द्रोणाचार्य ने उसे वचन दिया था कि वह अर्जुन को दुनिया का सबसे श्रेष्ठ धनुर्धारी बनाएंगे। किंतु उन्होंने वन में एक ऐसा शिष्य बनाके रखा था, जो अर्जुन से भी कई गुना अधिक कुशल था।

फिर सारे राजकुमार द्रोणाचार्य के पास चले आए और उनको सारी घटित घटना सुना दी। फिर अर्जुन ने द्रोणाचार्य से कहा, ‘हे गुरुवर, आपने मुझे वचन दिया था कि आप मुझे इस विश्व का सबसे निपुण धनुर्धर बनाएँगे किंतु आपने वह वचन तोड़ते हुए, मुझसे ज़्यादा विद्या एकलव्य को दे दी है।’ फिर द्रोणाचार्य ने अर्जुन को समझाया कि उन्होंने एकलव्य को कोई विद्या प्रदान नहीं की थी। उन्होंने यह भी बताया कि एकलव्य को तो उन्होंने शिष्य रूप में स्वीकार ही नहीं किया था। किंतु इस बात का तो उन्हें भी अचरज था कि एकलव्य उन्हें गुरु के रूप में क्यों बता रहा था।

इस बात की खोज करने के लिए, द्रोणाचार्य बाक़ी राजकुमारों के साथ एकलव्य से मिलने चल पड़े।

एकलव्य से मिलने के बाद, द्रोणाचार्य को सारी बात समझ आ गई। एकलव्य ने द्रोणाचार्य के मिट्टी के पुतले को अपना गुरु बनाकर, उस में गुरुभव रखते हुए सारी विद्या प्राप्त की थी। वह उस मिट्टी के पुतले के निर्देश लेकर धनुर्विद्या का दिन-रात अभ्यास करता था। यह उसकी मेहनत और लगन का ही परिणाम था कि वह धनुर्विद्या में अर्जुन से भी सरस हो चुका था।

द्रोणाचार्य को सारी बात बताने के बाद, एकलव्य ने उनसे कहा, ‘हे गुरुवर, अब मेरे लिए क्या आज्ञा है?’

द्रोणाचार्य बोल पड़े, ‘हे एकलव्य, तुम मेरे शिष्य हो और तुमने मुझ से विद्यार्जन किया है। किंतु तुमने अभी तक मुझे कोई गुरुदक्षिणा नहीं दी।’

‘गुरुदेव, आप बस आज्ञा दे दीजिए कि आपको क्या चाहिए? आपके चरणों में तो मेरा पूरा जीवन निछावर है,’ एकलव्य ने कहा।

‘एकलव्य, मुझे तो केवल तुम्हारे दाहिने हाथ का अंगूठा गुरुदक्षिणा के रूप में चाहिए,’ द्रोणाचार्य ने अपनी कठोर माँग एक गुरुभक्त के सामने रख दी।

एक धनुर्धर के लिए उसके दाहिने हाथ का अंगूठा ही उसका सर्वस्व होता है। अगर उसका अँगूठा ही चला जाए, तो वह तीर कैसे पकड़ेगा और उसे कैसे छोड़ेगा? इस प्रकार, एकलव्य से उसके दाहिने हाथ का अंगूठा माँगकर, द्रोणाचार्य ने उसके सामने बड़ी दुविधा खड़ी कर दी।

किंतु एकलव्य ने एक भी क्षण का विलंब न करते हुए, चाकु निकला और अंगूठा काटकर गुरु के चरणों में अर्पण कर दिया।

इसके बाद द्रोणाचार्य ने एकलव्य को उसकी धनुर्विद्या का प्रदर्शन दिखाने के लिए कहा। लेकिन अंगूठा गवाने के कारण अब उसके धनुर्विद्या में वो बात नहीं रही थी। वह चीज देखकर अर्जुन प्रसन्न हो गया और अब उसे विश्वास हो गया कि धनुर्विद्या में एकलव्य उसके आगे नहीं निकल पाएगा और विश्व के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर का मुकुट सिर्फ़ उसके ही सिर पर विराजमान होगा।

हस्तिनापुर लौटने के बाद, द्रोणाचार्य  ने वन में घटीत घटना कृपाचार्य को बता दी। एकलव्य के साथ जो हुआ, वह सुनकर कृपाचार्य को बड़ा दुख हुआ।

फिर कृपाचार्य ने द्रोणाचार्य से कहा, ‘हे द्रोणाचार्य, आपने अंगूठे के रूप में एकलव्य से गुरुदक्षिणा मांगकर एक अयोग्य काम किया है। क्योंकि वास्तव में, आप उसके गुरु नहीं थे। उसका गुरु तो वह मिट्टी का पुतला था। एकलव्य के साथ धोखा करके आपने अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनने में मदद ज़रूर की है। लेकिन इस धोखे का बदला नियति ज़रूर लेकर रहेगी।’

और इस प्रकार, महाभारत के युद्ध के में, द्रोणाचार्य की मृत्यु भी एक धोखे से ही हुई थी और नियती ने उसका बदला इस प्रकार लिया था। फिर महाभारत में एक ऐसी कथा आती है, जिससे यह सिद्ध हो जाता है कि अर्जुन सारे राजकुमारों में सबसे वीर था।

एक दिन, द्रोणाचार्य अपने सभी शिष्यों को लेकर गंगा के तट पर स्नान करने के लिए चले गए। जब सारे शिष्य गंगा के तट पर खेल रहे थे, तो वे नदी में उतरकर स्नान करने लगे। उस समय, एक मगरमच्छ ने द्रोणाचार्य को देखा और उनके ऊपर हमला कर दिया। उसने बड़े-बड़े जबड़ों में द्रोणाचार्य के पैर को पकड़ लिया। द्रोणाचार्य वेदनाओं से चिल्लाने लगे और मदद के लिए शिष्यों को पुकारने लगे।

यह दृश्य देखकर, सारे राजकुमार भयभीत हो गए और मदद पाने के लिए, इधर-उधर दौड़ने लगे। लेकिन शूरवीर अर्जुन ने, उसी समय उसके धनुष पर तीर चढ़ाएँ और उस मगरमच्छ पर पाँच बाण चला दिए। वह बाण उसने ऐसे कुशलता से चलाए कि मगरमच्छ का मुंह खुल गया और द्रोणाचार्य का पैर उसकी जकड़न से मुक्त हो गया।

फिर द्रोणाचार्य नदी से निकलकर अर्जुन के पास आए और उन्होंने अर्जुन से कहा, ‘हे अर्जुन, मैं तुमसे अतिप्रसन्न हूँ। अब मैं तुम्हें एक ऐसा महान अस्त्र प्रदान करने वाला हूँ, जो सारे अस्त्रों में सर्वश्रेष्ठ है। इसे ब्रह्मास्त्र कहते हैं। छोड़ने के बाद, इस अस्त्र को पीछे भी बुलाया जा सकता है। किंतु यह अस्त्र कभी दुर्बल शत्रु पर मत चलाना। अन्यथा यह पूरे पृथ्वी का विनाश कर देगा। इस अस्त्र के कारण तुमसे कोई टक्कर नहीं ले पाएगा।’

और इस प्रकार, द्रोणाचार्य ने अर्जुन को विश्व का सबसे अमोघ अस्त्र प्रदान कर दिया।

इस घटना के बाद, द्रोणाचार्य ने यह घोषणा कर दी कि सारे राजकुमारों की शस्त्रविद्या उचित तरीके से पूर्ण हो चुकी है।