'अनोखा सफर' - एक अद्भुत यात्रा (कहानी) - नवीन धनवर


आरम्भ 

 मैं एक बस में सबसे पीछे बैठा था। उस बस में और उसके पीछे वाले बस में भी बहुत से मेरी उम्र के लड़के और लड़कियां बैठे थे। उन दोनों बसों में एक एक गाइड भी थे, और दोनों बसों की मंजिल भी एक ही थी।

बसें अपनी रफ़्तार से चली जा रहीं थीं। रास्ते में कई फलों के पेड़ भी लगे थे। मुख्यतः बेर के पेड़ थे। बस रास्ते भर सवारियों के मन मुताबिक रुकती जा रही थी, ताकि फलों का स्वाद उनके जुबान चख सकें।

अचानक बिना किसी चेतावनी के हल्की हल्की बारिश शुरू हो गई। हल्की बरसात और बाहर का नजारा किसी जन्नत से कम ना था। दोनों बसों के संचालक बारिश कि लय में बस चला रहे थे।

हम सब अलग अलग शहरों और बैकग्राउंड के थे। फिर भी हमनें कुछ ही समय में दोस्ती कर ली थी। अपना अपना छोटा सा ग्रुप भी बना लिया था, ताकि हम कहीं गुम न हो सकें।

सबसे पहले हमारी बसें एक मंदिर के बाहर रुकी। यह मंदिर बहुत पुराना लग रहा था। इस मंदिर की सबसे खास बात मुझे इसकी सीढ़ियां लगीं, पता नहीं क्यों पर इसका प्रभाव मुझ पर ज्यादा हुआ। मंदिर के बाहर एक बड़ा सा पेड़ था। इस पेड़ के नीचे बहुत से शिवलिंग स्थापित थे। इस मंदिर का पूरा जायजा लेने के बाद हम आगे बढ़ गए।

बहुत से खेतों के बीच बने कच्चे और पक्के रास्तों के मिले जुले गलियारों से हमारी बस चल रही थी। सब अंताक्षरी खेल रहे थे, यहां तक कि हमारे पीछे के बस वाले भी, उनकी आवाजें भी आ रही थी। मैं पहले कि तरह पीछे ही बैठा था। वैसे इस बस में रिजर्वेशन जैसा कुछ भी नहीं था। यहां फर्स्ट कम फर्स्ट सर्व वाला केस भी नहीं था। सब अपनी सहूलियत से बैठे थे।

शाम होने वाली थी। बरसात भी रुक गई थी। हमारा काफिला एक सस्ते से लेकिन अच्छे घर में रुका। यहां पर आस पास रात को भी खुली दुकानों की वजह से कुछ बहुत भीड़ थी, लेकिन इस कारण हमें खाने के बंदोबस्त में आसानी हुई। दोनों गाइडों ने हमें बताया कि इस स्थान के दुकान चौबीसों घंटे खुले रहते हैं। यहां पर कभी भी किसी भी वक्त कोई भी वस्तु मिल जाएगी।

मैं और कुछ और लड़के पास वाली जूस की दुकान में बैठे जूस पी रहे थे। जबकि लगभग सभी लड़कियां दोनों गाइड्स के साथ पूरा बाजार खरीदने निकल पड़ीं, उस समय हमारा तो यही ख्याल था। आखिर वे शॉपिंग करने निकलें और खाली हांथ आ जाएं, भला ये कैसे संभव है। रात बहुत हो चुकी थी। हम भी थोड़ा आराम करनें चले गए।

अल-सुबह मुझे एक लड़के ने उठाया और कहा कि हम बारह लड़के और एक गाइड यहां पास पर स्थित आर्कियोलॉजिकल साइट पर जा रहे हैं, क्या तू चलेगा? वैसे तो मैं वहां नहीं जाना चाहता था क्योंकि मुझे अपनी नींद प्यारी थी, लेकिन पता नहीं क्यों मैं उठा और अपना फोन चार्जर से निकाला और उनके साथ चला गया।

जब हम वहां से वापस आए तब लड़कियां बहुत नाराज़ थीं। उन्हें भी वहां जाना था। हमनें सभी लड़कों को पूछा था लेकिन ज्यादातर इतिहास को जानने में इंटरेस्टेड नहीं थे। हमें लगा था लड़कियों को भी इसमें कोई इंटरेस्ट नहीं होगा इसलिए हमनें उनसे नहीं पूछा था। बड़ी मुश्किल से गाइड ने सब संभाल लिया। तब जाकर मामला शांत हुआ। सब तैयार थे। हम सबने नाश्ता किया और फिर आगे के सफर में निकल पड़े।

हम अब अपनी मंजिल यानी मंदिरों के शहर में पहुंच गए थे। यहां पर एक इमारत के चबूतरे पर सभी खड़े थे, की तभी एक लड़की ने एक ओर इशारा किया। हमनें देखा दूर एक भव्य और खूबसूरत नजारों के साथ एक मंदिर खड़ा था। मैं इमारत के एक खंबे के पास खड़ा होकर उधर देख रहा था।

कुछ समय बाद सब अपने अपने झुंड में बंट कर चारों ओर फैल गए। सब अपने अपने फोन और कैमरों से फोटो, सेल्फी और विडियोज लेने लगे। मैं और कुछ लोग उसी दूर से देखे गए मंदिर की ओर जाने लगे। वहां पर पहुंच कर कुछ फोटो और वीडियो शूट करने के बाद हम पार्क की ओर अग्रसर हो गए।

यह एक नेशनल पार्क तो नहीं, पर बहुत बड़ा था। यहां के कुछ क्षेत्र कीचड़ से भरे थे, जिनमें वह क्षेत्र भी शामिल था जहां पर आम लगे थे। लड़कियों को आम का लालच आ गया। जिस कारण मुझे और तीन और लड़कों को आम लानें उस कीचड़ से भरे रास्ते में जाना पड़ा। मेहनत रंग लाई थी, आम बहुत ही मीठे और रसदार थे।

पास में ही स्थित बड़े से झील के किनारे सब इकट्ठे हो गए। शाम का नजारा देखने में सुकून भरा था। किसी का भी उस नज़ारे को छोड़ कर वहां से उठने का मन नहीं कर रहा था।

सब बस की सीटों से चिपके सो रहे थे। बस धीरे धीरे चल रही थी। मैं बाहर की ओर खिड़की से टिककर देख रहा था। टिमटिम करते तारे, चमकते जुगनू और रातरानी की खुशबू, ये तीनों मन को मोहने के लिए काफी थे। रुक रुक कर रात के कीड़ों की आवाज़ें भी आ रही थी। पूरा शमा ही सुकून का था। धीरे धीरे मेरी पलकें भी भारी होते गईं और नींद की रानी ने मुझे कब अपने आगोश में ले लिया मुझे पता भी नहीं चला।

मेरी नींद खुली। सब बस में पहले की तरह अंताक्षरी खेल रहे थे। बस के एक ढाबे में रुकने पर सबने फ्रेश होने के बाद नाश्ता किया। नाश्ते में छोले भटूरे कॉमन था, इसके अलावा सबने अपने पसंद की चीजें भी खाईं।

हमारा इन दोनों बसों का सफर आगे एक साइन बोर्ड के पास खत्म हुआ। यहां से हमें आठ किलोमीटर पैदल चलना था, तब जाकर दो अलग नई बसें हमें मिलती जो कि वहां पर हमारा इंतजार कर रहीं थीं।

रास्ते भर पैदल चलते चलते सब कुछ न कुछ फोटो और वहां की यादें बटोर रहे थे। इन यादों में फोटो के अलावा अनोखे पत्थर, गुंजा के बीज और कुछ खूबसूरत फूल भी थे। एक साथ चलने में और रास्ते भर जुगलबंदी करने से रास्ते की दूरी का अंदाजा ही नहीं लगा।

हम बसों के पास पहुंच गए। दोनों बसें एक ढाबे पर खड़ी थीं। हमने ढाबे पर खाना खाया फिर कुछ देर वहीं पर रुके। गाइड ने बताया यहां पर दो किलोमीटर दूर एक पुरातन स्थल है और वहां पर एक तालाब भी है। हम सभी बस को वहीं रुकने का इशारा करते हुए दो किलोमीटर पैदल यात्रा के लिए निकल पड़े। वहां पर जा कर सबका मकसद नहाने का था। नहाने के बाद वहां पर कुछ टहल बाजी करने के बाद सभी वापस लौट गए।

बस पर बैठे इस बार सब पहेली बूझने वाला खेल खेलने लगे। उबाऊ सफर से बचने का दो ही उपाय था। एक तो बाहर के सुंदर नजारे देखना और दूसरा सुंदर नजारों के आभाव में कोई मन बहलाऊ खेल खेलना।

हमारी बस एक गांव में रुकी। यहां पर सब दो - दो के ग्रुप में बंट कर अपने अपने मेजबान घर में रुक गए, जिसका बंदोबस्त उसी गांव के मुखिया ने किया था। उस रात को उनका कोई कार्यक्रम होने वाला था, जिसमें हम सब आमंत्रित किए गए। सब एक दूसरे से शाम को कार्यक्रम में मिलने का वादा कर अपने अपने मेजबान घरों की ओर चल पड़े।

रात का समय था। मैं अपने साथ आए एक लड़के के उठाने से उठा। हम दोनों और हमारा मेजबान परिवार उस कार्यक्रम में शामिल होने गए। वहां का खाना बहुत अच्छा लगा। हम सब कार्यक्रम का पूरा आनंद ले रहे थे। मैं और कुछ लोग वहां पर बाकियों के साथ इंस्ट्रूमेंट्स के धुन के साथ नाचने लगे।

सुबह हम सबने उन लोगों से विदाई ली। मेरे मेजबान परिवार ने मुझे और मेरे साथ वाले लड़के को एक थैली भी दी जिसमें बहुत सारे काजू थे। जब हमने बस में कदम रखा, तब केवल हम दोनों के पास ही गिफ्ट था। हम दोनों ने उसे सबके साथ शेयर किया।

हम सब एक साथ अपने सफर के अंतिम पढ़ाव में पहुंचे। ये एक शराय था। यहां से सब अपने अपने घर जाने वाले थे। वहां सब बारी बारी नहा कर तैयार हो गए। सबने खाना खाया और कुछ देर के लिए आराम करने लगे।

सब आपस में बात करते हुए अपने अपने मंजिल तक के लिए साथी ढूंढ़ रहे थे। मैं जहां जाने वाला था, वहां तक के लिए दो लड़की मिल गईं, उन्हें भी वहीं जाना था। मैं शराय के बाहर कुछ देर के लिए टहलने लगा। मुझे दूर एक खाली स्थान दिखा जहां पर बैठने की व्यवस्था भी थी। यह स्थान शराय से दूर जंगल जैसी जगह में था।

मैं उस जगह पर बैठे बैठे वहां चारों तरफ अपनी नजरें घुमा रहा था। मैंने वहां पर कुछ दूर एक बैल को देखा। वह बैल जैसे ही उस बड़े से घेरे के अंदर आया जो कि उस बैंच के चारों तरफ दूर तक फैला था, जिसमें में बैठा था, वह एकदम से बूढ़ा हो गया और उसकी हालत दयनीय हो गई। मैं यह सब देख कर बहुत अचंभे में पड़ गया। जब वह बैल उस घेरे के बाहर गया तो वह फिर से अपनी पहले की स्थिति में लौट आया। मुझे इस रहस्य के बारे में पता नहीं था और न ही मैंने उस घेरे को नोटिस किया, जब तक उस शराय के मालिक ने मुझे नहीं बताया।

मैं शराय पर बैठे यह घटना उन दोनों लड़कियों को बता रहा था। बाकी सभी अपने अपने घरों के लिए निकल चुके थे, केवल हम तीनों ही बचे थे। हमारी बातों को सुन कर शराय के मालिक ने कहा कि बहुत से लोगों ने यह नजारा देखा है, सबको वह स्थान नहीं मिलता और दुबारा जाने से भी वह स्थान और वह नजारा नहीं दिखता।

हम तीनों अब अपने मंजिल के करीब थे। दोनों अपने घर की ओर चल पड़ीं और मैं अपनी।

शेषनाग धारा 

ट्रेन तेज रफ्तार से चल रही थी, जबकि मैं स्टेशन में उसे पकड़ने के लिए तैयार खड़ा था। ट्रेन तेजी से स्टेशन के पास आ रही थी और उसके साथ ही मेरी दिल की धड़कन भी लय बद्ध हो कर धड़क रही थी। ट्रेन स्टेशन से होकर जाने लगी लेकिन स्टॉपेज ना होने के कारण वह वहां रुकने वाली नहीं थी। मुझे उसे दौड़ कर ही पकड़ना था।

मैं तेजी से दौड़ कर उसके एक गेट पर लटक गया और उसके बाद कुछ प्रयास कर ट्रेन में चढ गया। ये एक स्लीपर क्लास बोगी था। वहां पर मौजूद सभी यात्री मुझे अजीब निगाहों से देख रहे थे। मुझे एक खाली शीट मिल गई। कुछ देर मैं उसी शीट पर लेट भी गया। जब आंखें खुली तो मैंने वहां पर कुछ नये लोगों को देखा। उनमें से दो आदमी थे और एक औरत।

वे तीनों एक ही परिवार के होने का दिखावा कर रहे थे, मगर मैं उन्हें देख कर ही बता सकता था कि वे लोग एक परिवार के नहीं हैं। मुझे उन पर शक हुआ। मैं उठा और गेट के पास चला गया।

शाम हो चली थी। बाहर बहुत ही हरियाली थी। मैंने देखा कोई स्टेशन आ गया है। ट्रेन अपनी रफ्तार से चली ही जा रही है। उस स्टेशन से एक लड़की दौड़ते हुए जनरल डिब्बे में चढ गई। मुझ में कुछ क्यूरियोसिटी उत्पन्न हुई। मैं बिना कुछ सोचे समझे दौड़ कर ट्रेन से उतरा और फिर दौड़ते हुए जनरल डिब्बे में चढ गया।

यहां स्लीपर के मुकाबले बहुत कम लोग थे। मैं उसी लड़की को ढूंढने लगा। वह लड़की सबसे पीछे बैठी थी, जहां पर कुछ दूर, कुछ अजीब से लोग थे। सब के सब भगवा वस्त्र और माला पहने थे, लेकिन उन्होंने देख कर नहीं लगता था कि वे लोग कोई बाबा थे।

उन लोगों और उस लड़की के बीच के क्षेत्र में कई शीट खाली थी, जहां पर मैं बैठ गया। उस लड़की के बैग के पीछे एक अजीब सी वस्तु बंधी थी, जिसे देख कर मैं उसके बारे में जानने को बेताब हो गया था। मैं अपने मोबाइल में इंटरनेट के जरिए आस पास के लोगों के मोबाइल की जानकारी चुराना चाहता था इसलिए अपना हॉट स्पॉट ऑन कर दिया। मुझे बाद में पता चला कि उन में से किसी के पास भी स्मार्ट फोन नहीं है। उनके पास केवल कीपैड वाला फोन था। अब मुझे और भी अजीब लग रहा था।

मैंने देखा एक वाईफाई कनेक्ट है। ये उस लड़की ने किया था। मैंने सोचा चलो इसकी ही कुछ इंफॉर्मेशन चुराया जाए। मैंने उसके इनकॉडेड सिस्टम से एक मैप अपने सिस्टम में कॉपी कर लिया।

बड़ी अजीब बात थी, एक मैप के लिए इनकोडिंग की गई थी।

शुरू से अब तक मुझे जितने भी लोग मिले सब अजीब थे। मैंने उसके मैप को टॉयलेट में जाकर देखा। उस मैप में नदियों, समुद्रों या कहें तो पूरे जल तंत्र का नक्शा था। उसमें किसी एक खास जल तंत्र को चमकीली रेखा से दर्शाया गया था और साथ ही जगह जगह पर क्रॉस का निशान था। मैंने मैप बंद किया और टॉयलेट से बाहर निकला ही था कि वह लड़की मुझे बाहर खड़ी मिली।

उसने मेरी तरफ देखते हुए बोला - "किसी ने कुछ देर पहले मेरे सिस्टम में हांथ साफ किया है, और मुझे नहीं लगता कि तुम्हारे सिवा यहां पर कोई इतना काबिल होगा।" मैं इन बातों को सुन कर चौंक गया। उसने अचानक मुझे धकेल कर टॉयलेट के अंदर कर दिया और खुद भी अंदर आ कर गेट अंदर से बंद कर दिया। उसने कहा कि तुमने टॉप सीक्रेट फाइल को एक एजेंट के सिस्टम से कॉपी किया है, अब तुम मेरी मदद करो या मरने के लिए तैयार हो जाओ।

मैं बहुत गुस्सा हो गया और कहा कि गलती तुम्हारी है किसी भी अनजान वाईफाई से कनेक्ट ही क्यों किया मोबाइल को, अब मुझे मारने की धमकी दे रही हो।

फिर उसने कहा मैं तुम्हें नहीं मारने वाली, इस डब्बे में जो लोग हैं वो भी उसी चीज के पीछे पड़े हैं जिसको ढूंढने का मेरा मिसन है, उन लोगों को मुझ पर शक है। अब जब मैं तुम्हारे साथ हूं तो वे लोग मेरे साथ तुम्हें भी मार देंगे।

मैंने उससे कहा आखिर किस चीज की तुम बात कर रही हो। उसने कहा मैं तुम्हें अभी कुछ नहीं बता सकती, बस उस मैप को किसी के हांथ में पड़ने मत देना और मुझे यहां से बच कर निकलने में मदद करो।

हम सही सलामत तो निकल गए लेकिन मैं तमिलनाडु नहीं जा पाया। अब हम जंगल में पैदल चल रहे थे। उसने मुझे बताया कि ये मैप जिसे तुमने देखा होगा, ये शेषनाग धारा को दिखाता है। बारह हजार साल में एक बार शेषनाग धारा में कुछ अजीब घटना होती है, जिसके कारण वहां पर कुछ खास वस्तु प्रकट होती है।

मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था और मैं इन बातों को बेवकूफी समझ रहा था। लेकिन इतने सारे मूर्ख इन बेकार सी बातों के पीछे पड़ जाएंगे इसका मुझे यकीन नहीं हुआ। उसकी सीरियस आंखों को देख कर मैंने पूछा वह वस्तु क्या है? उसने कहा मुझे पक्का कुछ नहीं पता, लेकिन सबकी अलग अलग थियोरी है। कोई उसे अमृत कलश कहता है, कोई सबसे शक्तिशाली अस्त्र, तो कोई सबसे बड़ा खज़ाना।

मैंने फिर उससे पूछ कि तुम इसे क्यों खोजना चाहती हो? तब उसने कहा कि पांच साल पहले नालंदा विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी वाले खंडहर के पास खुदाई में एक बक्सा मिला था। जिसमें कई तांबे के पन्ने थे और साथ में कुछ अजीब से अवशेष भी। उनकी जांच से पता चला कि वे अवशेष कोई बहुत पुराने दस्तावेज थे जो नष्ट हो चुके हैं और शायद उन ताम्र पत्र में उसी के अनुवाद थे। कुछ शोधकर्ता ने उन पर शोध करके ये पूरी बात कही। उनमें से कुछ पत्र पढ़े नहीं जा सके। पता नहीं कैसे ये बात बाहरी लोगों को भी पता थी। वो वस्तु जो भी हो उसे सरकार ने किसी गलत हांथों में जाने से रोकने के लिए एक गुप्त अभियान चलाया था, जो कि अभी भी चल रहा है।

कुछ देर में कुछ लोगों ने हमें पिक कर लिया। वो दो लड़के और दो लड़कियां थी। उसमें से एक ने मेरे साथ वाली लड़की से कहा ये कौन है? उसने जवाब दिया - इसने मेरी जान बचाई है। ये भी उस रहस्य के बारे में जानता है। उसने मेरी तरफ देख कर कहा - इसे इसके दादाजी ने बताया था।

मैं समझ गया इसने उन लोगों से झूट क्यों बोला। मैं चुप ही रहा। मैंने उस लड़की से पूछा हम कहां जा रहे हैं। उसने कहा तुम मुझे मानसी कह सकते हो, हम पूरे शेषनाग धारा को ट्रेस कर रहे हैं।

मैं चौंक गया और बोला अब पूरा विश्व घूमना पड़ेगा। तब उसने कहा कि हमने पहले ही विदेश यात्रा कर ली है बस भारत भ्रमण ही करना बाकी है। यह कह कर वह मुस्कुरा दी।

हम काशी में थे। वहां पर बहुत से जगहों में सर्च अभियान चलाया लेकिन कुछ हांथ नहीं लगा। मानसी ने बाकियों से कहा मैंने कुछ रिसर्च किया है और मेरी समझ में तो यही आया है कि उस पत्र में तो बारह हजार साल में एक बार इस घटना का होना बताया है लेकिन शायद इस बारह हजारवें साल में किसी एक दिन वह होगा और शायद कुछ समय के लिए रहेगा ना की एक बार घटित होने के बाद एक साल तक रहे।

हमने टीम बांट दिया। कैलाश और शिखा उत्तर भारत में, इन्द्र और सुलेखा मध्यभारत में, और मानसी और मैं दक्षिण भारत में। मुझे इन सब में पड़ने की जरूरत नहीं थी फिर भी सोचा कुछ खजाना ही मिल जाएगी तो अच्छे से जिंदगी कटेगी।

हम दक्षिण भारत के समुद्री तट की ओर बढ़ रहे थे और मैं डार्क और डीप वेब में इस शेषनाग धारा से जोड़ने वाले लिंक ढूंढ़ रहा था। मुझे कुछ मिला। ये एक मेसेज था, जो कि डीप वेब में एक अनजान आईडी से दूसरी अनजान आईडी में भेजा गया था। इसमें कुंभ मेले में विस्फोट की बात कही गई थी। मैंने तुरंत ये बात मानसी को बताई, उसने कंट्रोल रूम में इसकी सूचना दी और बाद में मुझसे कहा। डीप वेब में सर्फिंग करना इल्लीगल है मैं तुम्हें अरेस्ट भी कर सकती हूं। मैं कुछ नहीं बोला चुपचाप ही बैठा रहा। उसने गाड़ी बायी तरफ मोड़ी और मेरी तरह देखते हुए मुझे शुक्रिया कहा।

हम समुद्र तट पर थे। आगे एक छोटा सा जमीन दिखा जो कि समुद्र में होते हुए भी पानी से अछूता था। पानी कम गहरा होने के कारण केवल घुटनों तक भीगते हुए हम वहां पहुंचे। हम वहां कुछ मिलने कि उम्मीद से घूमने लगे। मेरे दिमाग में एक ख्याल आया। मैंने मानसी से कहा कुंभ कब है। उसने कहा आज ही है। मैंने उसे बताया शायद कुंभ जिस समय में शुरू होता है वही समय और कुंभ होने के स्थान यानी संगम में वह बेकार सी घटना होगी जिसके पीछे सब मूर्ख पड़े हैं। उसने मुझे घूरते हुए देखा, तब मैंने कहा - बस तुम ही एक समझदार मिली हो मुझे, मैं मूर्ख तो बाकियों को कह रहा हूं।

मानसी ने कहा तुम भी बहुत बड़े मूर्ख हो ये बात अभी बता रहे हो। कुंभ का समय तीन घंटे में होगा। मैंने कहा तुम समझदार तो हो लेकिन भुलक्कड़ भी हो। कुंभ वाले स्थान के पास अभी इन्द्र और सुलेखा होंगे।

मानसी ने सुलेखा को फोन किया तब उसने कहा यहां पर तो पहले से ही दुनिया भर के सौ से ज्यादा खजाना चोर घात लगाए बैठे हैं, लेकिन हम कुछ नहीं कर सकते, वर्ना हमारी असलियत उन्हें पता लग जाएगी।

कुछ देर में वहां पानी अजीब तरह से बढ़ने लगा जिसे देख कर मुझे डर लगने लगा था। मैं पानी को छूना भी नहीं चाहता था। मेरे द्वारा पानी में ना जाने की वजह से मानसी भी मेरे साथ रुकी रही जबकि वह तैर सकती थी। किसी का फोन भी नहीं लग रहा था। वहां पर मानसी की एक सहेली इंजन वाली बोट लेकर पहुंची, वह वही औरत के साथ थी जो मुझे स्लीपर कोच में दो आदमियों के साथ दिखी थी।

हम तट में उतरे और उससे दूर जाने लगे, जबकि वह ट्रेन वाली औरत बोट लेकर वहां से चली गई।

मानसी और उसकी सहेली को मैंने कहा तुम्हारा काम हो गया अब मुझे मेरी मंजिल की ओर जाने दो। उसने मेरा प्रस्ताव ठुकरा दिया। उसने कहा जब तक वह कथित खजाना सरकार के पास नहीं पहुंच जाता मैं तुम्हारे पीछे ही पड़ी रहुंगी।

हम हम्पी के पास थे, वहां से कुछ दूर जाने पर हमें एक बड़ा तालाब मिला। मैं यहीं आने के लिए तमिलनाडु जा रहा था, ताकि वहां से यहां आ सकूं।

कुंभ योग लगने में बीस मिनट बाकी थे। मानसी अपनी सहेली प्रिया से संगम में होने वाली विशेष घटना को ना देख पाने असमर्थता जाहिर कर रही थी। और मैं उस मैप को देख रहा था। मैंने मानसी से कहा कि मैं अगर गलत नहीं हूं तो ये जितने भी क्रॉस इस मैप में हैं ये दो जल धारा के मिलने की बात बताते हैं, है ना। उसने हामी भरी और पूछा तुम यहां क्यों आना चाहते थे, तब मैंने कहा यह तालाब जो तुम देख रही हो यह पहले समुद्र से जुड़ा था। अभी भी इसके नीचे एक सुरंगनुमा रास्ता है उससे यह त्रिवेणी से जुड़ा है। इसलिए यहां का पानी पवित्र माना जाता है और यहां पर राजा कृष्णदेव राय स्नान किया करते थे।

बातों ही बातों में हम तीनों की दिमाग की बत्ती जली। प्रिया ने हर जगह कैमरा सेट किया। मानसी ने वहां के पानी को एक ट्यूब से जोड़ा और परीक्षण करने लगी और उसने मुझे एक हीट ऑब्जर्वेशन कैमरा जैसा कुछ दिया, जिससे में एक पेड़ पर चढ़ कर उस विशाल तालाब का निरीक्षण करने लगा।

कुंभ योग लग गया था। हम तीनों की सांसें और दिल की धड़कन बढ़ गई थी। मेरे गैजेट में कुछ आकृति बनने लगी उसने कुछ हीट वाली गतिशील वस्तु को डिटेक्ट किया था। हमने पानी कि सतह से कुछ नीचे एक विशाल सांप को देखा। ये  जरूर शेषनाग होगा, मगर इसका केवल एक ही सिर था। वह बहुत विशाल और चमकीले रंग का सांप हमें पानी के अंदर तैरते हुए साफ साफ दिख रहा था। उस समय हम तीनों के अलावा वहां कोई भी नहीं था। हम केवल उसे निहारे जा रहे थे। प्रिया ने कहा देखो वह कुछ उगल रहा है।

उसने एक बड़ा चमकने वाले वस्तु को उगला था और वहां पर कुंडली मार कर सो गया था। तालाब भले ही बहुत बड़ा था लेकिन ज्यादा गहरा नहीं था। हम अपने गैजेट्स से जब ये पता लगाने लगे कि वह चमकीली चीज क्या है तो पता चला कि वह एक शिवलिंग है। मानसी और प्रिया उसे लेने के लिए प्लान तैयार करने लगे लेकिन मैंने उन्हें ऐसा ना करने को कहा। इसमें कुछ अलग बात थी, अगर यह शिवलिंग किसी गलत हांथो में पड़ गया तो कुछ भी हो सकता है।

कुछ देर बाद वह सांप शिवलिंग को निगल गया और दो तीन चक्कर लगा कर कहीं चला गया। मानसी ने रिकॉर्ड किए हुए फुटेज को किसी "कोड नेम पास्कल" को भेजा और इसका रिपोर्ट बनाने के लिए प्रिया को कहा।

हम दो दिन बाद वहां से प्रयागराज चले गए जहां पर मानसी अपने साथियों से मिली। मैं अब अपने घर लौटने के लिए तैयार था। मानसी ने कहा रुको हम दोनों साथ में चलेंगे।

हम अपनी मंज़िल में पहुंच चुके थे। मानसी अपने घर जाने के लिए ट्रेन में बैठी थी और मैं स्टेशन में खड़ा उससे बातें कर रहा था। ट्रेन का सिग्नल हो चुका था, ट्रेन धीरे धीरे आगे चल पड़ी थी। मैंने और मानसी ने एक दूसरे को अलविदा कहा।

मैं दौड़ते हुए उसकी खिड़की के पास गया और उससे पूछा जब मैंने तुम्हें पहली बार देखा था तो तुम्हारे बैग में कुछ बंधा हुआ था वह क्या था। मानसी ने धीरे से कहा वह एक खजाने के बारे में सुराग था। मैं यह सुना और बोला तुम उसे ही ढूंढने जा रही हो ना। उसने हामी भरी और कहा मैंने दो टिकट्स लिए हैं। यह सुनते ही मैं लपक कर ट्रेन में चढ गया। मेरा और मानसी का दूसरा सफर शुरू हो चुका था।

नील माधव 

हम ओड़िशा के जगन्नाथपुरी में पहुंचे। मानसी और मैं तीन दिन पहले ट्रेन से यहां के सफर के लिए निकले थे। मानसी के पास खजाने का एक सुराग बताने वाला पुराना अजीब सा कलश था, जिसमें कई आकृतियां बनी हुई थी। इस कलश को लेकर मेरी जिज्ञासा तब से है जब से हम दोनों शेषनाग धारा को ट्रेस करने निकले थे।

कलश के अनुसार हमारा पहला पढ़ाव जगन्नाथपुरी था। यहां पर हमें क्या मिलने वाला था या क्या ढूंढ़ना था, कुछ पता नहीं था। हमें इतना जरूर अंदाजा था कि यह कलश मंदिर को दर्शाता है। ऐसा ही एक कलश भगवान जगन्नाथ के मंदिर में भी लगा था।

जगन्नाथ के मंदिर में मुख्य पुजारी से मिलने के बाद हमें कुछ पुरानी मान्यताओं के विषय में भी जानकारी मिली। अब हमें पूरा विश्वास हो गया था कि हो ना हो ये नक्सा जैसी जानकारी जो इस कलश में बनी है, जरूर नील माधव के दिव्य स्वरूप के छुपे हुए स्थान के विषय में कुछ बताती हो।

मानसी वैष्णव थी इसलिए उसे अब नील माधव के उस जागृत स्वरूप या कहें तो दिव्य मूर्ति को ढूंढना ही था, और उसके दर्शन करने ही थे। जगन्नाथ मंदिर में रखे जगन्नाथ की मूर्ति भी नील माधव के स्वरूप में ही निर्मित है एवं हर नवकलेवर में बदली जाती है।

परम्परानुसार नवकलेवर का कार्य तब किया जाता है जब आषाढ़ मास अधिकमास होता है। यह प्रायः ८ वर्ष बाद, ११ वर्ष बाद या १९ वर्ष बाद आता है। ये मूर्तियाँ एक विशेष प्रकार की नीम की लकड़ी से बनायीं जाती हैं जिसे 'दारु ब्रह्म' कहते हैं।

जगन्नाथ की नव निर्मित मूर्ति में अंधेरी रात को एक छोटा सा चमकने वाला पिंड स्थापित किया जाता है जो कि पुरानी मूर्ति से निकाला जाता है। इस कार्य को पुजारी आंखों में पट्टी बांध कर करते हैं। इस कार्य को करते समय जगन्नाथपुरी के सभी लोग अपने घरों की बत्ती बुझा देते हैं। कोई नहीं जानता वह पिंड क्या है। कई लोग उसे भगवान श्रीकृष्ण का दिल कहते हैं जो कि उनके शरीर के दह के बाद भी बचा रह गया।

मानसी को यह सब कथा पुजारी से सुनने में बहुत मजा आ रहा था। मैंने उसे याद दिलाया कि हमें अपने खजाने की तलाश में निकलना है। हमें वहां से यह पता लगा था कि नील माधव के उस दिव्य मूर्ति की पूजा सुंदरवन में मौजूद एक कबीले का सरदार करता था। केवल वही जानता था कि नील माधव कहां हैं। लेकिन नील माधव के कहीं चले जाने के बाद वहां का कबीला भी उजड़ गया।

सुंदरवन से हम लिंगराज मंदिर गए। इस मंदिर में एक बड़ा सा ताला अंग्रेजों के जमाने से लटक रहा था। उस मंदिर के बाहर एक चबूतरे में हम दोनों साथ बैठे थे और एक दूसरे को अच्छे से जानने की कोशिश कर रहे थे। हमारी मुलाकात शेषनाग धारा के कारण हुई थी एवं हम दोनों ने बस कुछ ही बातें शेयर की थी।

मानसी ने कहा वह एक मॉडल बनना चाहती थी लेकिन उसके पापा जो कि भारत सरकार के रक्षा सलाहकार थे, उनकी वजह से एजेंट बनना पड़ा। शेषनाग धारा की फाइल क्लोज होने के बाद वह मेरे साथ इस सफर पर निकली थी।

हम बातें ही कर रहे थे कि तभी किसी ने हमें पीछे से इसोइटाइन का गैस सुंघा कर बेहोश कर दिया। जब हमारी आंखें खुली तो हम दोनों ने खुद को एक छोटे कमरे में बंधा पाया। बहुत प्रयास करने के बाद हमनें खुद को रस्सी से आजाद कर लिया। हमारा सब सामान और पैसे सब वैसे के वैसे ही थे, बस वह कलश ही गायब था। उस जगह पर एक खंभा का अवशेष भी रखा था जिसमें उस कलश से मिलते जुलते कुछ निशान भी थे। मानसी ने उसके कुछ फोटो खींच कर वहां से निकलने को कहा।

हम उन निशानों को फॉलो करते हुए एक पुराने मंदिर में पहुंचे वहां पर हमें एक तहखाना मिला, जो कि मंदिर के पीछे पहाड़ी में था। उस तहखाने में ओड़िशा के राजा भुवनेश्वर के खजाने का कुछ हिस्सा रखा था।

सरकार ने हमें उस खजाने में से दस प्रतिशत की पेशकश की लेकिन हमने मनाह कर दिया। हम दोनों एक होटल में उसके परिवार वालों के साथ खाना खाने गए थे। वहां पर उसके पापा ने उसकी शादी की घोषणा अपने दोस्त के बेटे से की। मानसी बहुत ही खुश दिख रही थी, उसने और उसके परिवार वालों ने मुझे भी उसकी शादी में शामिल होने के लिए कहा। मैंने हामी भरी और किसी जरूरी काम का बहाना बना कर वहां से निकल आया। वो रात अपुन दो बजे तक पीया।

सुबह जब मेरी आंख खुली तब मेरे सामने एक चिट्ठी रखी थी। होटल वालों से पूछने पर उन्होंने कुछ पता होने से इंकार कर दिया। उस चिट्ठी में मुझे उसी मंदिर के पास बुलाया गया था जिसके पास हमें खजाना मिला था। पिछली बार मैं उस मंदिर में रखे मूर्ति के दर्शन नहीं कर पाया था, सोचा इस बार कर लुंगा।

मैं उस जगह खड़ा था। एक दो पुजारी वहां घूम रहे थे। सीढ़ियों के पास एक छोटा सा कुंड बना था। उस कुंड में चट्टान से पानी रिस कर आ रहा था। मेरे पीछे कोई खड़ा था, पीछे मुड़ने पर वहां एक साधु था। उसने अपने झोले से कुछ निकाल कर मुझे दिया। वह वही कलश था जो चोरी हो गया था। मैं कुछ कह पाता इससे पहले उस साधु ने मुझे सीढ़ी चढ़कर ऊपर मंदिर तक जाने के लिए कहा।

मैं उस कलश को लेकर ऊपर मंदिर में पहुंचा। वहां पर सात देवियां थीं। जिनमें से मैं केवल बीच वाली देवी को पहचानता था। वे देवियां एक एक कर कुछ बोलने लगीं। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था और मैं थोड़ा घबराया हुआ भी था। कुछ देर बाद मैंने एक अनजान जगह में खुद को खड़ा पाया। ये एक बड़ा गुफा था, जिसके अंदर पानी का एक बड़ा कुंड था। यह कुंड ठीक उसी कुंड की आकृति का था जो कि उस मंदिर के बाहर बना था। मैं उस कुंड के किनारे चलते हुए गुफा के दूसरे छोर कि ओर जाने लगा। दूसरे छोर से निकलने के पहले मैंने उस कलश में उस कुंड का पानी भर लिया था।

बाहर पहुंचने पर मैंने समुद्र को देखा। मैं जिस बड़े चट्टान में खड़ा था उसके नीचे खाई में समुद्र का जल स्तर बहुत ज्यादा था। मैं अचानक उस खाई में गिरने लगा। समुद्र की गहराई तक पहुंच कर मैंने महसूस किया कि मैं वहां पर बिना किसी कठिनाई के सांस ले सकता हूं। मैंने आंखें खोली तो सामने मुझे एक और छोटी सी गुफा दिखने लगी। अब मुझे फिर से उन्ही देवियों की आवाजें सुनाई देने लगीं। लेकिन इस बार मुझे सब साफ साफ समझ में आ रहा था।

मैं उस गुफा में घुस गया। उस गुफा के अंदर बहुत बड़ा जगह था। वहां पर मुझे मां समलेश्वरी की बहुत बड़ी दिव्य मूर्ति दिखी। मुझे गुफा के बाहर मिले उन निर्देशों के अनुसार मैंने उस कलश के जल से मां का अभिषेक किया। मां की दिव्य मूर्ति बहुत चमकने लगी और मैं वहां से सीधे उसी मंदिर पर पहुंच गया जहां से यहां आया था।

वहां पहुंचकर मैंने उसी साधु से बात की। उसने मुझे बताया इस सब का नाता शेषनाग धारा से है। हर बारह हजार साल में एक बार शेषनाग द्वारा प्रभु शिव को धरती पर कुछ समय के लिए शेषनाग कुंड में लाया जाता है। प्रभु शिव के दिव्य शिवलिंग से पवित्रता और दिव्यता प्राप्त उस कुंड का पानी एक दूसरे कुंड तक पहुंचता है और वहीं कहीं पर मौजूद मां की दिव्य मूर्ति को उसी जल से अभिषेक करवाने से इस ब्रह्मांड को चलने की शक्ति प्राप्त होती है। उस जगह और मां के दर्शन केवल उसी व्यक्ति को हो सकते हैं जिसका जन्म मां के कुल में हुआ हो, और वह व्यक्ति तुम हो।

मैं सब समझ गया, क्यों मुझे शेषनाग धारा के रहस्य को जानने के लिए हम्पी के उस कुंड के नीचे बने रास्ते के बारे में बताया गया और क्यों उस खजाने को ढूंढने के लिए ऐसी व्यवस्था की गई ताकि मानसी इस सब से दूर रहे, क्योंकि मानसी मेरे साथ रहती तो मैं उस जगह नहीं जा सकता था।

मुझे मानसी से दूर होने का थोड़ा दुःख तो हुआ लेकिन मैं इस कार्य को कर के भी खुश था। मैं इतने बड़े सफर में पहले अकेले निकला था, फिर मेरी मुलाकात मानसी से हुई और अब मैं फिर से अकेले था। मैंने उस मंदिर पर पूजा की, कुछ देर वहीं रुक गया और फिर मानसी की शादी में शामिल होने निकल पड़ा।

 समाप्त

लेखक - नवीन धनवर