आस्तिक ऋषि का जन्म (महाभारत की अनसुनी कहानियाँ -5)

 


गरुड़ की कहानी में हमने पढ़ा की कैसे कद्रू ने अपने हजार सर्प पुत्रों को राजा जनमेजय के सर्प-मेध यज्ञ में नष्ट होने का शाप दिया था।

ऐसा भयंकर शाप सुनने के बाद, सारे साँप इस शाप के परिणाम के बारे में चिंतित हो गए थे। फिर साँपों के नेता वासुकी ने सर्प-मेध यज्ञ में होने वाली साँपों की हानि को रोकने के लिए, संभावित समाधानों पर विचार-विमर्श करने के लिए सभी साँपों की एक बैठक बुलाई।

उस बैठक में जो साँप आ गए थे, उन्होंने सोच-विचार करके कई समाधान बाक़ी साँपों के सामने प्रस्तावित किए।

एक साँप ने सुझाव दिया कि जब राजा जनमेजय सर्प-मेध यज्ञ की घोषणा करेगा, तो उन्हें खुद को एक ब्राह्मण के रूप में बदलना चाहिए और राजा जनमेजय से सर्प-मेध यज्ञ रोकने का अनुरोध करना चाहिए।

एक दूसरे सर्प ने कहा कि जब तक राजा जनमेजय सर्प-मेध यज्ञ की घोषणा करे, तब तक हम बस ऐसे ही बैठे रहे यह उचित नहीं है। हमें अभी से खुद को एक विद्वान ब्राह्मण के रूप में बदलना चाहिए और राजा के साथ उसके परामर्शदाता के रूप में अभी से रहना चाहिए। जब राजा भविष्य में सर्प-मेध यज्ञ के बारे में सोचेगा, तो हम उसे यज्ञ के खिलाफ सलाह दे देंगे।

तिसरे साँप ने कहा, ‘जनमेजय हमारी बात सुनकर यज्ञ करने से इंकार करे, इसकी सम्भावना बहुत कम है। इसीलिए हमें यज्ञ को पूर्ण होने से रोकने की तरकीब सोचनी चाहिए। हम ख़ुद को बादलों के रूप में बदल सकते हैं और बारिश करके यज्ञ की आग बुझा सकते हैं।’ उस तिसरे साँप का समर्थन करते हुए एक और साँप बोला, ‘हम यज्ञ का घी चुराकर, या फिर यज्ञ का प्रसाद मल-मूत्र जैसे पदार्थों से अशुद्ध करके यज्ञ को रोक सकते हैं। ऐसा करने से, यज्ञ की पूर्ति नहीं होगी।’

अब तक साँपों ने हानिरहित समाधान ही सभा में प्रस्तुत किए थे, लेकिन जैसे-जैसे सभा आगे बढ़ने लगी, सभा के कुछ सदस्यों ने सर्प-मेध यज्ञ को रोकने के कुछ बुरे तरीकों का सुझाव देने में भी कोई कमी नहीं छोड़ी। एक साँप ने कहा, ‘हमें सर्प-मेध यज्ञ के संभावित पुजारी को मार देना चाहिए।’ उसका समर्थन करते हुए एक और साँप बोला, ‘में तो कहता हूँ कि हमें उन सभी लोगों को मारना चाहिए, जिन्हें सर्प-मेध यज्ञ का अच्छा ज्ञान है, क्योंकि हमें यह नहीं पता कि उस यज्ञ का मुख्य पुजारी कौन बनेगा।’

फिर एक साँप ने कहा, ‘मुझे लगता है कि पुजारी को मारना उचित नहीं है। में तो कहता हूँ कि जनमेजय का अपहरण कर लेते है।’ ऐसे कहके उस साँप ने बस जनमेजय के अपहरण करने का सुझाव दिया, लेकिन यह सुनकर दूसरे साँप ने तो जनमेजय को जान से मारने की इच्छा व्यक्त की। जब बाक़ी साँपों ने जनमेजय को मारने की बात सुनी, तो सारी सभा गम्भीर हो गई।

फिर उन्होंने वासुकी की ओर अपना रुख मोड़ा और सभा में प्रस्तुत किए हुए विभिन्न सुझावों पर उनकी राय माँगी। वासुकी ने कहा, 'मैं इनमें से किसी भी उपाय को स्वीकार नहीं कर सकता। मुझे लगता है कि केवल हमारे पिता, महान कश्यप ऋषि ही अब हमें इस भयानक शाप से बचा सकते हैं।'

जैसे ही वासुकी ने सभा में पेश किए हुए सारे उपाय ख़ारिज कर दिए, एलापत्र नाम का एक बुद्धिमान साँप बोल पड़ा, ‘अगर हमारे भाग्य ने सर्प-मेध यज्ञ में हमारा विनाश लिखा है, तो हम इसे रोक नहीं सकते। हमें अपने भाग्य को स्वीकार करना चाहिए। लेकिन, मुझे कुछ उम्मीद है। मैं आपको ब्रह्माजी और देवताओं के बीच हुए एक बातचीत के बारे में बताता हूँ। यह बातचीत तब हुई थी, जब हमारी माँ ने हमें ये भयंकर शाप दिया था। यह शाप इतना भयानक था कि देवता भी इस शाप से काँप उठे। फिर सारे देवता ब्रह्माजी के पास इस शाप के बारे में बातचीत करने पहुँच गए। तब देवता और ब्रह्माजी उनके बीच हुए संवाद को मैंने भी सून लिया। में वह संवाद अब तुम लोगों को भी सुनाता हूँ।’

एलापत्र ने फिर ब्रह्माजी और देवताओं के बीच हुए संवाद का वर्णन करना शुरू किया।

देवताओं ने ब्रह्माजी से कहा, ‘हे भगवन, कद्रू के भयावह शाप का अब क्या परिणाम होगा? क्या दुनिया से सारे साँपों का खात्मा हो जाएगा?’

फिर ब्रह्माजी ने देवताओं को उत्तर दिया, 'नहीं। इस शाप से सारे साँप नहीं मरेंग़े। जो साँप सदाचारी है, उन साँपों की सर्प-मेध यज्ञ में रक्षा होगी। लेकिन जो दुष्ट साँप निर्दोष जानवरों को खाते हैं, उनका सर्प-मेध यज्ञ में अवश्य विनाश होगा।'

देवताओं ने तब पूछा, 'लेकिन सदाचारी साँप ऐसे महाविनाशक यज्ञ से कैसे बचेंगे?'

ब्रह्माजी ने तब उत्तर दिया, 'आस्तिक नाम का एक महान तपस्वी सर्प-मेध यज्ञ को रोककर सदाचारि साँपों की रक्षा करेगा।’

फिर देवताओं ने पूछा, ‘यह आस्तिक कौन है?’

ब्रह्माजी बोले, ‘आस्तिक का जन्म होना अभी बाक़ी है। जरत्कारु नामक एक महान तपस्वी पृथ्वी पर पैदा हो चुका है। आस्तिक उनका बेटा होगा। जरत्कारु ऋषि की शादी वासुकी की बहन से होगी और उस दंपति को आस्तिक नाम का बेटा होगा। वासुकी की बहन का नाम भी जरत्कारु है। इस प्रकार, जरत्कारु नाम के ऋषि और जरत्कारु नाम की कन्या से आस्तिक की उत्पत्ति होगी।’

इसके बाद एलापत्र ने अपनी कहानी समाप्त की और अन्य साँपों से कहा कि वासुकी को साँपों की प्रजाति बचाने के लिए अपनी बहन की शादी जरत्कारु ऋषि से करानी चाहिए। एलापत्र का संदेश सुनकर, अन्य साँपों के दिल में आशा की किरण जाग उठी, लेकिन वासुकी को अभी भी सर्प-मेध यज्ञ को लेकर चिंता हो रही थी।

इस सभा के कुछ समय के बाद, वासुकी ने देवताओं से मित्रता की। फिर देवताओं ने उसकी मदद दूध-सागर के मंथन में अमृत प्राप्त करने के लिए माँगी। वासुकी ने उन्हें अपनी सहमति दे दी। जब देवता और दानवों ने अमृत के घड़े के लिए दूध-सागर का मंथन किया, तो वह उस मंथन में रस्सी बन गया। जब दूध-सागर के मंथन से देवताओं को अमृत मिल गया, तो देवता वासुकी ने की हुई मदद से खुश हो गए। फिर वासुकी ने देवताओं से अपने माँ के शाप के बारे में चर्चा की और उनसे इस दुविधा का हाल पूछा। देवताओं के पास भी इसका कोई उपाय नहीं था, तो सारे देवता वासुकी को ले के ब्रह्माजी के पास चले गए।

ब्रह्माजी के पास जाने के बाद, वासुकी ने अपने माँ के शाप बारे में ब्रह्माजी के सामने चिंता व्यक्त की।

फिर ब्रह्माजी ने कहा, 'वासुकी, तुम चिंता मत करो। तुम्हें वैसा ही करना चाहिए जैसा तुम्हें एलापत्र ने पहले ही सूचित कर दिया है। तुम तुम्हारी बहन की शादी जरत्कारु ऋषि से कर दो। उस दम्पति का पुत्र, आस्तिक, सारे साँपों को इस शाप से बचाएगा। जरत्कारु ऋषि अभी तो घोर तपस्या में लगे हुए हैं। सही समय आने पर, अपने बहन की शादी तुम उनसे करा देना।’

वासुकी ने ब्रह्माजी की सूचना को मान लिया और अपने बहन की शादी जरत्कारु ऋषि के करने की ठान ली।

वासुकी का हृदय ब्रह्माजी के वचन सुनकर थोड़ा शांत हो गया। फिर उसने अपने सभी साथी साँपों को जरत्कारु ऋषि पर कड़ी नजर रखने को कहा। उसने साँपों से कहा, ‘तुम सब मिलकर जरत्कारु ऋषि पर कड़ी नज़र रखना। जैसे ही जरत्कारु ऋषि पत्नी की तलाश करे, मुझे तुरंत सूचित कर देना।’

फिर सारे साँपों ने जरत्कारु ऋषि पर कड़ी नजर रखनी शुरू कर दी। ऐसे कई साल बीत गए। सांसारिक इच्छाओं से विरक्त होकर जरत्कारु ऋषि अपनी तपस्या में लगे हुए थे। वह जंगल में ध्यान लगाते, पेड़ों के फल खाते और अपना सारा समय ईश्वर चिंतन में बिताते।

एक दिन, जरत्कारु ऋषि जंगल में भटक रहे थे। तब उन्होंने कुछ तपस्वियों को एक गुफ़ा में उलटा लटके हुए देखा। उन तपस्वियों का शरीर एकदम जर्जर हो गया था। ऐसा लग रहा था, मानो बहुत महीनों से उन्होंने कुछ नहीं खाया। वह सारे तपस्वी एक सिर्फ़ एक धागे की मदद से उस गुफा में उलटे लटके हुए थे। दुःख की बात तो यह थी कि वह धागा भी, एक तेज दांतों वाला बड़ा चूहा, कुतर के खाए जा रहा था। ऐसा लग रहा था, मानो कुछ ही पल में वह धागा टूट जाएगा और फिर वह तपस्वी लोग गुफ़ा के ज़मीन पर गिर जाएँगे।

उनकी दयनीय दशा को देखकर, जरत्कारु ऋषि का दिल करुणा से भर गया। फिर जरत्कारु ऋषि ने उनसे कहा, 'हे मुनिवर, आप लोगों की ऐसी दशा देखकर मेरा हृदय दया से भर गया है। मैं अपनी सारी तपस्या आपको दान करने के लिए तैयार हूँ। मेरी तपस्या के प्रभाव से इस नरक से आपकी ज़रूर मुक्ति होगी। कृपा करके मुझे बताइए कि आपकी यह दशा कैसे हो गई?’

जरत्कारु ऋषि कि बात सुनकर, उन जर्जर तपस्वियों ने उत्तर दिया, 'हे ब्राह्मण, हम आपकी दया के लिए आपके आभारी हैं, लेकिन आपकी तपस्या हमारे किसी काम की नहीं है। हमारे पास तो हमारे ख़ुद की तपस्या का फल है। लेकिन वह फल भी हमारे किसी काम का नहीं है। हम इस बिकट स्थिति में हैं, क्योंकि हमारा वंश ख़तरे में है। अभी तो हमारे पास एक वंशज है, लेकिन वह वंशज भी कठिन तपस्या करने में व्यस्त है। इसके कारण, उसे संतति होने की कम सम्भावना है। इस प्रकार, भविष्य में कोई वंशज ना होने के कारण, हमें मुक्ति नहीं मिल रही हैं। यह धागा हमारे अंतिम वंशज का प्रतिनिधित्व करता है और यह बड़ा चूहा समय का प्रतिनिधित्व करता है। हमारा आखरी वारिस भी धीरे-धीरे मौत के मुँह में जा रहा है और जैसे ही यह धागा टूट जाएगा, उसका जीवन ख़त्म हो जाएगा। धागा टूटते ही, हम लोग अनंत काल के लिए इस अंधकारमय गुफ़ा के ज़मीन पर गिर जाएँगे। हमारे आखरी वंशज की मृत्यु होते ही हमारा वंश ख़त्म हो जाएगा। फिर हमारा श्राद्ध करने के लिए कोई नहीं रहेगा और हमें कभी भी मुक्ति नहीं मिलेगी।’

फिर जरत्कारु ऋषि ने उन तपस्वियों से पूछा, ‘अगर ऐसी बात है, तो मेरी तपस्या आपको किसी काम नहीं है। लेकिन, क्या में आपकी किसी और तरह से मदद कर सकता हूँ?’

तपस्वियों ने फिर जरत्कारु ऋषि से कहा, ‘हे तपस्वी, यदि तुम हमारी मदद करना चाहते हो, तो एक काम करो। अगर तुम हमारे आखरी वंशज से मिलते हो, तो उसे हमारा संदेश दे दो। उसे शादी करने के लिए और हमारे वंश को आगे बढ़ाने के लिए कहो। बस यही हमारी मुसीबतों का एकमात्र उपाय है। हमारे आखरी वंशज का नाम ‘जरत्कारु’ है!'

जैसे ही जरत्कारु ऋषि ने तपस्वियों के वचन सुने, वह उनके चरणों में गिर पड़े और उनके नेत्रों से अश्रुओं की धाराएँ बहने लगी। अश्रुपूर्ण नेत्रों से जरत्कारु ऋषि ने अपने पूर्वजों से कहा, 'मैं ही आपका अंतिम वंशज हूँ। मेरा ही नाम जरत्कारु है। मेरी वजह से आपको इतने कष्ट उठाने पड़ रहे हैं। इसके लिए में बहुत शर्मिंदा हूँ। मैं जल्दी से एक पत्नी खोज लूँगा और आपके उत्थान के लिए विवाह करके अपना वंश आगे बढ़ाऊँगा।’

तब जरत्कारु ऋषि के पूर्वजों ने उनसे कहा, 'जरत्कारु, हमें अच्छा लगा कि तुमने विवाह करके अपना वंश आगे बढ़ाने की ठान ली है। लेकिन इतने लंबे समय तक ब्रह्मचारी रहने का क्या कारण है?'

जरत्कारु ऋषि ने उत्तर दिया, 'मैंने ब्रह्मचर्य का व्रत इसलिए रखा क्योंकि मैं अपने वीर्य को ऊर्ध्वगामी करके, योग में ऊँचाई प्राप्त करना चाहता था। मैं अब आपके उद्धार के लिए विवाह करूँगा, लेकिन मेरी कुछ शर्तें हैं। लड़की का नाम मेरे नाम जैसा ही ‘जरत्कारु’ होना चाहिए। लड़की ने विवाह के लिए ख़ुद अपनी इच्छा से मेरे पास आना चाहिए और हमारे परिवार की भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर नहीं होनी चाहिए, क्योंकि में संसार बंधन में नहीं फँसना चाहता।’

इस प्रकार अपनी शर्तें अपने पूर्वजों को बताने के बाद, जरत्कारु ऋषि ने अपने पूर्वजों का आशीर्वाद लिया और वहाँ से चल पड़े।

फिर जरत्कारु ऋषि पत्नी की तलाश में घूमने लगे। लेकिन वृद्धावस्था के कारण लंबे समय तक उन्हें पत्नी नहीं मिली।

ऐसे ही समय बितता रहा। इतने दिन भटकने के बाद भी, जरत्कारु ऋषि को पत्नी नहीं मिल रही थी। वह अपने पूर्वजों के साथ किए गए समझौते को याद करके बहुत व्यथित थे। एक दिन, जब वह जंगल में भटक रहे थे, तब उन्होंने बड़े जोर से पुकार लगायी, 'जंगल में रहने वाले तमाम जीवों, मैं अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए विवाह करना चाहता हूँ। यदि किसी के पास विवाहयोग्य कन्या है, तो मैं उससे शादी करने के लिए तैयार हूँ।’

तब जरत्कारु ऋषि की पुकार उनपर नज़र रखने वाले साँपों ने सुनी, तब उन्होंने वासुकी को इस घटना के बारे में सूचित किया।

वासुकी तुरंत अपनी बहन के साथ जंगल में प्रकट हुआ और जरत्कारु ऋषि को अपने बहन के साथ शादी करने के लिए विनती की।

जरत्कारु ऋषि ने फिर वासुकी के सामने अपनी शर्त रख दी और वासुकी को बताया कि परिवार के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी वह अपने ऊपर नहीं लेना चाहते। फिर वासुकी ने अपनी बहन और जरत्कारु ऋषि के भरण-पोषण की जिम्मेदारी स्वयं के ऊपर ले ली।

इसके बाद, जरत्कारु ऋषि ने विवाह के लिए सहमति दे दी।

दोनो का विवाह होने के बाद, वे वासुकी ने बनाए हुए एक सुंदर घर में रहने लगे। एक दिन, जरत्कारु ऋषि ने अपनी पत्नी से कहा, ' कभी कुछ ऐसा मत करना, जो मुझे नाराज कर दें। यदि में नाराज़ हो गया, तो में घर छोड़के चला जाऊँगा।’ उनकी पत्नी ने फिर उनसे कहा कि जरत्कारु ऋषि नाराज़ ना हो, इसका वह ख़याल रखेगी।

ऐसे ही कुछ साल बीत गए और जरत्कारु ऋषि की पत्नी गर्भवती हो गई।

एक दिन, जरत्कारु ऋषि अपनी पत्नी की गोद में सो रहे थे। शाम हो चुकी थी और सूरज क्षितिज से ढलने वाला था। तब जरत्कारु ऋषि की पत्नी को एक द्विधा मनःस्थिति का सामना करना पड़ा। वह इस सोच में डूब गई कि वह जरत्कारु ऋषि को नींद से जगाए या नहीं? अगर वह जरत्कारु ऋषि को नहीं जगाती है, तो जरत्कारु ऋषि की शाम की संध्या छूट जाएगी और उनकी साधना अधूरी रह जाएगी। लेकिन अगर वह जरत्कारु ऋषि को नींद से जगा देती है, तो शायद वह ग़ुस्सा हो जाएँगे और फिर घर छोड़कर चले जाएँगे। फिर जरत्कारु ऋषि की पत्नी ने सोचा कि जरत्कारु ऋषि के साधना की हानि बहुत बड़ी हानि है, इसलिए उन्हें नींद से जगा देना चाहिए।

ऐसा सोचकर जरत्कारु ऋषि की पत्नी ने उन्हें नींद से जगाया और उनसे शाम की संध्या करने का अनुरोध किया।

जैसे ही जरत्कारु ऋषि अपनी नींद से जाग गए, वह अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, 'तुमने मेरी नींद में बाधा डालकर, मुझे अपमानित कर दिया है। तुम्हारे इस बर्ताव से में नाराज़ हो गया हूँ, इसलिए में अब घर छोड़कर फिर से वन में चला जाऊँगा।’

जरत्कारु ऋषि की पत्नी ने उनसे निवेदन किया कि उनके पुत्र का जन्म होना अभी बाकी है और जब तक उनके पुत्र का जन्म नहीं होता, तब तक वह घर पर ही रुक जाए।

लेकिन जरत्कारु ऋषि ने घर पर रुकने से माना कर दिया। उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, ‘जब मैंने वन में जाने का मन बना लिया है, तो अब मुझे घर नहीं रुकना चाहिए। लेकिन मेरे ना होने से, तुम चिंतित मत होना। अपना बेटा सूखरूप इस धरा पर आएगा और वह एक महान ऋषि बनेगा। अपने ज्ञान की शक्ति से सूर्य की तरह वह पूरी दुनिया में चमक उठेगा।'

इतना कहकर जरत्कारु ऋषि ने वन में प्रस्थान कर दिया।

जरत्कारु ऋषि के वन में चले जाने के बाद, उनकी पत्नी वासुकी के पास गई। उसने अपने भाई को अपनी गर्भावस्था के बारे में और जरत्कारु ऋषि के घर छोड़कर जाने के बारे में जानकारी दी।

फिर वासुकी ने अपनी बहन को ढाँढस बँधाया और उसे चिंता न करने के लिए कहा। भाई का कर्तव्य निभाते हुए, उसने अपने बहन और उसके होने वाले बच्चे की ज़िम्मेदारी उठा ली।

कुछ समय बाद, जरत्कारु ऋषि की पत्नी ने एक तेजस्वी बच्चे को जन्म दिया। उस बच्चे का नाम ‘आस्तिक’ रखा गया।

आगे चलकर, आस्तिक एक प्रख्यात ऋषि बन गए, जिन्होंने सर्प जाति को राजा जनमेजय के सर्प-मेध यज्ञ में विनाश से बचा लिया।